नीता शर्मा, लेखिका, आकाशवाणी की पूर्वोत्तर सेवा में हिदी उद्घोषिका।


कचरे के ढेर में पड़ी हुई वो मासूम धीरे धीरे सिसक रही थी और आस पास खड़े कु त्तेज़ोर – ज़ोर से भौक रहे थे। राह से गुजरते एक बच्चे की नजर पड़ गई उसपर। उसने लपककर उठा लिया और सीने से चिपका लिया उसको जैसे कोई जिदा खिलौना मिल गया हो खेलने के लिए। भागता हुआ घर ले आया।
“माँ, माँ देखो कितनी प्यारी परी मिली मुझे कचरे के ढेर में।
“परी, कचरे में ? हँसकर मां उसकी बात को सुनी अनसुनी करते हुए बोली। उसे लगा फिर कोई टूटा – फू टा खिलौना मिल गया होगा बेटे को।
“हाँ माँ, देखो कितनी प्यारी है। पर देखो आँखो से ऑं सू निकल रहे हैं। शायद भूख लगी होगी।”
अब माँ चौकी औं र पलटकर देखा। क्या सच में एक बच्ची है और वह भी जिदा ? कुछ दो – चा र दिन की रही होगी। एकदम मासूम सहमा – सा चेहरा, न कोई ईर्ष्या न द्वेष, शांत बिल्कुल शांत। आंसू आंखो की पो रो के पास सूख चुके थे। धीरे से आंख खोलती बं द करती। उसकी ममता चीत्कार उठी। क्या पता था बेचारी कै से क्रूर और वासना के अंधे जगत में आ गई थी लड़की बनकर।
उसका पाँच वर्ष का बेटा था जो इसी तरह कु छ साल पहले ही कचरा बीनते मिला था। दोनो माँ- बेटा पेट की आग बुझाने की खातिर दिन भर घूम घूमकर गली मोहल्लों में कच ल्लों रा बीनते। यदा कदा कोई टूटा फू टा खिलौना, गाड़ी या गेंद आदि मिल जाता कचरे के ढ़ेर से तो चेहरा कै से खिल जाता था खुशी से बच्चे का। और आज जब बेटा उसी कचरे से अनमोल हीरा बीन लाया तो उसका चेहरा भी खिल गया था खुशी से। दोनो हाथ जोड़क र ऊपरवाले को कृ तज्ञता से बोली, “कु छ के लिए कचरा और हम जैसो के लिए खजाना! कितना दयालु है तू प्रभु! जिसको पति और समाज ने बांझ कहकर ठुकरा दिया था उसकी झोली तूने एक बार फिर इतने बड़ेखजाने से भर दी और उसकी आंखो से झ र झर ऑं सू बहने लगे। बच्ची के माथे को चूमकरबुदबुदायी-पंकजा।