डॉ रचना निगम, अहमदाबाद


कठपुतली सा नाच रहा
मानुष तेरा तन
कभी नचाये ऊपरवाला
कभी नचाये मन
हाड़ मांस के पिंजरे में
रहती रूह निसंग
जब बुलावा आये उसका
छोड़ जाये ये तन
बंद मुठ्ठी में लाये किस्मत
खोल पिटारा कर्म गठरिया
बने राजा, कभी रंक
उस जादूगर ने भेजा सबको
करके साँसों का अनुबंध
खेल हो जाये पूरा
कर दे साँसें बंद
उम्र भर जो जोड़ी दौलत
करके अनेक जतन
कभी कमाई मेहनत से
कभी दुखा कर मन
आसमान में ऊपर बैठा
वह देख रहा साँसों का नर्तन
एक इशारे पर उसके
रूह छोड़ जाये ये तन
दिए कई किरदार जगत के
रंगमंच पर निभाने को
कभी बने सफल अभिनेता
कभी चूक जाये ये मन
उस मायावी की नगरी में
हम चंद दिनों के मेहमान बने
कब चुक जाये उसकी झोली
कर दे साँसें बंद
रिश्ते-नाते, सगे-सम्बन्धी
हैं कुछ समय का रेला-मेला
आये जब बुलावा उसका नहीं जाये कोई संगी तेरा।

आजादी अमृत महोत्सव

मुझे बोनसाई नहीं होना

केसरिया

कठपुतली