भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन का इतिहास भारतियों के संघर्ष की अद्भुत गाथा है। भारतीय इतिहास के गौरवपूर्ण अध्याय के निर्माण में जितना सहयोग पुरुषों का रहा, वहाँ स्त्रियों का भी कम नहींं हैं। हजारों लोग ब्रिटिश अत्याचार के तहत मारे गए हैं और महिलाओं ने भी तत्कालीन रूढ़िवादी समाज को छोड़ स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। 1857 का आन्दोलन पूरे भारत की एकता का उदाहरण कहा जा सकता है। यह वह समय था जब रानी लक्ष्मी बाई ने अपनी दिलेरी, पराक्रम और वीरता का परिचय दिया था। इनके अलावा स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय जागृति में सरोजिनी नायडू, कमला नेहरू जैसी महिलाओं की भागीदारी और बलिदान अविश्वसनीय और प्रशंसनीय है। उनकी भागीदारी ने युवा रक्त को आंदोलन में स्थानांतरित कर दिया और अपने आत्मबल से वे निर्दयी ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्ति के सामने निडर खड़ी रह।
मेघालय प्रांत ने भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कई शानदार अध्याय देखे। यहाँ जो प्रसिद्ध क्रांतिकारी वीर हुए उनमें तिरोत सिंग, कियांग नांगबाह और पा तोगन सांगमा प्रमुख थे, जिनकी वीरगाथा आज भी यहाँ के लोगों को गौरवान्वित करती हैं। इन्होने देश को आज़ाद करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इनके अतिरिक्त यह समाज एक ऐसी महिला को भी याद करती हैं जिन्होंने नारी शक्ति का दृष्टांत देकर ब्रिटिश को सबक सिखाने का महत्वपूर्ण कार्य किया और यह महिला थी फान नोंगलाइत।
फान नोंगलाईत वेस्ट खासी हिल्स जिले के रम्मई गांव से थी, जो नोंग़ख्लाव साम्राज्य के अंतर्गत आता है और उनके कई वंशज अब भी इस गाँव में रहते हैं। इनकी दो बेटियां थी जिनका नाम था लाशेर्मों और लाकेरमों। लाशेर्मों और लाकेरमों की एक एक बेटी थी। लाकेरमों की बेटी थी-मिसलिन्दा नोंगलाईत जिनसे हुई मक्देलिन नोंगलाईत।
1800 ई. में नोंगख्लाव साम्राज्य के ‘स्यिएम’(अर्थात राजा या चीफ़) तिरोत सिंग अपने लोगों से बहुत प्यार करने वाले एक दूरदर्शी नेता थे। इसलिए जब डेविड स्कॉट के नेतृत्व वाले ब्रिटिश ने उन्हें गुवाहाटी से सिलहट को जोड़ने वाली सड़क बनाने के प्रस्ताव के साथ संपर्क किया, तो उन्होंने इस विचार का स्वागत किया। जिस तरह छल कपट से भारत के अन्य राज्यों पर अंग्रेज़ों ने कब्ज़ा किया था, उसी प्रकार डेविड स्कॉट ने भी स्यिएम तिरोत सिंह से दोस्ती कर डेविड स्कॉट मार्ग बनाने को राज़ी कर लिया ।
लगभग 18 महीनों तक कार्य सुचारू रूप से आगे बढ़ा। अधिकारी—स्थानीय लोगो के साथ घुलने मिलने लगे और सौहार्द्रपूर्ण संबंध बनाए रखा। लेकिन 1829 में लोगो को समझ में आ गया कि यह सड़क बनाने के पीछे ब्रिटिशों का कोई गुप्त मकसद है। स्पष्ट हो गया था कि वे स्थानीय लोगों पर कर लगाने की योजना बना रहे थे और सड़क के बन जाने के तुरंत बाद उन्हें अपने अधीन कर लेंगे। यह भी कहा जाता हैं कि जो ब्रिटिश सिपाही थे, वे स्थानीय महिलाओं के साथ कुकर्म करते थे। उनके द्वारा स्त्रियों के ऊपर ही नहींं बल्कि पुरुषों, बच्चो, और बूढो के ऊपर शोषण भी आम बात—बन गयी थी। पर फान नोंगलाईत ऐसी महिला थी जो सामना होने पर इन सिपाहियों का मुँह तोड़ जवाब देती थी। वह निडर होकर सदैव अपनी नारी होने की प्रतिष्ठा और गौरव को बचाने का प्रयास करती थी। एक दिन इनसे जब फान नोंगलाईत का सामना हुआ तो वह समझ गयी थी कि अब इन अंग्रेज सिपाहियों के शोषण की सीमा पार हो चुकी है। यहाँ स्यिएम तिरोत सिंग भी समझ गये कि उन्होंने डेविड स्कॉट से दोस्ती कर बहुत बड़ी गलती की है। अंग्रेज सिपाहियों के खिलाफ युद्ध का ऐलान वे करके देते हैं। यह सब देखकर सिपाहियों की कुछ और टोली को माइरांग से वापस नोंग्ख्लाव लाने की योजना बनी, जिसकी जानकारी फान नोंग्लाईत ने यहाँ के सिपाहियों को दिया। तिरोत सिंग के सिपाहियों में जिनका नाम इतिहास में सबसे ज्यादा सुना और पढ़ा जा सकता है वे थे मोंभुत। माइरांग और नोंग्ख्लाव के रास्ते में लांगस्तीहरिम नामक जगह में एक झरना है, जहाँ लोग आराम करने बैठते थे। फान नोंग्लाईत ने मोंभुत के सिपाहियों के साथ वहाँ उन्हें दबोचने की योजना बनायी। जब अंग्रेज सिपाही वहाँ आराम करने रुके तो फान नोंगलाईत ने तिरोत सिंग के सिपाहियों को छुप जाने को कहा। वह उन अंग्रेज सिपाहियों के पास जाकर, उन्हें शराब पिलाकर उन्हें रिझाने और बहकाने लगी। अंग्रेज़ों के हथियारों को एक जगह जमा करके वह पानी में फेंकने—लगी। अंग्रेज सिपाही जब पूरी तरह से नशे में धूत हो गये तो फान नोंग्लाईत ने मोंभुत और अन्य सिपाहियों को बुलाया। और कहा जाता है कि उस दिन बत्तीस अंग्रेज सिपाहियों के सर धड़ से अलग कर दिए गए। उनकी याद में इस झरने को “फान नोंगलाईत फॉल्स” कहा जाता है जो माइरांग से दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।
आज भी उनके बर्तनों और उनके घर को सुरक्षित रखा है। इतना ही नहींं उनकी याद में माइरांग गाँव में “का फान नोंगलाईत मेमो स्कूल” की स्थापना हुई और साल 2017 को प्रचलित ‘लेडी ह्य्डेरी पार्क’ का नाम ‘का फान नोंगलाईत पार्क’ में बदलकर ‘खासी छात्र संघ’ ने इस बहादुर स्त्री को श्रद्धांजलि अर्पित किया।
परमात्मा ने स्त्रियों के भीतर अद्भुत शक्ति प्रदान कि है। नारी अगर ममता का प्रतीक हैं तो असुरों का नष्ट करने वाली काली भी बन सकती है। फान नोंगलाईत ने भी अपने कार्यों से यह जताया है कि स्त्री शक्ति के मुकाबले कोई और शक्ति नहींं है। यह कहना गलत न होगा कि जब भी भारत की स्वतंत्रता में महिलाओं की भूमिका का जिक्र हो तो फान नोंगलाईत का नाम भी उनमें शामिल होना चाहिए।

डायाफिरा खारसाती
पी एच.डी शोधार्थी,
पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय