डॉ अन्नपूर्णा बाजपेयी, ‘अंजू’, कानपुर
साहित्यकार, ब्लॉगर, समाज सेविका, योगा ट्रेनर।


“रे! कलुआ, जरा इधर तो आ! “खटिया पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ करते हुए कलुआ के बापू ने जोर से पुकारा।
कलुआ खेल में मग्न था सुना नहीं।
“जरा जोर से बुलाइयो, खेल रहा है छोरा न सुनैगो!”अपने सिर के पल्लू को सँवारती हुई माई उधर ही आ बैठी।
“इतनी देर से पुकार रहा हूँ सुनता ही न है पाजी कहीं का!” झुंझलाते हुए बापू बोला।
“बालक ने दिनभर खेलते रहना अच्छा न है गोलू के बापू! इसको जरा कस के रखियो!”और घी गुड़ रोटी पर चुपड़ कर दूसरे पुत्र गोलू को खिलाने लगी।
उसने प्रेम से पुकारा, “कल्लू जरा सुन तो!”
“हाँ माई!” कल्लू लपकता हुआ आ पहुंचा। और ललचाई नजरों से घी गुड़ लगी रोटी खाते हुए छोटे भाई का मुँह ताकने लगा।
“सुन मैं तुझे पाठशाला भेजना चाहवे हूँ तू जावेगा न, जैसे गोलू जावे है!” माई बोली।
“हाँ माई!”कहते हुए वह खुशी से उछल पड़ा फिर कुछ सोचता हुआ बोला, “माई तू मन्ने सच्ची में पढ़ने भेजेगी।” “हाँ रे! छोरा!” तू काहे पूछे है माई बोली।
“बगल वाली चाची कह रही थी कि इसको कौन पढावेगा ये तो सौतेला है! इसकी माई अपने बालक ने पढावेगी और अफसर बनावेगी!” भोलेपन से बोला कल्लू।
“इसीलिए तो तुझे जरूर पढ़ाना चाहूँ हूँ, तू तो मेरा कान्हा है सौतेला नहीं, जैसे कान्हा जी की दो-दो माई थी वैसे ही तेरी भी दो दो माई।” मुस्कुराते हुए माई ने उसके गाल पर एक प्यार भरी चपत लगाई।
“तो माई तूने घी गुड़ की रोटी मन्ने क्यों न दी!“ भोलेपन में बोल गया कल्लू और उसके माँ बाप एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।