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Poesy - कवितायन

मौसम के नाम

Om Prakash Dhiraj   |   ISSUE VIII

मौसम के नाम लिखा
ख़त एक अनाम ने,
बेच रही पुरवाई
हर घर के सामने.
कजरारे मेघ तेरे
यहाँ-वहाँ बरसे,
चातक की प्यास के लिए
होथ यहाँ तरसे,
रात भर जगी सुबह
शबनम की आस
शबनम की आस मुझमें
छीन लिया जिसे कोई मदमाती शाम ने

रातों ने फैलाई जब
लंबी बातें,
भोर तलक तड़प उठी भर ठंडी आहें,
चादर से बाहर जब
कुहरे का पाँव हुआ,
टैब छिड़का चुटकी भर
धूप दिनमान ने

‘बौराये’ आमों के बौर-बौर महके,
‘रसमातल’ गन्ने कि पोर-पोर दहके,
कनफुसिया करे मटर
चना भरे आह रे,
लगता है छोड़ दिया एक तीर काम ने!

जल जाए धरती का
हरा -भरा अँचरा ,
तब भी पसीजे ना
निर्मोही बदरा
कोयल पपीहे भी
मौन हुए खौफ से,
लगता है दे डाला
फतवा इमाम ने!


author
Om Prakash Dhiraj