ओ जिन्दगी देखा है मैंने अक्सर,
तू नहीं चलती हिसाब से,
परोस देती है ,
दुःख - सुख बेहिसाब
बेतरतीब,
लाखों नम आँखें,
कृशकाय जर्जर
क्षुधित उदर
आँखों की कोटरें
याचित पूँजीपतियों के द्वार
मूँगफली बांटते
दुःख पीड़ा से
बेपरवाह
मुस्कुराते, खिलखिलाते
व्यवस्था चलाते
मृत शरीर का
बोल लगाते, घोषणा करते
छीन उनकी जिंदगी
ए ज़िन्दगी, तू क्यों है
इतनी बेहिसाब?
वाराणसी में सन् 1957 को जन्मी डॉ. अनीता पंडा की कर्मभूमि सन 1984 से मेघालय की राजधानी शिलांग रही है। यहाँ की लोक-संस्कृति आदि पर हिन्दी में लेखन तथा हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु संलग्न हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं से भी जुड़ी हैं।सम्प्रतिः आप वरिष्ठ शोधकर्ता, आई. सी. एस. एस. आर., दिल्ली एवं अतिथि प्रवक्ता मार्टिन लूथर क्रिश्चियन विश्वविद्यालय, शिलांग, वरिष्ठ लेखिका, अनुवादक, कवियित्री, समीक्षक एवं सह-संपादिका "का जिन्शाई/ज्योति", दूरदर्शन मेघालय एवं पूर्वोत्तर सेवा आकाशवाणी, शिलांग में कार्यक्रमों का संचालन। राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान 2015, आकाशवाणी नई दिल्ली के विदेशी प्रसारण सेवा प्रभाग द्वारा संगीत रूपक नौह का लिकाई के संगीत रूपक लेखन हेतु प्रथम पुरस्कार-2009 में, नौ पुस्तकें प्रकाशित, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन में कार्यक्रम संचालन, सक्रिय भूमिका, देश-विदेश में सरकारी-गैर सरकारी प्रतिष्ठित संगोष्ठियों में भागीदारी, पुरस्कृत एवं सम्मानित, मेघालय की जनजातीय संस्कृति एवं लोक पर शोध।