स्वामी सर्वभूतानन्द

Art By Ms Graciela Caivano, Argentina

श्री माँ सारदा देवी व नारी जागरण

इस विषय को हम दो तरह से देख सकते हैं। श्री माँ को केंद्रित कर नारी जागरण अथवा नारी जागरण के संबंध में माँ का विचार। हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि उनके मुख से ऐसी कोई वाणी उच्चारित नहीं हुई, जो समाज के लिए चरम आदेश स्वरूप हो। वे हमेशा ही अवगुण्ठन में रहती थी, जिन्होंने हमें दिखाया की जीवन कैसे जीना चाहिये। बातों को जीवन में प्रधानता ना देकर वाणी को जीवन में किस तरह उतारना चाहिए यह हम उनके जीवन से पाते है। श्रीमाँ के महाप्रयाण के बाद स्वामी विवेकानन्द के विदेशिनी शिष्या मिस मैक्लाउड एक चिट्ठी में लिख रही हैं ‘वह दीप तो फिर बुझ गया जो दीप हजारों वर्षों तक विश्व के नारी जाति को राह दिखाएगी।

इनके साथ साथ हम भगिनी निवेदिता की विख्यात ग्रंथ “स्वामी विवेकानन्द जैसा उन्हें देखा” का भी उल्लेख कर सकते हैं। वहाँ वह लिखती हैं, ‘श्री माँ क्या प्राचीन आदर्श की अंतिम प्रतिनिधि हैं? या नवीन आदर्श के अग्रदूत?’ स्वामीजी की शिष्यायें ही नहीं बल्कि स्वामीजीने भी अपने गुरु भाइयों को विदेश से जो पत्र लिखा है, वहाँ स्पष्ट उल्लेख करते है, ‘श्री माँ को केन्द्रित कर कितनी गार्गी मैत्रेयीयों का जन्म होगा।’ तो इस प्रकार हम देखते हैं कि देश में माँ को केन्द्रित कर नारी जागरण की बातें, तो दूसरी तरफ समस्त विश्व के नारीयों को किस प्रकार जीवन जीना है उसका संकेत भी हम श्री माँ के जीवन से पाते हैं। माँ के जीवन में हम प्राचीन एवं नवीन का समन्वय देखते हैं। साथ ही प्राच्य नारी व पाश्चात्य नारी के व्यक्तित्व का अपूर्व सम्मेलन हमें उन्हीं की जीवन में देखने को मिलता है। अतः हमें श्री माँ सारदा देवी व नारी जागरण की चर्चा में इन दो पहलुओं को विचार में रखना होगा।जिस समाज में श्रीमाँ का जन्म हुआ, उस समाज में नारीयाँ अपने जीवन को घर के दरवाजे से पूजा घर तक केवल दुख झेलने और आँसू विसर्जन करने का एक कारखाना बना रखा था।
माँ उसी घर में ले आती है युक्ति, विज्ञान, समाजचेतना और प्राचीन आध्यात्मिक दर्शन की रोशनी। वह दिखा देती है कि इसी छोटे से पूजा गृह में नारी अपने जीवन को तैयार करने में समर्थ (सक्षम) है। जीवन को ऐसे रूपान्तरित करना है कि अपने लिए तो आँसू नहीं बहाना है और दूसरों के आँसू पोंछने के लिए भी जीवन को तैयार करना है।

माँ जिस ऐतिहासिक युग में जन्म ग्रहण करती हैं, वह युग है नवजागरण का सन्धिकाल। इस नवजागरण को ऐतिहासिकगण नारी जागरण का दूसरा पहलू बताते हैं। 19वीं शताब्दी के नवजागरण का एक उल्लेखनीय अंग नारी जागरण भी है। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे समाज- सुधारकों ने सती प्रथा रद्द, विधवा विवाह का प्रचलन आदि संस्कार कार्यों में उल्लेखनीय भूमिका प्रदान किया हैं। अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में यदि हम देखे तो देखते हैं कि उस समय अमेरिका में नारी के वोट अधिकार अर्जित करने का आंदोलन तथा फेमिनिस्ट आंदोलन का आरम्भ हो चुका था। ऐसी परिस्थिति में भारत तथा विश्व एक सामंजस्यपूर्ण राह ढूँढने की चेष्टा कर रहीं थी। ऐसे एक महत्वपूर्ण काल में श्रीमाँ जन्म ग्रहण करती हैं।
हम देखते हैं कि निवेदिता कह रहीं हैं, ‘श्रीमाँ प्राचीन आदर्शों की अंतिम प्रतिनिधि हैं।’ वास्तव में प्राचीन नारीयों की आदर्श स्वरूप श्रीमाँ एक ही आधार में गार्गी, मैत्रेयी और लीलावती हैं। जहाँ मैत्रेयी के मुँह से हम सुनते हैं अमृतत्व पाने की वाणी ‘जो धन हमें अमृतत्व प्रदान नहीं करता उस धन से मेरा क्या प्रयोजन…’।
उसी की परछाई हम माँ के जीवन में पाते है। जब माँ दक्षिणेश्वर आती हैं और रामकृष्णदेव एक दिन उनसे पूछते हैं, ‘क्या तुम मुझे संसार के पथ में खींचने के लिए आई हो?’
श्री माँ अनायास ही उत्तर देती है ‘नहीं संसार के पथ में खींचने के लिए क्यों. . । मैं तुम्हें ईष्ट पथ में सहायता करने के लिए आई हूँ।’ श्रीरामकृष्ण का ईष्ट पथ क्या है? इस जगत को अमृतपद लाभ करने के उपयोगी बनाना। इसीलिए उनकी अमोघ वाणी है ‘तुम लोगों का चैतन्य हो’। माँ अवगुण्ठनवती है, उनके भीतर मूर्त है, भारतीय नारी का एकमात्र पति प्रेम मानो वह एक काव्य हो।
श्रीरामचंद्रमयी सीता की तरह श्रीमाँ भी श्रीरामकृष्ण गतप्राणा है। ‘श्रीरामकृष्ण के विश्व प्रेम को धारण करने की एक अपूर्व पात्र है।’
यह उक्ति भगिनी निवेदिता की है। रामकृष्णदेव स्वयं माँ को भार समर्पण करते हैं। काशीपुर में वे श्रीमाँ से कहते हैं, ‘कलकत्ते के लोग कीड़ों की तरह किलबिला रहे हैं। तुम उनको देखना।’ ‘परवर्ती काल में इस संबंध में माँ अपने सेवक से कहती है “मैं और क्या कर पा रही हूँ, कितनों को देख पा रही हूँ। वे तो सभी का भार मुझ पर सौंप गये हैं! सबको देख पाती, तब न होता! पति के जीवनव्रत की तरफ कितनी सजग दृष्टि। दूसरी तरफ आध्यात्मिक गंभीरता को देखें तो पति ही ईष्टदेव है। इस बात का दृष्टान्त, काशीपुर में लीलासंवरण के बाद, श्रीमाँ की मुख से निकली हुई विख्यात वाक्य ‘ओ माँ काली, मुझे छोड़ कहाँ गई’ से मिलता है।
भारतीय आदर्शों के अनुसार! यथार्थ सहधर्मिणी। उधर सिर्फ पतिनिष्ठ स्त्री ही नहीं ज्ञानदायिनी माँ भी है। श्रीमाँ के मुँह से हमेशा भारत की चिरंतन ज्ञान की स्फुलिंग उज्जवल रूप से प्रकाशित होती है।
‘श्रीश्रीमाँ की बातें’ ग्रंथ में एकदिन की वर्णन कि ओर यदि देखें-
‘उद्‌बोधन में एक भिन्न सम्प्रदाय की भगवाधारी साधिका का। उनके प्रिय गुरुदेव ऋणग्रस्त हैं। वह उनके लिये धन संग्रह करने के लिये निकली हैं। अचानक श्रीमाँ से वह प्रश्न करती हैं, (उनके) गुरु देव मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करते। इसमें आपकी क्या राय है! ’ श्रीमाँ पहले गुरुवाक्य में विश्वास करना चाहिये कहकर, उसको निरस्त करती हैं। वे कहने लगी, “नहीं, आपको अपनी राय देनी ही होगी।” माँ ने पुनः अपनी राय देने में असहमति जतायी, पर भगवाधारिणी किसी प्रकार भी छोड़ने को राजी नहीं। तब माँ ने कहा, “वे (तुम्हारे गुरु) यदि सर्वज्ञ होते – यह देखो तुम्हारे जिद के कारण, बात से बात निकली तब वे ऐसी बात नहीं कहते। पुरातन काल से कितने ही लोग मूर्ति की उपासना करके मुक्तिलाभ करते आ रहे हैं। वह क्या कुछ नहीं है? हमारे ठाकुर की उस प्रकार की संकीर्ण भेदबुद्धि नहीं थी । ब्रह्म सभी वस्तुओं में है। पर बात यह है साधु पुरुषगण सब आते हैं मनुष्य को रास्ता दिखाने। अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग प्रकार की बातें कहते हैं। रास्ते अनेक हैं, इसलिए उन सबकी बात ही सही हैं। जैसे एक वृक्ष में सफेद, काला, लाल इत्यादि विभिन्न रंगों के पक्षी आकर बैठते हैं तथा तरह-तरह की बोली बोलते हैं। सुनने में अलग-अलग होने पर भी हम उन सबको पक्षी की बोली कहते हैं। एक ही बोल पक्षि का है और दूसरे नहीं है ऐसा हम नहीं कहते।”
रामकृष्ण देव की सर्वधर्म समन्वय की वाणी को ही माँ ने के भिन्न रूप से प्रकट किया है। फिर एक संतान माँ को पत्र लिखते हैं। उसमें उन्होंने अभिमान प्रकाश किया है, इतना जप-ध्यान करने पर भी अपने प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगा पा रहा हूँ। यहाँ अपने आहत, अक्षम संतान के प्रति माँ के मुँह से अभय वाणी निकलती है, ‘यह जो पानी है, वह सदा नीचे की ओर ही बहती है, उसे भी सूर्य की किरणें ऊपर खींच लेती हैं। उसी प्रकार जिस मन का स्वभाव ही हैं नीचे की तरफ यानि भोग वस्तु में जाने का, उसे भी भगवान की कृपा ऊर्ध्वगामी करती हैं।’
श्रीमाँ का अपने भक्त संतानों को उपदेश देने का ढंग ही अलग था। वे जीवन को दृष्टांत स्वरूप रखकर उपदेश दिया करती थी।
स्वामी शांतात्मानन्द से वे कहती हैं, “बुरे कर्मों की तरफ मन हमेशा आकर्षित होता है, अच्छे कर्म में मन जाना नहीं चाहता। देखो न पहले मैं रोज रात के तीन बजे उठकर जप करती थी, एक दिन आलस वश मैंने जप नहीं किया, तो कुछ दिन बाद बंद ही हो गया। इसलिये अच्छे कार्य करने के लिये बहुत ज़िद चाहिये। नहबत रहते समय, रातों में जब चाँद उठता, तो गंगा में उसके छवि को देख भगवान से रो-रो कर प्रार्थना करती कि चाँद में भी कलंक हैं, मेरे मन में कोई काला न रहे।’ इस प्रकार का आध्यात्मिक विषयों में और सांसारिक विषयों में माँ के परिश्रम को हम मूर्त देखते हैं। उन्होंने हर क्षेत्र में असाधारण साधना का परिचय दिया है। इस विषय को आज के नारी के सशक्तिकरण का अनुपम उदाहरण के रूप मे देखा जा सकता है। श्रीमाँ की नहबत के जीवन में एक ओर जहाँ कर्म निष्ठा थी तो दूसरी तरफ ध्यान व आध्यात्मिकता।
इसीलिए ठाकुर माँ से कहते थे, ‘कर्म करना चाहिए, स्त्री जाति को बैठे नहीं रहना चाहिए बैठे रहने से अनेक प्रकार की कुचिंताए आती है। श्रीमाँ इसे उल्लेख कर कहा करती थी, ‘ठाकुर मुझे कुछ पटसन (jute) लाकर देते और कहते इनसे मुझे रस्सी बना कर दो। मैं इन्हे छत में लटका कर मिठाई आदि रखा करूँगा।’ मैंने एसा ही किया था और उसके बचे हिस्से से तकिया बना कर रात को सिरहाने में रख कर सोती थी। उन्होंने बताया ‘वह तकिया और आजकल जो तकिए में सिर रखकर सोती हूं, उसमे कोई फर्क मालूम नहीं पड़ता। नींद वैसी ही आती है। माँ स्त्रियों के जीवन में संतोष, संसार में शान्ति संचार करती है जो परिवार को सुन्दर बनाती है। समाज को दृढ़ता प्रदान करती है। इस संतोष के लिए जरूरी है आन्तरिक रूप से आध्यात्मिक भाव से भावित होना। आजकल के आधुनिक समाजविज्ञानी नारी जागरण के लिए स्त्रियों में अध्यात्म भावना का होना स्वीकार करते हैं। प्रख्यात समाजविज्ञानी ‘उर्सुला किंग’ अपने ग्रंथ में लिखती है- स्त्रियों को आध्यात्मिक धारक, एवं वाहक बनना है। वे ऐसी एक समाज की कल्पना करती हैं, जहाँ स्त्री के प्रति अत्याचार नहीं है। वे दर्शन, स्वतंत्रता, मुक्त चिंता की अधिकारी है। स्त्रियों के इस रूप को अपने ग्रंथ में सुश्री किंग श्रीमाँ की बात स्पष्ट रूप से उल्लेख करती हैं। प्राचीन भारतीय नारीयों में जो त्याग, तपस्या तितिक्षा आदि हम देखते हैं, श्रीमाँ के जीवन का हर पहलू उसी दृष्टि से उज्जवल है। साधारण व्रत आदि से लेकर वेदान्त के गहन दर्शन भी उनके जीवन में मूर्त हुआ है।
हम जानते हैं श्रीमाँ ने बेलुड़ के नीलांबर मुखर्जी के घर के छत पर पंचतपा का अनुष्ठान किया था। बाद में इस व्रत करने का तात्पर्य के विषय में भक्तों के पूछे जाने पर माँ सहज भाव से उत्तर देती हैं, ‘यह सभी लड़कियों की व्रत है, पार्वती ने शिव के लिए किया था। लोक शिक्षा के लिए इन व्रतों का करना। नहीं तो लोग समझेंगे कि खा पीकर मस्ती में है।’ अत: माँ प्राचीन भारत की मूर्त विग्रह है। ।
भगिनी निवेदिता अपने विदेशिनी संगिनीओ को लेकर कामारहाटी के गोपाल माँ को देखने गई थी। स्वामी विवेकानन्द ने इस सन्दर्भ मे कहा की, ‘तुम लोग आज प्राचीन भारत को देख आई हो। वह त्याग तितिक्षा रूप भारत आज समाप्त हो रहा है। वह फिर कभी वापस नहीं आएगा।’ माँ के जीवन को देख कर भी हम वही बातों को दोहरा सकते हैं। वैदिक युग की नारी हो या की पौराणिक नारी; महाकाव्य की नारी और सत्य युग के नारीयों का सकारात्मक पहलू उनके जीवन में परिलक्षित होता है। ।
और यदि वर्तमान भारत के अग्रदूत के रूप में देखे तो उस क्षेत्र में भी वह अनन्या है, अद्वितीय है। आज के समाज में खड़े होकर हम इससे अवगत हैं कि अस्पृश्यता, जातपात वाली विभेद नीति ये सभी धर्मतत्व नहीं है, बल्कि मनुष्य ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए इस प्रथा का प्रचलन किया है। यह सब आज हम माँ के जीवन को सामने रख समझने में समर्थ होते हैं कि उस युग में खड़ी होकर समाज के लिए उन्होने एक उत्कृष्ट दृष्टान्त रखी है।

वह जात-पात के लक्ष्मण रेखा के ऊपर उठकर अमजद को पुत्र रूप से स्वीकार करती हैं। बागदी (बंगाल के एक अनुसूचित जात) डकैत से पिता-पुत्री का संबंध स्थापित करती है। भगिनी निवेदिता को सादर अपने गोद में स्थान देती है। जिस समय कालापानी (समुद्र) पार करने से जात चली जाती हो, ऐसे समय में सन्यासी सन्तान को विदेश जाने की अनुमति देती है। घर में रहकर भी मन का इस प्रकार विस्तार धर्म इतिहास में आप और कहीं नहीं पायेंगे।
नूतन को ग्रहण करने की उदारता हम माँ के जीवन में मूर्त देखते हैं।
वह गौरी माँ से कहती हैं, ‘उनसे कह दो, सिर्फ घर गृहस्थी करने के लिए उनका जन्म नहीं हुआ है।’ इस तरह नारी जीवन को उन्होने एक सम्यक रूप से विशिष्टता प्रदान की।
कोई अभिभावक उनसे दुख से कहते हैं कि लड़कियों की शादी नहीं करा पा रहे हैं। उनका साफ साफ उत्तर होता, ‘यदि शादी नहीं करवा सकते, तो उन्हें निवेदिता स्कूल में दाखिला कर दो, लिखना पढ़ना सीखें।’ इधर गौरी माँ की एक छात्रा से वे पूछती है कि ‘घर जाकर खाऊँगी’ इसका अंग्रेजी क्या होगा।
इस तरह एक नारी के उन्मुक्त मन को माँ ने सादर से ग्रहण किया है। परंतु दुख की बात है कि आज के तथाकथित नारी आंदोलन के साथ माँ की मानसिकता का उच्च सोच साफ झलकता है।
श्री माँ कभी भी नारी को पुरुषों के समान होने की बात नहीं कहती हैं। कोई भक्त महिला माँ से कहती है लज्जा, घृणा, भय यह तीन नही रहना चाहिए। माँ तुरंत कह उठती है ‘नहीं बेटे यह सन्यासियों के लिए हैं, लड़कियों के लिये लज्जा, घृणा, भय इन तीनों का प्रयोजन है। जिसके पास है भय उसका होगा जय।’ वे तर्कसंगत बातों में विश्वास करती है पर विसंगत बातों को उन्हानें स्थान नहीं दिया। इस प्रकार माँ के जीवन में नवीन एवं प्राचीन के समन्वय के साथ-साथ प्राच्य एवं पाश्चात्य के मिलन को भी पाते हैं। प्राचीन आर्यों में जिस प्रकार की समाज चेतना और विभित्र नागरिक चेतना देखने को मिलता है, वह माँ के जीवन में भी विराजमान है। परंतु विशेषता यह है कि माँ ने उसे भारतीय भावना से अनुरंजित किया है। विल्सन के 14 दफा मांगों के साथ विश्वयुद्ध बंद हुआ। माँ एक सन्तान से उन मांगों को सुनना चाहा। सब सुनकर माँ कहती हैं ‘सभी मुखस्थ यानि सिर्फ मुँह से कही हुई बात है, यदि अंतस्थ होता (अर्थात हृदय से प्रेरित होता) तो बातें कम होती।’
एक भक्त बिना मिलावट वाला दूध पाने के लिए दूध के मूल्य में वृद्धि करने की बात करने से उनको कहती हैं, – ‘दुध की कीमत क्यों बढ़ा रहे हो?’ इस प्रकार की कितनी असाधारण दूरदृष्टि उनमें थी, अभी इस युग में सोचकर हम आश्चर्यचकित होते हैं।
एक दिन माँ के प्रिय शिष्य प्रबोध बाबू माँ से कहते हैं कि अंग्रेजों ने कितने प्रकार के सुख-सुविधाएं प्रदान किया हैं। यह कहकर उनका गुणगान करते हैं। सब सुनने के पश्चात माँ कहती हैं ‘हाँ बेटे, यह सब तो हुआ परंतु पहले इतनी अनाज की कमी नही थी, अब तो अन्न का अकाल है’।
केवल नवीन एवं प्राचीन का समन्वय नहीं, या सिर्फ प्राच्य एवं पाश्चात्य का मिलन ही नहीं , माँ अपने जीवन से नारी को एक निजस्वता में विचरण करने क्षेत्र दिखला दिया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि विस्तार में ही नारी का मातृत्व है। इस मातृत्व में वे श्रीरामकृष्ण को भी प्रवेशाधिकार नहीं दिया। वे खुद कहती हैं ‘मैं सचमुच में माँ हूं, ’। गर्भ में पालन न कर भी किस प्रकार सत्य जननी बना जा सकता है, वह हमें माँ के जीवन से ही सीखना है।
माँ इसी विस्तार को हमें सिखलाती है। भारतीय नारीयों के समक्ष एक ऐसा आदर्श जीवन रख गई है कि जो नारीत्व के गरिमा से परिपूर्ण है जो एक नए नारीवाद के विचारधारा को वहन करती है, जहाँ माँ कुछ तोड़ती नहीं जोड़ती हैं। जोड़ने के लिये आह्वान करती हैहुई।
स्वामी सर्वभूतानन्दजी रामकृष्ण संघ के एक वरिष्ठ साधु, व रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के ट्रस्टियों में से एक हैं, जो वर्तमान में रामकृष्ण मिशन, मठ चांदीपुर के सचिव हैं। उन्होंने अपना मठ जीवन नारायणपुर केंद्र से शुरू किया और गोलपार्क, इलाहाबाद केंद्रों की अध्यक्ष के रूप में सेवा की। वह 2017 से 2021 तक शिलॉन्ग सेंटर के प्रमुख थे। उनके प्रेरणा से 2020 को त्रिभाषी पत्रिका ‘का जिंगशाई, द लाइट’ शुरू हुई।