Essay Writing – Using Factual Information To Compose Your Essay

Essay writing is an essential element of the school admissions process. Your essay ought to be unique, informative, and convincing in supporting your statements. It’s not required to write a very long personal essay; some good-quality essay is only going to call for a maximum of 300 words. The rest could be based on your topic, but it is necessary (more…)

महिला सशक्तिकरण – भारतीय संस्कृति का अंग


उज्ज्वला संदीप देसाई,

श्रीमती उज्जवला देसाई आई.टी. कम्पनियों में विभिन्न पदों पर 20 वर्ष से ज्यादा कार्यरत रहीं हैं। सम्प्रति वे पूना की एक साफ्टवेयर कम्पनी की बोर्ड आफ डायरेक्टर्स में एक हैं। पिछले पाँच वर्ष से स्वैच्छिक सामाजिक मुद्दों पर कार्य कर रही हैं यथा देशप्रेम के प्रति जागरूकता, युवा -निर्माण आदि।

Priyanka Jhunjhunwala


नमस्ते, आज २१वी शताब्दी में हम महिला सशक्तीकरण के बारे में सोचते, लिखते या पढ़ते हैं तो बहुत अच्छा लगता है पर थोड़ा विचित्र नहीं लगता?
जिन महिलाओं ने सृष्टि की रचना से लेकर आज तक अनेकों पीढ़ियों को या महापुरुषों की निर्मात्री बनीं, उनका सशक्तिकरण अबतक क्यों नहीं हुआ? क्या वो सशक्त नहीं है? जब निसर्गत: उसे बड़ा ही उच्च, माता का दर्जा मिला हुआ है। मातृत्व एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी का काम है, एक माता न सिर्फ अपने बच्चों पर बल्कि आनेवाली अनेक पीढ़ियों पर संस्कार देने का काम करती है। एक तरह से देखा जाय तो वो एक कुम्हार की तरह माटी को, अंदर और बाहर से सुधार कर मटके में रूपांतरित करती है। आज अगर उस पर अत्याचार हो रहे हैं या उसे एक भोगवस्तु के रूप में देखा जा रहा है, तो उसके लिए वो खुद भी तो जिम्मेदार है। समस्या का समाधान अगर चाहिए तो उस समस्या की जड़ तक जाना पड़ेगा, निरपेक्ष भाव से काम करना होगा, अगर हमारी गलती है, तो उसे भी स्वीकार करना होगा।
हम अपने पुराणों में या इतिहास में झाँककर देखेंगे तो पाएँगे कि स्त्री कभी अबला नहीं थी। इस सृष्टि के सृजन में पुरुष के साथ प्रकृति का कार्य भी महत्वपूर्ण है। हमारी प्रमुख देवताओं में स्त्री देवता अर्थ, शस्त्र, शास्त्र, कला सहजतासे संभाल रही है। मां लक्ष्मी के साथ श्री विष्णू जो सत्विक्तता का प्रतीक है, मां शक्ति के साथ शिव जो समदर्शिकता का प्रतीक है, हमे बता रहे है कि संपन्न होने पर सात्विकता और शक्ति आने पर समदर्शिता का त्याग नहीं करना चाहिए। माँ सरस्वती कला और विद्या दोनों की देवता हैं। शक्तिस्वरुपा दुर्गा सर्व शस्त्रों से सुसज्ज है और उसने अनेक दैत्यों का संहार करके संसार की रक्षा की है।
इतिहासमें कैकयी ने देव दानव युद्ध में अपने पति की सारथी बन कर उसके प्राणों की रक्षा की है। महाभारत काल में अंबाने अपने ऊपर हुए अन्याय का बदला घोर तपश्चर्या करके पूर्ण किया। इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त भीष्माचार्य के मृत्यु का कारण बनी। कुंतीने अपने पुत्रों को अपने बहू पर हुए अन्याय को प्रत्युत्तर देनेके लिए प्रेरित किया, उसी समय धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ वनवास जाकर, उनकी सेवा भी की। न्याय और कर्तव्य दोनोंका समानता से निर्वाह किया। अनेक प्रसंग उसके धैर्य और संतुलित मन का परिचय देते है। द्रौपदी तो इतिहास में अमर हो गई। बंधक बने अपने पाँच बलशाली पतियों को मुक्त कराया। अपने केश खुले रखकर, सतत अपने पतियों को उनके कर्तव्य की याद दिलाती रही। राजदरबार में भीष्म, द्रोण, विदुर जैसे दिग्गजों को उनकी हतबलता और कर्तव्यबोध का आइना दिखाया। पति बंधन में होते हुए भी खुद की स्वतंत्रता का मान रखा। माता सीता ने भी अपना निर्णय खुद लिया। चाहे वनवास जाना हो या रावण की कैद में खुद का मनोबल संभालना या भूमिगत होना हो।
अध्यात्मशास्त्र में पारंगत अनेक स्त्रियोंका वर्णन पुराणों में आता है, लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषियों की ऋचाएँ वेदों में आती है। आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य और मंडन मिश्र के विवाद में मंडन मिश्र की पत्नी उभयाभारती ने पंच की भूमिका निभाई थी।
भक्ति योगमें मीराबाई, मुक्ताई, जनाई और अशिक्षित समझी जानेवाली बहिणाबाई, रामकृष्ण परमहंस की अर्धांगनी शारदा देवी शिखर पर थी। धैर्य और सामर्थ्य में जीजाबाई, रानी लक्ष्मीबाई, ओनके अव्वाक्का, केलाडी चेंनंमा, बेलावडी मल्लंमा, राणी अबाक्का, राणी वेलू नचीयार व कित्तुर चेल्लंमा, नागालैण्ड की रानी गिइदिन्ल्यू आदि पुरुषों से कम नहीं है अपितु विदेशी आक्रांताओं से मातृभूमि की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने अपने जीवन सार्थक कर आने वाले पीढ़ियों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया।
आज भी अनेक महिलाएँ शास्त्र, कला, संरक्षण जैसे विविध क्षेत्रों में उत्तम कार्य कर रही हैं। फिर क्या भूल हो गई हमसे या हमारे अज्ञान का फायदा लिया गया, जो आज स्त्रियों पर अत्याचार होते हैं और महिला सशक्तिकरण का नारा बुलंद करना पड़ता है।
दुर्दैव से बीच के काल में हम पर बहुत से आक्रमण हुए। उसके परिणाम स्वरूप स्त्रियोंपर बहुत सी पाबंदियां आ गई, क्यों कि आक्रांता राक्षसी वृत्ति के थे। ७००/८०० साल की गुलामी से समाज की मनोदशा गुलामवत हो गई फिर भी हमारी शूरवीर महिलाओं और पुरुषों ने समय-समय पर संघर्ष कर स्वयं को पारतंत्र्य से बाहर लाने की कोशिश अनवरत की। अन्य किसीभी देशमें उनकी पुरानी सभ्यता दिखाई नहीं पड़ती। पर आज स्वातंत्र्य के पश्चात धर्मनिरपक्षता जैसे लुभावने नाम से हमारी संस्कृति पर चारो और से आघात हो रहे है और हम भी उस दलदलमे फँसते जा रहे है। अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण, आक्रांताओं का उदात्तीकरण करनेवाला इतिहास व हिंदू मन पर आघात करनेवाला सिनेमा जगत, इन सबके कारण आज हमारा युवावर्ग अपने ही गौरवशाली इतिहास को भूलकर, पाश्चत्य संस्कृति के आधीन होता दिखाई दे रहा है। महिला वर्ग भी बाजारीकरण के अधीन हो रहा है।
स्त्री को सक्षम और सशक्त होना है तो इस आभासी दुनियासे बाहर आकर, सत्य का सामना करना पड़ेगा। आज जागरूक होनेकी आवश्यकता है।
अगर समाज हमे भोगवस्तू न माने ऐसे लगता है तो सबसे पहले जो सिनेमा स्त्रियोंको भोगवस्तु(आइटम) बनाकर प्रस्तुत करता है उसपर बहिष्कार होना चाहिए। अगर बदलाव चाहते हो, तो उसकी शुरुआत खुद से करो। लड़कों के कपड़े पहननेसे या उनकी तरह रात को बाहर टहलने से महिला सशक्त नहीं हो सकती, वो सिर्फ ऊपरी दिखावा मात्र है। स्त्रियों कों कराटे या तत्सम स्वसंरक्षण सिखाने वाली कला में पारंगत होना पड़ेगा, दूसरी ओर लड़कों को पाक कला का शिक्षण देना होगा। दोनों को सब जीवनावश्यक कला आनी चाहिए, जिससे वो सही तरह से आत्मनिर्भर हो सकेंगे। हर चीज सरकार नहीं कर सकती, आज भविष्य के लिए तैयार होना पड़ेगा। महाभारत में भीम पाक कला और अर्जुन नृत्य कला जानने के कारण विपरीत परिस्थितियों भी बच गए।
प्रत्येक माता ने अगर अपने बच्चों को सही शिक्षण दिया तो ये समाज सक्षम और सशक्त होगा। समाज का कोई भी घटक, स्त्री या पुरुष कमजोर नहीं होना चाहिए। अपने गौरवशाली इतिहास को याद करो, नहीं तो पैसा और प्रसिद्धि का हवस समाज को नष्ट कर देगा। कल जो प्रसिद्धिके जाल में फँसे थे वो आज ईडी के जाल में दिखाई दे रहे है।
हमारे सच्चे नायक/नायिका सैनिक, स्वास्थ्य कर्मचारी, समाज सेवी, वैज्ञानिक शास्त्रज्ञ, कृषक एवं श्रमिक वर्ग हैं, जो हमारे समाज का भरण, पोषण और संरक्षण कर समाज को आगे ले जा रहे है, उन्हें छोड़कर झूठे नायक/नायिका के मायाजाल में न फँसिए। आपका आदर्श अगर सही है तो आपकी दिशा भी सही होगी। भारत ही विश्वगुरुका स्थान ले सकता है अगर हम देवी/देवताओंकी तरह स्त्रियों का भी सम्मान कर सके। सन् 1893 मार्च 25 को स्वामी विवेकानंद के ‘भारतीय नारी’ विषय पर अपने भाषण में कहा था –
भारत में नारी ईश्वर की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और उसका सम्पूर्ण जीवन इस विचार से ओत-प्रोत है कि वह माँ है। पश्चिम में स्त्री पत्नी है, पूर्व में वह माँ है। हिन्दू माँ-भाव की पूजा करते हैं और संन्यासियों को भी अपनी माँ के सामने अपने मस्तक से पृथ्वी का स्पर्श करना पड़ता है।