डॉ. श्रुति पाण्डडे

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास देश के हर क्षेत्र के स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के बलिदानों की गाथाओं से भरा पड़़ा है। परन्तु इनमें तमाम ऐसे वीर भी हैं जिनकी चर्चा प्रमुखता से इतिहास ग्रंथों में नहींं मिलती। इन बलिदानी वीरों ने स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना के लिये संघर्ष किया और उनके त्याग की गाथा ने आने वाली तमाम पीढ़ियों को प्रभावित किया। उनके बलिदान की कहानी हमें देश के महान आदर्शों और मूल्यों की याद दिलाती है। ऐसे ही महान वीरों में एक नाम सुदूर मेघालय के तिरोत सिंग का भी आता है।
मेघालय की खासी-जयन्तिया पहाड़ियों के नयनाभिराम सौंदर्य के बीच बसने वाली खासी जनजाति ने युगों से स्वतंत्रता की तीव्र आकांक्षा को बनाये रखा है। इसी खासी जनजाति के बलिदानी वीर तिरोत सिंग पूर्वोत्तर क्षेत्र के ऐसे महान वीर थे जिन्होंने जातीय अस्मिता की रक्षा के लिये तब संघर्ष किया था जब हमारा देश औपनिवेशिक सत्ता से आक्रांत होने की प्रक्रिया में था। हमारे देश की जनता को तब अंग्रेजी हुकूमत की चुनौती का सामना करना पड़़ रहा था। इस समय पूर्वोत्तर के पहाड़ी क्षेत्रों की अखंडता को बनाये रखने में तिरोत सिंग की महत्वपूर्ण भूमिका थी। तिरोत सिंग के नेतृत्व में अंग्रेजों के साथ हुए संघर्षों ने खासी जनमानस पर अमिट छाप छोड़ी है। त्याग, साहस और बलिदान से भरी इन वीरतापूर्ण गाथाओं का हस्तांतरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी होता रहा। परन्तु यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि तिरोत सिंग और उनके प्रतिरोध के विषय में मेघालय के बाहर बहुत कम जानकारी है।
अठारहवीं शताब्दी के अन्त से ही ईस्ट इंडिया कम्पनी ने खासी मुखियों के क्षेत्रों में घुसपैठ करनी शुरु कर दी थी। इनमें से एक मुखिया थे तिरोत सिंग, जो पूर्वोत्तर क्षेत्र के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। इन्होंने दूरदराज के खासी जनों को ब्रिटिश आधिपत्य के खिलाफ एक सूत्र में बांधा था। तिरोत सिंग और उनके साथियों ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया और छापामार (गुरिल्ला) युद्ध शैली अपना कर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में इसका कारगर उपयोग किया।
अंग्रेजी सरकार का खासी और जयन्तिया पहाड़ियों से आरम्भिक सम्पर्क आर्थिक था। सन् 1765 में बंगाल की दीवानी हासिल करने के साथ ही वे खासियों से और उनके क्षेत्र से परिचित हुए। खासी चूना खदानों से बंगाल ने प्राचीन काल से ही चूना आपूर्ति की थी और इसी कारण यूरोपीय उद्यमी खासी पहाड़ियों की ओर आकर्षित हुए।1—दीवानी का अधिकार प्राप्त करने के बाद कम्पनी ने चूना व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया। खासियों के साथ व्यापारिक आदान-प्रदान के कारण ब्रिटिश—व्यापारियों का खासी मुखियों के साथ वाणिज्यिक संबंध स्थापित हुआ।1 खासी पहाड़ियों पर ब्रिटिश—आधिपत्य के पीछे इन पहाड़ियों में अंग्रेजो की आर्थिक दिलचस्पी थी। साथ ही वे सिलहट और असम को जोड़ने वाली सीधी सड़क चाहते थे जिसे इन पहाड़ियों में से होकर गुजरना था। सन् 1824 में अंग्रेज बर्मी युद्ध में शामिल हुए। इस युद्ध का अन्त यान्दाबो की सन्धि के साथ सन् 1836 में हुआ। पूर्वोत्तर भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवादी विस्तार और आधिपत्य में इस सन्धि की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस सन्धि के परिणामस्वरूप असम पर अंग्रेजी हुकूमत का कब्जा हो गया और डेविड स्कॉट को असम का कमिश्नर नियुक्त किया गया। वे पहले से ही पूर्वोत्तर सीमान्त में गवर्नर-जनरल के एजेन्ट थे। इन गतिविधियों ने खासी इतिहास में नये अध्याय की श्ुारुआत की।
खासी जनजाति की राजनीतिक व्यवस्था लोकतांत्रिक थी। अंग्रेजों के आने से पूर्व खासी पहाड़ियों में लगभग 30 राज्य थे। इन राज्यों में एक परिषद् होती थी जिसका अध्यक्ष ‘सिएम’(मुखिया) होता था, परन्तु इन परिषदों की स्वीकृति के बिना मुखिया कोई महत्वपूर्ण निर्णय नहींं ले सकता था। इन्हीं छोटे-छोटे गणराज्यों से खासियों की राजनीतिक व्यवस्था निर्मित थी। स्वतंत्रता उनकी रगों में बसती थी। ऐसे स्वतंत्रता प्रेमी लोगों द्वारा दमनकारी विदेशी सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध खड़ा किया जाना स्वाभाविक ही था।3
अंग्रेजों के आने से पहले भी खासियों ने कई शक्तिशाली शत्रुओं के खिलाफ लड़ाईयाँ लड़ी थीं। मान, अहोम और बर्मियों के खिलाफ उन्हें संघर्ष करना पड़ा था। दक्षिणी सीमा पर मुगलों की शक्तिशाली सेनाओं के खिलाफ उन्हें लड़ाई लड़नी पड़ी थी। इन युद्धों के संघर्षपूर्ण अनुभव के कारण वे अंग्रेजों द्वारा पूर्ण आधिपत्य स्थापित करने से पूर्व वर्षों तक उनका प्रतिरोध कर सके। अलेक्जेंडर मैकेन्जी ने सन् 1869 में लिखा था, ‘‘कोसिया (खासिया) ने अपने युद्धप्रिय चरित्र और जनजातीय व्यवस्था के कारण हमें दूसरी पहाड़ी जातियों की तुलना में अधिक परेशान किया है।’’2
नौंग्खलाव युद्ध (खासी स्वतंत्रता की लड़ाई) से पहले भी खासियों ने अंग्रेजी सेना के खिलाफ कई युद्ध किए। पहला संघर्ष सन् 1774 में हुआ, जिसके बारे में अलेक्जेंडर मेकेन्जी ने सन् 1869 में लिखा कि यह सिलहट में हुए किसी संघर्ष का परिणाम था। इसी प्रकार सन् 1778 के ब्रिटिश रिकार्डों में अंग्रेज सेनाओ ंऔर चेरा-मौसमाई तथा शेला राज्यों के बीच हुए संघर्षों का विवरण है।5
जयन्तिया और शिलांग इन पहाड़ियों में स्थापित होने वाले पहले राज्य थे। दूसरे राज्यों की स्थापना तब हुई जब इन दोनों राज्यों से लोग कम जनसंख्या वाले पश्चिमी क्षेत्रों की ओर बढ़ने लगे। यहाँ एक के बाद एक कई राज्यों की स्थापना हुई। इस समय से खासी राज्यों ने बांग्लादेश और असम के अन्य राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध कायम किये। उनके बीच व्यापारिक तथा वाणिज्यिक संबंध भी बने। किन्तु बाद में सीमा-विवाद के कारण खासी राज्यों के उत्तर में मान तथा बर्मा से तथा दक्षिण में मुगलों और अंग्रेजों से कई युद्ध करने पड़े। मुगलों और अंग्रेजों जैसी साम्राज्यवादी शक्तियों ने जब असम और बांग्लादेश के मैदानेां में घुसपैठ करना प्रारंभ किया तो खासी पहाड़ियों के इन छोटे, स्वतंत्र राज्यों ने आपस में एकजुट होकर उनसे मोर्चा लिया। इस प्रकार उनमें एक प्रकार का गठबन्धन हो गया।
सन् 1765 में मुगलों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) की दीवानी दी, जिसकी सीमा दक्षिण में खासी और जयन्तिया पहाड़ियों से लगी हुई थी और गोआलपाड़ा तक फैली थी। इस प्रकार अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में अपनी जड़ें जमा लीं। सन् 1819 में डेविड स्कॉट को गोआलपाड़ा भेजा गया। स्कॉट ने सुझाव दिया कि पूर्वी बंगाल में मैमन सिंह और असम में गोआलपाड़ा को जोड़ने वाली सड़क बनाई जाए। डेविड स्कॉट ने इस समय तक खासी और जयन्तिया पहाड़ियों की स्थितियों का गहराई से अध्ययन किया था। उन्होंने समझ लिया था कि खासी शासकों की एकता का कुशल नेतृत्व एक ही व्यक्ति कर सकता है और वे हैं तिरोत सिंग, नौंग्ख्लाव के सिएम, जो एक तेजस्वी राजा, कुशल प्रशासक, परिपक्व राजनीतिज्ञ और असाधारण नेता थे।
तिरोत सिंग का जन्म अठारहवीं शताब्दी के अन्त में नौंग्ख्लाव में हुआ था। उनकी माता का नाम का क्सान सिएम और पिता का नाम खीन कोनगोर था जो लाइट लिंगकोट के नौग्किनरिह ग्राम के नौंगकिनरिह खानदान के थे।6 अपनी युवावस्था में तिरोत सिंग गठीले बदन के लम्बे और सुदर्शन युवक थे। वे अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग में दक्ष व कुशल घुड़सवार थे तथा तीरंदाजी, तैराकी और शिकार के शौकीन थे। राजा बनने के पहले राजा छतरसिंग के शासन काल से ही उन्होंने राजकार्य में गहरी दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी थी। उप सिएम के रूप में तिरोत सिंग नौंग्ख्लाव राज्य के सबसे सक्षम प्रशासकों में से एक थे। उस समय उन्होंने अपने साहस, रणकौशल और अद्वितीय संगठनशक्ति का परिचय दिया था। स्थानीय विवादों का निपटारा करने की उनकी क्षमता और उनकी प्रशासनिक योग्यताओं ने उन्हें सभी के आदर का पात्र बना दिया और कई योग्य तथा क्षमता-सम्पन्न व्यक्ति उनके मित्र बन गये। बचपन से ही प्रतिभा सम्पन्न तिरोत सिंग को अपने मार्गदर्शकों तथा परामर्शदाताओं से बहुत ही बातें सीखने को मिलीं तथा उन्होंने युद्धकला, व्यूहरचना, कूटनीति आदि में अद्भुत योग्यता हासिल कर ली।7
कोनराय सिंग ऊर्फ छतर सिंग सिएम के देहान्त के बाद नौंग्ख्लाव के पाँचों लिंगडो (पाँच प्रमुख कुलों के प्रतिनिधि) को राजवंश के राजकुमारों में से एक को राजा चुनना था। छतर सिंग का भतीजा और उत्ताराधिकारी नाबालिग था। राज्य की स्थिति विषम थी और प्रजा को एक ऐसे सिएम की आवश्यकता थी जो उसे स्थिर और कुशल नेतृत्व प्रदान कर सके। पाँचों लिंगडो ने एक मत से तिरोत सिंग का चुनाव किया और यह फैसला किया कि तिरोत सिंग के बाद रिजोन सिंग उनके उत्ताराधिकारी होंगे।
राजकुमार के रूप में तिरोत सिंग ने अपने राज्य के मैदानी भागों पर हुए हमलों का सामना किया था। राजा के रूप में उनका पहला महत्वपूर्ण कदम था नौंग्ख्लाव के राज दरबार (हिमा) का आयोजन जिसमें पूरे राज्य के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस दरबार में उन्होंने अपने राज्य की और विस्तृत अर्थ में पूरे खासी क्षेत्र की स्वतंत्रता और स्वायातता पर मंडरा रहे खतरे के प्रति सचेत किया। उन्होंने खासी युवकों से अनुरोध किया कि वह आसन्न संकट को ध्यान में रखते हुए अपने आपको मातृभूमि की रक्षा के लिये सन्नद्ध रखें। उन्होंने प्रजाजन से अनुरोध किया कि वे छोटे-मोटे मतभेदों को भुलाकर एकजुट हो जायें। उनकी अपील का लोगों पर प्रभाव पड़ा और वे अपने-अपने गाँवों में वापस जाकर अपने आपको तैयार करने लगे। शासक के रूप में तिरोत सिंग की यह पहली सफलता थी।
राज्य के आंतरिक प्रशासन में तिरोत सिंग सिएम ने कई परिवर्तन किये। अपने सम्पूर्ण राज्य में उन्होंने विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया शुरु की। राजदरबार ने स्थानीय दरबारों को यह शक्ति प्रदान की कि वे गाँवों के प्रशासन का दायित्व संभाल सकें। इस दौरान नौंग्ख्लाव राज्य ने पड़ोसी खासी राज्यों के साथ सभी सीमा विवाद सुलझा लिये। आसपास के क्षेत्रों के साथ व्यापारिक संबंधों की महत्ता को ध्यान में रखते हुए तिरोत सिंग ने पड़ोसी खासी राज्यों से व्यापारिक संबंधों को सुदृढ़ बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत की।
असम में अपने शासन को संगठित करते समय अंग्रेजों ने खासी हिल- असम सीमा के दुआरों को अपने कब्जे में ले लिया। ये दुआर खासी शासकों के अधीन थे। खासी मुखियों ने पाया कि वे उन दुआरों के अधिकारों से वंचित हैं जो उनकी रोजमर्रा के सामानों की आपूर्ति का मुख्य जरिया था। उन्होंने सीमा पर उर्वर कृषि भूमि खो दी थी और व्यापार भी अंग्रेजों के हाथ में चला गया था। अंग्रेज खासी मुखियों के पारम्परिक अधिकारों में भी हस्तक्षेप करते थे। दुआरों में सबसे महत्वपूर्ण बोरदुआर था जो नौंग्ख्लाव राज्य के अधीन था। तिरोत सिंग ने अपने पुश्तैनी क्षेत्र को अंग्रेजों द्वारा हड़पे जाने पर विरोध व्यक्त किया।
सन् 1824 में असम में ब्रिटिश आधिपत्य स्थापित हाने के बाद डेविड स्कॉट ने असम और सिलहट के बीच खासी पहाड़ियों से होकर सीधी यातायात सुविधा के लिये प्रयास शुरू किये। सैन्य दृष्टिकोण से इस योजना का विशेष महत्व था, क्योंकि इससे तीन महीने के बजाय तीन सप्ताह में ही यह दूरी तय की जा सकती थी। सैनिक लाभ के अतिरिक्त स्कॉट की और भी कई योजनाएं थीं। इस क्षेत्र में ब्रिटिश प्रभाव के स्थापित हो जाने से उन छोटे-मोटे खासी मुखियों का प्रभाव खत्म हो जाने की संभावना थी जो सिलहट सीमा के आसपास प्रभावशाली थे।
स्कॉट ने सीमा क्षेत्रों के बाजारों में खासियों से सभी व्यापारिक संबंध समाप्त कर दिये। साथ ही उन्होंने ब्रिटिश सेनाओं को खासी और जयन्तिया पहाड़ियों के दोनों ओर इकट्ठा होने का आदेश दिया। किसी संभावित विद्रोह को ध्यान में रखकर यह कदम उठाया गया था। इन राज्यों की अर्थव्यवस्था अंग्रेजों की आर्थिक नाकेबन्दी के कारण चरमराने लगी। ऐसी स्थिति में स्कॉट ने सुनियोजित योजना के तहत तिरोत सिंग से अपने एजेंट मेघनारायण के माध्यम से बातचीत करनी शुरू की। तिरोत सिंग ने एजेंट को आश्वस्त किया कि वे प्रस्ताव पर विचार करेंगे। वे जानते थे कि आर्थिक नाकेबन्दी का कायम रहना जनता के हित में नहींं होगा। स्कॉट के प्रस्ताव पर विचार करने के लिये राजदरबार का आयोजन नवम्बर 1826 में नौंग्ख्लाव में हुआ। डेविड स्कॉट ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रतिनिधि मंडल के अध्यक्ष के रूप में नौग्ख्लाव आए। अन्त में समझौता किया गया जिसके तहत तिरोत सिंग ने न केवल ब्रिटिश सेनाओं को अपने क्षेत्र में आवागमन की सुविधा दी, बल्कि रसद पहुंचाने का भी वादा किया। अंग्रेज सरकार की ओर से स्कॉट ने राजा को विदेशी शत्रुओं से बचाने का वादा किया और आन्तरिक प्रशासन के मामले में दखल न देने का आश्वासन दिया। इस समझौते को गवर्नर-जनरल की स्वीकृति मिलने के साथ ही सड़क का निर्माण होने लगा और स्कॉट की इच्छानुसार नौंग्ख्लाव में एक बंगला भी बनाया गया। पर संकट के बादल खासी पहाड़ियों पर मंडरा रहे थे और समझौते के डेढ़ वर्ष के भीतर दुखद घटनाओं का दौर शुरू हो गया।
नौंग्ख्लाव से होकर सड़क बनने के साथ ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने उसका उपयोग शुरू कर दिया। कुछ समय तक सब कुछ ठीक-ठाक रहा और स्कॉट तथा तिरोत सिंग अच्छे मित्र बन गये। राजा की माता स्कॉट को पुत्रवत मानती थीं। पर दुर्भाग्य से यह मित्रता बहुत दिनों तक न चल सकी। तिरोत सिंग और स्कॉट के बीच संबंध बिगड़ने लगे। राजस्व की वसूली को लेकर दोनों पक्षों में कुछ विवाद हुआ। इसी दौरान नौंग्ख्लाव राज्य से लगे मैदानी क्षेत्र को लेकर तिरोत सिंग और रानी के मुखिया बलराम सिंग के बीच विवाद शुरू हो गया। समझौते के अनुसार तिरोत सिंग ने अंग्रेजों से बलराम सिंग के खिलाफ कारवाई करने का अनुरोध किया। अंग्रेजों द्वारा मदद न मिलने को तिरोत सिंग ने समझौते को उल्लंघन माना। साथ ही नौंग्ख्लाव और कामरूप की सीमा पर अधिक सैनिकों की तैनाती और अंग्रेजों द्वारा अधिक संख्या में भवन बनाये जाने को लेकर तिरोत सिंग को आशंका हुई। इस प्रकार की घुसपैठ पर आपत्ति किये जाने को अंग्रेजों ने रुखाई से नजरअंदाज कर दिया। अंग्रेजों का यह रूखा और अवज्ञापूर्ण व्यवहार तिरोत सिंग और उनके साथियों को नागवार गुजरा।
सबसे ताकतवर राज्यों में से एक मिलियम राज्य के सिएम बोर मानिक ने कुछ अन्य मुखियों के साथ मिलकर तिरोत सिंग के सामने एक प्रस्ताव रखा। यह प्रस्ताव असम तथा पहाड़ी क्षेत्रों के राजाओं से मिलकर विदेशियों को खदेड़ने का था। डेविड स्कॉट मार्च 1829 के अन्त में नौग्ख्लाव में ही थे और उन्हें आसन्न संकट की भनक लग गयी। वे तुरन्त सोहरा (चेरापूँजी) के लिए रवाना हुए ताकि कलकात्ता के उच्चाधिकारियों को सूचना भेजी जा सके। परन्तु उन्हें तिरोत सिंग से किसी खतरे की उम्मीद नहींं थी। इधर तिरोत सिंग पर सभी ओर से दबाव बढ़ रहा था। कामरूप और गोआलपाड़ा में रह रहे गारो और खासी लोगों ने उनसे शिकायत की कि सरकार उनके क्षेत्र में घुसपैठ कर रही है और राजस्व की मांग कर रही है। बोर मानिक और अन्य खासी मुखियों ने शिकायत की कि कामरूप और सिलहट के मैदानी क्षेत्रों में स्थित उनकी भूमि पर अंग्रेजी ने जबरन कब्जा कर लिया है। उनके अपने रिश्तेदार और सरदार शिकायत कर रहे थे कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सैनिक और अधिकारी स्थानीय लोगों से बुरा बर्ताव कर रहे हैं।
तिरोत सिंग इन शिकायतों को अपने मित्र डेविड स्कॉट तक पहुंचा रहे थे। परन्तु उन्होंने पाया कि स्कॉट द्वारा स्थिति को बेहतर बनाने की तमाम कोशिशों का कोई ठोस नतीजा नहींं निकल पा रहा था। स्कॉट दोषियों को हटाते, उन्हें दण्ड देते, परन्तु उनके स्थान पर जिन लोगों को नियुक्त करते, वे हटाये गये लोगों की तरह ही बुरा बर्ताव करते। अन्त में तिरोत सिंग के सामने अपने साथी मुखियों और सरदारों का प्रस्ताव मानकर अंग्रेजों को भगाने की योजना बनाने के सिवा कोई उपाय न बचा। इसी बीच डेविड स्कॉट ने बोर मानिक तथा अन्य खासी मुखियों की योजनाओं पर पानी फेरने की सोची। उनका ख्याल था कि बोर मानिक को परास्त कर देने के साथ ही तिरोत सिंग तथा अन्य खासी मुखियों का हौसला अपने आप पस्त हो जाएगा। इधर बोर मानिक ने खासी राज्यों की एक परिषद् का संगठन किया जिसमें तिरोत सिंग को सर्वसम्मति से खासी क्षेत्र की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कोई भी निर्णय लेने का अधिकार दिया गया।
4 अप्रैल 1829 को तिरोत सिंग ने खासी योद्धाओं की एक टोली को अंग्रेजों पर हमला करने के लिये भेजा। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध की घोषणा करके लेफ्टिनेंट बर्लटन बचे हुए सैनिकों के साथ कामरूप भागने की कोशिश में मारे गये। इसी बीच खासी योद्धाओं ने नौंग्ख्लाव में सरकारी इमारतों और स्वास्थ्य लाभ केन्द्र को जला दिया। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा कैद किये गये बंदियों को छुड़ा दिया।

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डॉ. श्रुति पाण्डेय: सह आचार्य एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, शिलांग कॉलेज, शिलांग