अर्णव के कुंडलिया छंद

१। जन्म मन से पूरे हों वचन, तब जीवन का सार।
जीवन के कुरुक्षेत्र में, संयम का आधार।।
संयम का आधार, करे इच्छा सब पूरी।
मन से मन का नेह, हटा देता सब दूरी।।
मर्यादा के राम, बने जाकर हैं वन से।
अच्छे हों जब कर्म, लोग अच्छे हों मन से।।
२। कैसे उदघाटित करें, दुख में सारे सत्य।
दिखें आचरण में सदा, मानव के सब कृत्य।।
मानव के सब कृत्य, रखें कोशिश को जारी।
समझ सकें यदि गूढ़, भक्ति की महिमा न्यारी।।
गीत रचे अब भक्ति, नित्य स्वागत में जैसे।
दिशा बदल दे क्रोध, सहज निश्छल मन कैसे।।

मंजरी के आल्हा छंद

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भारत माँ की तुम हो शान
सिसोदिया राजवंश के राजा, भारत माँ की तुम हो शान।
राणा सांगा के पोते तुम, उदय सिंह के पुत्र महान।
सकुशल योद्धा भारत के तुम, बहादुरी के परम मिसाल।
वीर महाराणा प्रताप तुम, जयवंताबाई के लाल। ।
वीर-पुत्र पाकर तुझ जैसा, धन्य-धन्य है राजस्थान।
सिसोदिया राजवंश के राजा…।
देशभक्त तुम, शौर्यवान तुम, मातृभक्त दृढ़, शिष्ट उदार।
थर-थर शत्रु काँप थे जाते, जब तुम भरते थे हुंकार। ।
तेज सूर्य का फीका पड़ता, उन्नत करते जब तुम माथ।
अंबर भी नीचे झुक जाता, देख तुझे सेना के साथ। ।
तुझसे गर्वित देश हमारा, गाए तेरा ही गुणगान।
सिसोदिया राजवंश के राजा…
मुगलों से टक्कर ली तुमने, कभी नहीं मानी यूँ हार।
किए प्रबल युद्ध वीरता से, चमका कर अपनी तलवार।
गद्दारों की कर दी तुमने, रण कौशल से खट्टे दाँत।
भारी भरकम सेना पे तुम, करते रहे निरंतर घात।
युद्ध किए हल्दीघाटी में, बरबस अपने सीना तान।
सिसोदिया राजवंश के राजा…
पराक्रमी घोड़ा था चेतक, जिसपर तुम करते थे नाज।
जिसकी एक छलांग की करते, चर्चा सारा जग है आज।
आवाज़ आज तक गूँज रही है, सुनो पहाड़ी के उस पार।
गौर करो कोई बोल रहा है, -नीला घोड़ा रा असवार।
‘खोड़ी इमली’ लहर-लहर कर, गाती चेतक का जयगान।
सिसोदिया राजवंश के राजा…
जन्म-दिवस के शुभ अवसर पर, श्रद्धा मन में लिए अकूत।
आज प्रतिज्ञा हम लेते हैं, हे भारत के वीर सपूत !
भारत माँ के आन-बान का, सदा रखेंगे हम सब ख्याल।
दुश्मन आँख उठाए तो हम, बन जाएँगे उसके काल।
पड़े जरूरत अगर देश को, दे देंगे इसपर हम जान। ।
सिसोदिया राजवंश के राजा…

मंजु के कह-मुकरी

गुरू

१। उसकी महिमा सबसे न्यारी,
गोविन्द भी जायें बलिहारी,
शीश नवा कर ध्यान करूँ।
क्या सखि राधा ? ना गुरू।
२। खुद जलता जग रौशन करता,
ग्यान का दीपक उसमें जलता,
उसकी वाणी से सुबह शुरू।
क्या सखि पिता ? ना गुरू।
३। शंकाओं का समाधान दे,
सद्मार्ग का आत्मग्यान दे,
हाँथ जोड़ वंदन करूँ।
क्या सखि माता ? ना गुरू।

कृष्ण

१। जी करता नैनन में भर लूं,
बंद पलक फिर कभी न खोलूं,
मैं अपना दिल उस पर हारी।
ऐ सखि साजन ? ना गिरधारी।
२। वस्त्र छुपा देता वो मेरे,
पैरों पड़ती तब वो छोड़े,
बड़ा वो चंचल है चितचोर।
ऐ सखि साजन ? ना रणछोर।

अमरनाथ के दुम दार दोहे

 Nischal Mudennavar from Pexels

बेटी

बेटी तन की गंध है,
मन की है सरताज
लेट पिता के पेट पर,
छेड़े मन के साज
वह तो घर की लाज। ।

उसकी इक मुस्कान पर,
मात पिता न्यौछार।
बनी पिता की लाड्ली,
माता करे दुलार।
पाती सबका प्यार। ।

कटि करधनिया बाँध कर
धरे रजत मुस्कान।
पग पैजनिया बाजती
भरे धरा में जान।
वह देवी की शान। ।

दुर्गा, लक्ष्मी वो बनी,
वही सृष्टि-आधार।
बेटी बिन तो यह जगत,
लगे नुकीला-ख़ार।
बेटी पर सब वार। ।

बेटों के बाप

दुनिया भर से श्रेष्ठ हम,
बेटों के हैं बाप।
इन मूँछों के बाल तक,
गिन न सकेंगे आप। ।
बेटा काला, चेचकी,
अनपढ़, मूर्ख, गँवार।
सुन्दर, शिक्षित वधु मिले,
संग विदेशी-कार। ।
काली, मोटी, भैंस सी,
बेटी है शहजोर।
रूप खुदा की देन है,
किसका चलता जोर?
खोटी बिटिया को मिले,
पति सीधा औ’ श्रेष्ठ।
शिक्षित, शक्ति, रूप सहित,
हो सेठों का सेठ। ।
शादी बिना दहेज हो,
मैं बेटी का बाप।
पर बेटा दस लाख से,
क्यों कम आँकें आप?
नंगे, लोभी, ठग बसें,
बेटी की ससुराल।
बसते वधु के मायके,
भिखमंगे, कंगाल। ।
बेटी मेरी बहुगुणी,
लेकिन बहू, निकृष्ट।
समधिन तो प्यारी लगे,
पत्नी लगती भ्रष्ट। ।
बेटी को दामाद जब,
सैर कराता नित्य।
बड़ा गुणीं आता नजर,
लगे सुहाना -दृश्य। ।
बेटा पत्नी साथ ले,
कभी घूमने जाय।
दोनों ही बे-शर्म हैं,
शर्म बेच ली, खाय। ।
बेटी को ससुराल में,
करना पड़े न काम।
बहू निकम्मी आ गयी,
जब देखो, आराम। ।
बेटा, पत्नी पीटता,
निभा रहा पतिधर्म।
बेटी को दामाद जब,
पीटे तो दुष्कर्म?
बच्चा बहू के न हुआ,
बाँझ बहू में दोष।
बेटी कभी न माँ बनी,
पति कैसे निर्दोष?
तुम बेटों के बाप बन,
गये धर्म सब भूल।
बेटी लगती फूल सी,
बहुएँ लगतीं शूल।
“अमर” धरा पर हों नहीं,
‘गर बेटी के बाप।
बेटे सब क्वारे रहें,
तब खुद सोचो, आप ।

अमरनाथ

Angels Unawares (III) Swami Vivekananda

One drunk with wine of wealth and power
And health to enjoy them both, whirled on
His maddening course, till the earth, he thought,
Was made for him, his pleasure-garden, and man,
The crawling worm, was made to find him sport,
Till the thousand lights of joy, with pleasure fed,
That flickered day and night before his eyes,
With constant change of colours, began to blur
His sight, and cloy his senses; till selfish One born with healthy frame — but not of will
That can resist emotions deep and strong,
Nor impulse throw, surcharged with potent strength —
And just the sort that pass as good and kind,
Beheld that he was safe, whilst others long
And vain did struggle ‘gainst the surging waves.
Till, morbid grown, his mind could see, like flies
That seek the putrid part, but what was bad.
Then Fortune smiled on him, and his foot slipped.
That ope’d his eyes for e’er, and made him find
That stones and trees ne’er break the law,
But stones and trees remain ; that man alone
Is blest with power to fight and conquer Fate,
Transcending bounds and laws.
From him his passive nature fell, and life appeared
As broad and new, and broader, newer grew,
Till light ahead began to break, and glimpse of That
Where Peace Eternal dwells—yet one can only reach
By wading through the sea of struggles—courage-giving, came.
Then looking back on all that made him kin
To stocks and stones, and on to what the world
Had shunned him for, his fall, he blessed the fall,
And with a joyful heart, declared it —
“Blessed Sin!”

U Riew Bneng Ha Ka Jingkyndit (III)
-La pynkylla khasi da I Bah P S Lyngdoh

La kha ïa u briew ha ka dur ba lymphuin – hynrei ym ha ka mon
Ba lah ban ialeh pyrshah ïa ki jingsngew ba tasam,
Lymne pynkhih jingmut da ka dor barem lem bad ka jingkhlain bor
Bad tang kum kaba dei ban iaid kat kumba dei ban long.
Ha khmih u lah lait, katba kiwei ki kwah
Bad ka jingialeh ba lehnohei pyrshah ïa jingatphyllunng ki lat lat.
Haduh ba lah kiew ka jingpang, ba lah ban iohi ha ka jingpyrkhat jong u, kum ki skain.
Kiba wad ïa ka bynta ba pyut, pat de te kaei kaba sniew.
Te ka Kupar ka la rkhie ïa u, bad ka kjat jong u ka la btuit,
Ba la pynpeit ïa ki khmat jong u junom, bad la pynlong ïa u ban lap
Ba ki maw bad ki dieng kim ju pynkhein ain
Hynrei ki maw bad ki dieng ki neh tang u briew marwei
Ba la kyrkhu lem bad ka bor ban ialeh bad synshar la ka kupar
Ki kyndon bad ki ain ba ha khlieh tam.
Na u ki jingpynlong ka mariang ki wan jia long, bad ka jingim ka la mih-paw
Kaba khraw bad khie lung, bad ka la san kham khraw kham khie lung shuh shuh
Tad haduh jingshai ka khmat ka la sdang saphriang, bad ka jingiohi byrngut-byrnget ïa Uta
Hangno ba Jingsuk ka Shongneh junom – ba u briew u lah tang ban shu poi
Daba iaid kan-kan lyngba ka duriaw ka jingialeh – la wan ka jingpynshlur.
Te daba phai dien ïa baroh la pynkam jingiadei ïa u
Ban pynshitom bein, bad kumta ter ter ïa kaei ba ka pyrthei
Ba lah isih tasam ïa u, ha ka jinghap shop jong u, u la kyrkhu ïa ka jingwan jia long
Bad da ka mynsiem kaba kmen, la pynbna ïa ka
“Ko pap ba la pynkyntang.”

भागते गए

जीत- जीत
कर भी हम
हारते गए।
बार- बार
खुद को ही
संवारते गए।
कथन,
रेशमी सभी
चुभन से भरे।
जो भी मिले
हाथ पर ही
हाथ थे धरे।
खींचतान
में ही दिन
गुजारते गए।
मौन रहे
फिर भी
प्रश्नचिह्न थे लगे।
पहचानना
हुआ कठिन कि
कौन हैं सगे?
अपने,
हर मोड़ पर
नकारते गए।
लोग मिले
दूरियों से
समझ न सका।
फूंक- फूंक
रखे कदम
हर कदम थका।
ज़िन्दगी में
बेवजह ही
भागते गए।

जानो इन्सान को…

उन लोगों को मैं
चुनौती देता हूं
जो कहते हैं कि
वे ईश्वर तक हमें पहुंचा सकते हैं.
अरे! पहले इंसानियत को तो पूजो फिर बात करो ईश्वर की।
इंसान ही इंसान को भूलने के लिए कहता है।
आओ मूल जड़ों की ओर
मूल क्या है ?
मूल वह धारा है
जो पृथ्वी को माता मानती है।
मूल वह है जो कहता है –
“नर सेवा नारायण सेवा”
Tip briew, tip blei
अर्थात इंसान को जानो
फिर ईश्वर को जानो।
क्यो हो गई है
इस अंधेरे में रहने की आदत?
ईश्वर है लेकिन उस तक पहुंचने के लिए,
किसी मंदिर मस्जिद गिरजाघर की जरूरत नहीं,
मानवता में ही ईश्वर उत्पन्न होता है लौट जाओ अपने मूल की ओर।

केतली

विशाल के सी

जलती हुई अंगारो की भट्टी पर
एक सहमी हुई
खौलती केतली
चुप-चाप से बैठी थी
सुबह से लेकर शाम तक
वह भट्टी पर जरूरत मंद लोगो
के लिए तपी रहती
खुद को बर्दाश्त कर के
मैं हर रोज देखता था
उसके अंदर का चमत्कार
कभी उस में पानी का
उबाल होता
तो कभी चाय, आलू
कभी कुछ तो कभी कुछ
मगर भट्टी पर ही अढी़ रहती
शाम को जब भट्टी सो जाता थी
उसे ढककर अगली सुबह के लिए
वह अपने घर को जाता था
पर कोने के उस तरफ़ विवश केतली
अपने दर्द के साथ
पड़ी रहती थी
ना मालिक ने
उससे पूछा
उसका हाल
ना आग के तपिश ने
ना उन हाथों ने
जो हर सुबह
उसे भट्टी पर रखने आते थे
फिर एक दिन विवश केतली
भट्टी के ताप पर ही फट गई
और भट्टी का वजूद
पल में ही धराशायी
हो गया
घमंडी अंगारे भी
पल में
शान्त हो गए
एक ऐसी केतली
आज हर एक उस
घर पर सजती है
शायद उसे हम जानते हैं
जो रोज किसी एक
भट्टी पर तपती है।
रोक लो उन हाथों को
जो यह सेज सजाती हैं
बुझादो उस भट्टी के अंगार को
ना फट सके फिर
कोई विवश केतली

Wah Myntdu … Ha Chnong Jowai

Dangngir Kjat sngi ia pha wandoh.
Sawdong ia pha mariang iaroh
Darong byrtem ia pha wanjngoh
Ha ki tharia ki krem ki kroh
Ki lyngkha kba jyrngamsawdong.
Harud jong pha ki juh ki shong.
Tiew laluthin ‘Tiew saw ki ong
Ngin phuh harud da sngewsarong.
Ki maw ramsong kiba itynnad
Lyer batemon ba beh pyngngad
Jyrmi dieng kseh pynnoh ki tnad
Syrngiew ha thwei rupa ki shad.
Na khlieh langsha pha noh sngewbha
Ki sim ki doh baroh pynbud ia pha Sohlang harud ki saw-ih bha
Sha thwei ki hap kaweh sngewbha.
Ynda la poi ha syntu ksiar
Ki kynud sur ki wah ki liar
Ki sher syngkai ki jngi diar-diar
Ki nong tong jar ki kiew ki hiar
Don ki jaka pha leh kmen lang
Ba wan khwai doh kynthei shynrang Ngan tuid shano batai ngam nang
Chnong jowai ban ieh mynsiem ka pang.

U Riew Bneng Ha Ka Jingkyndit (II)

U briew ba la pyn-buaid da ka kiad jong ka spah bad ka bor,
Ban lehkmen ia ki baroh ar, ha ka koit ka khiah, ba pynking stet
Ka jingiabeh ba pynlamwir jong u, tad haduh ba ka pyrthei u la pyrkhat,
La pynlong ka kper–jingsngewbha jong u, bad u briew,
Kum u wieh ba par, la pynlong ia u ban ioh ialehkai,
Tad haduh ki hajar ki jingthaba jong ka jingkmen, ba la pynkdang da ka jingsngewbha,
Kaba thap la ki thapniang sngi la bad miet ha khmat ki khmat jong u,
Da kaba iai pynkylla rong, bad ba la sdang pynjakhlia
Ka jing-iohi jong u, bad kaba pynthiang ia ka jingmut jong u, haduh ka jingbishni
Kum ka jingsan ka bor, ba lah saphriang kylleng ha dohnud jong u
Bad ka jingsngewbha ka la mut ha u ba ym don ei ei shuh ban ia ka jingsnai
Ba la knieh noh ia ka jingsngew, bad ha ka jingmut jong ka jingim
Ba pynkmen katta katta, shisien ba la niewkor, ka
dohpyut u briew ba la iap ha ki ksangkti jong u,
Kaba ha kaba shisha-shisha un kyntait, hynrei katba u pyrshang shi pyrshang
Ka la snoh rdin ha u, bad ka da kwah da la ka bor pyrkhat ba la khie bhang,
Ha ki hajar ki dur jong ka jingiap, hynrei kaba kynran kynsan shuwa ban shah pynshoh bieit,
Te wan ka jingsngewsih– bad ka Spah, ka Bor ka jah noh.
Bad la pynlong ia u ban shem ia kiba don jingiadei lem bad ki jaitbynriew baroh,
Ha ka jing-isih bad jingjaw-ummat, bad watla ki lok jong u ki rkhie,
Ki rymmiang shyntur jong u ki kren iaroh jam
— ‘Ko Jingkordit Bakhuid!’


Angels Unawares (II)

Swami Vivekananda

One drunk with wine of wealth and power
And health to enjoy them both, whirled on
His maddening course, till the earth, he thought,
Was made for him, his pleasure-garden, and man,
The crawling worm, was made to find him sport,
Till the thousand lights of joy, with pleasure fed,
That flickered day and night before his eyes,
With constant change of colours, began to blur
His sight, and cloy his senses; till selfishness,
Like a horny growth, had spread all o’er his heart;
And pleasure meant to him no more than pain,
Bereft of feeling; and life in the sense,
So joyful, precious once, a rotting corpse between his arms,
Which he forsooth would shun, but more he tried, the more
It clung to him; and wished, with frenzied brain,
A thousand forms of death, but quailed before the charm,
Then sorrow came — and Wealth and Power went —
And made him kinship find with all the human race
In groans and tears, and though his friends would laugh,
His lips would speak in grateful accents —
‘O Blessed Misery!’