शिलांग के ‘खुबलेई’ से प्रॉव्हिडन्स के ‘हैलो’ तक

अक्टूबर १९९९ में, मुझे रामकृष्ण मिशन के मुख्यालय से एक आदेश मिला:

“अमेरिका के पूर्वी तट पर प्रॉव्हिडन्स नाम के छोटे से नगर में रामकृष्ण संघ का एक पुराना आश्रम है- ‘वेदान्त सोसायटी ऑफ प्रॉव्हिडन्स’। वहाँ कई दशकों से कार्यभार सम्हाल रहे पूजनीय स्वामी सर्वगतानन्दजी अब ८८ साल के हैं और पिछले ३-५ वर्षों से अनुरोध कर रहे कि अब उनके स्थान पर अन्य किसी को कार्यभार सौंपा जाए। इसके लिए मुख्यालय ने आपको चुना हैI”

 उन्होंने कई संन्यासियों के नाम सुझाए थे, जिन में मेरा नाम भी था। चूँकि मेरी कभी उनके साथ मुलाकात नहीं हुई थी, यह स्पष्ट था कि किसी से मेरे बारे में सुनकर उन्होंने मेरा नाम उस सुझाव-सूची में रखा था। (यदि मेरे साथ प्रत्यक्ष परिचय होता तो वे ऐसी गलती कभी नहीं करते)। उन दिनो परम पूजनीय स्वामी रंगनाथानन्दजी रामकृष्ण संघ के परमाध्यक्ष थे। चूँकि मैने शायद ही कभी अंग्रेजी में व्याख्यान दिए थे, मेरे मन में वहाँ जाने में कुछ दुविधा थी। उन्होंने मुझे उत्साह देते हुए कहा कि ‘वह बड़ा अच्छा स्थान है और जब Providence (सबका भरण-पोषण करने वाले परमात्मा) तुम्हें बुला रहा है, तो तुम ‘ना’ कैसे कह सकते हो?’

सन २००० के मार्च में मेरी शिलांग से छुट्टी हुई। तभी मेरे शिलांग में चार वर्ष पूर्ण हो गये थे। १९९९ के नवम्बर में मेरा पासपोर्ट भी बन गया था। वीजा पाने का प्रयास जारी था। उसमें बहुत समय लग गया। करीब १५ महीने मैं भारत के कई आश्रमों और तीर्थस्थानों- में भ्रमण करता रहा। सन २००१ के मई महीने में वीजा मिल गया और फिर ठीक ३१ मई को मैं मुम्बई से इंग्लैण्ड, हॉलैंड, जर्मनी, फ्रान्स, स्वित्झर्लण्ड में प्रवास करते हुए अमेरिका पहुँच गया। इसको इत्तेफ़ाक़ कहूँ कि – स्वामी विवेकानन्द भी ३१ मई को मुंबई से अमेरिका के लिए चल दिए थे। वह २१ जून की प्रभात थी। प्रात:काल के  १ बजे (1 am) में बोस्टन के वेदान्त सोसायटी में पहुँच गया। सर्वगतानन्दजी मेरा इन्तजार कर रहे थे। श्रीरामकृष्ण के अंतरंग पार्षद स्वामी अखण्डानंदजी के वे शिष्य थे। १९५४ से वे बोस्टन और प्रॉव्हिडंस के बेदान्त सोसायटी का कार्यभार सम्हाल रहे थे। इस महापुरुष के सम्बन्ध में बहुत कुछ शिक्षाप्रद बातें क्रमशः समझ में आयी; उसकी चर्चा बाद में कभी करूँगा। करीब दो बजे सो गया; कमरा काफी गरम था पर प्रायः पुलिस या फायर ब्रिगेड, ट्रक्स बड़े ज़ोर से कर्णकर्कश ध्वनी करते हुए पास के बड़े रास्ते से गुज़र रहे थे। इस के कारण मैं बिल्कुल सो नहीं पाया। दिन निकलने पर ध्यान -जप आदि के बाद नास्ता करने गया। वहाँ सैंटा बार्बरा कॉन्व्हेन्ट से आयी प्रव्राजिका ब्रह्मप्राणा (इन दिनो वे  वेदान्त सेंटर ऑफ नॉर्दन टेक्सास का कार्यभार सम्हालती हैं) से मेरी भेंट हुई। वे चंद दिनों के लिए बोस्टन में आई थीं और वहाँ स्वामी विवेकानन्द से सम्बंधित स्थान देखना चाहती थीं। उनके साथ मेरी भी यह तीर्थयात्रा हुई। एक भक्त – जोसेफ (संक्षेप में ‘जो’) ड्वायर – जो कुछ घण्टों पहले मुझे एयरपोर्ट से बोस्टन बेदान्त सोसायटी ले आए थे, वे ही अब हमें उन स्थानों पर गाड़ी से ले जाने वाले थे। वे एक बड़े ही अच्छे गायक और संगीतज्ञ थे। क्रमशः उनसे अधिक घनिष्ठ परिचय हुआ। हम दोपहर के २ बजे के बाद वहाँ से मिकले।

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अमेरिका के सम्बन्ध में कितनी ही बातें कई विषयों पर सुनता आया था। भारत के लोगों में यह धारणा कई दशकों से जड़े जमाकर बैठी है कि इस देश में सर्वत्र विलासिता है, गरीबी का बिल्कुल नामो निशान तक भी नहीं। कुछ दिनों में ही समझ में आया कि विलासिता,  अमीरी होने के बावजूद, यहाँ पर भी अधिकांश लोगों को गरीबी से जूझना पड़ता है। अमरीकी समाज का स्त्री-पुरुषों के परस्पर सम्बन्धों के विषय में भी बिलकुल अलग नज़रिया है। यह भी सुनता आया था, मध्यमवर्गीय सुशिक्षित  हिन्दू समाज के नज़रिये से यह भिन्न होने के बावजूद भी इन में नैतिकता कम हो ऐसी कोइ बात नहीं। और सुना था – यहाँ वेदान्त / हिन्दू  दर्शन और स्वाभी विवेकानन्द के प्रभाव के विषय में। कई लोगों की राय है कि यह प्रभाव बड़ा ही विस्तारित है और गहरा भी। अन्य लोगों का कहना था कि प्रभाव कोई बड़ा नहीं है; सामान्य अमरीकी लोगों ने न वेदान्त का नाम सुना है, न ही श्रीरामकृष्ण- विवेकानन्द का।

जो भी हो, हम लोग इन स्थानों के दर्शन हेतु निकल पड़े। सर्वप्रथम गए विश्वविख्यात हार्वर्ड विश्वविद्यालय। वहाँ विवेकानन्दजी ने जिस हॉल पर व्याख्यान दिया था उसे देखा। ३३ वर्ष बाद उस कमरे में एक साइन बोर्ड लगाया गया, जिसमे विवेकानन्दजी के वहाँ व्याख्यान के बारे में लिखा है। उस दिन हम लौट आये।

दूसरे दिन हमलोग वाल्डन पॉन्ड देखने गये। नयनरम्य वनराजी से घिरा यह अति मनोरम सरोवर है; किन्तु यहाँ हमारे जाने का उद्देश्य अलग था। यह स्थान  हेन्री डेविड थोरो से सम्बन्धित है। थोरो भारतीय औपनिषद दर्शन से बहुत प्रभावित हुए थे। उन्नीस वी  शताब्दी के मध्योत्तर में अमरीका के उत्तर-पूर्व भाग में Transcendentalist Movement नाम से एक दार्शनिक संप्रदाय शुरू हुआ था। Transcendentalist का तात्पर्य है कि सतही तौर पर जो भासमान होता है उसके परे जो नित्य तत्व है उसे पकड़ना। राल्फ वाल्डो इमर्सन, मार्गरेट फुबर, अमोस ब्रॉनसन अल्कोट्, थॉरो इ. कई विख्यात कवि और दार्शनिक इस सम्प्रदाय के अग्रणी थे। विवेकानन्द जी ने जो वेदान्त के बीज बोए उसके लिए जमीन तैयार करने का काम इन ट्रान्सेंडेटालिस्ट लोगों ने किया। कई दशकों पहले थॉरो (हेनरी डेविड थॉरो) का नाम पढ़ा था। इस स्थान में उन्होंने अपने निवास हेतु एक छोटा सा लकड़ी का कमरा बनवाया था। उस कमरे को बाहर से और भीतर से देखकर विशेष आनन्द हुआ।

रविवार के दिन सुबह बोस्टन आश्रम में एक विद्वान भक्त का सुंदर प्रवचन हुआ। पू. सर्वगतानन्दजी के लिए इसे उनके कमरे से ही सुनने की व्यवस्था की गई थी, उन्होंने मुझे भी वहीं से सुनने के लिए कहा। इस रविवार के व्याख्यान कार्यक्रम को यहाँ Sunday Service कहा जाता है। इस के उपरान्त Soup lunch (सूप भोजन) हुआ और फिर हम सब एक गाड़ी में सवार होकर प्रॉव्हिडन्स शहर के लिए निकल पड़े। और करीबन सवा घण्टे में प्रॉव्हिडंस पहुँच गए।

इस रविवार को बोस्टन और प्रॉव्हिडन्स में कितने ही भक्तों के साथ परिचय हुआ। इन में कुछ भारतीय मूल के थे, परन्तु बहुत से अमेरिकन मूल के थे। यहाँ आने के पहले भी मैंने ऐसे भक्तों को श्रीरामकृष्ण, माँ सारदा, स्वामी विवेकानन्द और वेदान्त के प्रति लगाव होने की बहुत कहानियाँ सुनी थी। आज उसका प्रत्यक्ष अनुभव पाकर विशेष आनंद हुआ। इनमें से प्रायः सभी ने श्रीरामकृष्ण माँ सारदा – विवेकानन्द और वेदान्त का अच्छा अध्ययन किया था। इसलिए उनकी भक्ति केवल एक परंपरा- पालन या धर्म का औपचारिक आचरण न होकर मूल आध्यात्मिक जीवन का प्रामाणिक प्रकाश था।

यहाँ के रीतिरिवाज, मिलने-जुलने-खान-पान इत्यादि नियम (Manners etiquettes) सीखना मेरे लिए एक प्राथमिकता थी। सभी भक्त आनन्दपूर्वक मेरी गलतियों को प्रेम और विनम्रता से सुधार देते थे। इन्हीं दिनों स्वामी विवेकानन्द जी से सम्बन्धित स्थानों के दर्शन का अनायास सुअवसर प्राप्त हुआ। इन में सारा बुल का निवासस्थान (जहाँ विवेकानन्दजी कई दिनों तक रहे और स्वामी अभेदानन्द, सारदानन्द जैसे उनके गुरु बन्धुओंका भी यहाँ वास हुआ। बाद में सारा बुल ने परमानन्दजी को बोस्टन में वेदान्त का केंद्र प्रारंभ करने हेतु इस भवन में आमंत्रित किया।), एनीस्क्वाम (Annisquam) – जहाँ विवेकानन्दजी का प्रथम व्याख्यान हुआ और जहाँ से उन्हें शिकागो के धर्मसभा में सहभागी होने के लिए आवश्यक प्रशस्ति पत्र प्राप्त हुआ, सेलेम (Salem), जहाँ स्वामीजी कुछ दिन रुक थे और कुछ व्याख्यान भी दिए – इत्यादि स्थानों का समावेश था। विवेकानन्द- चरित्र में मैंने इन सब स्थानों के सम्बन्ध में पढ़ा था। किन्तु इन स्थानों को मैं अपनी आखों से कभी देख सकूँगा ऐसा स्वप्न में भी कभी नहीं सोचा था। इन के दर्शन-स्पर्शन से शरीर-मन बिलकुल रोमांचित हो गया।

इन्हीं दिनों एक विशेष ग्रंथ पढ़ने को मिला और उसके रचयिताओं से प्रत्यक्ष परिचय भी हुआ। भारत में रहते समय इस ग्रंथ को देखा तो था, किन्तु पढ़ा नहीं था। ग्रंथ का नाम था, ‘The Gift unopened’ (नहीं खुला उपहार) लेखिका का नाम एलेनोर स्टार्क। इनसे और इनके पति से इन दिनों मुलाकात हुई। दोनों उमर में पचहत्तर पार कर गए थे, किन्तु मुखमण्डल पर एक आध्यात्मिक आनंद और शान्ति छायी हुई थी।

इस ग्रंथ में यह दिखाया गया था कि विवेकानन्द ने अमेरिका के लिए जो अति मूल्यवान तोहफा दिया है, उसे अव तक पूर्णरूप से खोला नहीं गया है। इस ग्रंथ से एक उद्धरण देकर इस लेख का समापन कर रहा हूँ। यदि भगवान की इच्छा हो तो यहाँ के कुछ और उद्बोधक संमरण अगली किस्त में लिखुंगा ।

लेखिका एलेनोर स्टार्क, स्वामीजी के अमेरिका में आगमन को ‘अमेरिका की चतुर्थ क्रांती’ कहती हैं ।

“America has passed through three great revolutions: the first was a struggle  for independence as a new nation from the tyranny of unheeding power; the second was a civil war, an internal revolution… the third was an industrial revolution, which freed men & women from heavy labor and opened world- markets, but which did not bring about corresponding advances in the consciousness of man….

“This book proposes to tell of an advent on the American scene of a voice from the East, which in a few short years sowed the seeds of a regeneration of a great people. At the turn of the century an unheralded and quiet revolution took place across the land. A message, a gift was given to the American people in words of such universal wisdom and power that those who heard them at the time found their lives changed and their spirits freed…”  Intro. (xix)

यहाँ पिछले बाइस वर्षों से इस गंभीर सत्य का साक्षात अनुभव कर रहा हूँ।

स्वामी योगात्मानन्द वेदान्त सोसाइटी आफ प्रोविडेन्स के मंत्री एवं अध्यक्ष हैं। ये 1976 में रामकृ ष्ण मिशन में शामिल हुए और 1986 में सं न्यास की दीक्षा ली। 20 वर्ष तक रामकृ ष्ण मिशन नागपुर, में कार्य करने के उपरांत रामकृ ष्ण मिशन शिलांग मेघालय, के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे।

अरुणाचल प्रदेश की ज्ञान-संस्कृति और संकटग्रस्त भाषाएँ

अरुणाचल प्रदेश के एक वयोवृद्ध गाँवबुढ़ा से बातचीत हुई और उनके चिंतित स्वर ने हमें झकझोर दिया था। आदी जनजाति के इस जानकार आदमी ने अरुणाचली ज्ञान का समाजशास्त्र और अरुणाचली समाज का ज्ञानशास्त्र समझने हेतु आग्रह किया और उनके महत्त्व को जानने पर बल दिया था। मैं अपनी आईसीएसएसआर-इम्प्रेस टीम के साथ था। अरुणाचली लोक-साहित्य को स्थानीय एवं राष्ट्रीय मीडिया द्वारा यथोचित महत्त्व न दिए जाने के कारण यहाँ की आदिवासी संस्कृति और जनभाषाओं पर पड़ रहे विपरीत प्रभावों का हम गंभीरतापूर्वक आंकलन कर रहे थे। यह साक्षात्कार इसी परियोजना-कार्य का हिस्सा था और हमारे लिए आँख खोलने वाला था।

इस साल अरुणाचल प्रदेश अपने नामकरण की स्वर्ण-जयंती मना रहा है। आजादी के दो दशक बाद 20 जनवरी, सन् 1972 को अरुणाचल प्रदेश नाम स्वीकृत हुआ। इससे पूर्व यह ‘नार्थ ईस्ट फ्रंट्रियर एजेंसी’ यानी ‘नेफा’ के नाम से जाना जाता था। भारतीय गणराज्य के रूप में अरुणाचल प्रदेश की स्थापना 20 फरवरी, 1987 ई. को हुई। उत्तर-पूर्व के सबसे बड़े राज्य अरुणाचल प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में आदिवासी समाज के अलग-अलग समुदाय बसे हुए हैं। उनका रहवास गहरे घाटियों और ऊँचे पहाड़ों के बीच स्थित है। इन जनजातियों की संख्या मुख्य रूप से 26 है जिनकी अपनी ढेरों उप-जनजातियाँ हैं और यह संख्या सौ से भी अधिक हैं। मुख्य जनजातियों में मेयोर, लिसु, अका, बुगुन, वांचो, तांगसा, सिंग्फो, तुत्सा, नोक्ते, मोम्पा, शेरर्दुक्पेन, खाम्ति, मेम्बा, मिजी, न्यीशी, आदी, गालो, तागिन, आपातानी, इदु मिश्मी इत्यादि। यहाँ की नदी-संस्कृति पहाड़ों की जीवनवाहिनी हैं जिसमें सियांग, दिरांग, कामेंग, तिराप, सुबनसिरी, यामने, योमगो, पाचिन, पारे, पापुम, पान्योर, लोहित आदि। इसी तरह याक, ताकिन, मिथुन और धनेश पक्षी के अलावे आर्किड फूल और कीवी फल की प्रचुरता है। होलुङ के पेड़ इस परिक्षेत्र की शोभा है। नाहर एवं अन्य पेड़ खूबसूरत बहुत है। वन-सम्पदा से परिपूर्ण अरुणाचल प्रदेश में ज्ञात तौर 241 प्रकार के वृ़क्ष होने की पुष्टि एक पुस्तक करती है-‘‘ट्रीज ऑफ अरुणाचल प्रदेश: अ फील्ड गाइड’। इसी तरह आदी भाषा में ‘तान्नो इलिङ’ कहे जाने वाले फूल की सुन्दरता मोहक है। गणना में 84, 743 वर्ग किलोमीटर में फैला यह प्रदेश प्राकृतिक रूप से जवां और सांस्कृतिक रूप से धनी है। इस प्रदेश में विभिन्न गुणों और प्रचुर उपलब्धता वाले बाँस उपयोगी बहुत है। बम्बू का प्रयोग घर बनाने, खाने से लेकर अपोङ (लोकल दारू) पीने-पिलाने में बहुत होता है। घरों के ऊपर छज्जे के रूप में ‘तोको पत्ता’ का प्रयोग किया जाता रहा है जो आधुनिक दिनों में कम इस्तेमाल हो रहे हैं।

अरुणाचली घर अपनी बनावट एवं संरचना में बेहद आकर्षक मालूम होते हैं जिसे बनाने का काम सारे बस्ती के लोग सामूहिक रूप से करते हैं। आज भी अरुणाचली गाँवों की पहाड़ी खेती में जंगल साफ कर जलाने से लेकर अमुक भूमि पर खेती करने की प्रक्रिया सबलोग मिलजुल कर करते हैं। यह अपनापा और आत्मीयता आदिम जनजाति की बड़ी खूबी है जिसमें सुख और दुःख, खुशी और उदासी सब के सब साझे में मिले-बँटे हुए हैं। इस प्रदेश की बड़ी खूबी भाषिक बहुलता है। जनजातीय भाषा के उच्चार में प्रकृति की अभ्यर्थना और स्तुति सबसे अधिक हैं। इन भाषाओं के शब्द छोटे किन्तु गहरे अर्थ और भावभूमि वाले होते हैं। इनमें एक लय और लोच देखने को मिलते हैं जो मामूली फेरफार के कारण अर्थ-परिवर्तन का कमाल कर डालते हैं। जनजातीय शब्दों की निर्मिति या कहें व्यक्ति (स्त्री-पुरुष) के नामकरण की रामकहानी अलग है। इन नामों के पीछे का इतिहास परम्परा का अवगाहन करता मालूम देता है। गालो आदिवासी न सिर्फ अपने माता-पिता का नाम जानते हैं, बल्कि अपने 20 पुश्त पहले के पुरखा का नाम भी पता कर लेते हैं जहाँ से उनका खानदान शुरु हुआ है। यह ताज्जुब करने योग्य हो सकता है, किन्तु सचाई यही है कि गालो जनताति में नामकरण की विधि पूर्व-निर्धारित है जिसके माध्यम से नाम रखा जाता है।

अरुणाचली लोक-साहित्य वाचिक परम्परा में अब भी बने हुए हैं। पर्व-त्योहर के अवसर पर इनकी प्रस्तुति पारम्परिक विधि-विधान एवं अनुष्ठान के बीच किया जाता है। इस राज्य को उत्सवप्रिय राज्य कहा जा सकता है जहाँ सालों भर त्योहारों की धूम रहती है। जैसे-सी-दोन्यी, बूरी-बूत, लोसर, तोरग्या, रेह, न्योकुम, मोपिन, सोलुंग, मोह मोल, द्रि, चालो लोकू, आरान, एतोर, खिकसबा इत्यादि। अरुणाचली लोक-साहित्य यहाँ के आदिवासी शब्दों में समोये हुए हैं। इन आदिवासी शब्दों का व्यवहार-जगत में भीतर तक धँसा होना आदिवासीयत की मूल पहचान और जड़ से जुड़ा होना है। अरुणाचली आदिवासी अपने समस्त दुःख-तक़लीफ को शब्दों में रोप देना जानते हैं जिससे निकलने वाले अर्थ गहरी पीड़ा का आकल्पन होती है जिसे बड़ी समझदारी से गाया अथवा स्वरबद्ध किया जाता है। नृत्य का आदिवासी भाषाओं से तालमेल गहरा है। वह युद्ध अथवा उल्लास के लिए भी नृत्य कर अपनी ओजपूर्ण वीरता और प्रसन्नतासूचक उमंग व्यक्त करते हैं। जैसे-तापू नृत्य, बुया नृत्य, रिकमपादा नृत्य, देलोङ नृत्य, पोनुङ नृत्य, पोपिर नृत्य आदि।। ‘सेदी’ और ‘सेलो’ जैसी आदिवासी गाथाएँ हैं जिसमें अनगिन दर्द छुपा हुआ है। अरुणाचली लोक-साहित्य आदिवासी जीवन के दुःख और संत्रास को व्यक्त करने का सघन माध्यम बनते हैं। ‘आंजा’ और ‘पेङे’ शोकगीत यहाँ किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद गाया जाने वाला स्मरणगीत है जिसे नई पीढ़ी भूलने लगी है।

अरुणाचल प्रदेश की जनभाषाओं में विकल्पन सर्वाधिक है, तो लहजे में बदलाव के कारण उच्चारण में अंतर खूब है। एक ही पहाड की अलग-अलग स्थितियों में रहने वाली समान जनजाति की भाषा में भिन्नता मिलना स्वाभाविक है। यद्यपि पहाड़ों के बीच जीवन सहज नहीं है, तथापि पहाड़ को पैदा होते ही जिन्होंने देखा है; उनसे यारी गाँठी है; दु:ख-सुख, आफत-बिपत सबमें उसी के सुमिरन भरोसे अपने को अब तक बचाए रखा है। वे पहाड़ की परिभाषा नहीं बाँचते। फर्जी नामकरण नहीं करते। दरअसल, पहाड़ उनके लिए सजावटी लैम्प-पोस्ट नहीं है। छवि-निर्माण का तिकड़म या औजार नहीं है। पहाड़ उनके लिए आदिवासीयत-संस्कृति के मजबूत पाँव हैं, जिनसे विलग उनका अपना कोई इतिहास नहीं, सामूहिक-बोध, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक स्मृति नहीं है। जंगल उनकी अपनी दुनिया हैं, तो वनचरों से निकटता और लगाव उनके प्रेम का उत्स। भारतीय आदिवासियों के स्वीकार में दृढ़ता या कहें अटल वचनबद्धता है, तो क्रोध में आवेश का स्फुरण मात्र। उनके यहाँ धोखे की सतरंगी कलाबाजियाँ मौजूद नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में उन्हें इरादतन सिखाया गया है। उन्हें उनकी ही मूल पहचान से कट जाने की शिक्षा दी जा रही है। उन्हें अपने जड़ और मूल आस्था से जुड़े रहने का आश्वासन तो दिया जा रहा है, लेकिन अलग-अलग आयातित ‘नेमप्लेट’ के साथ उनके आंतरिक मूल्यों एवं पुरखाई चेतना को नष्ट-विनष्ट भी किया जा रहा है। आधुनिक शिक्षा-प्रणाली ने इन्हें अपनी मातृभाषा से अधिक दूर कर दिया है या फिर प्रत्यक्ष-परोक्ष बाहरी दबाव एवं आक्रमण के कारण वे अपनी विलुप्त होती जा रही भाषाओं को बचा पाने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं।

अरुणाचल प्रदेश के 25 जिलों में करीब सवा सौ जनजातियाँ हैं जो अपनी भाषा में समृद्ध और सामूहिक चित्तवृत्ति वाली संस्कृति में श्रेष्ठ है। यहाँ गंगा लेक है, जो ताईबिदा की लोककथा आज भी सुनाती है। जयरामपुर, विजयनगर, महादेवपुर, परशुराम कुण्ड, भीष्मकनगर, मालिनीथान, रुक्मिणी मंदिर आदि ऐसे नाम हैं जो उत्तर भारतीय लोक में रचे-बसे द्वापर व त्रेतायुगीन मिथकों की सचाई उजागर कर देते हैं। यह प्रस्थान-बिन्दु भारत की सामासिक-संस्कृति का सच सामने ला कर खड़ा कर देता है। प्राचीनता के ये अवशेष भारतीय सभ्यता के ऐसे स्मारक हैं जिसके समक्ष अखिल भारतीय चेतना मनुष्य मात्र के निमित रची-बुनी गई मालूम पड़ती है। पुरातत्त्व के आधुनिक विशेषज्ञ इस प्रदेश की प्राचीनता को भारत की गौरववर्णी सभ्यता का केन्द्रक मानते हैं। आदिवासियत की बहुआयामी परम्परा और मिथकीय चेतना में अरुणाचल प्रदेश अव्वल है। जीवटता और कर्मठता यहाँ के रहवासियों के गहने हैं। श्रमशीलता उनके जीवन की मुख्य धुरी है। उत्परिवर्तन और उद्वविकास के वे प्राकृतिक यात्री हैं। भाषा में उनके हृदय के फूल खिलते हैं और गंध बिखेरते हैं। कला, शिल्प और नानाविध कौशल भारतीय आदिवासियों का मुख्य श्रृंगार है।

आधुनिक मीडिया तंत्र या कहें संचार विधान में पहाड़ के लिए जगह या तो नहीं है या-है भी तो अल्पमात्र। ऐसे में आदिवासियत को समझने के लिए खुला दिल और सहृदय मन चाहिए। अस्तु, आदिवासी जनसमूह के वाचिक साहित्य को लेकर जिस ढंग की संवेदनशील एवं आत्मिक चेष्टाएँ चाहिए, उसका हर तरफ अभाव है। विशेषतया अरुणाचल या पूर्वोत्तर का आदिवासी लोक-साहित्य मौजूदा विमर्श की केन्द्रीयता एवं पहुँच से बाहर है। अरुणाचली भाषाएँ आज अपनी तमाम खूबियों के बावजूद पहचान के संकट से गुजर रही है। उनके समक्ष अपने को बचाए रखने की चुनौती है। यह घाव नित गहरा होता जा रहा है। मौजूदा मीडिया ने इस घाव को और चोटिल करने का काम किया है। वह बिकाऊ गाय बन चुकी है जिसे दूहते सत्ता-पूँजी के समर्थक हैं। आज की सूचना एवं संचार-संस्कृति में यही गायें भारतीयता के अब तक के हासिल को गोबर करने पर तुली हुई हैं। निःसंदेह वर्तमान मीडिया की सूचना एवं संचार-संस्कृति आलोचना के घेरे में है। यह घेराव पूर्वग्रह या दुराग्रहपूर्ण नहीं है, बल्कि हक़ीकत यही है। वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी मीडिया के वर्ग-चरित्र और वस्तु-स्थिति पर गंभीर टिप्पणी करते हैं कि-“अब मुख्यधारा की मीडिया की स्वतन्त्रता कोरी मिथ है। यह कारपोरेट घरानों व विज्ञापन घरानों का बंधक है। मीडिया सामग्री ‘प्रोडक्ट’ बन चुकी है। यह अब सूचना विचार की वाहक नहीं रही। अतः मीडिया की अन्तर्वस्तु और एकरूपीकृत कार्यशैली सचाई है जो मूल सवालों व मुद्दों का विलोपीकरण या हाशियाकरण करता है तथा सतही सवालों एवं मुद्दों का केन्द्रीकरण करता जाता है।“ परिणास्वरूप मीडिया की मनोगतिकी एवं मनोभाषिकी में अप्रत्याशित फेरफार हुआ है। शब्द अर्थ से आवृत्त न होकर पूँजी के दास हो गए हैं। अब शब्द तक की ‘यूनिक सेलिंग प्राइस’  (यूएसपी) तय की जा रही है। यह देखा जाने लगा है कि ‘शब्द-निवेश’ के कारण माध्यम की प्रभावशीलता में क्या और कितना फ़र्क पड़ रहा है। यह गौरतलब है कि अब छवियों की ही नहीं बल्कि शब्द के अभिविन्यास और उसके सत्ता को लेकर भी राजनीति शुरू हो गई है। ये शब्द अर्थ की वजह से नहीं अपनी बिकाऊपन की प्रकृति के कारण प्रयोग में घट या बढ़ रहे हैं।  लगातार हाशिए पर धकेली जा रही लोक-संस्कृति और उसके ठेठ लोक-साहित्य को लेकर रोना-धोना मचाने की जगह कुछ बातें ठोस एवं उपयुक्त तरीके से जान लेनी आवश्यक है। आधुनिक सूचनाशास्त्री सुभाष धूलिया का मानना है कि-‘‘समाज के नए-नए तबके मीडिया बाज़ार में प्रवेश कर रहे हैं और अपनी क्रय-शक्ति के आधार पर मीडिया उत्पादों के उपभोक्ता बन रहे हैं। सूचना की इस क्रांति के उपरांत दुनिया में जितने भी संवाद आज हो रहे हैं, वे बेमिसाल हैं; लेकिन इस संवाद का आकार जितना बड़ा है इसकी विषयवस्तु उतनी ही सीमित होती जा रही है। लोग अधिकाधिक मनोरंजित होते जा रहे हैं, और अधिकाधिक कम सूचित/जानकार होते जा रहे हैं।’’

अरुणाचली बौद्धिकों में अपनी ज्ञान-व्यवस्था और सांस्कृतिक कला-शिल्प के प्रति चिंता गाढ़ी हुई है। अपनी भाषाई अस्मिता और पुरखाई कोठार को लेकर वे जागरूक तथा अत्यंत संवेदनशील होते दिखाई दे रहे हैं। शहरी आबोहवा में उनका घरेलूपन जिस तरह छिन्न-भिन्न होता जा रहा है या कि उनकी सामूहिकता की संस्कृति जिस तरीके से अलगाववादी होती जा रही है; वे इसका निषेध करते हुए अपनी अस्मिता और पहचान को ‘पुनि पुनि’ खोजने का प्रयास कर रहे हैं। परिणामस्वरूप ‘वोकल फॉर लोकल’ की बात तेजी से हो रही है, लेकिन मीडिया की उपेक्षा और इरादतन नज़रअंदाज़ करने का भाव बेचैन कर देता है। 

पूर्वकथित गाँवबुढ़ा की चिंता आदी भाषा को लेकर थी। वह नई पीढ़ी के अपनी आदिवासी मूल्य-दर्शन और पहचान-अस्मिता से कटते जाने को लेकर व्यथित थे। माक्तेल परटिन नाम है उनका और पासीघाट से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित दाम्बुक गाँव के पोबलुङ बस्ती में रहते हैं। नई पीढ़ी तकनीकी ज्ञान में अव्वल है। उसे झटपट बहुत कुछ करने आता है जिससे आधुनिक जीवन जीना आसान हो चला है। इसे लेकर वह सकारात्मक रूख दिखाते हैं, लेकिन उनकी मूल चिंता भाषा को लेकर है।

अरुणाचल प्रदेश की अधिसंख्य जनजातियाँ अपनी स्वतंत्र लिपि नहीं होने के कारण बड़ी विडम्बना का शिकार है। खाम्पति और मोम्पा आदिवासी के पास लिपि की अपनी परम्परा है, लेकिन उसके जानकार बहुत कम और बेहद विशिष्ट लोग हैं। सामान्य प्रचलन में अरुणाचली लिपि का सर्वथा अभाव है जिस कारण यह प्रदेश दुनिया की दृष्टि में आज भी पूरी तरह से खुला या कि सूचना एवं संचार संस्कृति की सीधी पहुँच में नहीं है। यद्यपि इस दिशा में बहुतेरे प्रयास हुए हैं, तथापि यह नाकाफ़ी है। जैसे-वांचो लिपि, तानी लिपि, गालो लिपि, आदी लिपि आदि। व्यक्तिगत प्रयास द्वारा स्थानीय लिपि-निर्माण की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन किसी एक लिपि को लेकर अभी अरुणाचल प्रदेश का मानस एकजुट अथवा एकमत नहीं है। लिपि को लेकर जन-स्वीकृति का नहीं होना बड़ी समस्या है। बहरहाल, बहुमान्य लिपि न होने के कारण अरुणाचली जनसमाज अपनी मातृभाषाओं के लोक-साहित्य का संरक्षण एवं संग्रह कर पाने की स्थिति में नहीं है। आकाशवाणी पासीघाट के कार्यक्रम प्रमुख इदाङ परटिन ने बताया कि-‘पासीघाट का यह आकाशवाणी केन्द्र सबसे पुराना केन्द्र है। इस केन्द्र के पास रिकॉर्डेड अति-महत्त्वपूर्ण अभिलेख हैं जो यहाँ के जनसमाज एवं जनसंस्कृति के लिए अमूल्य धरोहर है। लोक-साहित्य आधारित कार्यक्रम की व्यवस्था है। आधुनिक तकनीक एवं प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जा रहा है जिसमें डीआरएम (DRM) और यूपीटीआर (UPTR) की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।”

अरुणाचली प्रसारण में रेडियो की भूमिका अन्यतम रही है। इनके पास मौजूद रिकार्डेड अभिलेख संकटग्रस्त होती जा रही जनजातीय भाषाओं के लिए संजीवनी सरीखा है। ईटानगर स्थित दूरदर्शन के ‘अरुण प्रभा’ चैनल की उल्लेखनीय भूमिका यह रही है कि वह स्थानीय भाषाओं में प्रसारण को लगातार बढ़ावा और मातृभाषाओं में अनेकानेक कार्यक्रम ‘टेलिकास्ट’ कर रहे हैं। यह यूनेस्को के उस रिपोर्ट की चिंता को कम करने की दिशा में ठोस एवं सार्थक पहलकदमी हैं जिसके मुताबिक 1961 ई. की जनगणना में 1652 भाषाओं के होने की जो पुष्टि हुई थी, वह 1971 ई. में मात्र 808 की संख्या में बची थीं। पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के 2013 ई. में हुए सर्वेक्षण बताते हैं कि पिछले पचास सालों में भारत की 220 भाषाएँ मृत हो चुकी हैं, जबकि 197 भाषाएँ संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल हो चुकी हैं। ऐसी दशा में शिक्षा आधारित भाषाई लगाववृत्ति विकसित किया जाना आवश्यक हो चला है। खासकर अरुणाचल प्रदेश की उन भाषाओं के लिए यह खतरा अधिक भयावह है जिसके बोलने वाले की संख्या दो-चार सौ तक सिमट कर रह गई है। ऐसे में अरुणाचल प्रदेश के ज्ञानवान समाज और उनकी ज्ञान-संस्कृति का बचाने की मुहिम छेड़ना जरूरी हो गया है। यह और बात है, अरुणाचल प्रदेश की पढ़ी-लिखी पीढ़ी के शौक और स्वप्न तेजी से बदल रहे हैं। वह आदिम आकांक्षा की जन-भावनाओं से भिन्न सोच रही है। वह प्रकृतिजीवी नहीं है, अपितु अधिकाधिक विलासी एवं कृत्रिम जीवन चुन रही है। महँगी गाड़ियों की ख़रीद, बड़े-बड़े बँगलों का शौक तथा सांस्कृतिक उत्पाद एवं  उपनिवेश बनते जाना इसका उदाहरण है। ऐसे में अपने समय के अंतर्विरोधों को दर्ज करना है, देशकाल में मौजूद विरोधाभासों से टकराना है तथा अपने समय के द्वंद्वों एवं विडम्बनाओं पर गंभीरता के साथ चिंतन-मनन करना है। जनमाध्यम के लिए ‘मास’ की असल अवधारणा मुख्य भूमिका और औचित्य भी यही है।

  1. Navendu Page; Aparajita Dutta; Bibidishananda Basu, Trees of Arunachal Pradesh (Mysore:Nature Conservation Foundation, 2022)
  2. रामशरण जोशी, “असंतोष और असुरक्षा के साये में”, समयांतर (फरवरी, 2011), 8
  3. समयांतर (फरवरी, 2011) 57
  4. आईसीएसएसआर-इम्प्रेस क्षेत्र-सर्वेक्षण के अन्तर्गत पासीघाट आकाशवाणी के कार्यक्रम निदेशक इदाङ परटिन द्वारा लिए गए रिकार्डेड साक्षात्कार से।

डॉ. राजीव रंजन प्रसाद राजीव गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, अरुणाचल प्रदेश के हिंदी विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं तथा भारतीय समाज विज्ञान अनुसन्धान परिषद् द्वारा अनुदानित ‘अरुणाचली लोक-साहित्य और मीडिया: अंतःसम्बन्ध एवं अंतःक्रिया’ शीर्षक शोध-परियोजना कार्य पूर्ण कर चुके हैं।

दोहों में गीतों के अक्षय अंकुर : ज्यों कुहरे में धूप

पुस्तक: ज्यों कुहरे में धूप
लेखन: श्री शिव मोहन सिंह
प्रकाशन: विनसर पब्लिशिंग कं देहरादून

“देखन में छोटा लगे, घाव करे गंभीर” वाली सटीक पंक्ति कविवर बिहारी की सतसई के संदर्भ में कही गई थी। सतसई वह दोहा-संग्रह है जिसे विश्व स्तरीय ख्याति मिली है। संत कवि कबीरदास, आचार्य तुलसीदास, नीति निपुण रहीम जी, जायसी जी आदि कवि दोहों की बदौलत अब तक जनमानस में जीवित हैं।  इससे दोहा की महत्ता और जन स्वीकार्यता सिद्ध होती है। दोहा चार चरणों में कुल 48 मात्राओं का व्यवस्थित छंद मात्र नहीं है अपितु कथ्य और प्रभाव की दृष्टि से युगबोध का सबसे लघु प्रतिनिधि दस्तावेज भी है। इसलिए दोहा का कलापक्ष सबसे आसान है तो भावपक्ष का प्रतिमान सबसे ऊपर। अतएव दोहाकार को स्थापित होने के लिए बहुत बड़ी सतत साधना की आवश्यकता होती है। ससम्मान सेवानिवृत्त अभियंता श्री शिव मोहन सिंह जी देहरादून की धवल धरती से सरस गीत, प्रेरक मुक्तक के बाद अब दोहाकार के रूप में “ज्यों  कुहरे में धूप” के साथ उपस्थित हैं।

15 अध्यायों में विभक्त किंतु अखंड 108 पृष्ठीय तकरीबन 600 दोहों से सुसज्जित है ज्यों कुहरे में धूप। यद्यपि दोहे मुक्त होते हैं तथापि कुछ लेखक विविध विषयों या उपविषयों में बाँधकर श्रृंखलाबद्ध सृजन भी करते हैं। इस पुस्तक के लेखक के मन में जब भी विचारों का अर्णव उदित हुआ, मन वांछित विधा में लिपिबद्ध कर लिए। जब पुस्तक प्रकाशन का विचार आया, विषयों-उपविषयों में संग्रहित कर लिए। इस सम्बंध में लेखक ने “अपनी बात” में बताया भी है कि-

“भाव-भाव आते रहे, पथ में जैसे मीत।

शब्द-शब्द बनते रहे, कुछ दोहे कुछ गीत।।”

इस संग्रह में शतकाधिक दोहे ऐसे हैं जिन्हें लोकोत्तियों का नव कलेवर कहा जा सकता है। द्विरुक्ति का अधिकाधिक प्रयोग हुआ है जो दोष होते हुए भी श्रृंगार वर्द्धक है। एक या दो चरण का कई दोहों में ज्यों का त्यों जुड़ जाना खलता है किंतु लेखक की पूर्व स्वीकारोक्ति कि दोहों का सृजन काल व्यापक रहा है, दोष क्षीण हो जाता है। पुस्तक को त्रुटिरहित रखने में लेखक को बहुतायत सफलता मिली है। प्रायः दोहा में प्रथम व द्वितीय चरणों में किसी तथ्य को कहा जाता है और तृतीय व चतुर्थ चरण में उदाहरण द्वारा पुष्टि की जाती है। यही कारण है कि मात्र 48 मात्राओं में एक विषय का पूर्ण निष्पादन हो जाता है। दृष्टांत या उदाहरण के संदर्भ में सर्वाधिक प्रचलित दोहे ही हैं। इस मानक पर कुछ दोहे कुछ कमजोर प्रतीत होते हैं किंतु वे एक स्वतंत्र काव्य बनकर स्थापित हो जाते हैं।

 दोहों के परिधान में गीत सँजोना इस दोहाकार की प्रमुखं विशेषता है। इसका कारण इनके पूर्व रचित गीत हैं जो किसी भी काव्यिक साँचे में स्वयं को ढाल लेते हैं। लेखक महोदय वर्तमान की दशा और भविष्य की दिशा के प्रति भी पूर्णतः सजग हैं। विरासत, परिवर्तन और प्रगति के पक्षधर हैं। कुछ दोहे द्रष्टव्य हैं जो प्रबुद्ध पाठक को कुहरे में धूप की अनुभूति कराकर ही दम लेते हैं।

“आज अधूरे ज्ञान की, सत्ता हुई समर्थ।

बनते पावन शब्द के, नित्य अपावन अर्थ।।

पक्की होती क्यारियाँ, कच्चा घर बुनियाद।

खेती होती सड़क पर, धरना संग फसाद।।

नफ़रत के बाजार में, घुला प्रीति का रंग।

मुदित हुआ मन झूमता, उर में भरी उमंग।।”

समीक्षक

डॉ अवधेश कुमार अवध: वाराणसी (चन्दौली), उत्तर प्रदेश के मूल निवासी डॉ अवध मेघालय में सिविल अभियांत्रिकी मेंं सेवारत हैं। बहुआयामी लेखन के साथ समीक्षा में भी रुचि रखते हैं।  देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ नियमित रूप से प्रकाशित होती रहती हैं। इनके द्वारा संपादित “इनसे हैं हम” उल्लेखनीय पुस्तक है।

संस्कार

“अरे रवि जल्दी उठो और ये लो बाहर गेट पर गौमाता रम्भा रही हैं, दे दो उन्हें,” कंप्यूटर पर गेम खेलते हुए अपने बेटे को रोटियाँ पकड़ाते हुए महिमा बोली।

“अनु से कह दो, वो दे आएगी, मेरी गेम का टाइम आऊट हो जायेगा।” कंप्यूटर पर नजर गड़ाए रवि बोला।

“अनु बेटा, जाओ तुम ही दे आओ रोटियाँ,” प्यार से पुचकारते हुए महिमा बोली।

“नहीं मैं नहीं जाऊंगी, भाई गेम ही तो खेल रहा है, मैं तो होमवर्क कर रही हूँ,” मुंह बनाते हुए बेटी ने कहा।

“ये क्या बदतमीजी है, बाहर इतनी धूप में खड़ी गौमाता कब से रम्भा रही है और तुम दोनों  बहाने बना रहे हो। जल्दी उठो,ये लो।” गुस्से में तमतमाती महिमा चिल्लाई।

“क्या हुआ भाई! क्या दे रही हो बच्चों को?” कमरे में घुसते अमित ने पूछा।

“संस्कार!” कहकर मुस्कुरा दी महिमा।

नीता शर्मा: सफल गृहिणी और लेखिका होने के साथ-साथ आकाशवाणी के कार्यक्रम और नियमित उद्घोषणाएँ भी करती हैं

बिंदी

पति की मृत्यु के बाद भारती आज पहली बार नौकरी पर जा रही थी। एक महीने का अवकाश लिया था और कितना लेती! नौकरी पर तो जाना ही था। उसने एक क्रीम कलर की साड़ी निकाली, पैरों पर ध्यान गया, बिछिया और नेल पॉलिश बिना पैर बहुत सूने लग रहे थे। उसने हल्के रंग की नेल पॉलिश पैरों के नाखूनों पर लगा दी, मैचिंग चूड़ियाँ निकाली किंतु उन्हें पहनने का दिल नहीं किया। एक हाथ में दो सोने की चूड़ी, एक हाथ में घड़ी ठीक है; कांच की चूड़ियों के बिना भी हाथ इतने बुरे नहीं लग रहे हैं। उसने हल्के रंग की लिपस्टिक भी लगा ली। अब उसके सामने असली समस्या बिंदी की थी। पति के रहते वह बहुत बड़ी बिंदी लगाती थी। बिना बिंदी के वह अपना चेहरा स्वयं नहीं देख पाती किंतु लोग क्या कहेंगे, यह सोच कर हाथ में बिंदी का पत्ता लिए  समझ नहीं पा रही थी कि बिंदी लगाए अथवा नहीं । एक बार उसने माथे पर बिंदी लगा ली किंतु अगले ही पल उसे बिंदी  के पत्ते में चिपका दिया।

      तभी उसे पति की तेरहवीं की घटना याद आई। उसके मायके से साड़ी के साथ- साथ रस्म के मुताबिक श्रृंगार का सामान भी आया था। पंडित जी के साथ जेठ जी बैठे सामान देख रहे थे। बिंदी देखते ही वह बिदक गए,”मर्यादा भी निभानी पड़ती है, बिंदी हटा दो इसमें से।” उन्होंने बेटी से कहा लेकिन बेटी अड़ गई थी।

” मेरी माँ बाहर जाती है; ज़रूरी नहीं है कि वह मनहूस शक्ल लेकर जाए। जमाना अब पहले वाला नहीं है ताऊ जी। माँ बिंदी लगाएगी।” और भारती ने हाथ में देर से पकड़े हुए पत्ते से बिंदी‌ निकाली और माथे पर लगा ली।

डॉ. विद्या सिंह निजी रचनाओ के अलावा कइ पुस्तकों का सम्पादन कर चुकी हैं, जिनमें  उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार, बी.ए. द्वितीय वर्ष के लिए पाठ्य पुस्तक प्रमुख हैं। अनगीनत साहित्य सम्मान से सम्मनित विद्या जी सम्प्रति महिला काव्य मंच, उत्तराखंड और अध्यक्ष धाद साहित्य एकांश, देहरादून के अध्यक्ष हैं। भ्रमण में रुचि के करण विद्या जी नेपाल, कम्बोडिया, वियतनाम, थाईलैण्ड, दुबई, मॉरिशस, स्विट्जरलैण्ड, बेल्जियम, हॉलैण्ड, फ्रांस, दुबई,मिस्र, उज़्बेकिस्तान, अमेरिका आदि देशों का भ्रमण कर चुके हैं

मोबाइल

“जब देखो मुए मोबाइल में घुसी रहती है।”

जया की सास का मानो ये तकिया कलाम हो गया था।

“बहू उ उ उ……,कब से आवाज दे रही हूँ,जब देखो मुए मोबाइल में घुसी रहती  हो” जया की सास लगभग चिल्लाकर बोली।

“आ ई ई ई…..

मम्मीजी,ये देखिए आपके लिए मदर्स डे का उपहार।”

पुराने वाले फोन का सिम नये स्मार्ट फोन में डालकर जया ने सासू माँ को देते हुए चलाना सिखाया।

इसके बाद सासू माँ ने कभी तकिया कलाम नहीं दोहराया।

सासू माँ भी खुश,जया भी खुश।

ज्योति अग्रवाला जोरहाट, असम  पत्रिकाओं, समाचार पत्रों ,सांझा संकलन में कविताएं,लेख आदि छपे हैं।कई साहित्यिक मंचो से भी जुड़ी  हैजहाँ साहित्यिक सम्मान मिले।

गांव व्यवहार    

खालिकपुर ग्राम पंचायत का मजरा, अड़ौवा। लगभग सौ घर का पुरवा। यहां की अधिकतर आबादी लाल राशन कार्ड वाली। परधानी की शुरुआत बदरी महाराज से हुई और लगातार चलती रही। बीच-बीच में जब आरक्षित सीट आई तो उन्होंने अपने ताबेदार के जरिए गांव की नेकी खैरियत संभाली। इसी गांव के खोड़हुनू के बेटे गोजई ने बदरी महराज की चक्की में लगे एसटीडी बूथ में उस दिन शहर से संदेश दिलाया कि, ‘अम्मा तुम चिंता ना करिहो।  मालिक छुट्टी नहीं दइ रहा। पइसा जल्द ही भेजब। तीज त्यौहार का समय है सामान कपड़ा लइ लेहें। बड़न का पैंलगी छोटन का राम राम।’

और फिर अगले ही दिन गोजई की…।

पूरे गांव में मातम छा गया। जैसे तैसे क्रिया-कर्म संपन्न हुआ। विद्या पंडित ने सलाह दिया कि उत्तम-मध्यम ही सही संस्कार तो होना ही चाहिए। खोड़हुनू से बोलते ना बन रहा था वही कमासुत बेटा था। बिन पैसे के तो तेरहवीं ना होगी? किससे कहे?

बदरी परधान और महाजन ने खोड़हुनू को ढांढ़स बंधाया, यही विधि का विधान है, दुखी ना हो। तुम तैयारी करो। हम लोग के रहते कउनो चिंता नाहीं। सब लोग तुम्हारे साथ हैं। पैसे का इंतजाम हो जाएगा। महाजन ने बही निकाली और नाम दर्ज किया खोड़हुनू वल्द कोदे…।

‘सबसे डेढ़ टका ब्याज लिया जाता है तुमसे सवा टका…।’

बेटे को खो चुका बूढ़ा पिता  इस गांव व्यवहार  से कैसे उऋण होगा!

डॉ. श्यामबाबू शर्मा संप्रति भारत सरकार के एक राजभाषा सेवक हैं। राष्ट्रभाषा भूषण सम्मान से सम्मानित इनकी कुछ लघु कथाएँ पाठ्यपुस्तकों में समाहित हैं। इनके 14 से ज्यादा पुस्तकप्रकाशित है।

त्याग और वलिदान की जाग्रत प्रतिमूर्ति – सती जयमती

जम्बुद्वीप भरतखण्ड भारतवर्ष आर्यावर्त देश के प्राचीन शाश्वत् इतिहास के पृष्ठ में महिमामयी तथा वीरांगना नारियों के नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। अखंड भारत के भूभाग एवं रत्नगर्भा धरित्री के कोख में जन्मे सौभाग्यवती नारियों का वर्णन कर पाना किसी भी कलमकारों के लिए सहज नहीं है। वह चाहेँ प्राचीन काल की विदुषी नारी के विषय में हो अथवा ऋषि-मुनियों का ही वर्णन हो अथवा मध्यकाल की वीरांगनाओं का वर्णन ही क्यों  न हो। समय-समय पर ऐसी विदुषी द्वारा दिखाए गये साहसिक कदमों ने नारी जाति के कद को अनेक बार ऊँचा उठाया है। उसी क्रम में पूर्वोत्तर भारत के नारियों का योगदान भी इतिहास के पन्नों में पाया  जाता है। वो चाहे आक्रमणकारियों के विरोध में आवाज उठाना हो अथवा देशहित को सर्वोपरि मानकर देशभक्ति सहित राष्ट्रधर्म पालन करने वाला कार्य हो अथवा परतन्त्रता से मुक्ति पाने के लिए किया गया संघर्ष ही क्यों न हो? ऊपर उल्लेख किया गया समग्र महामानवीय गुणों से परिपूर्ण पूर्वोत्तर भारत असम राज्य की वीरांगना जयमती का नाम वीरांगना नारियों के बीच का कभी न भूलने वाला नाम है। ऐसी स्वाभिमानी नारी, जिन्होंने अपने पति और देश के लिए दिया हुआ बलिदान तथा उनके गौरवमय ऐतिहासिक गाथा को प्रत्येक भारतवासियों को हृदयंगम करना और उनके बारे में जानना जरूरी है।

माता चन्द्रदारू और पिता लाइथेपेना बरगोहाञी की पुत्री जयमती कई भाई बहनों के बीच की थी, फिर भी वह माता-पिता तथा परिवार के सभी लोगों से ज्यादा प्यार – दुलार पाकर पली बड़ी थी। लाइथेपेना बरगोहाञी के पूर्वजों के साथ आहोम राजपरिवार का घनिष्ट सम्पर्क था। इसी सूत्र के तहत ही लाइथेपेना का भी आहोम राजा के साथ घनिष्ट सम्पर्क रहा। राज परिवार की छत्रछाया तथा अपने परिवार से अधिक प्यार दुलार पाने वाली सती जयमती छोटी उम्र से ही अधिक दायित्वशील,  दक्ष और अत्यन्त बुद्धिमती थी।

उस समय आहोम राज्य के राजा थे गोबर राजा। गोबर राजा के तृतीय पुत्र थे गदापाणि। गदापाणि बहुत ही शक्तिशाली तथा साहसी थे। प्राय: राजकुमार गदापाणि जंगलों में शिकार करने हेतु जाया करते थे। एक दिन शिकार से लौटते वक्त वे भूख और प्यास से आतुर हो गदापाणि के घर पहुँचे और कुछ खिलाने के लिए आग्रह किया। सुशील तथा अतिथि परायण गुण सम्पन्न जयमती ने बहुत ही स्फूर्ति से भूख और प्यास से आतुर गदापाणि का बहुत अच्छी तरह से अतिथि सत्कार किया। उत्तम आतिथ्य से प्रभावित होकर जयमती को अपनी अर्द्धांगिनी  के रूप में पाने की इच्छा उनके मन में प्रकट होने लगी। लावण्यमयी जयमती भी सुंदर, सुदक्ष तथा शक्तिशाली राजकुमार गदापाणि से प्रभावित हुई। दोनों परिवार की सहमति से जयमती और गदापाणि का आहोम के ‘चकलंग’ विवाह पद्धति अनुसार शुभ विवाह सम्पन्न हो हुआ । ‘त्याग नारी के जीवन का अलंकार है और पति उनका देवता है’ – इस आप्तवाक्य को शिरोधार्य कर जयमती ने अपनी वैवाहिक जीवन में कदम रखा। ससुराल में भी सासू माँ जयमती से असीम स्नेह करती थीं। उन दोनों का युग्म जीवन सुख – समृद्धि से व्यतीत होने लगा। दोनों को वैवाहिक जीवन के साक्षी स्वरुप दो सुंदर पुत्र संतान की प्राप्ति भी हुई।

गोबर राजा के मृत्यु पश्चात् उनका तृतीय पुत्र गदापाणि आहोम के राजा बना। उस समय राजसत्ता को लेकर अधिकारियों के बीच घमासान गृहयुद्ध शुरु हो गया  । गुवाहाटी और निचले असम के आहोम राज प्रतिनिधि लालुकखोला बरगोहाञी ने कूटनीति  एवं षड्यन्त्र कर सात दिन में ही गदापाणि को राजसत्ता से हटाया और चुलिकफा नामक चौदह वर्षीय बालक को खुद के निजी स्वार्थ सिद्धि के लिए सन् 1679 में राज सिंहासन पर बैठाया। छोटी-सी उम्र में राजा बनने के कारण चुलिकफा को ‘लरा रजा’ भी कहा जाता था। चतुर लालुकखोला ने कुशलतापूर्वक उनकी पाँच वर्ष की बेटी को सत्तासीन लरा रजा के साथ विवाह कर फिर शासन की बागडोर अपने हाथों में ले लिया। उसके बाद वह तमाम षडयन्त्र रचने लगा। आहोम राज्य में ऐसा एक प्रचलित नियम था कि अंगक्षत वाला कोई भी युवक राजा बनने का योग्य नहीं होगा। लालुकखोला ने इस नीति का गलत फायदा उठाते हुए राज्य में राजा बनने के योग्य युवकों को अंगक्षत करने का आदेश दे दिया। जयमती के पति गदापाणि लालुकखोला बरफुकन का सबसे बड़ा शत्रु था क्योंकि एक राजा होने के सभी गुण और योग्यता उनमे विद्यमान था। ‘लरा रजा’ और लालुकखोला के इस तरह के अनैतिक क्रिया-कलापों के कारण गदापाणि अपनी अर्धाङ्गिनी जयमती और दोनों बेटों को लेकर किसी गुप्त स्थान में रहने लगे। राजा के सैनिक गदापाणि को ढूँढते हुए उस स्थान पर पहुँच गए। अपने पति को शत्रु-पक्ष से बचाने तथा देश को सुशासक प्रदान करने के लिए जयमती गदापाणि से दूसरे जगह भागने के लिए कहा। पहले तो गदापाणि कहीं भागने के लिए राजी नहीं थे। पत्नी के बार-बार अनुरोध करने पर वह टाल नहीं पाते और दोनों बेटों को नानी के पास सुरक्षित छोड़कर गदापाणि नगापाहाड़ की ओर चल गए ।   लालुकखोला के आदमियों ने जयमत जयमती से गदापाणि का पता बार-बार पूछा लेकिन जया ने अपने पति का ठिकाना नहीं बताया। अत्याचारी लालुकखोला जयमती को बंदी बना कर ले गए और गदापाणि के बारे में पूछते हुए राजदरवार में उन पर अनेक प्रकार के अत्याचार करने लगे लेकिन जयमती अडिग रही और पति के विषय में कुछ भी नहीं बताया। अत्याचार सहन करती रही फिर भी मुँह नहीं खोली। शत्रु पक्ष जब जया से कुछ जान नहीं पाए तब और भी ज्यादा क्रुद्ध होकर जयमती को जेरेंगा पथार नामक एक खुले मैदान में ले ग्ए। काँटों से भरे हुए एक पेड़ पर जया को बाँधकर ” अपने  पति को कहाँ छुपाया है?” यह प्रश्न बार-बार कर उसको शारीरिक और मानसिक अमानवीय अत्याचार करने लगे। –” राज्य शासन कर रहे भ्रष्ट सत्ताधारियों को गदापाणि जीवित रहने से ही सत्ताच्युत करना सम्भव हो पाएगा। यदि  इन लोगों को  गदापाणि का पता चल गया तो निश्चित ही उनको मार डालेंगे। उनकी मृत्यु से अच्छा है, ये लोग मुझे ही मार डालें। खुद के प्राण की आहुति देकर भी इन दुराचारियों के पंजे से भावी योग्य राजा को मैं बचाऊँगी ।” ऐसी बातें सोचते हुए अत्याचार सहन करने लगी। दुराचारियों ने उबलते हुए गरम पानी जयमती के शरीर पर फेंका और लोहे के चाबुक से प्रहार किया उसके  उपरान्त भी परम तेजस्विनी क्रान्तिकारिणी नारी जयमती ने राजधर्म का पालन करते हुए क्रूर शासक के आगे मुँह नहीं खोला। उसी समय वहाँ एक दृश्य परिघटित होता है – गदापाणि नगापाहाड़ में स्थान बदल-बदल कर खुद को छुपाते हुए  जयमती प्रति हो रहे कठोर अत्याचार  का पता चला। वे छद्मवेश में उसी स्थान पर पहुँच जाते हैं, जहाँ जयमती कठोर अत्याचार की शिकार हो रही थी। अपनी प्रियतमा पत्नी को आँखों के सामने किया गया अत्याचार, उत्पीड़न देखकर उनका हृदय पीड़ा से दग्ध हो जाता है। चाबुक से निरन्तर पीटते हुए प्रताड़क कह रहे थे — “ओई तोर गिरियेक कोत आसे क’?” (अर्थात् तेरा पति कहाँ है बता) कहकर पत्नी को पिटते हुए देखकर छद्मवेशी गदापाणि खुद को रोक नहीं पाता  और सामने आकर जयमती को कहता है – “ओइ, तइ तोर गिरियेकर कथा कोइ निदिय किय?” (अर्थात् – तुम अपने पति के बारे में क्यों बता नहीं देती?”) अपने पति की उपस्थिति का आभास जयमती को हो जाता है, वह गदापाणि को पहचान लेती है। तब तुरंत जयमती गदापाणि को यह स्थान छोड़ने के लिए इंगित करते हुए कहती है — “जोर मानुह तालै नाजाय किय? मइ नकउँ, नकउँ, नकउँ।” (जहाँ से आए हो वहीं क्यों नहीं जाते? मैं नही कहूँगी, नहीं कहूँगी, नहीं कहूँगी) वे अपनी पत्नी के दृढ़ संकल्प तथा कठोर निर्णय के आगे नतमस्तक होकर दुखी मन लेकर वहाँ से चले जाने को बाध्य हो गए। यह विछोड़ इन प्रेमी युगलों के जीवन की अंतिम विदाई बनी। अर्थात् यही थी गदापाणि और जयमती का अंतिम मुलाकात।

जेरेंगा पथार में 14 दिन तक निरन्तर अमानवीय अत्याचार सहते हुए अपने पति का ठिकाना “मैं कदापि नहीं कहूँगी” कहते हुए एवं अनेक यातनाएँ सहकर उसी पेड़ पर बँधी हुई जयमती ने सन् 1679 के 27 मार्च के दिन प्राण त्याग दिया । वीरांगना जयमती के महान त्याग के द्वारा लरा रजा तथा लालुकखोला के अन्याय तथा अत्याचार से असमवासी का उद्धार करने में सक्षम हुई । सन् 1681 से लेकर सन् 1696 तक गदापाणि  गदाधर सिंह नाम  से आहोम के राजा हुए। बाद में सन् 1696 – 1724 तक  जया के ज्येष्ठ पुत्र रूद्र सिंह आहोम के राजसिंहासन पर अधिष्ठित हुए। वीरांगना जयमती के पुत्र रूद्र सिंह ने कुछ दिनों के बाद अपनी  माता जयमती का अमानवीय अत्याचार सहन कर मृत्यु वरण किये गये स्थान ( जेरेंगा पथार ) पर ‘जयसागर’ नाम से एक पोखर का निर्माण किया और उसी जयसागर के ही पास ही “जयदौल” भी निर्माण किया। सन् 1714 – 1744 तक जयमती के कनिष्ठ पुत्र शिव सिंह आहोम के राज सिंहासन पर अधिष्ठित हुए। इस प्रकार राजसत्ता परिवर्तन करने में सक्षम अत्यन्त निडर दृढ़ निश्चयी भारतीय क्रांतिकारी नारी जयमती का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षर में अंकित किया गया है। जयमती के त्याग ने समग्र नारी जाति को गौरवान्वित किया है। वैसे तो इतिहास में बलिदान के अनेको गाथाएँ पढ़ने अथवा सुनने को मिलती हैं। उन सभी का बलिदान  अपने अपने क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हैं। आत्मबलिदान की परिसीमा अधिकतम् अथवा न्यूनतम कभी नहीं होती। आखिर बलिदान तो बलिदान ही होता है, यह सदैव महानतम होता है लेकिन जयमती के बलिदान नारी जगत के लिए विशेष महत्वपूर्ण एवं राष्ट्रधर्म के साथ संलग्न तथा राज्य के लिए सुयोग्य प्रशासक पति रूपी सुराजा का चयन और नियुक्ति का मोहर है। चौदह दिन तक का भीषण प्रहार झेलकर भी भावी सुयोग्य राजधर्म पालक राजा के सपने संजोकर मृत्यु को आलिंगन करने के लिए एकबार भी पीछे नहीं हटी। उन्होंने भारतीय सनातनी नारी के पतिधर्म का भी उतना ही पालन किया जितना उन्होंने सुयोग्य राजा को बचाने के लिए किया। ऐसी महिमामयी त्यागी वीरांगना नारी जयमती की महान् त्याग को स्मरण करते हुए प्रतिवर्ष 27 मार्च के दिन पूरे असम में ” जयमती दिवस” मनाया जाता है। महान् वीरांगना नारी जयमती की असीम त्याग,  उनके दिखाए गए आदर्श तथा उनकी स्मृति हमारे बीच सदैव सजीव होकर रहेगा।

साभार  ग्रंथ:

  1. Itihase Soaura Chasahata Bachar (ইতিহাসে সোঁৱৰা ছশটা বছৰ), Sarbananda Rajkumar ,(Guwahati: Banalata,2017)
  2. Tungkhungia Buranji Or A History Of Assam 1681-1826, S K Bhuyiyan, (London:Oxford University press,1933)
  3. Deodhai Asam Buranji: with several shorter chronicles of Assam, S K Bhuyiyan, (Calcutta:Department of Historical and Antiquarian Studies Assam,1932)
  4. जयमती कुँवरी, लक्ष्मीनाथ बेजबरूवा।
  5. जयमती कुँवरी मालिता, कृपानाथ फुकन

कल्पना देवी आत्रेय कल्पना असम के नगांव जिले के हाथीखोया गांव की रहने वाली हैं। वह एक शिक्षिका होने के साथ-साथ एक गृहिणी और लेखिका भी हैं। उनके लेखन में ऐतिहासिक महिला पात्र अधिक नजर आते हैं।

लोहा बन गया हूँ मैं और पाँव ये नींव हो गए

लोहा बन गया हूँ मैं
सरल मार्गों का
अनुसरण कब किया मैंने
खाई-खन्दक से भरी जमीन पर
योद्धा बन कर गुजरा हूँ मैं
धूप में तपकर
अनगिनत रूपों में ढला हूँ मैं
वक्त ने सौंपे जो भी काम
हॅंसते हुए पूरा किया उन्हें
कभी थका नहीं
पहाड़ों पर चढ़ते हुए
लोहा बन गया हूँ मैं
आघात झेलते-झेलते

अब पाँव हमारे दुखते नहीं
ये खड़े-खड़े, अच्छे दिनों के इंतजार में
बाँस हो गए हैं
धीरे-धीरे सीढ़ी हो गए
घबराहट नहीं होती
जब कोई इन पर चढ़कर ऊपर जाता है
अपनी ध्वजा फहराता है
हम देखते रहते हैं
नहीं दुखते सचमुच हमारे पाँव
अब ये नींव हो गए हैं

नरेश अग्रवाल झारखंड के निवासी हैं और कवि और कविताओं की दुनिया में एक सुपरिचित नाम है, इनकी कविताओं के काई किताबें प्रकाशित हुई हैं

ग़ज़ल

कहां पहुंचेगा वो कहना ज़रा मुश्किल सा लगता है
मगर उसका सफ़र देखो तो खुद मंज़िल सा लगता है

कभी बाबू कभी अफ़सर कभी थाने कभी कोरट
वो मुफ़लिस रोज़ सरकारी किसी फ़ाइल सा लगता है

न पंछी को दिये दाने न पौधों को दिया पानी
वो ज़िन्दा है नहीं बाहर से ज़िन्दादिल सा लगता है

वो बस अपनी ही कहता है किसी की कुछ नहीं सुनता
वो बहसों में कभी जाहिल कभी बुज़दिल सा लगता है

नहीं सुन पाओगे तुम भी ख़मोशी शोर में उसकी
उसे तनहाई में सुनना भरी महफ़िल सा लगता है

बुझा भी है वो बिखरा भी कई टुकड़ों में तनहा भी
वो सूरत से किसी आशिक़ के टूटे दिल सा लगता है

वो सपना सा है साया सा वो मुझमें मोह माया सा
वो इक दिन छूट जाना है अभी हासिल सा लगता है

ये लगता है उस इक पल में कि मैं और तू नहीं हैं दो
वो पल जिसमें मुझे माज़ी ही मुस्तक़बिल सा लगता है

उसे तुम ग़ौर से देखोगे तो दिलशाद समझोगे
वो कहने को है इक शायर मगर नॉविल सा लगता है.

भवेश दिलशाद उर्दू शायरी और हिंदी शायरी की दुनिया में एक जाना पहचाना नाम हैं। वह मध्य प्रदेश के शिवपुरी निवासी हैं। उनकी ‘नील’, ‘सुर्ख’ और ‘सियाही’ जैसी किताबों की काफी मांग है।