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एक अविस्मरणीय यात्रा : नई दिल्ली से शिलॉग

Dr Atul Vaibhav डॉ. अतुल वैभव   |   Spring 2025

एक अविस्मरणीय यात्रा : नई दिल्ली से शिलॉग
डॉ. अतुल वैभव

बात ३० नवंबर २०१४ की है, जब ट्रेन न. १२५०२, पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति एक्सप्रेस (नई दिल्ली-गुवाहाटी) रात के ११:४५ बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से खुली, तो मेरे मन में अनायास ही अनेक रोमांचकारी दृश्य प्रतिबिम्बितहोने लगे। जिन दृश्यों (बिंबों) को मैं अभी तक सिर्फ किताबों और अखबारों में पढ़ते, रेडियो- टेलीविज़न पर सुनते और देखते आया था, आज वे सारे दृश्य मेरे मस्तिष्क में एक साथ इस प्रकार उमड़-घुमड़ रहे थे, कि जिस प्रकार सावन के महीने में बादल आसमान में अठखेलियाँ करते हैं। मैं ट्रेन से पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय (नेहू) में एम.फिल दाखिले की प्रवेश परीक्षा देने जा रहा था। ३ दिसंबर को लिखित परीक्षा और ४ दिसंबर को साक्षात्कार होना था। जिस दिन परीक्षा की तिथि आई थी उसी दिन से मेरे मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा था कि जितनी जल्दी हो सके द्रुत गति से शिलांग पहुँच जाऊँ। जिसे अभी तक मानचित्र पर ही महसूस करता आ रहा था अब उससे साक्षात होने की तीव्र इच्छा बार-बार होने लगी। पूर्वोत्तर के विषय में पहले से बस इतना ही जानता था कि वहाँ आठ राज्य हैं, और यह भी कि दुनिया में सर्वाधिक वर्षा जहाँ होती है, वह स्थान चेरापूंजी (अब मावसिनराम है) पूर्वोत्तर भारत के मेघालय राज्य में ही है। भारत में सबसे पहले सूरज अरुणाचल प्रदेश में दिखाई देता है, असम में ब्रह्मपुत्र नदी बहती है और भारत के पड़ोसी देश चीन, म्यांमार, भूटान और बांग्लादेश पूर्वोत्तर भारत के पड़ोसी देश हैं। इसके अलावा दिल्ली में पूर्वोत्तर के लोगों के विषय में कई भ्रांतियां भी सुनने को मिलती रहती हैं।

मुझे तब प्रवेश परीक्षा देने जाने से ज्यादा खुशी इस बात की हो रही थी कि जो बातें अभी तक किताबों के पन्नों में शब्दों तक सीमित थी वो अब हकीकत बनने वाली हैं। पहाड़ों से स्पर्श करते बादलों को और ट्रेन की खिड़कियों से अद्भुत प्राकृतिक नजारों को देखूँगा। मासिनराम में जाकर बारिश में नहाऊँगा जैसे भाव मेरे मन में बार-बार हलचल पैदा कर रहें थे। नई दिल्ली से ट्रेन खुलते ही सभी यात्रियों की तरह मैं भी सो गया। अगले दिन जब नींद खुली तब सुबह के १० बज चुके थे। मैंने अपने कम्पार्टमेंट के एक यात्री से पूछा ‘भाई कौन सा स्टेशन आने वाला है’उसने बताया ‘कानपुर’ अभी थोड़ी देर पहले आया था, अब आगे कौन सा आएगा पता नहीं! मैं नीचे आकर बैठ गया और थोड़ी देर बाद एक चाय वाला आया तो उससे चाय लेते हुए पूछा- ‘भाई अब कौन सा स्टेशन आएगा?’ उसने बताया ‘इलाहाबाद’। मैंने पूछा ‘राइट टाइम चल रही है क्या’उसने बताया-नहीं, ४ घंटे लेट है’। ये तो हम जानते ही हैं कि ठंड में देश की अमूमन ट्रेनें लेट ही रहती हैं। राजधानी हो या शताब्दी, सभी ट्रेनें माल गाड़ी बन जाती हैं।

मैं अगले एक घंटे तक नीचे वाली सीट पर बैठकर बाहर का नज़ारा देखता रहा। फिर अचानक से एक यात्री -जिनका नीचे वाला बर्थ था- उन्होंने पूछा- ‘कहाँ जाओगे?’ मैंने बताया ‘गुवाहाटी’। फिर पूछा क्या करते हो, किसी काम से जा रहे होऔर मैंने उनके प्रश्नों का उत्तर दिया। थोड़ी देर में ही बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया। वो तीन लोग थे और उन्हें भी गुवाहाटी ही जाना था। वे तीनों रहने वाले तो असम के थे लेकिन रहते दिल्ली में थे। हमारे अलावे उस कम्पार्टमेंट में दो अरुणाचल प्रदेश, एक मणिपुर और असम के ही एक और सज्जन थे। धीरे-धीरे उन तीनों के अलावे अन्य यात्रियों से भी बातचीत होने लगी जैसा कि अमूमन सफर में होता है और जब सफर लंबा हो तो और भी ज्यादा। तीन असमिया और एक अरुणाचली का ग्रुप बन गया, फिर क्या था चारों में ताश जम गया। मैं थोड़ी देर बाद ब्रश करके अपने साथ कुछ खाने का सामान लाया था उसे खा कर अपने बर्थ पर जाकर पढ़ने लगा। सोचा थोड़ी बहुत पढ़ाई भी कर लूँ, इतनी दूर जा रहा हूँ परीक्षा देने, अगर पास नहीं हुआ तो घर वाले भी बोलेंगे कि सिर्फ घूमने ही जाना था तो परीक्षा का बहाना क्यों किया।

१ बजे मैं नीचे आया और फिर एक कप चाय ली। तब तक इलाहाबाद आ चुका था। उधर ताश भी जम चुका था। मुझसे भी उनलोगों ने खेलने को पूछा लेकिन मैंने मना कर दिया। ताश तो मुझे आता था लेकिन मैं यह जानता था कि अगर एक बार खेलने बैठ गया तो फिर जल्दी उठ नहीं पाऊँगा। वो खेल रहे थे और मैं उन्हें देख कर ही आनन्द लिए जा रहा था, साथ में उनसे बातें भी कर रहा था। पूर्वोत्तर और मेघालय से सम्बन्धित अपनी जिज्ञासाओं को शांत कर रहा था या कहूँ कि अपने ज्ञान को पुख्ता कर रहा था। उस क्षण मेरी स्थिति उस बच्चे के समान थी जो नया-नया बोलना सीखता है। मैं कम्पार्टमेंट के यात्रियों पर अपने प्रश्नों की बौछार किए जा रहा था और वे बहुत धैर्य और सहजता से ताश के पत्तों को फेंकते हुए उन प्रशनों का जवाब दिए जा रहें थे। मेरे कुछ प्रश्नों को तो वो ताश की मगनता में सुन भी नहीं पा रहें थे।

अधिकांश हिन्दी भाषी या समतल के लोग पूर्वोत्तर भारत तथा वहाँ के लोगों के विषय में जो सोचते हैं या जो भाव रखते हैं, वे लोग उससे बिल्कुल ही अलग थे। यहाँ मेरे बिल्कुल अलग कहने का आशय, उनके स्वभाव एवं व्यवहार से है। दिल्ली के अधिकांश लोग पूर्वोत्तर भारत के लोगों को पराया सा समझते हैं। दर असल दिल्ली के लोग पूर्वोत्तर भारत के लोगों और उनकी संस्कृति के विषय में अनेक भ्रांतियों के शिकार हैं। दिल्ली में रहते हुए मेरे मन में भी अनेक भ्रांतियाँ घर कर गयी थीं। नॉर्थ ईस्ट के लोगों को समीप से जानने का मुझे यह पहला अवसर मिला था। वे मुझसे हिन्दी में बातें कर रहें थे और आपस में अपनी मातृ भाषा में। मणिपुरी हिन्दी ठीक से नहीं बोल पा रहा था, लेकिन बाकी सभी हिन्दी अच्छे से बोल और समझ ले रहें थे। अरुणाचली से भी मेरी बात होती रही। शाम तक मेरी उन सभी यात्रियों से एक मित्रता सी हो गयी और आपस में राजनीति बातें भी होने लगी जैसा अमूमन ट्रेन के सफर में होता है। सभी में देश के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर भी बातें होने लगी। नरेंद्र मोदी ६ महीने पहले ही भारत के प्रधानमंत्री बने थे। ऐसे ही बातचीत करते और खाते-पीते रात हो गयी और सभी यात्री सो गए। थोड़ी देर पढ़ने के बाद मैं भी सो गया।

अगले दिन सुबह ६ बजे मेरी नींद खुली तब तक ट्रेन न्यू जलपाईगुड़ी पहुँच चुकी थी। चाय... चाय…, पानी... पानी..., और पेपर… पेपर...की आवाज से मेरी नींद खुल गयी। मैंने एक कप चाय लेते हुए चाय वाले से पूछा तो पता चला कि ‘ट्रेन ६ घंटें लेट हो चुकी है’। मैं चाय पी कर पढ़ने लगा। सभी यात्री थोड़ी देर में उठ गए। सभी को गुवाहाटी जल्द से जल्द पहुँचने की फिक्र होने लगी। सब बैठ कर एक-दूसरे से बातें कर रहे थे। मैं भी उनके साथ बात करते-करते पढ़ भी रहा था और साथ-साथ ट्रेन से बाहर के खूबसूरत नजारों को देख भी रहा था। ट्रेन बंगाल में से चल रही थी। पहली बार बंगाल की धरती पर था। कभी चाय के बागान तो कभी अनानास के खेतों के बीच ट्रेन अपनी अधिकतम रफ्तार पकड़ चुकी थी। मैं उस बंगाल की धरती पर था जिसकी वीरता और शौर्य गाथाएं हम इतिहास की किताबों में पढ़-पढ़ कर बड़े हुए हैं। जहाँ से देश में पत्रकारिता ही नहीं बल्कि हिन्दी पत्रकारिता की भी शुरुआत हुई और जहाँ से भारतीय नवजागरण की शुरुआत हुई। मैं गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानन्द की धरती वाले उसी बंगाल में था, जहाँ के बड़े-बड़े चाय बागान के विषय में सिर्फ किताबों में ही पढ़ा था। मैं ट्रेन के बाहर की हरियाली देख कर मंत्रमुग्ध हो रहा था। बाहर के नजारों का लुफ्त उठाए जा रहा था। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि प्रकृति का ऐसा भी सौन्दर्य रूप होता है। ट्रेन का गुवाहाटी में पहुँचने का समय सुबह ८:४५ बजे का था परंतु वह शाम को लगभग ४ बजे पहुँचती है। उस दिन (२ दिसंबर को) मुझे गुवाहाटी में ही स्टेशन के समीप एक पुलिस कैंप में रुकना था।

मैंने पहली बार इतनी लंबी यात्रा की थी। लगभग २ हजार किमी और ४० घंटें की। काफी थक चुका था, कैंप पहुँच कर चाय पीने के बाद आराम किया। थोड़ी देर बाद रात का खाना खाया और फिर पढ़ने लगा। १२:३० बजे सो गया और सुबह ४ बजे का अलार्म बजने पर उठा। सुबह अपने समय पर उठ कर तैयार होकर ४:३० बजे स्टेशन के लिए निकल गया और लगभग १० मिनट में स्टेशन पहुँच गया। ५ बजे १० सवारी को लेकर सूमो चालक ने गाड़ी आगे बढ़ाई। लगभग ३० मिनट की यात्रा के बाद हवा की ठंढक और कुहासे के बीच से धीर-धीरे गुजरती गाड़ियाँ मन को आनंदित कर रही थीं। कभी ऊँचे-ऊँचे पहाड़ दिखते तो कभी कुहासा गाड़ी में आ कर चेहरे पर स्पर्श करता। रह-रह कर मुझे नींद भी आ रही थी लेकिन मैं सो नहीं रहा था। मानो यह महसूस हो रहा था कि इन्हीं नजारों को तो देखने के लिए मैंने इतना इंतजार किया था। ऐसे दृश्यों की मैंने कल्पना भी नहीं की थी। जिसे मैं कुहासा समझ रहा था असल में वह बादल था। ऊपर से नीचे देखने पर वही कुहासा जिनके बीच से मैं थोड़ी देर पहले गुजरा था वो बादल के समान दिख रहा था।

डेढ़ घंटें बाद लगभग ६:३० बजे गाड़ी नोंगपो में एक होटल (ढाबे) के सामने रुकती है जहां सभी यात्री उतर कर चाय वगैरह पीते हैं। मैंने भी चाय पी। वहाँ की चाय थोड़ी अलग थी। १५-२० मिनट के बाद गाड़ी वहाँ से खुल गई। अब पूरा वातावरण एकदम साफ हो चुका था। सूरज की रौशनी से पहाड़ों के पेड़ रत्न जड़ित मुकुट के समान चमक रहे थे। सड़क के दोनों ओर पहाड़ मानो ऐसा एहसाह करा रहें थे जैसे कि सड़क उनके बीच नदी के समान आगे बढ़ रही हो। टू-लेन सड़क को फोर-लेन बनाया जा रहा था जिसकी वजह से सड़क की स्थिति काफी जर्जर हो चुकी थी और उसपर चलने वाली गाड़ियों की रफ्तार बहुत धीमी। यह सड़क जोराबाट से शिलांग होते हुए मिजोरम जाती है। यह राष्ट्रीय राज मार्ग संख्या ६ है। लगभग ७:३० बजे गाड़ी बड़ा पानी पहुँचती है। वहाँ पहुँच कर मैंने जो नजारा देखा वैसा अभी तक सिर्फ फिल्मों में ही देखा था। कुछ क्षण के लिए मेरी आँखों की पुतलियाँ मानों यह विश्वास करने को तैयार ही नहीं थीं। ‘उमियम लेक’ प्रकृति का वरदान है, बहुत बड़ी झील है। शायद इसी वजह से उस स्थान का नाम ‘बारापानी’ पड़ा हो। चारों दिशाओं से पहाड़ उस झील को इस प्रकार से कैद किए हुए हैं मानो मदारी का खेल देखने के लिए लोगों का हुजूम मदारी को चारों तरफ से घेरा हो। उस सौंदर्य को मैं अपने मोबाइल में कैद किए जा रहा था। मैं अपने मोबाइल से बिना रुके उस अद्भुत दृश्य का फोटो लिए जा रहा था। पहाड़ के ऊपर जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ रही थी उस झील की सुन्दरता मानो और निखरती जा रही थी। ऊपर से नजारा कुछ और ही था। सूमो की खिड़की से कभी बादलों के बीच में पहाड़ों की चोटियों पर हरे-हरे सुहावने पेड़ दिखते, तो कभी उनकी परछाइयाँ गाड़ी के आगे इस प्रकार प्रतिबिम्ब बनाती, मानो वो किसी कैनवास से कम न हो।

समूचा पहाड़ चीड़ के पेड़ (पाइन ट्री) की हरियाली से ढका हुआ था। पूरा पहाड़ मानो जैसे चीड़ की सुन्दरता से हिलोरे मार रहा हो। पाइन भारत में नहीं पाया जाता था बल्कि इसे अँग्रेज भारत में लाए थे। बताया जाता है कि शिलांग में अँग्रेजों ने हेलीकॉप्टर से उसका बीज गिराया था। ऐसा लग रहा था मानो चीड़ के पेड़ और सूरज की किरणों के बीच युद्ध हो रहा हो। मानो एक तरफ सूरज अपनी रोशनी से चीड़ को भेद कर सड़क को उज्ज्वलित करना चाह रहा हो, तो वहीं दूसरी तरफ चीड़ अपनी छाया से सड़क को ढक लेना चाह रहा हो। जिधर देखता उधर वृक्ष ही वृक्ष दिखते। सड़कों के किनारे कहीं-कहीं एक दो दुकानें दिख रही थीं। समतल की तरह वहाँ घनी आबादी नहीं थी। इक्का दुक्का घर दिख रहे थे। ऐसे ही दृश्यों को निहारते हुए गाड़ी कब मावलई पहुँच गयी पता ही नहीं चला।

लगभग ८ बजे मैं मावलई पेट्रोल पंप पर उतरा और वहाँ से नेहू (कैंपस) के लिए टैक्सी ली। १०-१२ मिनट में नेहू पहुँच गया। जैसे ही गेट न.-२ से परिसर में प्रवेश किया समूचा विश्वविद्यालय चीड़ की खूबसूरती में मानो नहाया हुआ प्रतिबिम्बित हो रहा था। जिस प्रकार स्त्री की सुन्दरता को आभूषण निखार देते हैं उसी प्रकार चीड़ के वृक्ष भी उस परिसर की सुन्दरता में चार चाँद लगा रहे थे। चीड़ रूपी आभूषण से विश्वविद्यालय का पूरा परिसर आभूषित हो रहा था। सूरज की किरणें ठंढ में भी मानो चुभ रही थीं। इतनी साफ-सफाई शायद मैंने इससे पहले कहीं और नहीं देखी थी। आपको बता दूँ कि एशिया का सर्वाधिक स्वच्छ गाँव (क्लीनेस्ट विलेज) ‘मावलिनॉन्ग‘ मेघालय में ही है। चारों तरफ पाइन ट्री की हरियाली दूर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और आसमान एकदम नीला, कंपकपाने वाली ठंड और उनके बीच में मैं विभाग के बाहर बने बस स्टॉप पर बैठ कर वहाँ की खूबसूरती को चारों ओर घूम-घूम कर निहारता रहा और विभाग खुलने का इंतजार करता रहा। ९ बजे विभाग खुला तब तक अन्य परीक्षार्थी भी आ चुके थे। पहले विभाग के द्वारा परीक्षा पूर्व की औपचरिकताएँ पूरी की गयीं। १०:०० से ११:३० बजे तक परीक्षा हुई। लिखित परीक्षा खत्म होने के बाद सूचना दी गयी कि ‘जो बच्चे बाहर से आए हैं उनका साक्षात्कार आज ही होगा। आधे घंटें के ब्रेक के बाद साक्षात्कार १२ बजे से शुरू होगा, सभी बच्चे यहाँ समय पर उपस्थित रहेंगे’। बाहर से का मतलब ऐसे छात्रों से था, जो उस विश्वविद्यालय (नेहू) के नहीं थे बल्कि बाहर से आए हुए थें। सूचना के बाद सभी बच्चे पास में ही एक कैंटीन में खाने चले गए। मैं भी उनके साथ चला गया। मेन्यू देख कर मैंने आलू पराठा और चाय ऑर्डर किया। कैंटीन में ही देश के अनेक हिस्सों से आए हुए परीक्षार्थियों से बातचीत होने लगी। आप कहाँ से आए हैंआपने एम.ए कहाँ से किया हैशिलांग कैसे आएनेहू के बारे में किसने बतायाकिस ट्रेन से आएपरीक्षा के बाद कहाँ-कहाँ घुमने जाना हैजैसी जिज्ञासाओं को शांत कर रहा था।

१२:१५ बजे साक्षात्कार शुरू हुआ और मेरा साक्षात्कार २ बजे हुआ। साक्षात्कार कक्ष से बाहर निकलते ही मैं बहुत राहत और शांति महसूस कर रहा था। क्योंकि अब मैं शिलांग की खूबसूरती का आनन्द लेने के लिए बिल्कुल तैयार हो चुका था। थोड़ी देर के बाद मैं विभाग से बाहर निकला और विश्वविद्यालय के गेट न. २ से पोलो के लिए टैक्सी में बैठ गया। मेरी दिल्ली वापसी की ट्रेन ६ दिसंबर को थी और तब तक मैं पोलो में ही एक पुलिस कैंप में रुकने वाला था और अगले ३ दिनों तक शिलांग का भ्रमण करने वाला था। १० मिनट में मैं पोलो में स्थित पुलिस कैंप पहुँच गया, जहाँ मुझे अगले तीन दिनों तक ठहरना था।

अगला पड़ाव अगले अंक में

एक अविस्मरणीय यात्रा : नई दिल्ली से शिलॉग
डॉ. अतुल वैभव

बात ३० नवंबर २०१४ की है, जब ट्रेन न. १२५०२, पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति एक्सप्रेस (नई दिल्ली-गुवाहाटी) रात के ११:४५ बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से खुली, तो मेरे मन में अनायास ही अनेक रोमांचकारी दृश्य प्रतिबिम्बितहोने लगे। जिन दृश्यों (बिंबों) को मैं अभी तक सिर्फ किताबों और अखबारों में पढ़ते, रेडियो- टेलीविज़न पर सुनते और देखते आया था, आज वे सारे दृश्य मेरे मस्तिष्क में एक साथ इस प्रकार उमड़-घुमड़ रहे थे, कि जिस प्रकार सावन के महीने में बादल आसमान में अठखेलियाँ करते हैं। मैं ट्रेन से पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय (नेहू) में एम.फिल दाखिले की प्रवेश परीक्षा देने जा रहा था। ३ दिसंबर को लिखित परीक्षा और ४ दिसंबर को साक्षात्कार होना था। जिस दिन परीक्षा की तिथि आई थी उसी दिन से मेरे मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा था कि जितनी जल्दी हो सके द्रुत गति से शिलांग पहुँच जाऊँ। जिसे अभी तक मानचित्र पर ही महसूस करता आ रहा था अब उससे साक्षात होने की तीव्र इच्छा बार-बार होने लगी। पूर्वोत्तर के विषय में पहले से बस इतना ही जानता था कि वहाँ आठ राज्य हैं, और यह भी कि दुनिया में सर्वाधिक वर्षा जहाँ होती है, वह स्थान चेरापूंजी (अब मावसिनराम है) पूर्वोत्तर भारत के मेघालय राज्य में ही है। भारत में सबसे पहले सूरज अरुणाचल प्रदेश में दिखाई देता है, असम में ब्रह्मपुत्र नदी बहती है और भारत के पड़ोसी देश चीन, म्यांमार, भूटान और बांग्लादेश पूर्वोत्तर भारत के पड़ोसी देश हैं। इसके अलावा दिल्ली में पूर्वोत्तर के लोगों के विषय में कई भ्रांतियां भी सुनने को मिलती रहती हैं।

मुझे तब प्रवेश परीक्षा देने जाने से ज्यादा खुशी इस बात की हो रही थी कि जो बातें अभी तक किताबों के पन्नों में शब्दों तक सीमित थी वो अब हकीकत बनने वाली हैं। पहाड़ों से स्पर्श करते बादलों को और ट्रेन की खिड़कियों से अद्भुत प्राकृतिक नजारों को देखूँगा। मासिनराम में जाकर बारिश में नहाऊँगा जैसे भाव मेरे मन में बार-बार हलचल पैदा कर रहें थे। नई दिल्ली से ट्रेन खुलते ही सभी यात्रियों की तरह मैं भी सो गया। अगले दिन जब नींद खुली तब सुबह के १० बज चुके थे। मैंने अपने कम्पार्टमेंट के एक यात्री से पूछा ‘भाई कौन सा स्टेशन आने वाला है’उसने बताया ‘कानपुर’ अभी थोड़ी देर पहले आया था, अब आगे कौन सा आएगा पता नहीं! मैं नीचे आकर बैठ गया और थोड़ी देर बाद एक चाय वाला आया तो उससे चाय लेते हुए पूछा- ‘भाई अब कौन सा स्टेशन आएगा?’ उसने बताया ‘इलाहाबाद’। मैंने पूछा ‘राइट टाइम चल रही है क्या’उसने बताया-नहीं, ४ घंटे लेट है’। ये तो हम जानते ही हैं कि ठंड में देश की अमूमन ट्रेनें लेट ही रहती हैं। राजधानी हो या शताब्दी, सभी ट्रेनें माल गाड़ी बन जाती हैं।

मैं अगले एक घंटे तक नीचे वाली सीट पर बैठकर बाहर का नज़ारा देखता रहा। फिर अचानक से एक यात्री -जिनका नीचे वाला बर्थ था- उन्होंने पूछा- ‘कहाँ जाओगे?’ मैंने बताया ‘गुवाहाटी’। फिर पूछा क्या करते हो, किसी काम से जा रहे होऔर मैंने उनके प्रश्नों का उत्तर दिया। थोड़ी देर में ही बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया। वो तीन लोग थे और उन्हें भी गुवाहाटी ही जाना था। वे तीनों रहने वाले तो असम के थे लेकिन रहते दिल्ली में थे। हमारे अलावे उस कम्पार्टमेंट में दो अरुणाचल प्रदेश, एक मणिपुर और असम के ही एक और सज्जन थे। धीरे-धीरे उन तीनों के अलावे अन्य यात्रियों से भी बातचीत होने लगी जैसा कि अमूमन सफर में होता है और जब सफर लंबा हो तो और भी ज्यादा। तीन असमिया और एक अरुणाचली का ग्रुप बन गया, फिर क्या था चारों में ताश जम गया। मैं थोड़ी देर बाद ब्रश करके अपने साथ कुछ खाने का सामान लाया था उसे खा कर अपने बर्थ पर जाकर पढ़ने लगा। सोचा थोड़ी बहुत पढ़ाई भी कर लूँ, इतनी दूर जा रहा हूँ परीक्षा देने, अगर पास नहीं हुआ तो घर वाले भी बोलेंगे कि सिर्फ घूमने ही जाना था तो परीक्षा का बहाना क्यों किया।

१ बजे मैं नीचे आया और फिर एक कप चाय ली। तब तक इलाहाबाद आ चुका था। उधर ताश भी जम चुका था। मुझसे भी उनलोगों ने खेलने को पूछा लेकिन मैंने मना कर दिया। ताश तो मुझे आता था लेकिन मैं यह जानता था कि अगर एक बार खेलने बैठ गया तो फिर जल्दी उठ नहीं पाऊँगा। वो खेल रहे थे और मैं उन्हें देख कर ही आनन्द लिए जा रहा था, साथ में उनसे बातें भी कर रहा था। पूर्वोत्तर और मेघालय से सम्बन्धित अपनी जिज्ञासाओं को शांत कर रहा था या कहूँ कि अपने ज्ञान को पुख्ता कर रहा था। उस क्षण मेरी स्थिति उस बच्चे के समान थी जो नया-नया बोलना सीखता है। मैं कम्पार्टमेंट के यात्रियों पर अपने प्रश्नों की बौछार किए जा रहा था और वे बहुत धैर्य और सहजता से ताश के पत्तों को फेंकते हुए उन प्रशनों का जवाब दिए जा रहें थे। मेरे कुछ प्रश्नों को तो वो ताश की मगनता में सुन भी नहीं पा रहें थे।

अधिकांश हिन्दी भाषी या समतल के लोग पूर्वोत्तर भारत तथा वहाँ के लोगों के विषय में जो सोचते हैं या जो भाव रखते हैं, वे लोग उससे बिल्कुल ही अलग थे। यहाँ मेरे बिल्कुल अलग कहने का आशय, उनके स्वभाव एवं व्यवहार से है। दिल्ली के अधिकांश लोग पूर्वोत्तर भारत के लोगों को पराया सा समझते हैं। दर असल दिल्ली के लोग पूर्वोत्तर भारत के लोगों और उनकी संस्कृति के विषय में अनेक भ्रांतियों के शिकार हैं। दिल्ली में रहते हुए मेरे मन में भी अनेक भ्रांतियाँ घर कर गयी थीं। नॉर्थ ईस्ट के लोगों को समीप से जानने का मुझे यह पहला अवसर मिला था। वे मुझसे हिन्दी में बातें कर रहें थे और आपस में अपनी मातृ भाषा में। मणिपुरी हिन्दी ठीक से नहीं बोल पा रहा था, लेकिन बाकी सभी हिन्दी अच्छे से बोल और समझ ले रहें थे। अरुणाचली से भी मेरी बात होती रही। शाम तक मेरी उन सभी यात्रियों से एक मित्रता सी हो गयी और आपस में राजनीति बातें भी होने लगी जैसा अमूमन ट्रेन के सफर में होता है। सभी में देश के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर भी बातें होने लगी। नरेंद्र मोदी ६ महीने पहले ही भारत के प्रधानमंत्री बने थे। ऐसे ही बातचीत करते और खाते-पीते रात हो गयी और सभी यात्री सो गए। थोड़ी देर पढ़ने के बाद मैं भी सो गया।

अगले दिन सुबह ६ बजे मेरी नींद खुली तब तक ट्रेन न्यू जलपाईगुड़ी पहुँच चुकी थी। चाय... चाय…, पानी... पानी..., और पेपर… पेपर...की आवाज से मेरी नींद खुल गयी। मैंने एक कप चाय लेते हुए चाय वाले से पूछा तो पता चला कि ‘ट्रेन ६ घंटें लेट हो चुकी है’। मैं चाय पी कर पढ़ने लगा। सभी यात्री थोड़ी देर में उठ गए। सभी को गुवाहाटी जल्द से जल्द पहुँचने की फिक्र होने लगी। सब बैठ कर एक-दूसरे से बातें कर रहे थे। मैं भी उनके साथ बात करते-करते पढ़ भी रहा था और साथ-साथ ट्रेन से बाहर के खूबसूरत नजारों को देख भी रहा था। ट्रेन बंगाल में से चल रही थी। पहली बार बंगाल की धरती पर था। कभी चाय के बागान तो कभी अनानास के खेतों के बीच ट्रेन अपनी अधिकतम रफ्तार पकड़ चुकी थी। मैं उस बंगाल की धरती पर था जिसकी वीरता और शौर्य गाथाएं हम इतिहास की किताबों में पढ़-पढ़ कर बड़े हुए हैं। जहाँ से देश में पत्रकारिता ही नहीं बल्कि हिन्दी पत्रकारिता की भी शुरुआत हुई और जहाँ से भारतीय नवजागरण की शुरुआत हुई। मैं गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानन्द की धरती वाले उसी बंगाल में था, जहाँ के बड़े-बड़े चाय बागान के विषय में सिर्फ किताबों में ही पढ़ा था। मैं ट्रेन के बाहर की हरियाली देख कर मंत्रमुग्ध हो रहा था। बाहर के नजारों का लुफ्त उठाए जा रहा था। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि प्रकृति का ऐसा भी सौन्दर्य रूप होता है। ट्रेन का गुवाहाटी में पहुँचने का समय सुबह ८:४५ बजे का था परंतु वह शाम को लगभग ४ बजे पहुँचती है। उस दिन (२ दिसंबर को) मुझे गुवाहाटी में ही स्टेशन के समीप एक पुलिस कैंप में रुकना था।

मैंने पहली बार इतनी लंबी यात्रा की थी। लगभग २ हजार किमी और ४० घंटें की। काफी थक चुका था, कैंप पहुँच कर चाय पीने के बाद आराम किया। थोड़ी देर बाद रात का खाना खाया और फिर पढ़ने लगा। १२:३० बजे सो गया और सुबह ४ बजे का अलार्म बजने पर उठा। सुबह अपने समय पर उठ कर तैयार होकर ४:३० बजे स्टेशन के लिए निकल गया और लगभग १० मिनट में स्टेशन पहुँच गया। ५ बजे १० सवारी को लेकर सूमो चालक ने गाड़ी आगे बढ़ाई। लगभग ३० मिनट की यात्रा के बाद हवा की ठंढक और कुहासे के बीच से धीर-धीरे गुजरती गाड़ियाँ मन को आनंदित कर रही थीं। कभी ऊँचे-ऊँचे पहाड़ दिखते तो कभी कुहासा गाड़ी में आ कर चेहरे पर स्पर्श करता। रह-रह कर मुझे नींद भी आ रही थी लेकिन मैं सो नहीं रहा था। मानो यह महसूस हो रहा था कि इन्हीं नजारों को तो देखने के लिए मैंने इतना इंतजार किया था। ऐसे दृश्यों की मैंने कल्पना भी नहीं की थी। जिसे मैं कुहासा समझ रहा था असल में वह बादल था। ऊपर से नीचे देखने पर वही कुहासा जिनके बीच से मैं थोड़ी देर पहले गुजरा था वो बादल के समान दिख रहा था।

डेढ़ घंटें बाद लगभग ६:३० बजे गाड़ी नोंगपो में एक होटल (ढाबे) के सामने रुकती है जहां सभी यात्री उतर कर चाय वगैरह पीते हैं। मैंने भी चाय पी। वहाँ की चाय थोड़ी अलग थी। १५-२० मिनट के बाद गाड़ी वहाँ से खुल गई। अब पूरा वातावरण एकदम साफ हो चुका था। सूरज की रौशनी से पहाड़ों के पेड़ रत्न जड़ित मुकुट के समान चमक रहे थे। सड़क के दोनों ओर पहाड़ मानो ऐसा एहसाह करा रहें थे जैसे कि सड़क उनके बीच नदी के समान आगे बढ़ रही हो। टू-लेन सड़क को फोर-लेन बनाया जा रहा था जिसकी वजह से सड़क की स्थिति काफी जर्जर हो चुकी थी और उसपर चलने वाली गाड़ियों की रफ्तार बहुत धीमी। यह सड़क जोराबाट से शिलांग होते हुए मिजोरम जाती है। यह राष्ट्रीय राज मार्ग संख्या ६ है। लगभग ७:३० बजे गाड़ी बड़ा पानी पहुँचती है। वहाँ पहुँच कर मैंने जो नजारा देखा वैसा अभी तक सिर्फ फिल्मों में ही देखा था। कुछ क्षण के लिए मेरी आँखों की पुतलियाँ मानों यह विश्वास करने को तैयार ही नहीं थीं। ‘उमियम लेक’ प्रकृति का वरदान है, बहुत बड़ी झील है। शायद इसी वजह से उस स्थान का नाम ‘बारापानी’ पड़ा हो। चारों दिशाओं से पहाड़ उस झील को इस प्रकार से कैद किए हुए हैं मानो मदारी का खेल देखने के लिए लोगों का हुजूम मदारी को चारों तरफ से घेरा हो। उस सौंदर्य को मैं अपने मोबाइल में कैद किए जा रहा था। मैं अपने मोबाइल से बिना रुके उस अद्भुत दृश्य का फोटो लिए जा रहा था। पहाड़ के ऊपर जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ रही थी उस झील की सुन्दरता मानो और निखरती जा रही थी। ऊपर से नजारा कुछ और ही था। सूमो की खिड़की से कभी बादलों के बीच में पहाड़ों की चोटियों पर हरे-हरे सुहावने पेड़ दिखते, तो कभी उनकी परछाइयाँ गाड़ी के आगे इस प्रकार प्रतिबिम्ब बनाती, मानो वो किसी कैनवास से कम न हो।

समूचा पहाड़ चीड़ के पेड़ (पाइन ट्री) की हरियाली से ढका हुआ था। पूरा पहाड़ मानो जैसे चीड़ की सुन्दरता से हिलोरे मार रहा हो। पाइन भारत में नहीं पाया जाता था बल्कि इसे अँग्रेज भारत में लाए थे। बताया जाता है कि शिलांग में अँग्रेजों ने हेलीकॉप्टर से उसका बीज गिराया था। ऐसा लग रहा था मानो चीड़ के पेड़ और सूरज की किरणों के बीच युद्ध हो रहा हो। मानो एक तरफ सूरज अपनी रोशनी से चीड़ को भेद कर सड़क को उज्ज्वलित करना चाह रहा हो, तो वहीं दूसरी तरफ चीड़ अपनी छाया से सड़क को ढक लेना चाह रहा हो। जिधर देखता उधर वृक्ष ही वृक्ष दिखते। सड़कों के किनारे कहीं-कहीं एक दो दुकानें दिख रही थीं। समतल की तरह वहाँ घनी आबादी नहीं थी। इक्का दुक्का घर दिख रहे थे। ऐसे ही दृश्यों को निहारते हुए गाड़ी कब मावलई पहुँच गयी पता ही नहीं चला।

लगभग ८ बजे मैं मावलई पेट्रोल पंप पर उतरा और वहाँ से नेहू (कैंपस) के लिए टैक्सी ली। १०-१२ मिनट में नेहू पहुँच गया। जैसे ही गेट न.-२ से परिसर में प्रवेश किया समूचा विश्वविद्यालय चीड़ की खूबसूरती में मानो नहाया हुआ प्रतिबिम्बित हो रहा था। जिस प्रकार स्त्री की सुन्दरता को आभूषण निखार देते हैं उसी प्रकार चीड़ के वृक्ष भी उस परिसर की सुन्दरता में चार चाँद लगा रहे थे। चीड़ रूपी आभूषण से विश्वविद्यालय का पूरा परिसर आभूषित हो रहा था। सूरज की किरणें ठंढ में भी मानो चुभ रही थीं। इतनी साफ-सफाई शायद मैंने इससे पहले कहीं और नहीं देखी थी। आपको बता दूँ कि एशिया का सर्वाधिक स्वच्छ गाँव (क्लीनेस्ट विलेज) ‘मावलिनॉन्ग‘ मेघालय में ही है। चारों तरफ पाइन ट्री की हरियाली दूर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और आसमान एकदम नीला,


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Dr Atul Vaibhav डॉ. अतुल वैभव

डॉ. अतुल वैभव, एक शिक्षाविद और लेखक हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में एक सहायक प्रोफेसर के रूप में, वह अपनी शोध विशेषज्ञता को कक्षा में लाते हैं। पहले, वह नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी (NEHU) में रिसर्च स्कॉलर थें