स्वामी योगात्मानन्द

संस्मरणों की इस किश्त में मैं शिलाँग रामकृष्ण मिशन की साठवीं वर्षगांठ समारोह के आयोजन सें सम्बन्धित कुछ रोचक तथ्य लिखने जा रहा हूँ। यह आश्रम १९३७ में स्थापित हुआ था; १९९७ साल में इसकी साठवीं वर्षगांठ समारोह मनाने का विचार १९९६ के नवम्बर से ही साधु-भक्तों के बीच जोर पकड़ रहा था। इस विषय में कई संन्यासी और भक्तों, सहयोगियों गीयों के साथ चर्चा होती थी। इस कार्यक्रम का बड़े पैमाने पर आयोजन करने हेतु सभी में बड़ा उत्साह था।
वैसे तो शिलाँग में आये हुए मुझे मात्र सात-आठ महीने हुए थे उसपर इस स्तर का बड़ा आयोजन। जिसमें कई ज्येष्ठ संन्यासी विशेषतः, जो इस आश्रम से घनिष्ठ रूप से जुड़े थे, और कई क्षेत्रों में कार्यरत थे। इसके अतिरिक्त इस आश्रम से करीबी सम्बन्ध रखने वाले अनेक भक्तों का समागम भी अपेक्षित था। इसे किस प्रकार संपन्न किया जाए? इसके बारे में मैं अनभिज्ञ था। ऐसे आयोजन के लिए आवश्यक धन कैसे जुटाया जाए? यहाँ यह भी एक बड़ी समस्या थी। पाठकों को यहाँ विदित करा दूँ कि इस आश्रम के लिए स्थानीय भक्तों या शुभचिन्तकोंके द्वारा दान कम दिन ही मिलता था। आश्रम के सेवाकार्य पूर्णरूप से शासकीय अनुदान से संचालित होते थे। फिर मंदिर, खान-पान, उत्सव आदिके लिए भक्तों के द्वारा मिलने वाला दान किसी प्रकार पर्याप्त होता था।
किसी अन्य कार्य – कोई बड़ा उत्सव हो या कुछ निर्माण या मरम्मत का कार्य हो, धन जुटाना एक समस्या थी। वहाँ भक्तों में कम ही लोग धनवान कहे जा सकते थे। और व्यक्तिगत रूप से मुझे इस कार्य का कोई अनुभव नहीं था। अन्य साधु – भक्तों से सलाह मशवरा करने के उपरान्त तय किया गया कि इस समारोह के उपलक्ष्य में एक स्मारिका का प्रकाशन किया जाय। इसमें विज्ञापन देने के लिए कई स्थानीय या बाहरी प्रतिष्ठानों से अनुरोध किया जा सकेगा और इसके जरिये कुछ धन मिल सकेगा। स्मारिका में कुछ अच्छे लेख भी छपाये जाएँगे, जिसके द्वारा इस आश्रम के इतिहास और पुराने संन्यासी और भक्तों के मूल्यवान संस्मरण पाठकों के लिए प्रस्तुत किए जा सकेंगे। इस सुझाव पर सभी ने सहमति दर्शायी।
इसी बीच विवेकानन्द संस्कृति-केंद्र (Vivekananda Cultural Centre – क्विण्टन हाल) के अत्यावश्यक मरम्मत का और आश्रम में भक्तों और आगंतुकों के लिए शौचालय के निर्माण का कार्य भी चल रहा था। इस शहर में जल की बहुत बड़ी समस्या थी; जिसका जिक्र मैंने प्रथम किस्त में किया था। आश्रम की गतिविधियाँ चलाने हेतु आवश्यक जल की पूर्ति कैसे करें, यह समस्या आश्रम के प्रारम्भ से ही विद्यमान थी। शिलाँग में बड़ी मात्रा में बारिश होती है – इसे देखकर इस जल के संग्रह से इस समस्या का हल निकल सकेगा, ऐसा एहसास मुझे था। इस विषय में भी लोगों से चर्चा हो रही थी; और इसकी योजना और नक्शा भी बन रहा था। इस कार्य के लिए भी बड़े धन की आवश्यकता थी।
जब साठवीं वर्षगांठ समारोह का चिन्तन चल रहा था और किन विशिष्ठ ज्येष्ठ और महनीय संन्यासियों को निमंत्रण किया जाय इसपर चर्चा हो रही थी, तब श्र. स्वामी विश्वनाथानान्द जी, जो उन दिनों निकटस्थ चेरापुंजी आश्रम के प्रमुख थे और बड़े ही विचारशील और सहदय थे, उन्होंने एक अति महत्त्वपूर्ण परामर्श दिया, जो आज भी मेरे लिए एक दिशा दर्शक तत्त्व के रूप में बना हुआ है। वे मुझसे काफी ज्येष्ठ और वरिष्ठ थे, और विनम्र स्वभाव के बावजूद अपना मन स्पष्ट रूप से कह देते थे। उन्होंने कहा – ‘जब इतने बड़े पैमाने पर आयोजन कर रहे हो तो सर्वप्रथम बेलुड़ मठ जाकर परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज के समक्ष इस बात को रखो, उनसे परामर्श लो, आशीर्वाद लो; फिर व्हाइस प्रेसिडेंट, जनरल सेक्रेटरी आदि सभी को इस संकल्प से अवगत कराओ, उनसे मार्गदर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करो और फिर आगे बढ़ो।’ ‘कच्चा काम मत करो’ – इस वाक्य को वे बारबार दोहरा रहें थे। यह तो निश्चित रूप से प्रथम, प्रधान बात थी। इसी समय पू. स्वामी गहनानन्द जी से फोन पर किसी अन्य प्रसंग को लेकर बात हुई। उन दिनों वे रामकृष्ण संघ के व्हाइस प्रेसिडेंट थे और शिलाँग आश्रम से उन्हें विशेष लगाव था। वे कई वर्षों तक यहाँ कार्यरत थे; इस आश्रम की उन्नती में उनका बड़ा योगदान था। जब साठवीं वर्षगांठसमारोह के बारे में उन्हें बताया तो उन्होंने मुझे अगरतला आकर उनसे मिलने के लिए कहा। वे भक्तों को मंत्रदीक्षा प्रदान करने हेतु अगरतला आ रहे थे। उनका आदेश शिरोधार्य कर मैं आश्रम की जीप लेकर ड्राइवर के साथ अगरतला की यात्रा के लिए निकला। २१ जनवरी १९९७ को, करीमगंज आश्रम में एक रात रुककर, अगरतला आश्रम पहुँचा। उन्होंने मिलने के लिए देर रात का समय दिया।
‘देखो – शिलाँग के आश्रम का सम्बन्ध पुराने असम राज्य से है। (असम का बाद में ७ राज्यों में विभाजन हुआ)। इसीलिए इस साठवीं वर्षगांठ महोत्सव में वहाँ के सभी साधु-भक्तों को आमंत्रित करना चाहिए। कार्यक्रम ६ – ७ दिनों तक पूरे उत्साह के साथ होना चाहिए। एक दिन भक्त-सम्मलेन हो, एक दिन Tribal Welfare Conference होगी, एक दिन सर्व-धर्म सम्मलेन होगा, एक दिन शास्त्रीय संगीत का आयोजन होगा…. ’ वे इस कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे; उन्होंने समारोह की तारीख (संभावित) भी बतायी – मई ६ से १२। उनका आशीर्वाद पाकर शिलाँग लौट आया।
इसके बाद फरवरी के २७ – २८ तारीख को बेलुड़ मठ में परम पूजनीय प्रेसिडेंट भूतेशानन्द जी से मिला। उन्हें इस महोत्सव की खबर दी। वे १९३७ से कई वर्षों तक शिलाँग आश्रम के प्रमुख रहे थे। उन्होंने ढेर सारे आशीर्वाद दिया। उनके स्वास्थ्य के दृष्टि से शिलाँग की यात्रा करना उनके लिए कई कतई संभव नहीं था। फिर भी मैंने उनसे इस महोत्सव में आने का अनुरोध किया। विनोदप्रिय भूतेशानन्द जी ने कहा, ‘अरे, मुझे इन सेवकों ने पूरा बन्दी बना दिया है; अपनी इच्छा से मैं कहीं भी नहीं जा सकता। तुम इन सेवकों से बात करो…। ’
इसी दौरान पू. लोकेश्वरानन्द जी से भी भेंट की। उन्होंने तुरन्त इस महोत्सव में आने का अभिवचन दिया। पूज्य प्रमेयानान्द जी ने भी आने का आश्वासन दिया। कलकत्ते में और भी कुछ काम था। उन्हें समाप्त कर मैं शिलाँग पहुँच गया।
समारोह का आयोजन अब जोर से चलने लगा। धन भी थोड़ा-थोड़ा आ रहा था। मेघालय के मुख्य सचिव श्री दिलीप कुमार गंगोपाध्याय जी ने पूरा सहयोग देने का वचन दिया और उसे पूरा भी किया। North East Electric Power Co. (NEEPCO) के एक प्रधान अधिकारी पी. के. चटर्जी ने भी स्मारिका में एक बड़ा विज्ञापन देने के साथ और भी सहयोग – गाडी-ड्राइवर, गेस्ट हॉउस आदि – देने का वादा किया। दैनिक ‘Shillong Times’ के सम्पादक श्री मानस चौधरी जी ने भी कई प्रकार की सहायता करने का आश्वासन दिया; उनका जनसम्पर्क बहुत अच्छा था और इस क्षेत्र की खासी – जयन्तिया जन जातियों में इस समारोह का प्रचार करने हेतु उनका सहयोग मूल्यवान रहा।
स्मारिका के मुद्रण में विलम्ब हो रहा था और छपाई का स्तर भी अच्छा नहीं था। मुद्रण जब किसी प्रकार पूरा हुआ तो देखा कि उसमें गलतियों की भरमार है। अब कुछ सुधार करने का समय नहीं था। दुसरे दिन से ही समारोह शुरू होने जा रहा था। मई के ३ तारीख से ही कई ज्येष्ठ संन्यासियों का आगमन होने लगा। ५ मई को पू. गहनानन्द जी महाराज उनके समस्त सहयोगी संन्यासी ब्रह्मचारी वृन्द के साथ पधारे। ६ मई को १६२ भक्तों को उन्होंने मन्त्रदीक्षा प्रधान की। सुदूर क्षेत्रों से बड़ी संख्या में भक्तों का भी शुभगमन हो रहा था। कई कार्यक्रम भी एक साथ चल रहे थे – पूजा, भजन, व्याख्यान इत्यादि। दुसरे दिन सुबह भी करीब सौ लोगों की मन्त्रदीक्षा हुई और फिर शाम को मुख्य कार्यक्रम था – जिसमे वहाँ के राज्यपाल महोदय M. M. Jacob और गृहमंत्री राबर्ट लिंगडोह भी थे। आश्रम का सभागृह पूरा भरा था – करीब ४५० – ५०० तक श्रोतागण थे।
८ मई को आदिवासी जनकल्याण के विषय में एक कार्यशाला (workshop) विवेकानंद कल्चरल सेंटर में आयोजित किया गया। आदिवासी क्षेत्रों में कार्यरत रामकृष्ण मिशन के कई संन्यासी और कुछ अन्य ज्ञानी लोगों ने अपने विचार रखे और अच्छे खासे प्रश्नोत्तर भी हुए। दुःख की बात यह थी कि ऐसे उपयुक्त बोधपूर्ण कार्यशाला में श्रोताओं की अच्छी उपस्थिति नहीं थी।
९ मई को कई सन्माननीय अतिथीगण पहुँचे, अगले दिन के सर्वधर्म सम्मलेन के लिए। इन महानुभावों में से कई लोगों के निवास की व्यवस्था शासकीय अतिथि-गृह में की गई थी, जो कि मेघालय सरकार के प्रमुख सचिव दिलीप कुमार गंगोपाध्याय जी ने उपलब्ध करा दिया था।
शुक्रवार ९ मई को सुबह ९ बजे के आसपास एक भूकम्प हुआ। कुछ समय के लिए बिजली गुल हो गयी। कई आगंतुकों को बड़ा भय हुआ। किन्तु पंद्रह मिनिट के उपरांत सब नार्मल हुआ। इसी दिन विवेकानन्द कल्चरल सेंटर में भक्त-सम्मलेन का आयोजन हुआ था जिसमें कई वरिष्ठ संन्यासियों के सुंदर, मार्गदर्शक व्याख्यान हुए। इनमें गोकुलानन्द, जितात्मानन्द, अमरात्मानन्द, प्रमेयानान्द आदि थे। भक्ति संगीत भी बहुत अच्छा था। बड़ी संख्या में भक्तों ने इसका लाभ उठाया। इसी दिन श्रद्धेय लोकेश्वरानन्द जी का शुभगमन हुआ। गुवाहाटी से शिलाँग की यात्रा के दौरान गाड़ी खराब हो जाने के कारण उन्हें बड़ा ही कष्ट हुआ। फिर भी वे प्रसन्नवदन थे। अन्य कई माननीय भक्तगण भी उसी दिन पहुँचे।
शनिवार को सर्वधर्म-सम्मलेन हुआ। मेघालय के शासकीय सभागृह में इसका आयोजन हुआ था। यह कार्यक्रम अतीव बोधप्रद श्रवणीय तथा संस्मरणीय हुआ। विशेष उल्लेख करने योग्य थे बलबीर सिंह जी और स्वामी लोकेश्वरानन्द जी के व्याख्यान। रविवार ११ मई को युवा सम्मलेन हुआ। बड़े ही उत्साह के साथ और बड़ी संख्या में युवकों ने इसमें हिस्सा लिया। फिर दोपहर के बाद लीला -गीती। भक्तिसंगीत का सुंदर कार्यक्रम हुआ। इसके बाद के दो दिन प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद रशीद खान का सुरीला गायन हुआ। इस प्रकार यह पूरे ७ दिन का (७ से १३ मई) कार्यक्रम अच्छी तरह सम्पूर्ण हुआ। इस के आयोजन में कई प्रकार की त्रुटियाँ रही, फिर भी श्रीरामकृष्ण देव की कृपा से मोटे तौर पर वह सफल हुआ।
स्वामी योगात्मानन्द वेदान्त सोसाइटी आफ प्रोविडेन्स के मंत्री एवं अध्यक्ष हैं।