“अरे ऋषभ! मेरी बीपी वाली दवा तो ले आओ, एक-आध दिन में ख़त्म हो जाएगी।”

कहते हुए दिनेश अपने नौकर ऋषभ के कमरे तक पहुॅंचा ही था कि फ़ोन पर ऋषभ को बात करता  सुनकर ठिठक गया । वह किसी से जोर से कह रहा था-

उसने मोबाइल को गौर से देखा तथा कान के और पास ले जाकर पूछा-

“उई छुटकऊ के साथ एम्बुलेंस मा हैं? उनका गाॅंव से निकले छह घंटा हुई गए? ऊई हड़ताल के चक्कर मा रस्ते मा फॅंसे हुइहैं?

कहते-कहते ऋषभ की आवाज काॅंपने लगी! सिसकते हुए वो आगे बोला-

“छुटकऊ का फोनऊ बन्द बतावत है? हाय मोर बप्पा! उनका राम बचावै” कहते हुए ऋषभ चीख कर रो पड़ा!

“का कहत हौ भैया? बाऊजी के आक्सीजन लगै की नौबत रही?”

और इधर दिनेश न्यूज़ रीडर की दूर से आती हुई आवाज सुनकर स्तब्ध रह गया कि-

 “ड्राइवरों की अचानक हुई हड़ताल के कारण पूरे देश में लगे भयंकर जाम के हटने के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं!”

रश्मि ‘लहर ‘ रश्मि संजय श्रीवास्तव सम्प्रति  भारतीय गन्ना अनुसंधान  संस्थान, लखनऊ मेंं निजी सचिव हैं। पच्चीस से अधिक साझा काव्य संकलन, लघुकथा, कहानी संग्रह में रचनाऍं और लघुकथाऍं प्रकाशित

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