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लघुकथा

कर्नल साहब

Nita Sharma   |   ISSUE VI

आज माँ को सिधारे पंद्रह दिन हो गए। सब नाते रिश्तेदार जा चुके थे। घर में कर्नल साहब तथा बेटा बहु और बेटी रह गए थे। रिटायर्ड कर्नल थे वो। रुतबे के मुताबिक ही खूब रौबदार और निहायत ही सख़्त किस्म के फौजी थे। रिटायर हुए लगभग दो वर्ष हो गए थे पर क्या मजाल किसीकी की घर को छावनी से बदलकर घर में परिवर्तित किया जा सके। आज भी पूर्णतया फौज के अनुशासन वाला कड़ा कानून ही चलता था घर में। माँ बेचारी ने जाने कैसे सारी उम्र काट दी एक फौजी का हुक्म सहते सहते। सारा परिवार अपने अफसर के आगे सदैव “यस सर” की मुद्रा में ही दिखाई देता।

कभी भी माँ से एक पति की तरह बात करते या हँसते-बोलते नहीं देखा था उनको। माँ भी तो बिना किसी शिकवा-शिकायत के, एक आदर्श भारतीय नारी के समान उनकी सेवा में रत रहती दिन रात। बस एक ही शौक बचा था माँ को, रेडियो पर फिल्मी गाने सुनने का। एक छोटा-सा ट्रांजिस्टर छुपा कर रखती थी अपने पास। जब भी समय मिलता अक्सर माँ गाने लगा कर साथ में गुनगुनाती थी। मगर पिताजी की गैर हाजिरी में ही ये संभव हो पाता। कर्नल साहब जानते थे माँ के इस शौक को पर क्या मजाल की कभी साथ मिलकर आनंद ले लेते। पिछले पंद्रह दिनों में बेशक मायूसी दिखी थी कर्नल साहब के चेहरे पर, लेकिन आँखों से एक बूंद ऑंसू बहते न दिखा किसीको।इतना भी क्या सख्त होना की जिस औरत ने सारी उम्र दे दी उनके घर परिवार को, उसके जाने का भी गम नहीं। सभी रिश्तेदार भी आपस में कानाफूसी करते दिखे।

“अजीब ही कड़क इंसान हैं ये! अरे इतना भी क्या सख़्त होना कि सावित्री जैसी पत्नी पर भी दो बूँद ऑंसू नहीं दिखे इनकी आँखों में। ”
“अरे कितने सख्त दिल हैं अपने कर्नल साहब। मजाल है जो एक ऑंसू भी निकला हो आँख से।”बेटा, बेटी को पिता की आदत पता थी पर इतने संगदिल होंगे उन्होंने भी सोचा न था। माँ के जाने से ज्यादा पिता के इस रूप को देखकर दिल व्यथित था दोनों का। एक बार भी पिता ने माँ की किसी बात का ज़िक्र तक नहीं किया। बिल्कुल चुप्पी साध ली थी। हमेशा की तरह काम की या कोई जरूरी बात ही की थी इतने दिन से।
आज भी रोजमर्रा की तरह रात को ठीक 8 बजे खाना खाकर आधा घंटा बाहर लॉन में टहलने के बाद ठीक नौ बजे अपने कमरे में चले गए थे कर्नल साहब।
सुबह ठीक 6 बजे उठ जाते थे और माँ हाथ में चाय का कप लिए खड़ी होती थी। चाय पीकर सुबह की सैर को निकल जाया करते थे। बीते पंद्रह दिन से भी यही दिनचर्या की शुरुआत थी उनकी। फर्क बस इतना था कि चाय अब बेटी बनाकर तैयार कर देती है। आज भी चाय का कप लेकर पापा को देने कमरे में चली गई। दरवाजे से झाँका तो स्तब्ध हो गई। अरे ये क्या? पापा और माँ का ट्रांजिस्टर! अपनी आँखों पर यकीन न हुआ ये देखकर कि कर्नल साहब आराम कुर्सी पर माँ का ट्रांजिस्टर गोद में रखे आंखे मूंदे कुछ सुन रहे थे। क्या ये कर्नल साहब ही हैं, उसके रौबीले पिता। बुत बनी देखती रही। आँखों में पानी भर आया और दरवाजा खटखटा सीधे अंदर घुस गई।
“पापा आपकी चाय?”
पर ये क्या? किसको पुकार रही थी वो। एक निर्जीव शरीर पड़ा था वहां तो। सख़्त दिल पापा तो माँ के पास जा चुके थे


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Nita Sharma