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Khasi / Hindi Articles

मोच

डॉ. सुशीला ढाका   |   ISSUE VII

 

कई दिनों से पाँव में दर्द होने के कारण खाना बनाने वाली बाई केवल सुबह ही आ पाती है l और उसमे भी बीच बीच में नागा कर लेती है अतः रात का खाना हम दोनों माँ -बेटी मिल कर ही बनातीं हैं इसीलिए रात का भोजन एक साथ बैठ कर ही कर लेते हैं l
इन्होंने हम दोनों से पहले खाना खा कर अपनी थाली खिसकाते हुए कहा -- ये भी रख देना और तुरंत खड़े हो कर सिंक की ओर मुड़ गए l
बेटी जो विदेश से कुछ महीनों पहले ही कोरोना के चलते मेरे पास यहाँ आई हुई है, तपाक से बोल पड़ी ----पापा अपनी थाली ख़ुद रखा करो, आप के जूठे बर्तन उठाते -उठाते मेरे हाथ में मोच आ गयी !
सुनते ही मुझे हँसी आ गयी !
सच में ही बेटी के हाथ में मोच आ गयी थी या आज कल के बच्चों की उच्शृंखलता झलक रही थी या कि उसने भारतीय मर्दों की सोच पर प्रहार करना चाहा था l

रात को बिस्तर में देर तक नींद नहीं आयी , जाने कितनी ही पिताजी की बातें एक मधुर एहसास लिए हुए , चलचित्र की भांति दिखाई देने लगीं l वो हमेंशा ही अपने जूठे बर्तन उठाते ही नहीं बल्कि माँजा भी करते थे l
इतना ही नहीं वे हमेंशा अपने पहनने के कपड़े धो कर प्रेस भी ख़ुद ही किया करते थे l बटन भी अपने आप ही टाँका था एक बार मेरे आग्रह के बावज़ूद भी l और न जाने कितने ही कार्यों में वो माँ का हाथ बँटाया करते l दही बिलौना तो जैसे उन्हीं की जिम्मेदारी हो l मैं जब दसवीं में थी तो उन्होंने मेरे हिस्से का काम भी सहर्ष किया था ताकि मुझे पढ़ने के लिए अधिक समय मिल सके l मेरे नौकरी पेशा पिता भी पूर्णतः भारतीय ही तो थे l
आज सुबह ही बाई का फ़ोन फिर आ गया उसकी बेटी ने उधर से कहा माँ के तेज बुख़ार है आज नहीं आएगी lमैं कुछ कह पाती उससे पहले ही फ़ोन काट दिया l अच्छा हुआ ऐसे में कहने को मेरे पास था ही क्या ? और मैं रसोई की तरफ जाते हुए सोचने लगी मेरे हाथ की मोच तो यूँ ही बर्तन धोते हुए ठीक हो जाएगी, हमेंशा की तरह l
अवनीत कौर दीपाली, का जालंधर पंजाब में जन्म हुआ। इनकी तुकांत, अतुकांत,लघुकथा, कहानी कई समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई है। अनेकों पत्रिका जैसे गृहशोभा, सरिता, वनिता गृहलक्ष्मी और असम की अनेकों पत्रिकाओं में इनकी कविताएं ज्ञापित हुई है।


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डॉ. सुशीला ढाका