Ka Jingshai
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Poesy - कवितायन

श्री राम वन्दना

Ka Jingshai-The Light   |   ISSUE VII

श्री रामचन्द्र दया निधान,
दयालु हे! जगदीश्वरम्।
तम तोम तारक सुर सुधारक,
सौम्य हे! सर्वेश्वरम्।
मन मणि खचित रवि निकर
सम, छविधाम आप जगत्पते।
सौन्दर्य की उस राशि के
आधार हों सीतापते!
लखि रूप मोहित देव सब
ब्रम्हा, उमा-महेश्वरम्।
श्री रामचन्द्र दया निधान,
दयालु हे! जगदीश्वरम्।
शत् काम लज्जित राम तव
आनन निहारि निहारि के।
सँग नारि सीता रूप छवि,
नव कलित रूप निवारि के।
अस सुयश गावहिं जगत के
सब मनुज हे! अखिलेश्वरम्।
श्री रामचन्द्र दया निधान,
दयालु हे! जगदीश्वरम्


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Ka Jingshai-The Light