वीरेन्द्र परमार

Matriliny by Bah Raphael Warjri

प्रकृति की सुकुमार गोद में बसा मेघालय पूर्वोत्तर भारत का एक लघु पर्वतीय प्रदेश है। यहाँ की शस्य-श्यामला धरती के गर्भ में अनेक रहस्य, कहानियाँ, पौराणिक आख्यान, रोमाँचकारी किस्से और मिथक छिपे हुए हैं। प्रकृति यहाँ के निर्दोष और निष्पाप लोगों की सहचरी है। मेघालय अपने अद्भुत और अनिर्वचनीय सौन्दर्य के मोहपाश में बाँध लेता है, अपने निष्कपट हाव–भाव से सम्मोहित कर लेता है, अपने अकृत्रिम आचरण से बार–बार आने के लिए आमंत्रित करता है। यहाँ के निवासी भविष्य की चिंता में दुबले नहीं होते, बैंक बैलेंस के व्यामोह में तनाव नहीं पालते और आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी परंपराओं को तिलांजलि नहीं देते। वे वर्तमान में जीते हैं और जो मिल गया उसी से संतुष्ट हो जाते हैं। मेघालयवासियों का पाखंडहीन जीवन और निष्पाप आचरण किसी भी सभ्य समाज के लिए वरेण्य है। यहाँ की हरियाली, खूबसूरत घाटी, मनमोहक सूर्योदय और सूर्यास्त किसी कवि की कल्पना से भी अधिक चित्रात्मक, भावपूर्ण और अर्थगर्भित है। अगर कोई व्यक्ति प्रकृति के आँचल पर अपनी कल्पना के रंग भरना चाहे है तो उसे मेघालय से बेहतर कोई जगह नहीं मिलेगी। यहाँ की मनमोहक जलवायु किसी श्रांत–क्लांत और तनावग्रस्त पथिक को चंदन का अवलेप लगाती है। मेघालय का अर्थ है मेघों का आलय अर्थात मेघों का आवास। सचमुच यहाँ बादल अठखेलियाँ करते हैं। यहां खासी, जयंतिया और गारो तीन प्रमुख आदिवासी समुदाय के अतिरिक्त तिवा, राभा, हाजोंग, लाखेर, कार्बी, बाइते, कुकी आदि जनजातियों के लोग निवास करते हैं। मेघालय का इतिहास यहाँ निवास करनेवाली तीन प्रमुख जनजातियों खासी, जयंतिया और गारो से जुडा हुआ है। ये जनजातियां सदियो से यहाँ निवास करती हैं। मेघालय की अधिकांश जनसंख्या ईसाई धर्म ग्रहण कर चुकी है। खासी लोग कैथोलिक हैं जबकि गारो लोग बैपटिस्ट हैं। पनार अथवा नार मेघालय का एक प्रमुख समुदाय है जिसे जयंतिया के नाम से जाना जाता है। जयंतिया शब्द एक पूर्व सम्राज्य जयंतिया सम्राज्य से लिया गया है जिसके शासक सिन्तेंग समुदाय के थे। जयंतिया का मूल आदिवासी धर्म नीमत्रे युग ता युग के नाम से जाना जाता है। एक लोककथा के अनुसार तूफान के देवता के साथ आकाश के देवता ने स्वर्ग के पेड़ को हिलाकर उससे बीज गिरा दिया जिसे एक पक्षी ने उठाया और उस बीज को जमीन में बो दिया। वह और कुछ नहीं बल्कि चावल का बीज था। ईश्वर ने मनुष्य को कुछ दिव्य बीज तथा चावल की खेती के लिए आवश्यक निर्देश दिए। मेघालय की जनजातीय संस्कृति और लोक परंपरा अत्यंत समृद्ध है। बांसुरी और मृदंग से निकली स्वर लहरियों के साथ नृत्य और मदिरापान यहाँ के सामाजिक समारोहों और धार्मिक अनुष्ठान का अभिन्न अंग है। पांच दिनों तक मनाया जानेवाला “का पाबलांग-नोंगक्रेम” खासी समुदाय का प्रमुख त्योहार है। इसे ‘नोंगक्रेम’ के नाम से जानते हैं। यह शिलांग से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘स्मित’ नामक गाँव में मनाया जाता है। “शाद सुक मिनसीम” भी खासी जनजाति का पर्व है। हर साल हर्ष और उत्साह के साथ अप्रैल माह में यह त्योहार आयोजित किया जाता है। इसका आयोजन शिलांग में किया जाता है। “बेहदीनखलम” जयंतिया समुदाय का त्योहार है जो प्रायः जुलाई में मनाया जाता है। “बेहदीनखलम” का शाब्दिक अर्थ है “छड़ी से शैतान को भगाना”। इसका आयोजन जोवाई नामक कस्बे में किया जाता है। गारो समुदाय अपने देवता “सलजोंग” (सूर्य) के सम्मान में अक्टूबर-नवंबर महीने में ‘वांगला’ त्योहार मनाता है। मेघालय में सदियों से युवागृह की परंपरा विद्यमान है। गारो समुदाय के युवागृह को ‘नोकपंते’ के नाम से जानते हैं। प्रत्येक गाँव में कम से कम एक नोकपंते अवश्य होता है। इसमें ग्रामीण युवक पारंपरिक कला और शिल्प का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। नोकपंते में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। गाँव के सभी युवक नोकपंते में ही रात्रि विश्राम करते हैं, परन्तु पूर्वोत्तर की अन्य जनजातियों के युवागृह की भांति गारो समुदाय के युवागृह भी आधुनिकता के प्रवाह में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
मेघालय का समाज मातृसत्तात्मक है। सबसे छोटी पुत्री समस्त संपत्ति की मालकिन होती है। छोटी पुत्री ही वृद्ध माता-पिता एवं अविवाहित भाई-बहनों की देखभाल करती है। परिवार में कोई पुत्री नहीं होने पर माता-पिता किसी निकटतम महिला संबंधी को अपनी संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाते हैं। खासी और जयंतिया समुदाय के लोग अपने पारंपरिक मातृवंशीय नियमों का पालन करते हैं जहां सबसे छोटी पुत्री परिवार की सभी जिम्मेदारियां निभाती है। गारो जनजाति में भी सबसे छोटी बेटी मूल रूप से पारिवारिक संपत्ति की वारिस होती है। जब माता-पिता किसी अन्य लड़की को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हैं तो उसका दावा स्वतः समाप्त हो जाता है। गारो जनजाति के गोत्र अनेक उपगोत्रों में विभक्त है जिसे ‘मचोंग’ कहा जाता है। मचोंग का शाब्दिक अर्थ मातृत्व (मदरहुड) है। मचोंग इस समुदाय की सबसे छोटी इकाई है। यह परिवार से भिन्न संस्था है। मचोंग के सभी सदस्य एक ही माँ की संतान माने जाते हैं। खासी और गारो दोनों जनजातियों में पिता को बाहरी व्यक्ति माना जाता है। बच्चे अपनी माता के नाम से जाने जाते हैं। परिवार की सम्पूर्ण सत्ता माँ के हाथों में होती है। इस समाज में पिता की कोई निर्णायक भूमिका नहीं होती है। सभी संपत्ति पर माँ का अधिकार होता है। माँ की मृत्यु के बाद माता की संपत्ति पर उसकी सबसे छोटी बेटी का अधिकार हो जाता है। यदि किसी महिला को कोई संतान नहीं हो तो उस मचोंग की किसी अन्य महिला को वह संपत्ति मिल जाती है। सबसे छोटी पुत्री को ‘नोकना’ कहते हैं जिसका अर्थ है उत्तराधिकारिणी। ‘नोकना’ की अनुमति के बिना उसकी बड़ी बहनें भी मकान में नहीं रह सकती हैं। बच्चों का गोत्र वही होता है जो माँ का गोत्र होता है। यदि माँ संगमा हो और पिता मोमीन हो तो बच्चों का गोत्र संगमा माना जाता है। जयंतिया समाज में गोत्र को ‘कुर’ कहा जाता है। ‘कुर’ समाज की लघुतम इकाई है। गोत्र कई उपगोत्रों में विभक्त है जिसे ‘कपोह’ कहा जाता है। एक गोत्र के सभी सदस्यों को एक ही माता (पूर्वज) की संतान माना जाता है। जयंतिया समुदाय में लगभग 38 गोत्र हैं। परिवार में पिता का कोई महत्वपूर्ण स्थान नहीं है। बच्चों का परिचय माता के नाम से दिया जाता है। विवाह के बाद पति अपनी पत्नी के साथ उसके घर में रहता है, फिर भी पति को आजीवन बाहरी व्यक्ति ही माना जाता है। पत्नी की सम्पति में पति का कोई अधिकार नहीं होता है। विवाहित पुत्र द्वारा अर्जित संपत्ति पर उसकी माता का अधिकार होता है, पत्नी का नहीं। इस समाज में माँ ही परिवार की मुखिया होती है, परिवार पर माँ का ही पूर्ण नियंत्रण होता है। वह परिवार की एकमात्र रक्षिका होती है। विवाह के बाद दामाद सम्पूर्ण रूप से अपनी पत्नी के माता–पिता के घर रहने के लिए नहीं आता है, बल्कि सूर्यास्त के उपरांत वह अपनी पत्नी के साथ रात व्यतीत करने के लिए आता है और प्रातःकाल में काम करने एवं खाने–पीने के लिए अपनी माँ के घर चला जाता है। मृत्यु के बाद भी उसकी अंत्येष्टि पत्नी के सगे–संबंधियों द्वारा नहीं की जाती, वरन उसके ‘कुर’ के सदस्यों द्वारा की जाती है। मेघालय की भूमि लोकसाहित्य की दृष्टि से अत्यंत उर्वर है। यहाँ के आदिवासी पर्वतशिखरों एवं सुदूर जंगलों में प्राकृतिक जीवन व्यतीत करते हैं जहाँ गीत गाते झरनों, बलखाती नदियों, वन्य–जीवों और नयनाभिराम पक्षियों का उन्मुक्त संसार है। यहाँ का जीवन सरल और स्वच्छंद है। यहाँ जीवन की आपाधापी नहीं, समय की व्यस्तता नहीं, कोई कोलाहल नहीं। यहाँ तनावरहित जीवन और न्यूनतम आवश्यकताएं हैं। इन परिस्थितियों में इनके उर्वर मस्तिष्क में कल्पना की ऊंची उड़ान उठती है। फलतः लोकगीतों, लोककथाओं, मिथकों, कहावतों, पहेलियों का सृजन होता है। मेघालय की पुरानी पीढ़ी को लोकसाहित्य का जीवंत भंडार गृह कहा जा सकता है। लोकसाहित्य वाचिक परंपरा में पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता है जो नई पीढ़ी के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम करता है।

वीरेन्द्र परमार: भारत सरकार के राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय में हिन्दी प्राध्यापक के रूप में हिन्दी शिक्षण योजना के केंद्रों पर प्राध्यापन। जल संसाधन मंत्रालय (भारत सरकार) के अधीनस्थ कार्यालय केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड, फरीदाबाद में उपनिदेशक (राजभाषा) के पद पर कार्य। राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय में उपनिदेशक (कार्यान्वयन) पद पर पूर्वोत्तर भारत के समाज, लोक परंपरा, लोकजीवन, लोकसाहित्य और आदिवासी जीवन के उपर विपुल लेखन। सम्प्रति असम विश्वविद्यालय, सिलचर में पदस्थ।