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रामकथा में शूर्पणखा

प्रो० डॉ० सविता कुमारी श्रीवास्तव   |   ISSUE IX

 

रामायण भारतीय अस्मिता का अनूठा ग्रंथ है। रामायण शब्द बाल्मीकि की निजी उ‌द्भावना है। आदिकवि की आर्ष भावना के अनुसार रामायण केवल रामकथा नहीं है बल्कि वह प्रमुखतः राम का अयन है। 'अयन' शब्द का तात्पर्य गतिशीलता से है, जो राम के सम्पूर्ण जीवन वृत्तान्त से उद्घाटित होता है अर्थात् राम के जीवन में गति ही गति है। वास्तव में रामायण केवल राम का अयन नहीं है, बल्कि रामा (सीता) का भी अयन है। राम व सीता की समन्वित जीवन शैली रामायण में वर्णित है। हिन्दी साहित्य के पुरोधा कवि गोस्वामी तुलसीदास राम के अनन्य भक्त थे। उन्होंने राम के जीवन वृतान्त पर आधारित एक महत्वपूर्ण ग्रंथ की संरचना की - 'रामचरित मानस'। यह सर्वविदित है कि रामचरितमानस केवल ग्रंथ नहीं बल्कि वह हिन्दू धर्म का पवित्र दस्तावेज है। इसमें तुलसीदास ने जीवन के विविध रंगों का समायोजन किया है जहाँ पग-पग पर धर्म, संस्कृति, कला व लोक जीवन है। जहाँ सम्बन्धों व भाई-भाई को प्रेम प्रगाढ़ता चरम सीमा पर है। जहाँ रिश्तों की सही पहचान है। ऊँच-नीच के भेद-भाव को मिटाकर केवल प्रेम की गंगा प्रवाहित है। जहाँ छल, धोखा व अधर्म पर धर्म व प्रेम की विजय दिखायी गयी है।
मुख्यतः रामकथा भारतीय साहित्य, संस्कृति और कला का जीवन है। भारतीय जनमानस की आस्था, उसके विश्वास का सत्य, जीवन का शिवत्व एवं सामाजिक चिंतन का चिरंतन सुंदरम् उसी में नित रूप धरता है। रामचरित मानस में तुलसीदास जी ने राम के जीवन की अनेक घटना क्रमों से जोड़ते हुये एक आदर्श रूप प्रस्तुत किया है जिसमें अनेक पुरुष व स्त्री पात्रों की अहम् भूमिका रही है। रामचरित मानस की कथा सात काण्डों में वर्णित है। मानस के सभी पात्र अपने अभिनय में खरे उतरते हैं। मानस के प्रमुख स्त्री पात्रों में सीता, कैकेयी, कौशल्या, सुमित्रा, अहिल्या, अनसूया, शबरी, मन्दोदरी, त्रिजटा और शूर्पणखा है। सीता मानस् की नायिका है।
वह समस्त सद्‌गुणों की आदर्श प्रतिमा तथा समस्त विभूतियों की साकार मूर्ति हैं। इसके ठीक विपरीत शूर्पणखा मानस की खलनायिका है। वह सीता की प्रतिद्वन्द्वी है क्योंकि राम का जीवन उससे प्रभावित होता है। सीता का प्रेम राम के प्रति उपासना भावना से युक्त है जबकि शूर्पणखा के प्रेम में केवल वासना का आकर्षण है क्योंकि वह तो राम के मोहिनी मूरति से प्रभावित होती है। तुलसीदास जी ने स्त्री धर्म के संदर्भ में कहा है कि शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना बस यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है क्योंकि पति का अपमान करने वाली स्त्री यमपुर में अनेक प्रकार के दुःख पाती है।
"ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना।। 
एकइ धर्म एक व्रत नेमा। काय वचन मन पति पदप्रेमा।।" 
सीता का चरित्र स्त्रियों के लिए सौभाग्यसूचक है। राम उन्हें प्राणों के समान प्रिय हैं। शूर्पणखा का चरित्र राम के जीवन घटना क्रम को बदल देता है। यह परिवर्तन राम को अप्रत्याशित दिशा की ओर ले जाता है। जिस प्रकार कुटिल बुद्धि मन्धरा की दुष्विचार से प्रभावित होकर दशरथ की सबसे प्रिय रानी कैकेयी की अपने पुत्र भारत के संदर्भ में राजमोह की लालसा जाग्रत हो जाती है और रामको चौदह वर्ष का वनवास दिलाकर अयोध्या से अलग करती है। इसी प्रकार शूर्पणखा का पंचवटी में अचानक का आगमन और राम-लक्ष्मण का सहज सात्विक परिहास राम-रावण के वैर का बीजारोपण करता है और राम से सीता को अलग कर देता है। राम के जीवन की दोनों घटनायें  रामचरितमानस को अप्रत्याशित किन्तु अभीष्ट दिशा में ले चलती है। इस दृष्टि से शूर्पणखा प्रसंग रामकथा को गति प्रदान कर महत्वपूर्ण योग देता है।
रामचरितमानस का चौथा काण्ड 'अरण्य काण्ड' महत्वपूर्ण काण्ड है। पिता दशरथ द्वारा वनवास दिये जाने पर राम, लक्ष्मण व सीता सहित वन-वन भटकते हुए अनेक राक्षसों का वध करते आगे बढ़ते जा रहे थे।
अनेक स्थानों पर उन्होंने मुनिजनों का आश्रय लिया। अपने वनवास की इस यात्रा में वे पंचवटी नामक स्थान पर पहुँचते हैं। पंचवटी 'नासिक' का बहुत ही सुन्दर स्थान है। चारों तरफ हरे-भरे वृक्ष युक्त हरियाली व गोदावरी नदी की कल-कल ध्वनि किसी के मन को मोहित कर सकती है। पंचवटी का दृश्य बड़ा ही मनोरम व हृदयंगम है। राम, लक्ष्मण व सीता सहित वहाँ कुटिया बनाकर वनवास का समय व्यतीत करते हैं एवं पंचवटी की महत्ता को द्विगणित करते हैं। इस प्रसंग में तुलसी दास जी ने राम की महिमा का गान किया है-
"बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकामा, तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा विश्राम।।" 
राम का मर्यादित व उदात्त अलौकिक व्यक्तित्व सीता की मोहिनी, सुकोमला रूप सौन्दर्य व लक्ष्मण की पौरूष व्यक्तित्व किसी को भी आकर्षित कर सकता था। शूर्पणखा का प्रवेश अरण्य काण्ड में होता है। यहाँ से राम की कथा में एक नया मोड़ आता है। गोदावरी के पवित्र सरित्प्रवाह में स्नान कर सीता, राम और लक्ष्मण पंचवटी की सुन्दर छाया में सुनहरी घड़ियाँ व्यतीत करते रहते हैं तभी आकस्मिक ढंग से शूर्पणखा का प्रवेश होता है। एक दिन सुबह के समय शूर्पणखा दण्डकवन में घूमते हुए राम के अद्वितीय सौन्दर्य को देखकर मुग्ध हो जाती है और अपनी जिज्ञासा और वासना को संतुष्ट करने के लिये पंचवटी के आश्रम में पहुँच जाती है-
"सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारून जस अहिनी ।। 
पंचबटी सो गई एक बारा। देखि बिकल भई जुगल कुमारा।।" 
शूर्पणखा रावण की एक बहिन थी, जो नागिन के समान भयानक और दुष्ट हृदय की थी। वह एक बार पंचवटी में गयी और दोनों राजकुमारों को देखकर विकल (काम से पीड़ित) हो गयी। राम के सौन्दर्य से आकर्षित होकर वह विवाह का प्रस्ताव रखती है-
"रुचिर रूप घरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसकाई ।।
तुम्ह सम पुरुष न मो समनारी। यह संजोग विधि रचा बिचारी।।" 
शूर्पणखा अपने राक्षसी रूप से सुन्दर रूप में परिवर्तित कर प्रभु राम के पास जाकर मुस्कराते हुये बोलती है कि न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है, न मेरे समान स्त्री। विधाता ने यह संयोग (जोड़ा) बहुत विचार कर रचा है। शूर्पणखा राम से कहती है मैंने तीनों लोकों की खोज कर देख लिया है कि मेरे योग्य पुरुष (वर) जगत भर में नहीं है इसी कारण मैं अबतक कुमारी अर्थात् अविवाहित हूँ, परन्तु तुम्हें (राम को) देखकर यह चित्त कुछ ठहरा है. अतः मैं तुम्हें अपना वर बनाना चाहती हूँ। इस पर राम सीता की ओर देखकर शूर्पणखा को लक्ष्मण के पास भेजते हैं कि वह कुमार हैं। तब वह लक्ष्मण के पास जाती है। लक्ष्मण उसे शत्रु की बहिन समझकर एवं प्रमु की ओर देखकर कोमल वाणी से बोलते हैं-
"सुदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहि तोर सुपासा ।।  
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा ।।" लक्ष्मण कहते हैं कि मैं तो उनका दास हूँ एवं पराधीन हूँ अतः तुम्हें सुख न होगा। प्रभु समर्थ हैं व कोसलपुर के राजा हैं वे जो कुछ करें सब उचित है। अतः तुम्हारे लिये मेरे बड़े भाई राम ही सर्वथा योग्य हैं और तुम भी उनके लायक हो। उनकी छोटी पत्नी बनने में कोई बुराई नहीं है। लक्ष्मण बड़े चतुराई से यह कहते हैं कि वह तो सीता से अधिक सुन्दर योग्य और सुपात्र है। शूर्पणखा दोनों भाइयों की चतुराई को समझ नहीं पाती है और सचमुच में स्वयं को सीता से अधिक सुन्दर समझती है। वह फिर राम राम के पास पहुँच जाती है -
"पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई ।। 
लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई ।।" 
तब राम फिर से उसे लक्ष्मण के पास भेजते हैं इस पर लक्ष्मण जी ने कहा - तुम्हें वही बरेगा जो लज्जा को तृण तोड़कर (अर्थात् प्रतिज्ञा करके)
त्याग देगा (अर्थात् जो निपट निर्लज्ज होगा)। तब शूर्पणखा क्रुद्ध होकर राम जी के पास जाती है और उनके समक्ष अपना भयंकर रूप प्रकट करती है जिसे देखकर सीता भयभीत हो जाती हैं तब तत्काल राम जी लक्ष्मण जी को इशारा करते हैं। राम का इशारा पाकर लक्ष्मण जी ने बड़ी फुर्ती से उसको (शूर्पणखा को) बिना नाक-कान की कर दिया अर्थात् लक्ष्मण शूर्पणखा के नाक-कान काट देते हैं। एक प्रकार से वे रावण को चुनौती दे देते हैं-
"लछिमन अति लाव सो नाक कान बिनु कीन्हि।
ताके कर रावन कहें मनौ चुनौती दीन्हि।।" 
शूर्पणखा लक्ष्मण द्वारा किये गये इस कृत्य से अत्यंत अपमानित होकर और बावली हो जाती है। नाक-कान कटने की असह्य वेदना के साथ वह रोती-बिलखती,
चीखती-चिल्लाती फिर जंगल में उसी स्थान पर वापिस अपने भाइयों खर-दूषण के पास चली जाती और और बीती हुई पूरी घटना क्रम को सुनाती है। इस पर खर-दूषण क्रोधयुक्त राक्षसों की सेना तैयार कर राम से युद्ध करने के लिए तत्पर हो जाते हैं।
शूर्पणखा मुख्य रूप से राम-लक्ष्मण के सौन्दर्य से आकर्षित तो होती है परन्तु स्त्री होने के नाते वह सीता के सुकोमल रूप सौन्दर्य से भी बहुत प्रभावित होती है और यही भावना ईर्ष्या का रूप धारण करती है। राम और लक्ष्मण से अपमानित होने पर अब वही ईर्ष्या प्रतिहिंसा बन जाती है। अतः उसका क्रोध राम व लक्ष्मण से अधिक सीता के प्रति अधिक है। इसी कारण वह अपने भाइयों से बदला लेने के संदर्भ में सीता को भी समाप्त करने की बात कहती हैं क्योंकि तभी उसके अन्दर की वेदना शांत होगी।
अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए खर-दूषण राक्षसों की भयानक सेना लेकर राम से युद्ध करने के लिए पहुँच जाते हैं जहाँ राम उन राक्षसों से अकेले युद्ध करते हैं। लक्ष्मण सीता की रखवाली करते हैं। राम की शरवर्षा के भीषण प्रकोप के सामने कोई नहीं टिक पाता और सब के सब समाप्त हो जाते हैं। खर-दूषण का विध्वंस देखकर शूर्पणखा जाकर रावण को भड़काती है। वह अत्यंत क्रोधित हो कहती है कि तूने देश और खजाने की सुधि ही भुला दी -
"करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती।। 
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा ।।"
अतः रावण के दरबार में जाकर शूर्पणखा सारा वृत्तान्त रावण को इस प्रकार सुनाती है जिससे उसके मन में राम के प्रति द्वेष और सीता के प्रति प्रेम समान रूप से उत्पन्न हो जाये। शूर्पणखा बात-चीत में बड़ी चतुर व निपुण है। अपनी इसी विशेषता से वह रावण के समक्ष यह स्पष्ट करती है कि राम व लक्ष्मण दोनों भाई कोई साधारण पुरुष नहीं है बल्कि वे असाधारण व्यक्तित्व वाले हैं। इनके कारण  जंगल राक्षसों से रहित होता जा रहा है। खर-दूषण का वध इसका ज्वलन्त प्रमाण है। रावण मन ही मन विचार करता है कि यह निश्चित रूप से सत्य है। शूर्पणखा बात-चीत में सीता के अद्वितीय सौन्दर्य का चित्रण कर रावण के मन में सीता के प्रति प्रेम की भावना भी जाग्रत कर देती है।-
"रूप रासि बिधि नारि सँवारि। रति सत कोटि तासु बलिहारी ।
तासु अनुज काटे श्रृति नासा। सुनि तब मगिनि करहिं परिहासा। ।।  "

 शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के लिए रावण मारीच को मायावी हिरण बनाकर जंगल में भेजता है जहाँ सीता उसे देखकर पाने के लिए आतुर हो जाती हैं फिर राम का उस मृग के पीछे भागना फिर आगे की घटनाक्रम में सीता को अकेले पाकर रावण का साधु वेश में आकर अपहरण करना रामकथा में विस्तार के साथ-साथ उसमें एक नया मोड़ लाता है। सीता को राम से अलग करने के संदर्भ में शूर्पणखा का लक्ष्य पूरा हो जाता है। सत्य और धर्म के सच्चे प्रवर्तक राम की साध्वी सीता परम सत्य का साकार रूप है जिसे पदच्यूत, भ्रष्ट और नष्ट करने में शूर्पणखा कोई कसर नहीं छोड़ती है। शूर्पणखा के चरित्र वर्णन में कहा गया है कि 'राम की दृष्टि को राम से अलग करने का प्रयास करने वाली शूर्पणखा सत्ता और सत्य के सायुज्य की साधना में बाधा डालने वाली आसुरी शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है। सीता रामाक्षी है तो शूर्पणखा वामाक्षी है। यही दृष्टि-भेद शूर्पणखा के दृष्टि-दोष का कारण बन गया है और इस दोष का फल भी उसे भुगतना पड़ा। सर्वसत्तात्मक स्वामी की सहज सात्विक सुषमा को कलुषित दृष्टिकोण से देखने का यही परिणाम होता है। शूर्पणखा जैसे पात्र का प्रयोजन इसी शिक्षा के प्रसार में है। 
फिर यदि भाग्य, विडम्बना की बात की जाय तो कहा जा सकता है कि भवितव्य बहुत प्रबल होता है जो होना है सो होकर रहता है। राम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम के मन में भी शूर्पणखा से कुछ परिहास करने की इच्छा होती है और लक्ष्मण भी इसी परिहास-प्रियता का पूरा-पूरा लाभ उठाते हैं। पर बेचारी शूर्पणखा इस परिहास और व्यंग्य को बिल्कुल समझ नहीं पाती। वह तो कामातुर थी। कुल मिलाकर सबकी मनोदशा ने प्रसंग को इतना जटिल और नाजुक बना दिया है कि आगे की घटना नियति से निर्धारित विधि से होकर ही रही।" 
अतः रामकथा के विस्तार में अरण्य काण्ड के पंचवटी प्रसंग महत्वपूर्ण है जहाँ शूर्पणखा का चरित्र उभर कर सामने आता है। शूर्पणखा कई दृष्टियों से भेद-भावना का सूत्रपात करती है जिसमें प्रथम सोपान है राम को सीता से अलग करना। तत्पश्चात् राम और लक्ष्मण को अपनी ओर आकृष्ट करने का उसका असफल प्रयास और रावण के मन में सीता के प्रति आसक्ति की भावना प्रबल रूप से जाग्रत करने का प्रयास। शूर्पणखा के दो और सोपान है यद्यपि वह अपने प्रयास में पूर्ण रूप से सफल नहीं हो पाती है क्योंकि कहीं न कहीं उसका ध्येय राम और सीता को मानसिक रूप से अलग करना होता है जो सफल नहीं होता है। रामकथा के आगे घटना प्रसंग इस बात की पुष्टि करते हैं। वाणी और अर्थ, जल और तरंग, चाँद और चाँदनी की तरह एक-दूसरे से घुले मिले एक ही तत्व के दो रूप हैं- सीता और राम। शूर्पणखा का क्षुद्र प्रलोभन राम के मन पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाता और इससे भी अधिक दृढ़ता सीता के निश्चल मन में तब देखी जाती है जब अपार सम्पत्ति का स्वामी रावण अनेक प्रकार के प्रलोभन दिखाकर सीता को अपने वश में करना चाहता है परन्तु उसका प्रयास निष्फल हो जाता है। वह रावण की सारी सम्पत्ति व पराक्रम को तिनके के समान ठुकरा देती हैं क्योंकि उसके हृदय में तो राम की प्रतिमा स्थापित है। निष्ठा की इस पराकाष्ठा का बिल्कुल विपरीत स्वरूप शूर्पणखा के चरित्र में परिलक्षित होता है। सीता की पवित्रता को स्पष्ट व पूर्ण रूप से प्रकट करने के लिए शूर्पणखा बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती है, क्योंकि उसका चरित्र उलझा हुआ चंचल और विषय वासिनी नारी के रूप में प्रकट होता है और इसके ठीक विपरीत सीता सुलझी हुई साहसी व अन्तर्मुखी हैं।
शूर्पणखा के व्यक्तित्व में उन्माद, आक्रोश और प्रतिहिंसा का प्रकट रूप है। उसका चरित्र प्रभावशाली व महत्वपूर्ण है एवं रामकथा के विस्तार में योग प्रदान करता है।
प्रो०० डॉ० सविता कुमारी झीवास्तव, म प्रोफेसर-हिन्दी क हेमवती नन्दन बहु‌गुणा राजकीय सातकोत्तर महाविद्यालय नैनी प्रयागराज (10)
 


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