भारत की सरजमीं को पूरे 200 साल तक अपने अधीन करके हमारे ही लोगों पर न जाने कितने अत्याचार किए। फल स्वरुप भारतीयों के मन में ब्रिटिश के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ। संपूर्ण भारतवर्ष में ब्रिटिश शासन के खिलाफ सबसे पहले आदिवासी समुदाय ने विद्रोह किया था। सन् 1785 में तिलका मांझी और जबड़ा पहाड़ी ब्रिटिश के खिलाफ लड़कर शहीद हुए थे। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का सूत्रपात सिपाही विद्रोह से माना जाता है। लेकिन उससे भी पहले हजार- हजार आदिवासी लोग ब्रिटिश के खिलाफ लड़कर शहीद हुए थे। यह समुदाय केवल संथाल , उराव ही नहीं बल्कि बेचू रावत जैसे ग्वाला संप्रदाय को भी सार्वजनिक रूप से फाँसी दी गई थी।

यह वह दौर था जब असम प्रदेश कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन में झारखंडी आदिवासी को शामिल करना नहीं चाहते थे। बल्कि चाय श्रमिक स्वयं ब्रिटिश के खिलाफ लड़ रहे थे। यह बात स्वयं अमिय कुमार दास ने भी स्वीकार किया था कि 1921 से पहले कांग्रेस ने कभी चाय बगीचे की आदिवासियों के साथ काम नहीं किया था।

1921 के असहयोग आंदोलन में असम की प्रथम महिला मांगरी उराव उर्फ मालती मेम शहीद हुई थी। जो एक आदिवासी महिला थी। 101 साल पहले शहीद हुई मालती मेम आज भी इतिहास के पन्ने पर गुमनाम है। जबकि 1921 के स्वतंत्रता आंदोलन में पूर्वोत्तर भारत की वह प्रथम महिला हैं, जो शहीद हुई थीं। आज पूरे देश में आजादी का पचहत्तर वर्ष अमृत महोत्सव के रूप में मनाया गया। ऐसे में मांगरी उराव उर्फ मालती मेम का उल्लेख करना न केवल आवश्यक है बल्कि गुमनामी के अँधेरे में दबी इस महान सेनानी को सम्मान देने की जरूरत भी है।

 मालती मेम एक आदिवासी महिला थी। जिनकी मर्मस्पर्शी कहानी को उस समय के लोकप्रिय नेता स्वतंत्रता सेनानी लेखक एवं संपादक अमिय कुमार दास द्वारा लिखित आलेख “उटी अहा एपाही फूल ….मांगरी “ अर्थात् “बहकर आया एक फूल …..मांगरी “ में उल्लेखित मांगरी की दर्द और अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने की कहानी है।

1919 के जालियांवाला बाग के निर्मम हत्याकाण्ड में घटित घटना ने मानों प्रत्येक भारतीयों के मन में स्वतंत्रता की ज्वाला धधका दिया था। क्या बूढ़े , क्या जवान, क्या महिलाएँ, क्या बच्चे सभी ने जैसे ब्रिटिश के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया था। सन् 1920 में गाँधीजी द्वारा प्रस्तावित असहयोग आंदोलन को सर्वसम्मति से पारित किया गया। हजारों की संख्या में नवयुवक, नवयुवतियाँ पढ़ाई छोड़ कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे।

सन् 2021 में असहयोग आंदोलन पूरे भारत में सक्रिय हो उठा था और असम में भी इस आंदोलन ने गति पकड़ ली थी। 19वीं शताब्दी में असम में शराब और तंबाकू का बहुत मात्रा में प्रचलन होने के कारण बहुत घर बर्बाद हो रहे थे। हालत यहाँ
 तक थी कि महिलाओं को गहने को गिरवी रखना पड़ रहा था। असहयोग आंदोलन के दौरान गांधीजी ने कांग्रेस नेता और स्वयंसेवकों से कहा कि मादक द्रव्य का वर्जन बहुत जरूरी है। इस पर ध्यान देना इसलिए जरुरी था क्योंकि उस समय में तंबाकू से आने वाली आय सरकार की झोली भर रही थी। इसलिए ब्रिटिश सरकार इधर यह नशा बंद न हो उस पर नजर भी रख रही थी क्योंकि इससे सरकार को नुकसान होने की आशंका थी। इसीलिए जहाँ पिकेटिंग होती, वहाँ पुलिस धड़ पकड़कर ले जाते थे। मगर स्वराज की कल्पना करने वाले स्वयंसेवक तनिक भी घबराए बिना अपने मिशन पर लगे रहे। फलस्वरूप सरकारी खजाने की आय कम होने लगी। सन् 1921 में लगभग 50% आय कम करने में सक्षम हो गए थे। तेजपुर में भी यह अभियान पूरी तरह चल रहा था। 2 अप्रैल, 1921 के दिन तेजपुर में राष्ट्रीय आंदोलन के सक्रिय नेता अमिय कुमार दास और उनके दोस्त लखीधर शर्मा उस दिन तेजपुर में मादक द्रव्य के वर्जन के लिए धरना दे रहे स्वयंसेवकों देखने के लिए गए। धरना तेजपुर के सिद्धि महाल्दार जमीलाल की दुकान के समीप था। उन्होंने एक अजीब घटना देखी। नेपाली पट्टी से एक महिला साफ-सुथरी साड़ी पहनी हुई पैर में जूते और हाथ में बोतल पकड़े हुये स्वयंसेवकों द्वारा दिए गए धरना स्थल की ओर आ रही थी। स्वयं सेवक स्वर्गीय थुलेश्वर बरा (कांग्रेस प्रमुख) उसे शराब की दुकान पर जाने से रोकने के लिए खड़े हो गए। यह देखकर वह महिला दूर से ही उन्हें सुनाती हुई जोर से गीत के माध्यम से बोलने लगी- “ मैं शराब पियूँगी, मजे करूँगी, मजे करूँगी मजे करूँगी ।” उन्होंने महिला का ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा था। लीलाधर ने महिला से प्रश्न किया -“आप कौन?”
 बस प्रश्न करना ही शेष था कि वह गरजती और हँसती हुए बोली “मुझे नहीं पहचानते? हा.. हा.. हा.., तीन साहब का सिर खा चुकी हूँ” कुटिलता के साथ फिर बोली, “आ जाना शाम को, लाल माटी में मेरा घर है। ” “आपका नाम ?” यह सुन वह महिला जोर से हँसती हुई फिर बोली, अंग्रेजी वर्ण में अपना नाम बताया “ एम ए एल ए टी आई , पहले का नाम था एम ए एन बी आर आई अभी साहब लोग मुझे मालती मेम बुलाते हैं। ” रास्ता रोक खड़े स्वयंसेवक को देखकर बोली –“मुझे जाने दो “ लेकिन थुलेश्वर बरा भी रास्ता छोड़ने वालों में से नहीं थे। वह बोले, “आपके पैर पड़ता हूँ माँ, मैं आपको शराब खरीदने नहीं दूँगा। ” यह सुनते ही वह बोली –“तुम कौन हो जो मुझे माँ कहकर बुला रहे हो?” माँ शब्द ने जैसे जादू कर दिया था। जीवन में मिले दुख- दर्द शोषण एवं दुत्कार ने उसे तोड़ के रख दिया था। उसने कहा- “लो छोड़ देती हूँ शराब, अब नहीं पिऊँगी” कहकर बोतल फेंक देती है। उसी समय लखीधर ने कहा-“आप सभी की माँ है। आप शराब छोड़ सकेंगी ।” मालती मेम अब बिल्कुल सहज हो चुकी थी। कल सुबह 10:00 बजे मेरे घर आ जाना। सच कहूँ तो अमिय कुमार दास से मिलने के बाद उसके जीवन में परिवर्तन हुआ। मालती मेम ने अपने जीवन कथा अमिय दास और उनके दोस्त को सुनाई जिसे उन्होंने लिपिबद्ध किया। जिसके कारण मालती मेम के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी मिलती है वरना गुमनामी के अँधेरे में दबी मालती के बारे में आज किसी को पता नही चला होता। अमिय कुमार दास के संपर्क में आने के बाद मालती ने स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान दिया। मगर ब्रिटिश की कड़ी नजर का आखिरकार उसे सामना करना पड़ा और देश के लिए मुखबरी करने के कारण वह मार दी गई और इस तरह 1921 के आंदोलन में मांगरी असम में प्रथम महिला शहीद मानी जाती है। यह अलग बात है कि ऑफिशियल रूप में उसे शहीद का दर्जा नहीं मिल पाया है।

 मालती मेम उर्फ मांगरी उराव का संक्षिप्त परिचय

सुंदर नयन नक्श की मांगरी के जीवन बहुत दुख दर्द से भरा रहा। अमिय कुमार दास जी द्वारा लिखित लेख में उल्लेखित मांगरी के जीवन गाथा को इस प्रकार हम जान सकते हैं मांगरी उराव का जन्म झारखंड के हजारीबाग के एक गांव के एक गरीब परिवार में हुआ था। गांव चारों से ओर जंगलों से घिरा हुआ था। गरीबी में पली-बढ़ी मांगरी अक्सर अपनी सहेलियों के साथ जंगलों में जाया करती थी। नदी में नहाती जंगलों से लकड़ी बिन कर लाती थी। गांव के लड़के धनुष-काड़ लेकर हिरण का शिकार करते थे कभी-कभी तो लड़के पेड़ के नीचे बैठकर बाँसुरी बजाते थे। उन्हीं में से एक लड़का था सोमरा जो अत्यंत मधुर बाँसुरी बजाया करता था। देखने में भी वह सुंदर था। जब वह तन्मय होकर अकेले बासुरी बजाता था, तब मांगरी उसकी बांसुरी की धुन में खो जाती थी। धीरे-धीरे वह सोमरा के प्रति आकृष्ट होने लगी। मगर सोमरा अनाथ और बहुत गरीब होने के कारण मांगरी के पिता को यह रिश्ता मंजूर नहीं था। हर पिता यह चाहता है कि उसकी बेटी को कोई तकलीफ न पहुँचे। यही सोचकर वे इस रिश्ते के खिलाफ थे। एकदिन जंगल में लकड़ी बीनते समय मांगरी ने खूब महुआ खा लिया जिसके कारण उसे नशा चढ़ गया और पेड़ के नीचे वहीं सो गई। काफी देर बाद जब उसकी नींद खुली तो सामने कोई नहीं था सभी लोग चले गए थे। सोमरा उसे अकेले छोड़कर जा नहीं पाया। वह वहीं बैठा रहा और दोनों को बात करने का अवसर मिला। दोनों ने निर्णय लिया कि वे घर वापस नहीं जायेंगे। वे दोनों वहाँ से बुआ के पास भाग जाते हैं। इस तरह चुपचाप आने पर बुआ को अच्छा नहीं लगता मगर रहने दे देती है। उधर मांगरी के पिता दोनों को ढूंढते हुए जब आते हैं उससे पहले ही दोनों वहाँ से भाग जाते हैं। उस समय दलाल भोले- भाले लोगों को अपनी बातों में फँसाकर असम के चाय बागानों में मजदूरी का काम करने के लिए भेजते थे और अंग्रेज साहबों से कमीशन लेते थे। इन्हीं एक दलाल के हाथों पिता से बचते हुए इसी तरह दोनों असम के चाय बागान में पहुँच जाते हैं। चाय बागान के लाइन में रहकर बहुत कष्ट के साथ दिन गुजरने लगा। कभी-कभी दिनभर का काम पूरा न कर पाने से दिन की मजूरी भी नहीं मिलती थी तो फाके भी काटने पड़ते थे। मगर दोनों साथ थे, यही अच्छी बात थी।

 एकदिन सोमरा एक गंभीर बीमार की चपेट में आकर हॉस्पिटल में भरती हुआ। मांगरी भी अस्वस्थ होकर भरती हुई। लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। सोमरा का सेहत दिन ब दिन खराब होने लगा और अपनी प्रिय मांगरी को अकेली छोड़ हमेशा के लिए दूसरे लोक में चला गया। अस्वस्थ मांगरी यह सब दूसरे बेड से देख रही थी पर वह बेबस थी। आँसू के सिवा उसके पास कुछ नहीं बचा था। जिस सोमरा के प्रेम में न जाने कितने सुखद सपने संजोए सुदूर झारखंड से अपने माता-पिता को छोड़कर हमेशा के लिए असम आई थी। वही सोमरा हमेशा के लिए उसका हाथ छोड़कर चला गया था। बेहद दुखी, बेबस मांगरी कुछ दिनों बाद हॉस्पिटल से छुट्टी पाकर बागान के लाइन में आयी। अकेली मांगरी के जीवन में अब शुरु हुआ संघर्ष का दौर। कई युवक उसके आगे पीछे चक्कर लगाते मगर मांगरी बस चुपचाप बागान में काम करती कभी किसी की तरफ नहीं देखती। ऐसे में लाइन में लक्ष्मण काका कभी-कभी उसकी खबर लेने आ जाते थे। एकदिन उन्होंने मांगरी से कहा- “देखो ऐसे अब कब तक अकेली रहेगी? मेरी मानो तो तू शादी कर ले। देखो बंगले के साहब को तुम बहुत पसंद हो। जाओ, उन्हीं के साथ रहो। अच्छा है, ठाठ से मेम बनकर रहना” । पर मांगरी बात को टाल देती। लक्ष्मण काका जब भी आते एकबार जरुर कहते बंगले में रहो मांगरी। आखिर में मांगरी ने साहब के साथ रहने की सोची। इस तरह साहब के साथ मांगरी बंगले में रहने लगी और मांगरी उराव से मालती मेम बन गई। मगर तीन बेटों को जन्म देकर भी मांगरी को बच्चे नहीं मिले, साहब ने समझा-बुझाकर कहा कि बच्चों को अच्छी तालीम हेतु मिशन में भेज रहे हैं। भोली-भाली मांगरी बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए मान जाती है।
 एक दिन साहब जब यह कहकर गए कि “मैं जा रहा हूँ। जब मैं आऊँगा, तो फिर आ जाना। मगर जब आया तो गोरी मेम उसके साथ थी। मांगरी को बुरा लगना स्वाभाविक था। एक के बाद एक तीन अंग्रेज साहब आते-जाते रहे। अंत में सभी साहब चले गए, मांगरी अकेली रह गई। यही उसके आक्रोश का कारण बन गया। वह तेजपुर के लालमाटी में रहने लगी। धीरे-धीरे शराब की आदी बन गई। इस तरह जीवन में अनेक घात-प्रतिघात के बीच उस दिन अमिय कुमार दास और लखीधर दास के संपर्क में आकर उसका जीवन बदल गया। ब्रिटिश के प्रति रोष ने उसे स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने को प्रेरित किया। इसी तरह असहयोग आंदोलन में अंग्रेजों के विरुद्ध मुखबिरी का काम करते समय ब्रिटिश सरकार को पता चलता है और उनके हाथों वह मारी गई । इस तरह स्वतंत्रता आंदोलन में पूर्वोत्तर भारत के असम राज्य की प्रथम शहीद महिला थीं मांगरी उराव उर्फ मालती मेम।

इधर सन 1969 में भारत सरकार द्वारा ‘Who’s Who of Indian Martyrs’ नामक ग्रंथ में स्वतंत्रता आंदोलन में शहीद हुए लोगों का नाम प्रकाशित किया गया। देश के 41 शहीदों के भीतर असम के चार महिला शहीदों का नाम है। मगर दुख के साथ कहना पड़ रहा है उसमें भी मांगरी उराव का नाम नहीं है। सन 1979 में असम सरकार ने ‘ मुक्ति जुझारुर अनुसंधान समितिर प्रतिवेदन’ नामक पुस्तिका में स्वतंत्रता आंदोलन के 29 शहीदो के भीतर 5 महिलाओं का नाम है। मगर मांगरी का नाम वहाँ भी नहीं है।

फरवरी 1994 में ढेकियाजुलि में ‘असम चा व प्राक्तन चा जनजाति युव संस्थार राज्यिक अधिवेशन’ के स्मृतिग्रंथ में प्रकाशित रचना मालती मेम के बारे में लिखकर चाय जनजाति के दृष्टि आकर्षण किया था।
अमिय कुमार दास द्वारा लिखित आलेख के आधार पर लेखक सुशील कुर्मी जी असम के अनेक बागानों में स्वयं घूम-घूम कर मांगरी के परिवार की जानकारी इकठ्ठा करने का प्रयास करते हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार “तेजपुर एण्ड घघरा चा बागिचा” में मांगरी ने सबसे पहले चाय की पत्ती तोड़ी थी और इसी बागान के साहब की मेम बनी थी। अंत काल में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देकर हमेशा के लिए अमर बन गईं।

निष्कर्ष: आज हमारे देश को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष हो गए है। मगर बिडम्बना यह है कि आज भी हमारे स्वतंत्र सेनानी गुमनामी के अँधेरे में जी रहे हैं, जिन्होंने आजादी के लिए सहर्ष बलिदान दे दिया। आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर आज उन विस्मृत सेनानियों को न केवल याद करने की, बल्कि उनकी खोज कर उन्हें सम्मान देने की भी जरुरत है। 101 साल पहले देश के लिए शहीद होने वाली आदिवासी महिला मांगरी उराव ऊर्फ मालती मेम असम की प्रथम शहीद थी। जिन्हें वह सम्मान अवश्य मिलनी चाहिए । इस महान महिला मांगरी उराव उर्फ मालती मेम को मेरा नमन।

तेजपुर की रहने वाली रीता सिंह सर्जना ‘ उषा ज्योति’ नमकक पत्रिका संपादन करती है उनके लिखे कहानियां का पुस्तक नई सुबह कई जगह से सराहा गया


संदर्भ ग्रंथ-
1.ब्रिटिश साम्राज्यवाद-चा पूंजिवाद जातीय निपीड़न आरु यौन शोषणर विरुद्धे आदिवासी कन्या, महान महिला मांगरी उरावर मुक्ति युद्ध- डॉ. देवब्रत शर्मा।

2. उटि अहा एपाही फूल…मांगरी – अमिय कुमार दास द्वारा लिखित आलेख- 1969(चा मजदूर पत्रिका में प्रकाशित)

3 . भारतर स्वाधीनता संग्राम: अहमर महिला शहीद – 1988 (प्रांतिक पत्रिका में प्रकाशित शोध आलेख)

4. मांगरी उरावर जीवन धारा- सुशील कुर्मी द्वारा लिखित शोध आलेख

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