Sensitive graces!

the sound of footsteps,
which curl up my toes
the distant worlds,
that make fresh tears roll

when each and every well in this form
becomes deserted,
drier than the autumn leaves but wailing,
 retching, howling with the wind
cannot long for a summer shower
so i beg for a typhoon.

it may completely rip me out but then i can
grip this truth for a little longer
tick and tok

with winter i have the typhoon i begged for,
breath of relief and a some more hope
i like the storm and how better it feels like home
even when all this time long I’ve been living on the shore

Mandavi Sharma


            

लोहा बन गया हूँ मैं और पाँव ये नींव हो गए

लोहा बन गया हूँ मैं
सरल मार्गों का
अनुसरण कब किया मैंने
खाई-खन्दक से भरी जमीन पर
योद्धा बन कर गुजरा हूँ मैं
धूप में तपकर
अनगिनत रूपों में ढला हूँ मैं
वक्त ने सौंपे जो भी काम
हॅंसते हुए पूरा किया उन्हें
कभी थका नहीं
पहाड़ों पर चढ़ते हुए
लोहा बन गया हूँ मैं
आघात झेलते-झेलते

अब पाँव हमारे दुखते नहीं
ये खड़े-खड़े, अच्छे दिनों के इंतजार में
बाँस हो गए हैं
धीरे-धीरे सीढ़ी हो गए
घबराहट नहीं होती
जब कोई इन पर चढ़कर ऊपर जाता है
अपनी ध्वजा फहराता है
हम देखते रहते हैं
नहीं दुखते सचमुच हमारे पाँव
अब ये नींव हो गए हैं

नरेश अग्रवाल झारखंड के निवासी हैं और कवि और कविताओं की दुनिया में एक सुपरिचित नाम है, इनकी कविताओं के काई किताबें प्रकाशित हुई हैं

ग़ज़ल

कहां पहुंचेगा वो कहना ज़रा मुश्किल सा लगता है
मगर उसका सफ़र देखो तो खुद मंज़िल सा लगता है

कभी बाबू कभी अफ़सर कभी थाने कभी कोरट
वो मुफ़लिस रोज़ सरकारी किसी फ़ाइल सा लगता है

न पंछी को दिये दाने न पौधों को दिया पानी
वो ज़िन्दा है नहीं बाहर से ज़िन्दादिल सा लगता है

वो बस अपनी ही कहता है किसी की कुछ नहीं सुनता
वो बहसों में कभी जाहिल कभी बुज़दिल सा लगता है

नहीं सुन पाओगे तुम भी ख़मोशी शोर में उसकी
उसे तनहाई में सुनना भरी महफ़िल सा लगता है

बुझा भी है वो बिखरा भी कई टुकड़ों में तनहा भी
वो सूरत से किसी आशिक़ के टूटे दिल सा लगता है

वो सपना सा है साया सा वो मुझमें मोह माया सा
वो इक दिन छूट जाना है अभी हासिल सा लगता है

ये लगता है उस इक पल में कि मैं और तू नहीं हैं दो
वो पल जिसमें मुझे माज़ी ही मुस्तक़बिल सा लगता है

उसे तुम ग़ौर से देखोगे तो दिलशाद समझोगे
वो कहने को है इक शायर मगर नॉविल सा लगता है.

भवेश दिलशाद उर्दू शायरी और हिंदी शायरी की दुनिया में एक जाना पहचाना नाम हैं। वह मध्य प्रदेश के शिवपुरी निवासी हैं। उनकी ‘नील’, ‘सुर्ख’ और ‘सियाही’ जैसी किताबों की काफी मांग है।

निहाल

जब-जब मनवा हो दुखी,
नैन बहे जलधार।
पलक भीग कर सो गई,
कुंठित पुतली खार॥

दोनो नैना सोचते,
क्या है अपना दोष?
क्यूँ हम दोनों रो रहे,
हम बिल्कुल निर्दोष॥

सुन उनके आक्रोश को,
द्रवित नासिका द्वार।
गंगा-जमुना बह रही,
हम भी हैं लाचार॥

दिल था जो आहत हुआ,
सहन नासिका नैन।
किस विधि करूँ निहाल[1] मैं,
सोचूँ मैं दिन रैन॥

किया कर्ण से मशविरा,
नहीं सूझती राह।
कर देना तुम अनसुनी,
देना सबको चाह॥

जिह्वा पर कटुता कभी,
कभी स्नेह उद्गार।
जो मधु भाषी तुम बनो,
हो निहाल संसार॥

नैना रोएँगे नहीं,
नाक रहे खुशहाल।
सुने कर्ण संगीतियाँ,
मन सौंदर्य निहाल

मधु खरे वर्जिनिया में लॉजिस्टिक विशेशज्ञ के रूप में कार्यरत थी। भारत के लखनउ के पूर्वनिवासी मधु जी की  काव्य सुमन, 2022, My Memoirs,, 2022, प्रियंवद (काव्य संग्रह), 2022, जैसी एकल पुस्तक प्रकाशित हुई है। कई काव्य गोष्ठी के सदाशय होने का साथ-साथ इन्हें काव्य पाठ और संचालन में भी रुचि है।


[1] प्रफुल्ल, प्रसन्न

मौसम के नाम

मौसम के नाम लिखा
ख़त एक अनाम ने,
बेच रही पुरवाई
हर घर के सामने.
कजरारे मेघ तेरे
यहाँ-वहाँ बरसे,
चातक की प्यास के लिए
होथ यहाँ तरसे,
रात भर जगी सुबह
शबनम की आस
शबनम की आस मुझमें
छीन लिया जिसे कोई मदमाती शाम ने

रातों ने फैलाई जब
लंबी बातें,
भोर तलक तड़प उठी भर ठंडी आहें,
चादर से बाहर जब
कुहरे का पाँव हुआ,
टैब छिड़का चुटकी भर
धूप दिनमान ने

‘बौराये’ आमों के बौर-बौर महके,
‘रसमातल’ गन्ने कि पोर-पोर दहके,
कनफुसिया करे मटर
चना भरे आह रे,
लगता है छोड़ दिया एक तीर काम ने!

जल जाए धरती का
हरा -भरा अँचरा ,
तब भी पसीजे ना
निर्मोही बदरा
कोयल पपीहे भी
मौन हुए खौफ से,
लगता है दे डाला
फतवा इमाम ने!

ओम प्रकाश धीरज नवभारत टाइम्स में सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत हैं। इन्हें ऑटोमोबाइल, टेक्नॉलजी, एंटरटेनमेंट, एजुकेशन, सोशल, पॉलिटिक्स और इंटरनैशनल अफेयर्स जैसे टॉपिक्स पर लिखने का अनुभव है। फ्री टाइम में फोटोग्राफी और ट्रैवलिंग के साथ ही नेचर एक्सप्लोर करना पसंद है

Ka Sngi Ba Khraw Jong Ki Kynthei

Ka snem 1975  ka dei ka sngi kyrpang
Kynthei da sngew sarong mynjur lang
Kyndit  18  tarik dei bnai December 1972  
Ka sngi ki kynthei ha pyrthei bishar.

Jingthmu ka dei pynroi imlang sahlang,
Baroh kynthei iai synroplang
Ymdon jingeh lada ai kti lang
Da sngew sarong kynthei kin iaid shaphrang.

Ban pdiang ithuh bad ban pynroi,
Haba bun ki lad ioh jingmyntoi
Ki don ka bor pyrkhat ba biang
Mynsiem jynsur khlem noh shiliang.

Kynthei ki kam pynroi ban myntoi
Ka pdiang da tip kumno ban roi
Ki kam naduh ha iing haduh habar
Thik thik pyniaid biang biang bishar.

Kynthei ka dei nonglum nonglang
Ba peit ha iing kñi synroplang
Dustur ba buh da u longshwa
Thik thik pyniaid khlem bakla.

Naduh habar ha iing peit phikir
Kam klet kamram naduh dangngir
Kumno hikai ki khun ki kti
Ka pynwandur miet bad sngi.

Kumba ka por ka iai kylla
Ka tip ban bud nuksa mynshwa
Kum ka longkmie pyrkhat miet sngi
Kumno ban sneng ki khun ki kti.

Ban pdiang ithuh ia jingmyntoi
Ka da tip lut ki kam pynroi
Kum ki rangbah kyrdan ki poi
Ryngkat ki kam ban trei myntoi.

Kynthei iohlad thoh bad pule
Kyrdan bapher ki don kine
Lang bad rangbah synroplang
Baroh iohlad ban iaid shaphrang.

Ha iing ka sneng ki khun ki kti
To iai minot khun miet bad sngi
Ka por la dei ban nang ban stad
Jingstad la don sa wad ki lad.

Ha iing ka ai nuksa ba dei ba bha
Kumno ki khun kin burom ia u kpa
Ban phuh ban phieng ka ai mynsiem
Akor babha burom ka iing.

 Kong Silbi Passah

Sundori

Beloved Sundori
Yesterday one of my people
Killed one of your people
And one of your people
Killed one of my people.
Today they have both sworn
To kill on sight.
But this is neither you nor I
Shall we meet by the Umkhrah River
And empty this madness
Into its angry summer floods?
I send this message
Through a fearful night breeze
Please leave your window open.

Sundori

Sundori bathiang,
Hynnin ka sngi uwei na ki para jait jong nga
U la pynïap ïa uwei na ki para jait jong phi
Bad uwei na ki para jait jong phi
U la pynïap ïa uwei na ki para jait jong nga.
Mynta baroh ar ki la ïa byrngem
Ban ïa pynïap tang mar shu ïashem.
Hynrei kine kim dei ma nga ne ma phi,
Hato ngin ïakynduh harud ka Umkhrah
Ban bret ïa kane ka lamwir
Sha ki lat lat lyiur jong ka wah?
Lyngba ka lyer miet rit mynsiem
Nga phah ïa kane ka pathai,
Sngewbha wat khang ïa la ka pongshai.

Dr Kynpham Sing Nongkynrih, poet, writer, and translator, and writes in both Khasi and English. Nongkynrih works as Reader in the Department of English, North-Eastern Hill University (NEHU), Shillong. He ws awarded a ‘Fellowship for Outstanding Artists 2000’ by the Government of India. He also received the first North-East Poetry Award in 2004 from the North-East India Poetry Council, Tripura.

श्री राम वन्दना

श्री रामचन्द्र दया निधान,
दयालु हे! जगदीश्वरम्।
तम तोम तारक सुर सुधारक,
सौम्य हे! सर्वेश्वरम्।
मन मणि खचित रवि निकर
सम, छविधाम आप जगत्पते।
सौन्दर्य की उस राशि के
आधार हों सीतापते!
लखि रूप मोहित देव सब
ब्रम्हा, उमा-महेश्वरम्।
श्री रामचन्द्र दया निधान,
दयालु हे! जगदीश्वरम्।
शत् काम लज्जित राम तव
आनन निहारि निहारि के।
सँग नारि सीता रूप छवि,
नव कलित रूप निवारि के।
अस सुयश गावहिं जगत के
सब मनुज हे! अखिलेश्वरम्।
श्री रामचन्द्र दया निधान,
दयालु हे! जगदीश्वरम्

राजेश तिवारी “विरल”

Rush Hours

There’s no cadence in morning rush hours
The frustration from the brevity of time
As anger burst like atomic bombs
and words splattered
like spilt tea on a white sheet;
Even self consciousness
becomes unconcious
as it swallowed benevolence
as it unchewed conversations
and devoured the serene day.
This wild madness
In morning rush hours
Ceased to numbness
as we rush in through the day-
May be the ritual of our madness
Pays salary to the oblivion
and owes debt to morning rush hours.
This wild madness
In morning rush hours

Rangkitbok C Dikrud

Showers from the lord

Our Heavenly lord, the Creator.
Touching everyone with the down pouring.
The welcoming of Dawn with the drizzling coupled with fog and thunderstorm.
The slight sprinkles on the face having imagined.
laying on bed, waking up from this dream
the showers from the lord in reality, fills one with Divine grace.
Announcement of morning with the light rain.
Starting out with daylight occupied with showers,
escaping the walls of the room.
The warmth of the sun is not what the heart desires
but dampening the fires of anger, jealousy and frustrations in this joyous showers.
Rain filled wind blends with the soul.
Making one complete and whole.
With the coming of noon, rain comes with force.
But the sense of peace and happiness remains intact, in spite of the heavy violent pour.
The evening comes with a steady shower
and the mumbles of denizens offering prayers.
Rain drops at night lulls watchers to sleep
where the soul is bonded with a feeling of a new tomorrow
and more positivity as well as goodness to borrow.
Erasing the misery and sorrows are the Showers from the lord.

Surmita