जब मैं शिलांग में रहता था, तब एक साधारण-सी घटना घटी, जिससे मुझे एक बड़ी ही शिक्षा मिली। मैं वहाँ सुबह दफ्तर में अपना काम करने में लगा था, तब एक भक्त महिला किसी कारण वहाँ आयी। अब मुझे उनका नाम याद नहीं है, न हि वह किस काम के लिए आयी थी इसका भी कोई स्मरण है। इतना स्मरण है कि, वह एक परिचित और प्रायः आनेवाली भक्त थी। . उस दिन उनके साथ उनकी पुत्री थी। लगभग ४-५ वर्ष की वह छोटी बालिका अपनी माँ से चॅाकलेट के लिए ज़िद कर रही थी। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी, बच्चे माँ से इन चीजों के लिए ज़िद करते ही हैं। माँ उस बालिका को समझा रही थी कि बाद में वह उसे चॅाकलेट जरूर देगी। अभी उसे मुझसे कुछ जरुरी बात करनी है। ताकि समझाया हमेशा चॅाकलेट इत्यादि खाना स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल अच्छा नहीं है । इधर माँ मेरे साथ बात कर रही थी, उधर बच्ची रो-रो कर माँ के ऊपर दबाव बढ़ा रही थी।
उन दिनो आफिस के कोने में टी. वी. हुआ करता था। १९९६ में भी वह टी. वी. गया बीता पुराना माना जाता था। मेरे शिलॉग आने के कुछ समय पूर्व वह किसी भक्त ने दानस्वरूप आश्रम को दिया था। प्रायः रात को आश्रम के अन्तेवासी भोजन के बाद वहाँ सम्मिलित होकर कुछ पाठ करते थे और टी. वी. पर समाचार देखते थे। इस प्रसंग के वर्षों बाद जब मैं अमेरिका से शिलाँग आया था तो देखा कि उस टी. वी. का स्थान एक अच्छे टी. वी. ने ले लिया है।
जब वह भक्त महिला अपनी छोटी बच्ची के साथ आयी थी, तो वह चल रहा था, किन्तु वह उस समय क्यों चल रहा था और उसपर कौन सा कार्यक्रम प्रदर्शित हो रहा था यह मुझे याद नहीं है। किन्तु हठात मैंने देखा कि उसपर किसी चॉकलेट का बिज्ञापन दिखाया जा रहा है। किसी बड़े से चॉकलेट का सुन्दर चित्र स्क्रीन पर दिखाई दिया। मैंने उस रोती हुई बालिका से कहा, “अरी रोती क्यों हो? देखो, टी. वी. पर से उसे लेलो; माँ को तंग करने की कोई आवश्यकता नहीं है।”
किन्तु बालिका अपने स्थान से हिली नहीं। जब मैंने फिर उसे स्क्रीन पर का चॉकलेट लेने लिए कहा तो उसने जवाब में कहा कि “वहाँ कोई चाकलेट नहीं है।” मैंने फिर कहा, “बेटा दिख तो रहा था- टी. वी. के पीछे खोजने से जरूर मिलेगा।” उसने फिर जोर से कहा कि “नहीं! दिखता है, परन्तु है नहीं, केवल इलेक्ट्रिसिटी है।”
कुछ मिनिट बाद माँ और बच्ची दोनों वहाँ से चले गये। बाद में उसे चॉकलेट मिला या नहीं उसकी खोज मैंने नहीं की। परन्तु उस बालिका का टी. वी. से चॉकलेट लेने से इन्कार करना मेरे लिए एक अच्छा चिन्तन का विषय बन गया।
इस घटना का जिक्र मैं आज भी व्याख्यानों में किया करता हूँ। वह बालिका निस्सन्देह जानती थी कि टी. वी. पर दिखने वाला चॅाकलेट वस्तुतः वहाँ है नही - वह केवल आभास मात्र है; इसीलिए उसे लेने की प्रवृत्ति ही नहीं हुई। उस चॉकलेट के आकर्षण का उसपर कोई असर नहीं हुआ, यद्यपि वह माँ से चॉकलेट के लिए रो-रो कर ज़िद कर रही थी।
***
इस संसार के प्रति हमारा आकर्षण क्यौं होता है? क्या हम नहीं जानते कि वह एक आभास मात्र है?
***
जानते तो हैं- किन्तु पूर्णरूप से नहीं जानते हैं। हमारा मस्तिष्क तो उसे समझ लेता है, किन्तु ज्ञान के इससे अधिक गंभीर स्तर होते हैं। मस्तिष्क में या बुद्धि में ज्ञान होना, यह प्राथमिक अवस्था है, जिसका वास्तविक जीवन पर विशेष रूप से कोई असर नहीं होता। हर रसायन शास्त्री या भौतिक वैज्ञानिक बुद्धि से तो समझता है कि समस्त शरीर सूक्ष्म परमाणुओं का नित्य परिवर्तनीय समुच्चय है। परन्तु यह समझ उसके शारीरिक आकर्षण पर असर नहीं डालती। उसका देह-भोगों की ओर आकर्षण किसी साधारण अनपढ़ व्यक्ति से अणुमात्र भी कम नहीं होता। इसका कारण स्पष्ट है। अपने मस्तिष्क की समझ के बावजूद भी वह वही देखता है, जैसा उसे देखना होता हैI जैसा कि एक अनपढ़-अज्ञानी व्यक्ति देखता है। दोनों ही ‘मैं और संसार’, ‘भोक्ता और भोग्य’ रूप अज्ञान के बन्धन में फँसे हुए हैं और दुख पाते हैं। व्यवहार की दृष्टि से एक वैज्ञानिक का जीवन और किसी अनपढ़ व्यक्ति का जीवन, इनमें कोई गुणात्मक भेद नहीं हैं। आचार्य शंकर का तो कथन है कि उन मनुष्यों और पशुओं का आचरण भी गुणात्मक दृष्टि से देखो तो समान ही होता है। (ब्रह्मसूत्र भाष्य, उपोद्घात)
पर जब कोई व्यक्ति साधन-भजन करें, स्वयं के शरीर को और इस शरीर के माध्यम से देखे जाने वाले जगत्-संसार को अनित्य-असार जानकर उनकी ओर से मुख मोड़ ले, फिर कहीं जाकर धीरे धीरे यह मस्तिष्क अवगत ज्ञान, भावना में परिणत होता है।
इस भावना(Feeling) के स्तर पर जब ‘मैं और संसार’ रूप ज्ञान गलत है, यह कोई समझ जाता है, तो जीवन में बदलाव की प्रक्रिया मानो आरम्भ हो जाती है। संसार के प्रति आकर्षण तब भी विद्यमान तो होता है, पर अब उसे उससे उबरने की इच्छा भी जागृत हो जाती है।
***
किस प्रक्रिया से मनुष्यों की सांसारिक भोग-सुखों के प्रति जो स्वाभाविक इच्छा, उससे पैदा होने वाली आसक्ति और परिणाम स्वरूप बन्धन, ये सारा घटता जाता है, इसकी कुछ समीक्षा आगे करेंगे। किन्तु इससे पहले शिलांग में हुई एक और घटना यहाँ प्रस्तुत करता हूँ।
एक दिन शाम के करीब ५ बजे एक अधेड़ उम्र की दीखने वाली महिला ग्रंथालय में एक पुस्तक लौटाने और दूसरा ले जाने हेतु पधारी। तब वहाँ और कोई साधु-ब्रह्मचारी या कर्मी न होने के कारण मैं ही ग्रंथालय खोलकर उन्हें भीतर ले गया। उनका नाम पूछा तो उन्होंने बताया ‘XX बरूआ’
‘अच्छा, तो आप असमिया हैं।’ मेरे इतना कहने भर की देरी थी की वह एकदम आग बबूला हो उठी।
‘हाँ, पर आप ये सब क्यों पूछते हैं, मैं असमिया हूँ या और कोई इससे आप को क्या लेना देना? क्या रामकृष्ण मिशन भी असमिया लोगों के विरोध में है? ...’
जब उनका क्रोध कुछ प्रशमित हुआ तो मैंने उनसे क्षमा माँगकर कहा कि “यकीन कीजिए, न मेरे मन में मे, न रामकृष्ण मिशन के कार्य पद्धति में असमिया लोगों के प्रति कोई भी विरोध है। सभी भाषा बालने वालों का यहाँ पूर्ण रूप से स्वागत है।” तब उन्होंने संतुष्ट होकर कहा कि “कुछ वर्षों पहले यहाँ शिलांग के साथ पूरे मेघालय क्षेत्र में असमिया लोगों को खदेड़ देने का हिंसक, विद्वेषपूर्ण अभियान चलाया गया था। अब वह थोड़ा शमित हुआ है, परन्तु कुछ विद्वेष-भरी वारदातें अभी भी चलती हैं।” मेरे प्रश्न से उन्हें ऐसी ही कुछ पुरानी घटनाओं का स्मरण हुआ और वह क्रुद्ध हुई। इस घटना का तात्पर्य था कि कैसे अपने पूर्वानुभव के आधार पर व्यक्ति किसी शब्द का एक अर्थ निकाल लेता है और उसके अनुरूप बर्ताव करने के लिए बाध्य होता है।
जब १९९६ के मार्च में मैं शिलांग में प्रथम आया तो उस समय एक अजीब सी बदबू आती थी। विशेषकर सुबह आठ बजने के आसपास उसकी शुरुआत होती और फिर एक दो घन्टे वह चलता था। कभी कभी उसकी तीव्रता इतनी बढ़ती थी कि उलटी करने की भावना हो जाती। और यह बदबू केवल मुझे ही आती थी। अन्य सारे लोग जो वहाँ थे उन्हें यह समस्या नहीं होती थी। खोजबीन के बाद पता चला कि वह गंध सूखी मछली (सुट्कि) के पकाने के समय आती है। वहाँ के प्रायः सभी निवासी सुटकी खाना पसन्द करते थे। उनके लिए यह बिलकुल बदबू नहीं थी; ऐसा कहना अत्युक्ति नहीं होगा कि उनके लिए वह आकर्षक सुगन्ध था। जहाँ मुझे उलटी होने लगती थी, वहीं उनके मुख में पानी छूटता था। मेरे बोध से उनका बोध बिलकुल विपरीत था और इसी वजह से प्रतिक्रियाएं भी विपरीत थीं। मेरे लिए विकर्षण था, उनके लिए आकर्षण।
** *
जैसा अपना बोध हो, उसी के अनुरूप कार्य करने का बन्धन सभी प्राणियों में दिखाई देता है। मनुष्य विचारशील होने के बावजूद भी यह उसकी विवशता हो जाती है कि जैसा बोध हो वह वैसा ही कार्य करे। जैसा बोध, वैसा कर्म और फिर उसी बोध का दृढ़ीकरण, फिर से उसी के अनुरूप कर्म... यह चक्र तो चलता ही रहता है। और यही दुष्टचक्र बन्धन कहलाता है। फिर सवाल यह पैदा होता है कि इस दुष्टचक्र से छुटकारा कैसे पाया जाए। हाँ, इस चक्र को परिवर्तित करने का उपाय है। और यह उपाय है - अन्तर्निरीक्षण(introspection)।
जब कोई अन्तर्निरीक्षण से समझता है कि उसके अपने बोध के अनुरूप जो सारे कार्य वह करता है, और उनसे अपेक्षित सुख के स्थानपर उसे दुःख ही मिल रहा है, तब वह व्यक्ति सोचता है कि मुझसे कहीं गलती हो रही है। तभी वह देखता है कि (यह प्रक्रिया एकसाथ तुरन्त नहीं होती। धीरे धीरे यह भीतर चलती रहती है) जिसे, मैं सच मानकर चलता था, वह सच नहीं है, जहाँ वह सुख खोज रहा था, वहाँ वह है ही नहीं। तब कहीं ऐसा व्यक्ति अपने ‘मैं और संसार’ के से भरे बोध का विश्लेषण करता है। यह जो सारा परिवर्तनीय और इसी कारण मिथ्या है, इसके बन्धन से छुटकारा पाने की कोशिश में लग जाता है।
बहुत लम्बे समय तक नियमितता से, अपने जीवन को किसी महानुभाव के मार्गदर्शन के अनुरूप सही दिशा मे ले जाने का भरसक प्रयास करें तब जाकर कहीं संसार का बन्धन शिथिल होने लगता है। जो सत्य है, नित्य है, आनन्द-स्वरूप है, उसके दर्शन हेतु तीव्र व्याकुळता होती है। इस व्याकुलता को श्रीरामकृष्ण अरुणोदय की उपमा देते थे। अरुणोदय होता है, तो हमे पता चलता है कि सूर्योदय होने में अभी ज्यादा देरी नहीं है। पहले तो सांसारिक विषयों की सत्यता का बोध था इसी के चलते संसार-बन्धन भी था। अब ईश्वर ही सत्य है, यह बोध उदित होता है तो ईश्वर के साथ बन्धन होता है।
इस ईश्वर के साथ बन्धन के फलस्वरूप, उसका बोध नित्य मुक्त, नित्य आनन्दवरूप ईश्वर में विलय हो जाता है, और फिर समस्त बन्धनों का अन्त हो जाता है।