कोरोना काल में जिस बहुतायत से शहरों, महानगरों से अपनी जमीन, गाँवों, अपनी जड़ों की ओर वापिसी हुई, वाहनों की अनुपलब्धता, कोरोना के नियम यथा दूरी, सेंनीटाइज हेंड आदि को देखते हुये मीलों पैदल यात्रा जिसमें नन्हें बच्चे, गर्भवती स्त्रियाँ भी थी, यह सोचने को विवश करते हैं कि लगभग 50–70% आबादी वापिस होने से क्या अर्थव्यवस्था पर असर हुआ? क्या शहरों और गाँवों का तालमेल बैठा ?क्या जो ठिकाने.महानगरों में जुटाये थे या पाँव के नीचे जमीन जुगाड़ने की  कवायद थी उसे छोड़ना किस आर्थिक विषमता को जन्म दे गया?

 इन सब प्रश्नों के उत्तर खोजने से पहले यह देखनाआवश्यक है कि आखिर गाँवों से पलायन के क्या कारण थे? अपनी जड़ों को छोड़ कर जाने में क्या खोया -क्या पाया?

 बदलती जीवन शैली, उन्मुक्त जिंदगी और सपनों की उड़ान, देखने सुनने में आज बड़ी बात न लगे परंतु इनके दुष्प्रभाव अपनी जड़ो से दूर हो रहे व्यक्तियों में देखे जा सकते हैं।

हताशा, तनाव के साथ एकांगी होती सोच, परिवार  की अवधारणा को कहीं न कहीं विघटित ही कर रहे हैं। आज हर घर में टेलीविजन और संचार के छोटे -बड़े माध्यम मौजूद हैं। मनोरंजन के नाम पर महानगरीय रहन-सहन और जादू की छड़ी घूमते ही सभी परिस्थितियां सुधर जाना युवा व ग्रामीणों को चकाचौंध कर रहा है उस समय यह विचार नहीं आता कि बिना आजीविका के यह सब कैसे संभव है?

जहाँ गाँवों का खुला परिवेश और पुश्तैनी काम- धंधे व खेती आदि से परिवार बेहतर तरीके से जीवन यापन कर सकता है, वहीं शहरों में बढ़ती जनसंख्या के चलते, महँगाई का सुरसा मुख की तरह मुँह फाड़ने के कारण बहुमंजिला  इमारतों में एक कमरे में रहना दुष्कर भी है।

आज गाँवों से कस्बों, कस्बों से शहरों की ओर पलायन लगातार जारी है। यद्यपि कोरोना काल ने कुछ लोगों की पुनर्वापिसी की है परंतु गाँवों और शहरों के बीच बढ़ने वाला अंतर कम नहीं हो रहा।हर साल लाखों की संख्या में लोग ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन करते हैं संभवतः इसका कारण क्षेत्र विशेष में जीवन यापन की मुश्किलें हों।

      देखने में आता है कि गाँव छोड़ने वालों में शिक्षित,सुविधा संपन्न लोग ज्यादा होते हैं। क्यूं कि उनकी शिक्षा उन्हें पुश्तेनी काम करने से रोकती है।दूसरे वे लोग हैं जो गाँवों में मजदूरी आदि करके भी रोजी-रोटी की पूर्ति नहीं कर पा रहे।संसाधनों के बढ़ते दबाव में कम होते रोजगार अवसर भी एक बड़ा कारण है है सपरिवार शहरों की ओर पलायन का।इस पलायन के कुछ कारण कुदरती हैं तो कुछ सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक राजनीतिक के साथ तकनीकी भी।तकनीकी रूप से दक्ष या तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवा ज्यादा अवसरोंकी तलाश में शहरों की ओर बढ़ जाते हैं। किस्मत साथ देती है तो वाणिज्य केंद्रों व शहरों के बड़े उद्योगों के कारण भी बन जाते हैं।

         इसी पलायन ने विभिन्न समस्याएं पैदा कीं ।जनसंख्या संतुलन बिगड़ने के साथ ही शहरों में आवास व रोजगारकी समस्या विकट होती जा रही है तो दूसरी तरफ गाँवों में उपजाऊ जमीन बंजर होती जा रही है।

     अगर आँकड़ों की बात करें तो भारत के शहरों में लगभग 44-50%परिवार एक कमरे में गुजारा करते हैं और शौचालय सुविधा भी लगभग 24-30% आबादी के पास ही है। 70% शहरों में रोज निकलने वाले कूड़े को ठिकाने लगाने की  व्यवस्था न होने से वह खुले में सड़ता है।

लेखिका ने स्वयं दिल्ली प्रवास के समय विभिन्न एरिया में जाकर देखा है कि उचित प्रबंधन न होने से कचरा सड़ता रहता है और उससे उठने वाली बदबू माहौल को प्रदूषित करती है। बरसात के पानी की भी निकासी की उचित व्यवस्था नहीं जिसके कारण फैलते प्रदूषण की समस्या की  चपेट में, गाँवों से पलायन करने वाले लोग हैं।

   2001 के आँकड़ों के अनुसार  भारत की आबादी का 27.81% हिस्सा शहरों में रहता था जोकि 2011में 31.16%तक पहुँचा। शहरीकरण का यह दौर अचानक ही नहीं बढ़ा। शहरीकरण की जो दर 1991-2001 में 2.10फीसदी थी ,वह 2001 से 2010 तक 3.35प्रतिशत तक पहुँच गयी। इस दौरान  देश में 2775 छोटे शहर और बस गये। आँकड़ों की मानें तो 2001 की जनगणना में शहर  और कस्बों की कुल संख्या 5161 थी जो अब बढ़ कर 7936 हो गयी। यह आँकड़े बताते हैं कि भारत की आबादी तेजी से सुविधा संपन्न आबादी में बदलती जा रही है ।विकास का जो वैश्विक मॉडल पूरी दुनियाँ में चल रहा है ,उसमें शहरीकरण को विशेष तरजीह दी गयी है।  यक्ष प्रश्न है फिर गाँवों का पिछड़ापन और बढ़ेगा या गाँव का अस्तित्व ही खतम प्रायः होगा?

आइये समझते हैं विकासीकरण की अवधारणा को …

विशेषज्ञों की मानें तो विकास का वर्तमान पैमाना अच्छी अर्थव्यवस्था का संकेत है ।वहीं दूसरी और तेजी से होते शहरीकरण की वजह ज्वलंत बहस का मुद्दा है जिसमें पलायन और गाँवों में बुनियादी सुविधाओं का न होना ,अशिक्षा,पिछड़ी लाइफ स्टाइल जैसे मुद्दे हैं।

 संयुक्त राष्ट्र संघ की हालिया रिपोर्ट के दो आँकड़े चौंकाने वाले हैं —–

1–इस वर्ष के अंत तक विश्व की आधी आबादी शहरों में रहने लगेगी।

2–2050तक भारत की आधी आबादी महानगरों,नगरों एवं कस्बों में निवास करेगी और तब तक विश्वस्तर पर शहरीकरण का आंकड़ा 70% हो चुका होगा।

ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाले पलायन से जहाँ एक तरफ कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा रही है ,वहीं शहरी ढाँचे पर भी इसका  विपरीत प्रभाव पड़ है। अर्थ शास्त्रियों की मानें तो यह शिक्षा प्रणाली म़े कमी के कारण है। वर्तमान शिक्षा गाँवों को अपने साथ नहीं जोड़ पा रही। यह शिक्षा युवाओं का गाँवो़ से मोह भंग कर रही है। पढ़ने लिखने के बाद गाँव उन्हें उबाऊ और अपनी शिक्षा के अनुकूल नहीं लगते। उच्च शिक्षा के साथ वह शहरों महानगरों में रहने के सपने संजोने.लगते हैं। ग्रामीणों के लिए अपनी संतान को पढ़ाना मुश्किल हो गया है। शिक्षित होने के बाद बच्चे पारिवारिक व्यवस्थाओं मेंहाथ नहीं बँटाना चाहते। जिस काम ने उन्हें लायक बनाया वही काम उन्हें अब ओछे और अपनी पोजीशन के खिलाफ लगते हैं।

ग्रामीण क्षेत्र के लोग संतान को पढा लिखा कर काबिल तो बनाना चाहते हैंपर ऐसी शिक्षा नहीं दिलाना चाहते जो संतान के अंदर अलगाव का बीज बो दे।

शहरी जीवन के सुने सुनाये ठाठ बाटके चलते हकीकत से कोसों दूर कोई भी झोंपड़ी और गंदगी में नहीं रहना चाहता। गरीबी, बिना व्यवसाय या धनोपार्जन के बुनियादी सुविधाओं से वंचित युवा शहरों में नारकीय जीवन जीने को विवश है।

अमूमन अनुमानतः लगभग दो तिहाई से ज्यादा आबादी शहरों में अविकसित कालोनियों और झुग्गियों या झोंपडपट्टियो़में रहती है।

विकास की गति ने गाँव – जंगल उजाड़ दिये। नदियों पर बाँध बना कर उनका स्वाभाविक प्रवाह रोकने, बड़े कारखानों या खनन आदि परियोजनाओं के कारण भी हर सार लगभग 5-6 हजार लोग गाँव छोड़ शहर आते हैं।

जमीन पर बढ़ता दबाव, खेती के तौर तरीकों में बदलाव आने से भी हाथ का काम छिनने लगा। आपसी लड़ाई झगड़ो, आर्थिख व.धार्मिक कारण एक बड़ा मुद्दा है गाँव छोड़ कर जाने का।

गाँव शहरों की दूरी को कम करने के प्रयास में ग्राम पंचायतों को जागरुक करने व इन्हें और अधिक अधिकार देकर सक्रिय करने की योजना पर भी पलीता लग चुका। क्यों कि  आज की जरुरत अनुसार गाँवों के समग्र विकास हेतु आवश्यक है कि धनराशि देकर लघु एवं कुटीर उद्योंगों को पुनर्जीवित किया जाए। जहाँ जिस कच्ची वस्तु का उत्पादन अधिक हो, वहाँ उसी से संबंधित उद्योग, छोटी मिल-फेक्ट्रियों को विकसित किया जाए। गाँवों के दर्जी, सुनार, जुलाहे, मोची, लोहार, बढई, तेली, कुम्हार, किसान आदि को प्रशिक्षण देकर वर्तमान समय से जोड़ा जाए। उनके माल की खपत हेतु बाजार सुनश्चित किये जाये़ तो सँभव है उनके बच्चे अपने पुश्तेनी व्यवसाय से पढ़ने लिखने के बाद भी जुड़े रहे। शहरों की ओर  बढ़ता पलायन रुक जाये!

साथही शहरों के साथ ग्रामीण क्षेत्र, अंचल के विकास की तरफ भी ध्यान दिया जाए। मूल भूत सुविधा आज भी रोटी कपड़ा और मकान ही है पर आवश्यकता नुसार, सड़क बिजली पानी पर भी ध्यान दिया जाए तो कोई कारण नहीं बचता शहरों की ओर पलायन का।

इन्हीं सारी बातों का ध्यान रखते हुये हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम जी ने प्यूरा का विचार प्रस्तुत किया था। इसमें चार संयोजन शामिल है — भौतिक, इलेक्ट्रॉनिक, ज्ञान  तथा ग्रामीण क्षेत्रों के गाँव की समृद्धि को बढ़ाने हेतु आर्थिक गतिविधियां।

प्यूरा के उद्यमी  के पास  इतना कौशल होना चाहिये कि वह बैंकों के साथ मिलकर  व्यवसायिक योजना बना सके, बुनियादी ढाँचा तैयार कर सके। यथा — क्षेत्र में शिक्षण संस्थान, स्वास्थ केंद्र व.लघु उद्योग, परिवहन सेवाएँ, टेलीएज्यूकेशन, टेलीमेडिसिन तथा ई गवर्नेंस सर्विसेस। ये सेवाएँ सरकार की ग्रामीण विकास योजनाओं जैसे सड़क संचार परिवहन और स्व उत्पाद और सेवाएँ बेचने के लिए राष्ट्रीय एवं विश्व बाजार के साथ घनिष्ट सहयोग करेंगी।।

         वास्तव में गाँवों व शहरों के बीच के अंतर को पाटना मात्र एक आर्थिक कार्यक्रम नहीं है। गरीब वर्ग के आर्थिक उत्थान और समाज सुधार के कार्यो़ को आपस म़े जोड़ कर सार्थक और सटीक परिणाम हासिल किये जा सकते हैं।

पलायन गाँव के मान सम्मान का प्रश्न है तो उनकी भाई चारे की भावना को चुनौती भी है। भूख, कुपोषण, गरीबी उन्मूलन और अभाव दूर करने की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है साथ ही अगर गाँव व समाज स्वयं भी इस क्षेत्र में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर ले तो गाँवों का विकास कोई बड़ी बात नहीं। सामाजिक बुराइयों, आर्थिक विषमताओं को दूर करना भी एक बड़ा लक्ष्य है। इसके साथ ही जहाँ अच्छी सार्थक परंपरायें हैं उन्हें भी सींच कर नवजीवन देना होगा तभी गाँवों से पलायन रुकेगा और पृथ्वी का असंतुलन और अति दोहन भी।

       कहने का आशय मात्र इतना है कि  एक तरफ विकास के ऊँचे ऊँचे सपने और दौड़ है तो दूसरी तरफ उजड़ते गाँव और सर्वहारा वर्ग की बर्बादी। विकास की गंगा सदैव गाँव ,कस्बों और कृषि से ही बही है ।खेतों को काट कर बंजर करना ,उन पर प्लाट बना कर कंक्रीट में बदलने से विकास तो दूर दूर तक नहीं दिखेगा अपितु हम ऐसे जाल में फँसते जायेंगे कि उससे निकलना मुश्किल हो जाएगा।पोलीथिन तो वायुमंडल व पर्यावरण को लील ही रहा है ….।आज आवश्यकता है कि विकास के हसीन ख्बाव दिखाने वाले उच्च स्तरीय , संबंधित अधिकारीगण वास्तविकता से आँखें न फेरें। धन लोलुप ,स्वार्थी न बनें। तभी देश का भला सँभव है।गाँव समृद्ध होंगे तो पलायन रुकेगा,पलायन रुकेगा तो छोटे धंधों को बढ़ावा मिलेगा.जिससे आर्थिक स्थिति सुधरेगी।

मनोरमा जैन “पाखी” शारदा स्कूल पत्रिका की संपादिका और ‘बरनाली’ तथा ‘लघुकथा संग्रह’ की सहसंपादिका है। इनकी रचनाएं स्पंदन,‘शब्द बिथिका’ आदि पत्रिकाओ में प्रकाशित हो चुकी हैं। कई साहित्य सम्मानो से सम्मानित, मनोरमा जी साहित्य प्रतियोगितायो विजेता रही हैं ।