शिलाँग के संस्मरणों की यह एक किस्त पेश कर रहा हूँ। प्रथम किस्त में केवल वहाँ के पेहले दिन की स्मृतियाँ शब्दबद्ध की थी; इससे ऐसी आशँका न हो कि मैं वहाँ के प्रत्येक दिन की स्मृति एक एक लेख में प्रस्तुत करने जा रहा हू। पाठकों पर इतना अत्याचार करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। इस किस्त में प्रारम्भ के दस दिन की कुछ विशेष स्मृतियों को लिपिबद्ध करने का प्रयास कर रहा हूँ।
जीवन का हर अनुभव कुछ शिक्षा लेकर हमारे पास आता है। मेरे जैसा कोई साधारण व्यक्ति भी पीछे मुड्कर बीते दिनों पर नज़र डालता है तो देखता है कि छोटे छोटे प्रसंग भी बड़ी सीख देने की क्षमता रखते हैं। प्रसंग विस्मृत होने के बावजूद भी उस्से प्राप्त शिक्षा भीतर बनी रहती है।दूसरे दिन से श्रद्धेय रघुनाथानन्द जी और आश्रम के अन्यान्य संन्यासी-ब्रह्मचारी मुझे वहाँ का काम समझाने में लग गये। कई कार्य मेरे लिए बिल्कुल नये थे। नागपुर में रहते समय हिसाब-किताब रखना मैंने कुछ हद तक सीख लिया था, किन्तु वहाँ कोई सरकारी अनुदान नहीँ मिलता था। ऐसे अनुदान का प्रस्ताव ठीक शासकीय पद्धति के अनुरूप बनाना होता था। उसका जमा-खर्च इत्यादि भी, जो सारे सरकारी नियम थे, उसी ढाँचे मे डालने पड़ते हैं। मेरे लिये यह कुछ अजीब सा मामला था, थोडा हास्यपूर्ण भी। उदाहरण के तौर पर – वहाँ साफ सफाई का काम करने वालें दो कर्मचारियों को “लाइब्रेरियन” के नाम से तनखा दिखानी होती थी। इसके पीछे क्या कारण हैं मुझे यथावकाश समझाए गए। कल औपचारिक रूप से कार्यभार ग्रहण करना था।
आश्रम के कई भक्त, संचालन-समिति (Managing Committee) के कुछ सदस्य, कर्मी और स्वयंसेवक मिलने आ रहे थे। कई फ़ोन भी चल रहे थे। यहाँ के भोजन के विशिष्ट गंध से भी परिचित होना मेरे लिए सहज नहीं था। विशेषकर ‘शूटकी’ पकाने की गंध। यद्यपि आश्रम में ‘शूटकी’ शायद ही कभी बनती थी, चारों तरफ से वह गंध (जो मेरे लिए अति दुर्गन्ध थी, अन्य लोगों के लिए वह कोई परेशानी नहीं थी; कुछ ऐसे भी थे कि उस गंध से वे बडे खुश हो जाते थे, मुँह में पानी आ जाता था। इससे यह सिद्ध होता है, कि कोई भी गंध, या कोई भी इन्द्रियानुभव अपने आप में अच्छा- बुरा नहीं होता; हर व्यक्ति की रुचि भिन्न होती है)। नाक को भर देती थी, और फिर भोजन करना एक प्रयास बन जाता था। शिलाँग में रहते रहते ऐसे गंधों से मेरा नासिकेंद्रिय परिचित हो गया। मैं माँस, मछ्ली इत्यादि कुछ नहीं खाता था – मुख से; किन्तु नासिकाद्वार से वह मेरे भीतर प्रविष्ट हो रहा था। ‘घ्राणेन अर्धभोजनम्‌’ यह उक्ति कितनी सार्थक है !
दूसरे दिन, अर्थात गुरुवार, २८ मार्च १९९६ को श्री रामकृष्ण का दर्शन कर मैं और रघुनाथानन्द जी दफ्तर में आए। अन्य साधु – छात्रावास के छात्र भी उपस्थित थे। मैने अनुमति पत्र (Letter of Acceptance) पर हस्ताक्षर किए। अब इस औपचारिक कार्यक्रम से इस आश्रम के सेक्रेटरी का भार रघुनाथानंद जी से मुझपर आ गया। हंसते हुए उन्होंने कहा, “अब बाघ की पूँछ तुम्हारे हाथ देकर मैं मुक्त हो गया।” मुझे इस कथन का तात्पर्य समझ में नहीं आया। तब उन्होंने केरल देश में प्रचलित कहानी सुनायीः
“एक नंबुद्री ब्राह्मण (ये लोग अपनी जिज्ञासु वृत्ति, चतुराई, तीव्र बुद्धि के लिए जाने जाते हैं) जंगल की एक पगडंड़ी से गुजर रहा था तो उसने देखा कि किसी शिकारी ने लगाये हुए पिंजरे में एक बड़ा बाघ फँस गया हैै। कौतूहलवश वहाँ जाकर उसने बाघ को एक टहनी से नोचा। गुस्से में आकर बाघ ने टहनी को खींचा, नंबुद्री ने भी खींचा दोनों की खींचा-तानी मे वह टहनी की अटकनी लगी और पिंजड़ा खुल गया। बाघ बाहर निकल ही रहा था कि बुद्धिमान नंबुद्री ने पिंजडे के बाहर निकली हुई बाघ की पूँछ कसकर पकड़ लिया। अब बाघ बाहर निकल नहीं सकता था। पर कितनी देर वह सारी शक्ति लगाकर पूँछ को पकड़ कर रख सकता था? कुछ थोड़े ही समय में वह थक गया; किन्तु पूँछ छोड़े तो बाघ बाहर निकलेगा और फिर…?
जान की बाजी लगाकर वह पूँछ पकड़े हुए वह बै्ठा था तब उसने पगडंड़ी से गुजरते हुए एक व्यक्ति को देखा और उसे पुकार कर कहने लगा, ‘यह बाघ मेरी पकड़ में आ गया है; बस अब इसे राजा के पास ले जाऊँगा और बहुत बड़ा इनाम पाऊँगा। तुम मेरी थोड़ी मदद करो तो तुम्हें भी कुछ हिस्सा मिलेगा; एक मिनट यह पूँछ पकड़ो, मैं अभी पेशाब करके आता हूँ। ’ उस मूर्ख व्यक्ति ने पूँछ पकड़ते ही नंबुद्री जी तो तेजी से भाग निकले। ” इतना कहकर रघुनाथानंद जी और हम सब हँसने लगे। उन्होँने मुझे बाघ की पूँछ पकड़ा दी है, इसका प्रमाण चंद दिनों में ही मिला। वह प्रसंग बाद में इसी किस्त के अंतर्गत बताऊँगा।
श्रद्धेय रघुनाथानंद जी ने फिर एक सुन्दर सा कोट निकालकर मुझे दिया। ‘मेरे पूर्ववर्ती सचिव देवदेवानंद जी ने दस सालों तक इस कोट का इस्तेमाल किया और फिर मुझे दिया; मैंने भी पिछले दस साल इसका उपयोग किया और अब तुम्हें दे रहा हूँ। मेरी इच्छा है कि तुम भी दस या अधिक साल उसका उपयोग कर फिर अपने उत्तराधिकारी को दे दोगे। ’
उनकी इस इच्छा को मैं पूर्ण नहीं कर सका। मात्र चार सालों के तुरन्त बाद ही मेरा शिलाँग से तबादला हुआ और मेरे उत्तराधिकारी श्रद्धेय स्वामी जगदात्मानंद जी को यह कोट (और बाघ की पूँछ भी) सौंपकर मैं शिलाँग से निकल पड़ा। जगदात्मानंद जी का कद उस कोट की लम्बाई से अधिक ऊँचा था, बाहें भी लम्बी थीं। उस कोट का उपयोग उन्होंने शायद ही कभी किया हो। उनके उत्तराधिकारी श्रद्धेय ब्रह्मदेवानंद जी को उस कोट की कोई जानकारी भी नहीं थी।
शुक्रवार, २९ मार्च १९९६, ठीक सढे नौ बजे संचालन समिती की मीटिंग शुरु हुई। श्री आर. टिं. रिम्बाई, मेघालय के जयंतिया जनजाति के एक प्रमुख व्यक्ति, इस समिती के सम्मानीय अध्यक्ष थे। आने वाले दो-ढाई सालों में उनके साथ मेरा धनिष्ठ संपर्क रहा। मीटिंग में उपस्थित सभी सदस्यों से वार्तालाप हुआ। इन सभी का आंतरिक सहयोग आश्रम की गतिविधियाँ सुचारु रूप से चलाने हेतु आवश्यक था। विगत दो महीनों का लेखा-जोखा और मीटिंग का इतिवृत्त (minutes) सारा रामकृष्ण मिशन के मुख्यालय को भेज दिया गया। श्रद्धेय रघुनाथानंद जी को बिदाई देने का (send-off) बड़ा समारोह करना होगा इसपर भी सभी ने उत्साहपूर्वक सहमति दर्शायी।
रामकृष्ण संघ के परमाध्यक्ष पूज्य भूतेशानन्द जी, उपाध्यक्ष रंगतानन्द जी, गहनानन्द जी इन्हें पत्र लिख्कर आशीर्वाद याचना की।
इसके दूसरे दिन रामकृष्ण मिशन चेरापुंजी (जिसे अब सोरा नाम से जाना जाता है) जाना था। बचपन से ही चेरापुंजी का नाम सुनता आया था – जहाँ दुनिया की सर्वाधिक बारिश होती है। जीप गाड़ी से सुबह निकले; शिलाँग में तो सुनहरी धूप निकल आयी थी। चेरापुँजी तक का लगभग ४० कि. मि. का पहाड़ी रास्ता पूरा करने को पूरा एक घण्टा लगा। शिलाँग से १५ कि. मि. के बाद ही दृश्य बदल जया। बायी और गहरी घाटी से घने बादल भी हमारे साथ मानो चेरापुँजी चल रहे थे। ‘देखो, अब आप की समझ में आएगा कि चेरा में इतनी बारिश क्यों होती है। ये सारे बादल जल से पूर्ण है। इस घाटी से गुजरते हुए वे चेरापुँजी के ऊँचे पहाड़ से टकरा जाते हैं। इतना सारा पानी का वजन लेकर ये बादल पहाड़ चढ़ नहीं पाते तो सारा पानी बारिश के रूप में वहीं फ़ेंक देते हैं’- हमारे एक सहयात्री, जो कि इस प्रदेश में कई साल रह चुके थे, बना रहे थे। उनका यह कथन मेट्रॉलाजी की दृष्टि में कितना वैज्ञानिक था, ये बताना मेरी औकात के बाहर होने पर भी बड़ा ही रोचक प्रतीत हुआ। आनेवाले कई वर्षों में उनका यह कथन मैंने कई बार नवागतों के सामने (कुछ अधिक मिर्च-मसाला डालकर) दोहराया है।
चेरापुँजी के रास्ते पर विभिन्न ग्रामों में रामकृष्ण मिशन, चेरापुँजी द्वारा संचालित कई स्कूल दिखाई पड़े। उन स्कूलों के बच्चे हमारी जीप को (जिसपर रामकृष्ण मिशन, शिलाँग लिखा था) देखते ही ‘खुब्लेई महाराज’ का घोष लगाकर अभिवादन करते थे। हम लोग भी गाड़ी जरा धीमी कर उन्हें ‘खुबलेई शिबून’ कहकर आगे बढते थे। रास्ते में दोनो तरफ कहीं कोयले के और कहीं बालू के ढेर लगे थे। कई ट्रक उन्हें उठाकर विक्रय के लिए अन्य स्थानों पर ले जाते थे। इस सम्बन्ध में पूज्य भूतेशानन्द जी महाराज एक विनोदपूर्ण किन्तु शिक्षाप्रद घटना सुनाया करते थे। उसे बाद के किस्त में लिखूँगा।
चेरापुँजी आश्रम के प्रमुख स्वामी इष्टानन्द जी मेरे साथ ही बेलुड़ मठ स्थित ‘प्रोबेशनर्स ट्रेनिन्ग सेन्टर’ में दो साल थे और हमारी अच्छा मित्रता थी और अभी भी हमारी आपसी मुलाकात और वार्तालाप आज भी जारी है। मेरे अमेरिका आने के कुछ महीने पहले वे भी यहाँ पहुंच गए थे और इन दिनों सेण्ट पीटर्सबर्ग, फ्लोरिडा में स्थित रामकृष्ण मिशन के वेदान्त सेंटर के प्रमुख बने। एक कार्यकुशल संघटक और अच्छे वक्ता के रूप में इस देश में भी सुख्यात हैं। हम दोनों एक-दूसरे से मिलकर बड़े हर्षित हुए। वहाँ का मंदिर, स्कूल, छात्रावास इत्यादि देखकर बहुत आनन्द हुआ। पिछले 20 सालों से से इस आश्रम के स्फूर्तिशाली इतिहास को मैंने गौर से कई बार पड़ा था, और मराठी मासिक पत्रिका ‘जीवन- विकास’ (जिसका प्रकाशन रामकृष्ण मठ, नागपुर से होता था) मैंने उसके विषय में प्रबन्ध भी लिखे थे। वहाँ अब मैं जब प्रत्यक्ष रूप से सब देख रहा था तो कितनेही पवित्र, ‘त्याग और सेवा’ इस स्वामी विवेकानन्द जी के मन्त्र से प्लावित भावतरंग मन में उछलने लगे थे। अच्छा खासा भोजन हुआ। वहाँ की संचालन समिती के एक सदस्य के रूप में मुझे सम्मिलित किया गया। उन की मीटिंग भी सम्पन्न हुई और शाम तक हम लोग शिलाँग आश्रम आ पहुँचा। चेरापुँजी के संस्मरणों को किसी अगली किस्त में लिखूँगा।
इसी बीच मुझे व्याख्यानों के लिए चंडीगढ़ जाना था। शिलाँग में तबादला होने के कई दिन पहले ही यह कार्यक्रम निश्चित हुआ था। ४ अप्रैल को शिलाँग से रवाना हुआ और वहाँ का व्याख्यान इत्यादि कार्यक्रम समाप्त कर १० तारीख को सुबह ७ बजे शिलाँग लौटा तो एक बुरी खबर मेरा इन्तजार कर रही थी।
वहाँ विवेकानन्द कल्चरल सेंटर (क्विण्टन हॉल) में दो लोग निवास करते थे – एक भक्त – स्वयंसेवी और एक वेतन कर्मी (उनके नाम यहाँ नहीं दे रहा हूँ)। इनमें जो वेतन कर्मी था वह मानसिक-पीड़ा से त्रस्त था और स्वयं वो भक्त से सख्त नफरत करता था। पूर्व रात्रि को उसने उस भक्त के मस्तक पर हँसिया से वार किया। वह लहुलहान अवस्था में भागकर जान बचाने में किसी प्रकार सफल हो गया। पुलिस ने उसे अस्पताल में भर्ती किया और हमलावर कर्मी को जानलेवा हमला (Attempt to murder) करने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया।
क्या करूँ मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। ऐसी परिस्थिति से सम्मुखी होने का प्रसंग मेरे जीवन में पहले कभी भी नहीं आया था। आश्रम के मेरे सहकारी साधुओं के लिए भी ऐसी जटिल समस्या का कोई अनुभव नहीं था। एक अच्छा समाचार इतना था कि उस भक्त की हालत ठीक हो रही थी, जीवन को खतरा नहीं था, पर पूर्ण रूप से स्वस्थ होने में अभी काफी समय लगेगा। उस प्रसंग के कारण पुलिस स्टेशन में और वकील लोगों के पास कई बार जाना हुआ। फिर अब विवेकानन्द कल्चरल सेंटर में अब काम कौन करेगा यह भी एक बड़ी समस्या थी। यह हादसा क्यों हुआ और इसमें दोष किसका है इस बारे में भी साधुओं में मतभेद था।
कुछ महिनें के गुजरने के बाद यह समस्या समाप्त तो हुई किन्तु उससे काफी शिक्षा भी मिली। यहाँ इस घटना से सम्बन्धित एक बात लिखना चहता हूँ। जिनसे मैंने कार्यभार स्वीकार किया था वे श्रद्धेय रघुनाथानन्द जी इस सम शिलाँग में ही थे। उनसे जब मैंने इस बारे में सलाह पूछी तो उन्होंने हँसते-हँसते कहा, “हाँ, अब बाघ की पूँछ तुम्हें सौंप दी है; मैं फिर से पकडने की मूर्खता नहीं करूँगा। ”
और उसी दिन आश्रम का वार्षिकोत्सव शुरु होने जा रहा था। किन्तु आज भजन- गान होने वाला था, किन्तु गायक-वादकों का दल – जो दिग्बोई से आनेवाला था- वह नहीं आ पाया – उन लोगों में जो मुख्य थे, उन्हें चुनाव के कारण छुट्टी नहीं मिल पायी। यहीँ आश्रम से सम्बन्धित कुछ गायकों ने भजन किया।
उत्सव में सहभागी होने हेतु काशी से स्वामी शुद्धव्रतानन्द जी और तपनानन्द जी पधारे थे – दोनो रघुनाथानन्द जी के घनिष्ट मित्र थे; वे तीनो १९६० के दशक में शिलाँग आश्रम में लगभग एक ही साथ ब्रह्मचारी के रूप में प्रविष्ठ हुए थे।
शुक्रवार को दोपहर ३.३० को उत्सव का दूसरा कार्यक्रम हुआ। आश्रम के ही एक स्वामीजी ने कुछ और गायक-वादकों के साथ ‘गीति-आलेख्य’ (गीतों के माध्यम से श्री रामकृष्ण के चरित्र का आख्यान) सादर किया। फिर श्रीमती दीपाली चक्रवर्ती, शुद्धव्रतानन्द जी, तपनानन्द जी के सारगर्भित व्याख्यान हुए।
अच्छा भक्त- समागम हुआ था। उत्सव और दो दिन तक चला। बड़े अच्छे व्याख्यान और भजनादि हुए। एक बड़ा कार्यक्रम विवेकानन्द कल्चरल सेंटर में भी हुआ। श्रद्धेय रघुनाथानन्द जी को ‘विदाई पार्टी’ (send-off) भी इन्हीं दिनो दी गयी। शिलाँग आश्रम में मेरा प्रथम व्याख्यान भी हुआ। बहुत सारे भक्तों से वार्तालाप हुआ। प्रायः सभी भक्त मेरे साथ बांगला में और आपस में सिल्हेटी भाषा मे बात करते थे, जिसे समझने में मुझे काफी कठिनाई होती थी।
अगला दिन रविवार, १४ अप्रैल बांगला सालगिराह ‘नोबो बोर्षो’। प्रातः काल से ही भक्तों की बड़ी भीड़ लगी थी। उन सब के साथ मिलना हुआ, परिचय हुआ। सुबह- शाम विवेकानन्द कल्चरल सेंटर में उत्सव का अंतिम दिन मनाया गया। एक विख्यात गायक का सुंदर गायन सुबह हुआ और शाम को कई स्वामीजी लोगों के सुंदर व्याख्यान!
शिलाँग पहुँचकर मुझे केवल १२ दिन हुए थे, (उनमे से ६ दिन चंडीगढ़ की यात्रा मे खर्च हुए) किन्तु लग रहा था कि मैं यहाँ कई बरसों से हूँ।

स्वामी योगात्मानन्द वेदान्त सोसाइटी आफ प्रोविडेन्स के मंत्री एवं अध्यक्ष हैं। ये 1976 में रामकृष्ण मिशन में शामिल हुए और 1986 में संन्यास की दीक्षा ली। 20 वर्ष तक रामकृष्ण मिशन नागपुर, में कार्य करने के उपरांत रामकृष्ण मिशन शिलांग मेघालय, के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे। तदुपरांत आप सन् 2001के ग्रीष्म ऋतु में अमेरिका में वेदांत सोसायटी आफ प्रोविडेन्स के मंत्री के पद पर आए।