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Poesy - कवितायन

मनोरमा प्रकृति

Malvika Malvika   |   ISSUE V

झर झर झर झर गिरता झरना,
कल कल कल कल बहती नदियाँ।
सी-सी-सी-सी स्निग्ध शीतल हवाएं,
सबमें देख प्रकृति के रूप हैं समाए।।

धवल घन विराजे नीले आसमा में,
सूरज उगे संदेशा नए दिन के लिए।
चंदा फैलाएँ चाँदनी बदन तड़पाए,
ऊँचा नग कहे सिर उच्च अटल रहे।।

पेड़ो से हैं बढ़ी धरती में हरियाली,
जीव जगत अविघ्न घूमे दिवा-रात्रि।
पुष्प खिल मनोरम बनी सुंदर पृथ्वी,
लहरे उठती-गिरती होकर मतवाली।।

अद्भुत वरदान यह मिला प्रभु से है,
प्रकृति अविरत हमें सींचती आई है।
निश्चित जीवन सुखमय बन पाया है,
इसी नैसर्गिक सौंदर्य में मिटना है।।

प्रकृति की देखभाल धर्म अपना हैं,
गोदी में सर रख जहाँ सोना हमें हैं।
अंधी कटाई यूँ पेड़ो की रोकना है,
शस्य श्यामला रूप देकर जीना हैं।।


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Malvika Malvika