स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत ऊ तिरोत सिगं

डॉ. श्रुति पाण्डडे

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास देश के हर क्षेत्र के स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के बलिदानों की गाथाओं से भरा पड़़ा है। परन्तु इनमें तमाम ऐसे वीर भी हैं जिनकी चर्चा प्रमुखता से इतिहास ग्रंथों में नहींं मिलती। इन बलिदानी वीरों ने स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना के लिये संघर्ष किया और उनके त्याग की गाथा ने आने वाली तमाम पीढ़ियों को प्रभावित किया। उनके बलिदान की कहानी हमें देश के महान आदर्शों और मूल्यों की याद दिलाती है। ऐसे ही महान वीरों में एक नाम सुदूर मेघालय के तिरोत सिंग का भी आता है।
मेघालय की खासी-जयन्तिया पहाड़ियों के नयनाभिराम सौंदर्य के बीच बसने वाली खासी जनजाति ने युगों से स्वतंत्रता की तीव्र आकांक्षा को बनाये रखा है। इसी खासी जनजाति के बलिदानी वीर तिरोत सिंग पूर्वोत्तर क्षेत्र के ऐसे महान वीर थे जिन्होंने जातीय अस्मिता की रक्षा के लिये तब संघर्ष किया था जब हमारा देश औपनिवेशिक सत्ता से आक्रांत होने की प्रक्रिया में था। हमारे देश की जनता को तब अंग्रेजी हुकूमत की चुनौती का सामना करना पड़़ रहा था। इस समय पूर्वोत्तर के पहाड़ी क्षेत्रों की अखंडता को बनाये रखने में तिरोत सिंग की महत्वपूर्ण भूमिका थी। तिरोत सिंग के नेतृत्व में अंग्रेजों के साथ हुए संघर्षों ने खासी जनमानस पर अमिट छाप छोड़ी है। त्याग, साहस और बलिदान से भरी इन वीरतापूर्ण गाथाओं का हस्तांतरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी होता रहा। परन्तु यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि तिरोत सिंग और उनके प्रतिरोध के विषय में मेघालय के बाहर बहुत कम जानकारी है।
अठारहवीं शताब्दी के अन्त से ही ईस्ट इंडिया कम्पनी ने खासी मुखियों के क्षेत्रों में घुसपैठ करनी शुरु कर दी थी। इनमें से एक मुखिया थे तिरोत सिंग, जो पूर्वोत्तर क्षेत्र के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। इन्होंने दूरदराज के खासी जनों को ब्रिटिश आधिपत्य के खिलाफ एक सूत्र में बांधा था। तिरोत सिंग और उनके साथियों ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया और छापामार (गुरिल्ला) युद्ध शैली अपना कर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में इसका कारगर उपयोग किया।
अंग्रेजी सरकार का खासी और जयन्तिया पहाड़ियों से आरम्भिक सम्पर्क आर्थिक था। सन् 1765 में बंगाल की दीवानी हासिल करने के साथ ही वे खासियों से और उनके क्षेत्र से परिचित हुए। खासी चूना खदानों से बंगाल ने प्राचीन काल से ही चूना आपूर्ति की थी और इसी कारण यूरोपीय उद्यमी खासी पहाड़ियों की ओर आकर्षित हुए।1—दीवानी का अधिकार प्राप्त करने के बाद कम्पनी ने चूना व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया। खासियों के साथ व्यापारिक आदान-प्रदान के कारण ब्रिटिश—व्यापारियों का खासी मुखियों के साथ वाणिज्यिक संबंध स्थापित हुआ।1 खासी पहाड़ियों पर ब्रिटिश—आधिपत्य के पीछे इन पहाड़ियों में अंग्रेजो की आर्थिक दिलचस्पी थी। साथ ही वे सिलहट और असम को जोड़ने वाली सीधी सड़क चाहते थे जिसे इन पहाड़ियों में से होकर गुजरना था। सन् 1824 में अंग्रेज बर्मी युद्ध में शामिल हुए। इस युद्ध का अन्त यान्दाबो की सन्धि के साथ सन् 1836 में हुआ। पूर्वोत्तर भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवादी विस्तार और आधिपत्य में इस सन्धि की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस सन्धि के परिणामस्वरूप असम पर अंग्रेजी हुकूमत का कब्जा हो गया और डेविड स्कॉट को असम का कमिश्नर नियुक्त किया गया। वे पहले से ही पूर्वोत्तर सीमान्त में गवर्नर-जनरल के एजेन्ट थे। इन गतिविधियों ने खासी इतिहास में नये अध्याय की श्ुारुआत की।
खासी जनजाति की राजनीतिक व्यवस्था लोकतांत्रिक थी। अंग्रेजों के आने से पूर्व खासी पहाड़ियों में लगभग 30 राज्य थे। इन राज्यों में एक परिषद् होती थी जिसका अध्यक्ष ‘सिएम’(मुखिया) होता था, परन्तु इन परिषदों की स्वीकृति के बिना मुखिया कोई महत्वपूर्ण निर्णय नहींं ले सकता था। इन्हीं छोटे-छोटे गणराज्यों से खासियों की राजनीतिक व्यवस्था निर्मित थी। स्वतंत्रता उनकी रगों में बसती थी। ऐसे स्वतंत्रता प्रेमी लोगों द्वारा दमनकारी विदेशी सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध खड़ा किया जाना स्वाभाविक ही था।3
अंग्रेजों के आने से पहले भी खासियों ने कई शक्तिशाली शत्रुओं के खिलाफ लड़ाईयाँ लड़ी थीं। मान, अहोम और बर्मियों के खिलाफ उन्हें संघर्ष करना पड़ा था। दक्षिणी सीमा पर मुगलों की शक्तिशाली सेनाओं के खिलाफ उन्हें लड़ाई लड़नी पड़ी थी। इन युद्धों के संघर्षपूर्ण अनुभव के कारण वे अंग्रेजों द्वारा पूर्ण आधिपत्य स्थापित करने से पूर्व वर्षों तक उनका प्रतिरोध कर सके। अलेक्जेंडर मैकेन्जी ने सन् 1869 में लिखा था, ‘‘कोसिया (खासिया) ने अपने युद्धप्रिय चरित्र और जनजातीय व्यवस्था के कारण हमें दूसरी पहाड़ी जातियों की तुलना में अधिक परेशान किया है।’’2
नौंग्खलाव युद्ध (खासी स्वतंत्रता की लड़ाई) से पहले भी खासियों ने अंग्रेजी सेना के खिलाफ कई युद्ध किए। पहला संघर्ष सन् 1774 में हुआ, जिसके बारे में अलेक्जेंडर मेकेन्जी ने सन् 1869 में लिखा कि यह सिलहट में हुए किसी संघर्ष का परिणाम था। इसी प्रकार सन् 1778 के ब्रिटिश रिकार्डों में अंग्रेज सेनाओ ंऔर चेरा-मौसमाई तथा शेला राज्यों के बीच हुए संघर्षों का विवरण है।5
जयन्तिया और शिलांग इन पहाड़ियों में स्थापित होने वाले पहले राज्य थे। दूसरे राज्यों की स्थापना तब हुई जब इन दोनों राज्यों से लोग कम जनसंख्या वाले पश्चिमी क्षेत्रों की ओर बढ़ने लगे। यहाँ एक के बाद एक कई राज्यों की स्थापना हुई। इस समय से खासी राज्यों ने बांग्लादेश और असम के अन्य राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध कायम किये। उनके बीच व्यापारिक तथा वाणिज्यिक संबंध भी बने। किन्तु बाद में सीमा-विवाद के कारण खासी राज्यों के उत्तर में मान तथा बर्मा से तथा दक्षिण में मुगलों और अंग्रेजों से कई युद्ध करने पड़े। मुगलों और अंग्रेजों जैसी साम्राज्यवादी शक्तियों ने जब असम और बांग्लादेश के मैदानेां में घुसपैठ करना प्रारंभ किया तो खासी पहाड़ियों के इन छोटे, स्वतंत्र राज्यों ने आपस में एकजुट होकर उनसे मोर्चा लिया। इस प्रकार उनमें एक प्रकार का गठबन्धन हो गया।
सन् 1765 में मुगलों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) की दीवानी दी, जिसकी सीमा दक्षिण में खासी और जयन्तिया पहाड़ियों से लगी हुई थी और गोआलपाड़ा तक फैली थी। इस प्रकार अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में अपनी जड़ें जमा लीं। सन् 1819 में डेविड स्कॉट को गोआलपाड़ा भेजा गया। स्कॉट ने सुझाव दिया कि पूर्वी बंगाल में मैमन सिंह और असम में गोआलपाड़ा को जोड़ने वाली सड़क बनाई जाए। डेविड स्कॉट ने इस समय तक खासी और जयन्तिया पहाड़ियों की स्थितियों का गहराई से अध्ययन किया था। उन्होंने समझ लिया था कि खासी शासकों की एकता का कुशल नेतृत्व एक ही व्यक्ति कर सकता है और वे हैं तिरोत सिंग, नौंग्ख्लाव के सिएम, जो एक तेजस्वी राजा, कुशल प्रशासक, परिपक्व राजनीतिज्ञ और असाधारण नेता थे।
तिरोत सिंग का जन्म अठारहवीं शताब्दी के अन्त में नौंग्ख्लाव में हुआ था। उनकी माता का नाम का क्सान सिएम और पिता का नाम खीन कोनगोर था जो लाइट लिंगकोट के नौग्किनरिह ग्राम के नौंगकिनरिह खानदान के थे।6 अपनी युवावस्था में तिरोत सिंग गठीले बदन के लम्बे और सुदर्शन युवक थे। वे अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग में दक्ष व कुशल घुड़सवार थे तथा तीरंदाजी, तैराकी और शिकार के शौकीन थे। राजा बनने के पहले राजा छतरसिंग के शासन काल से ही उन्होंने राजकार्य में गहरी दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी थी। उप सिएम के रूप में तिरोत सिंग नौंग्ख्लाव राज्य के सबसे सक्षम प्रशासकों में से एक थे। उस समय उन्होंने अपने साहस, रणकौशल और अद्वितीय संगठनशक्ति का परिचय दिया था। स्थानीय विवादों का निपटारा करने की उनकी क्षमता और उनकी प्रशासनिक योग्यताओं ने उन्हें सभी के आदर का पात्र बना दिया और कई योग्य तथा क्षमता-सम्पन्न व्यक्ति उनके मित्र बन गये। बचपन से ही प्रतिभा सम्पन्न तिरोत सिंग को अपने मार्गदर्शकों तथा परामर्शदाताओं से बहुत ही बातें सीखने को मिलीं तथा उन्होंने युद्धकला, व्यूहरचना, कूटनीति आदि में अद्भुत योग्यता हासिल कर ली।7
कोनराय सिंग ऊर्फ छतर सिंग सिएम के देहान्त के बाद नौंग्ख्लाव के पाँचों लिंगडो (पाँच प्रमुख कुलों के प्रतिनिधि) को राजवंश के राजकुमारों में से एक को राजा चुनना था। छतर सिंग का भतीजा और उत्ताराधिकारी नाबालिग था। राज्य की स्थिति विषम थी और प्रजा को एक ऐसे सिएम की आवश्यकता थी जो उसे स्थिर और कुशल नेतृत्व प्रदान कर सके। पाँचों लिंगडो ने एक मत से तिरोत सिंग का चुनाव किया और यह फैसला किया कि तिरोत सिंग के बाद रिजोन सिंग उनके उत्ताराधिकारी होंगे।
राजकुमार के रूप में तिरोत सिंग ने अपने राज्य के मैदानी भागों पर हुए हमलों का सामना किया था। राजा के रूप में उनका पहला महत्वपूर्ण कदम था नौंग्ख्लाव के राज दरबार (हिमा) का आयोजन जिसमें पूरे राज्य के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस दरबार में उन्होंने अपने राज्य की और विस्तृत अर्थ में पूरे खासी क्षेत्र की स्वतंत्रता और स्वायातता पर मंडरा रहे खतरे के प्रति सचेत किया। उन्होंने खासी युवकों से अनुरोध किया कि वह आसन्न संकट को ध्यान में रखते हुए अपने आपको मातृभूमि की रक्षा के लिये सन्नद्ध रखें। उन्होंने प्रजाजन से अनुरोध किया कि वे छोटे-मोटे मतभेदों को भुलाकर एकजुट हो जायें। उनकी अपील का लोगों पर प्रभाव पड़ा और वे अपने-अपने गाँवों में वापस जाकर अपने आपको तैयार करने लगे। शासक के रूप में तिरोत सिंग की यह पहली सफलता थी।
राज्य के आंतरिक प्रशासन में तिरोत सिंग सिएम ने कई परिवर्तन किये। अपने सम्पूर्ण राज्य में उन्होंने विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया शुरु की। राजदरबार ने स्थानीय दरबारों को यह शक्ति प्रदान की कि वे गाँवों के प्रशासन का दायित्व संभाल सकें। इस दौरान नौंग्ख्लाव राज्य ने पड़ोसी खासी राज्यों के साथ सभी सीमा विवाद सुलझा लिये। आसपास के क्षेत्रों के साथ व्यापारिक संबंधों की महत्ता को ध्यान में रखते हुए तिरोत सिंग ने पड़ोसी खासी राज्यों से व्यापारिक संबंधों को सुदृढ़ बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत की।
असम में अपने शासन को संगठित करते समय अंग्रेजों ने खासी हिल- असम सीमा के दुआरों को अपने कब्जे में ले लिया। ये दुआर खासी शासकों के अधीन थे। खासी मुखियों ने पाया कि वे उन दुआरों के अधिकारों से वंचित हैं जो उनकी रोजमर्रा के सामानों की आपूर्ति का मुख्य जरिया था। उन्होंने सीमा पर उर्वर कृषि भूमि खो दी थी और व्यापार भी अंग्रेजों के हाथ में चला गया था। अंग्रेज खासी मुखियों के पारम्परिक अधिकारों में भी हस्तक्षेप करते थे। दुआरों में सबसे महत्वपूर्ण बोरदुआर था जो नौंग्ख्लाव राज्य के अधीन था। तिरोत सिंग ने अपने पुश्तैनी क्षेत्र को अंग्रेजों द्वारा हड़पे जाने पर विरोध व्यक्त किया।
सन् 1824 में असम में ब्रिटिश आधिपत्य स्थापित हाने के बाद डेविड स्कॉट ने असम और सिलहट के बीच खासी पहाड़ियों से होकर सीधी यातायात सुविधा के लिये प्रयास शुरू किये। सैन्य दृष्टिकोण से इस योजना का विशेष महत्व था, क्योंकि इससे तीन महीने के बजाय तीन सप्ताह में ही यह दूरी तय की जा सकती थी। सैनिक लाभ के अतिरिक्त स्कॉट की और भी कई योजनाएं थीं। इस क्षेत्र में ब्रिटिश प्रभाव के स्थापित हो जाने से उन छोटे-मोटे खासी मुखियों का प्रभाव खत्म हो जाने की संभावना थी जो सिलहट सीमा के आसपास प्रभावशाली थे।
स्कॉट ने सीमा क्षेत्रों के बाजारों में खासियों से सभी व्यापारिक संबंध समाप्त कर दिये। साथ ही उन्होंने ब्रिटिश सेनाओं को खासी और जयन्तिया पहाड़ियों के दोनों ओर इकट्ठा होने का आदेश दिया। किसी संभावित विद्रोह को ध्यान में रखकर यह कदम उठाया गया था। इन राज्यों की अर्थव्यवस्था अंग्रेजों की आर्थिक नाकेबन्दी के कारण चरमराने लगी। ऐसी स्थिति में स्कॉट ने सुनियोजित योजना के तहत तिरोत सिंग से अपने एजेंट मेघनारायण के माध्यम से बातचीत करनी शुरू की। तिरोत सिंग ने एजेंट को आश्वस्त किया कि वे प्रस्ताव पर विचार करेंगे। वे जानते थे कि आर्थिक नाकेबन्दी का कायम रहना जनता के हित में नहींं होगा। स्कॉट के प्रस्ताव पर विचार करने के लिये राजदरबार का आयोजन नवम्बर 1826 में नौंग्ख्लाव में हुआ। डेविड स्कॉट ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रतिनिधि मंडल के अध्यक्ष के रूप में नौग्ख्लाव आए। अन्त में समझौता किया गया जिसके तहत तिरोत सिंग ने न केवल ब्रिटिश सेनाओं को अपने क्षेत्र में आवागमन की सुविधा दी, बल्कि रसद पहुंचाने का भी वादा किया। अंग्रेज सरकार की ओर से स्कॉट ने राजा को विदेशी शत्रुओं से बचाने का वादा किया और आन्तरिक प्रशासन के मामले में दखल न देने का आश्वासन दिया। इस समझौते को गवर्नर-जनरल की स्वीकृति मिलने के साथ ही सड़क का निर्माण होने लगा और स्कॉट की इच्छानुसार नौंग्ख्लाव में एक बंगला भी बनाया गया। पर संकट के बादल खासी पहाड़ियों पर मंडरा रहे थे और समझौते के डेढ़ वर्ष के भीतर दुखद घटनाओं का दौर शुरू हो गया।
नौंग्ख्लाव से होकर सड़क बनने के साथ ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने उसका उपयोग शुरू कर दिया। कुछ समय तक सब कुछ ठीक-ठाक रहा और स्कॉट तथा तिरोत सिंग अच्छे मित्र बन गये। राजा की माता स्कॉट को पुत्रवत मानती थीं। पर दुर्भाग्य से यह मित्रता बहुत दिनों तक न चल सकी। तिरोत सिंग और स्कॉट के बीच संबंध बिगड़ने लगे। राजस्व की वसूली को लेकर दोनों पक्षों में कुछ विवाद हुआ। इसी दौरान नौंग्ख्लाव राज्य से लगे मैदानी क्षेत्र को लेकर तिरोत सिंग और रानी के मुखिया बलराम सिंग के बीच विवाद शुरू हो गया। समझौते के अनुसार तिरोत सिंग ने अंग्रेजों से बलराम सिंग के खिलाफ कारवाई करने का अनुरोध किया। अंग्रेजों द्वारा मदद न मिलने को तिरोत सिंग ने समझौते को उल्लंघन माना। साथ ही नौंग्ख्लाव और कामरूप की सीमा पर अधिक सैनिकों की तैनाती और अंग्रेजों द्वारा अधिक संख्या में भवन बनाये जाने को लेकर तिरोत सिंग को आशंका हुई। इस प्रकार की घुसपैठ पर आपत्ति किये जाने को अंग्रेजों ने रुखाई से नजरअंदाज कर दिया। अंग्रेजों का यह रूखा और अवज्ञापूर्ण व्यवहार तिरोत सिंग और उनके साथियों को नागवार गुजरा।
सबसे ताकतवर राज्यों में से एक मिलियम राज्य के सिएम बोर मानिक ने कुछ अन्य मुखियों के साथ मिलकर तिरोत सिंग के सामने एक प्रस्ताव रखा। यह प्रस्ताव असम तथा पहाड़ी क्षेत्रों के राजाओं से मिलकर विदेशियों को खदेड़ने का था। डेविड स्कॉट मार्च 1829 के अन्त में नौग्ख्लाव में ही थे और उन्हें आसन्न संकट की भनक लग गयी। वे तुरन्त सोहरा (चेरापूँजी) के लिए रवाना हुए ताकि कलकात्ता के उच्चाधिकारियों को सूचना भेजी जा सके। परन्तु उन्हें तिरोत सिंग से किसी खतरे की उम्मीद नहींं थी। इधर तिरोत सिंग पर सभी ओर से दबाव बढ़ रहा था। कामरूप और गोआलपाड़ा में रह रहे गारो और खासी लोगों ने उनसे शिकायत की कि सरकार उनके क्षेत्र में घुसपैठ कर रही है और राजस्व की मांग कर रही है। बोर मानिक और अन्य खासी मुखियों ने शिकायत की कि कामरूप और सिलहट के मैदानी क्षेत्रों में स्थित उनकी भूमि पर अंग्रेजी ने जबरन कब्जा कर लिया है। उनके अपने रिश्तेदार और सरदार शिकायत कर रहे थे कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सैनिक और अधिकारी स्थानीय लोगों से बुरा बर्ताव कर रहे हैं।
तिरोत सिंग इन शिकायतों को अपने मित्र डेविड स्कॉट तक पहुंचा रहे थे। परन्तु उन्होंने पाया कि स्कॉट द्वारा स्थिति को बेहतर बनाने की तमाम कोशिशों का कोई ठोस नतीजा नहींं निकल पा रहा था। स्कॉट दोषियों को हटाते, उन्हें दण्ड देते, परन्तु उनके स्थान पर जिन लोगों को नियुक्त करते, वे हटाये गये लोगों की तरह ही बुरा बर्ताव करते। अन्त में तिरोत सिंग के सामने अपने साथी मुखियों और सरदारों का प्रस्ताव मानकर अंग्रेजों को भगाने की योजना बनाने के सिवा कोई उपाय न बचा। इसी बीच डेविड स्कॉट ने बोर मानिक तथा अन्य खासी मुखियों की योजनाओं पर पानी फेरने की सोची। उनका ख्याल था कि बोर मानिक को परास्त कर देने के साथ ही तिरोत सिंग तथा अन्य खासी मुखियों का हौसला अपने आप पस्त हो जाएगा। इधर बोर मानिक ने खासी राज्यों की एक परिषद् का संगठन किया जिसमें तिरोत सिंग को सर्वसम्मति से खासी क्षेत्र की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कोई भी निर्णय लेने का अधिकार दिया गया।
4 अप्रैल 1829 को तिरोत सिंग ने खासी योद्धाओं की एक टोली को अंग्रेजों पर हमला करने के लिये भेजा। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध की घोषणा करके लेफ्टिनेंट बर्लटन बचे हुए सैनिकों के साथ कामरूप भागने की कोशिश में मारे गये। इसी बीच खासी योद्धाओं ने नौंग्ख्लाव में सरकारी इमारतों और स्वास्थ्य लाभ केन्द्र को जला दिया। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा कैद किये गये बंदियों को छुड़ा दिया।

डब्लू डब्लू हंटर, “अ स्टैटिस्टिकल अकाउंट ऑफ असम”, 205-206.
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जर्ली टारियांग, तिरोत सिंग, (न्यू दिल्ली: नेशनल पब्लिकेशन, 1990), 9
वही, 10.
वही, 16.
हैमलेट बरेह, तिरोत सिंग, 20.
डॉ. श्रुति पाण्डेय: सह आचार्य एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, शिलांग कॉलेज, शिलांग

मेघालय की स्वतंत्रता सेनानी:फान नोंगलाईत

भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन का इतिहास भारतियों के संघर्ष की अद्भुत गाथा है। भारतीय इतिहास के गौरवपूर्ण अध्याय के निर्माण में जितना सहयोग पुरुषों का रहा, वहाँ स्त्रियों का भी कम नहींं हैं। हजारों लोग ब्रिटिश अत्याचार के तहत मारे गए हैं और महिलाओं ने भी तत्कालीन रूढ़िवादी समाज को छोड़ स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। 1857 का आन्दोलन पूरे भारत की एकता का उदाहरण कहा जा सकता है। यह वह समय था जब रानी लक्ष्मी बाई ने अपनी दिलेरी, पराक्रम और वीरता का परिचय दिया था। इनके अलावा स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय जागृति में सरोजिनी नायडू, कमला नेहरू जैसी महिलाओं की भागीदारी और बलिदान अविश्वसनीय और प्रशंसनीय है। उनकी भागीदारी ने युवा रक्त को आंदोलन में स्थानांतरित कर दिया और अपने आत्मबल से वे निर्दयी ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्ति के सामने निडर खड़ी रह।
मेघालय प्रांत ने भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कई शानदार अध्याय देखे। यहाँ जो प्रसिद्ध क्रांतिकारी वीर हुए उनमें तिरोत सिंग, कियांग नांगबाह और पा तोगन सांगमा प्रमुख थे, जिनकी वीरगाथा आज भी यहाँ के लोगों को गौरवान्वित करती हैं। इन्होने देश को आज़ाद करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इनके अतिरिक्त यह समाज एक ऐसी महिला को भी याद करती हैं जिन्होंने नारी शक्ति का दृष्टांत देकर ब्रिटिश को सबक सिखाने का महत्वपूर्ण कार्य किया और यह महिला थी फान नोंगलाइत।
फान नोंगलाईत वेस्ट खासी हिल्स जिले के रम्मई गांव से थी, जो नोंग़ख्लाव साम्राज्य के अंतर्गत आता है और उनके कई वंशज अब भी इस गाँव में रहते हैं। इनकी दो बेटियां थी जिनका नाम था लाशेर्मों और लाकेरमों। लाशेर्मों और लाकेरमों की एक एक बेटी थी। लाकेरमों की बेटी थी-मिसलिन्दा नोंगलाईत जिनसे हुई मक्देलिन नोंगलाईत।
1800 ई. में नोंगख्लाव साम्राज्य के ‘स्यिएम’(अर्थात राजा या चीफ़) तिरोत सिंग अपने लोगों से बहुत प्यार करने वाले एक दूरदर्शी नेता थे। इसलिए जब डेविड स्कॉट के नेतृत्व वाले ब्रिटिश ने उन्हें गुवाहाटी से सिलहट को जोड़ने वाली सड़क बनाने के प्रस्ताव के साथ संपर्क किया, तो उन्होंने इस विचार का स्वागत किया। जिस तरह छल कपट से भारत के अन्य राज्यों पर अंग्रेज़ों ने कब्ज़ा किया था, उसी प्रकार डेविड स्कॉट ने भी स्यिएम तिरोत सिंह से दोस्ती कर डेविड स्कॉट मार्ग बनाने को राज़ी कर लिया ।
लगभग 18 महीनों तक कार्य सुचारू रूप से आगे बढ़ा। अधिकारी—स्थानीय लोगो के साथ घुलने मिलने लगे और सौहार्द्रपूर्ण संबंध बनाए रखा। लेकिन 1829 में लोगो को समझ में आ गया कि यह सड़क बनाने के पीछे ब्रिटिशों का कोई गुप्त मकसद है। स्पष्ट हो गया था कि वे स्थानीय लोगों पर कर लगाने की योजना बना रहे थे और सड़क के बन जाने के तुरंत बाद उन्हें अपने अधीन कर लेंगे। यह भी कहा जाता हैं कि जो ब्रिटिश सिपाही थे, वे स्थानीय महिलाओं के साथ कुकर्म करते थे। उनके द्वारा स्त्रियों के ऊपर ही नहींं बल्कि पुरुषों, बच्चो, और बूढो के ऊपर शोषण भी आम बात—बन गयी थी। पर फान नोंगलाईत ऐसी महिला थी जो सामना होने पर इन सिपाहियों का मुँह तोड़ जवाब देती थी। वह निडर होकर सदैव अपनी नारी होने की प्रतिष्ठा और गौरव को बचाने का प्रयास करती थी। एक दिन इनसे जब फान नोंगलाईत का सामना हुआ तो वह समझ गयी थी कि अब इन अंग्रेज सिपाहियों के शोषण की सीमा पार हो चुकी है। यहाँ स्यिएम तिरोत सिंग भी समझ गये कि उन्होंने डेविड स्कॉट से दोस्ती कर बहुत बड़ी गलती की है। अंग्रेज सिपाहियों के खिलाफ युद्ध का ऐलान वे करके देते हैं। यह सब देखकर सिपाहियों की कुछ और टोली को माइरांग से वापस नोंग्ख्लाव लाने की योजना बनी, जिसकी जानकारी फान नोंग्लाईत ने यहाँ के सिपाहियों को दिया। तिरोत सिंग के सिपाहियों में जिनका नाम इतिहास में सबसे ज्यादा सुना और पढ़ा जा सकता है वे थे मोंभुत। माइरांग और नोंग्ख्लाव के रास्ते में लांगस्तीहरिम नामक जगह में एक झरना है, जहाँ लोग आराम करने बैठते थे। फान नोंग्लाईत ने मोंभुत के सिपाहियों के साथ वहाँ उन्हें दबोचने की योजना बनायी। जब अंग्रेज सिपाही वहाँ आराम करने रुके तो फान नोंगलाईत ने तिरोत सिंग के सिपाहियों को छुप जाने को कहा। वह उन अंग्रेज सिपाहियों के पास जाकर, उन्हें शराब पिलाकर उन्हें रिझाने और बहकाने लगी। अंग्रेज़ों के हथियारों को एक जगह जमा करके वह पानी में फेंकने—लगी। अंग्रेज सिपाही जब पूरी तरह से नशे में धूत हो गये तो फान नोंग्लाईत ने मोंभुत और अन्य सिपाहियों को बुलाया। और कहा जाता है कि उस दिन बत्तीस अंग्रेज सिपाहियों के सर धड़ से अलग कर दिए गए। उनकी याद में इस झरने को “फान नोंगलाईत फॉल्स” कहा जाता है जो माइरांग से दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।
आज भी उनके बर्तनों और उनके घर को सुरक्षित रखा है। इतना ही नहींं उनकी याद में माइरांग गाँव में “का फान नोंगलाईत मेमो स्कूल” की स्थापना हुई और साल 2017 को प्रचलित ‘लेडी ह्य्डेरी पार्क’ का नाम ‘का फान नोंगलाईत पार्क’ में बदलकर ‘खासी छात्र संघ’ ने इस बहादुर स्त्री को श्रद्धांजलि अर्पित किया।
परमात्मा ने स्त्रियों के भीतर अद्भुत शक्ति प्रदान कि है। नारी अगर ममता का प्रतीक हैं तो असुरों का नष्ट करने वाली काली भी बन सकती है। फान नोंगलाईत ने भी अपने कार्यों से यह जताया है कि स्त्री शक्ति के मुकाबले कोई और शक्ति नहींं है। यह कहना गलत न होगा कि जब भी भारत की स्वतंत्रता में महिलाओं की भूमिका का जिक्र हो तो फान नोंगलाईत का नाम भी उनमें शामिल होना चाहिए।

डायाफिरा खारसाती
पी एच.डी शोधार्थी,
पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय

सिक्किम के बौद्ध धर्मावलम्बियों में मास्क नृत्य (छाम) की प्रासंगिकता

भारत अपनी संस्कृति और सामाजिक विविधता के लिए विश्व भर में जाना जाता है, जितने राज्य उतने रंग, उतनी विविधता। भारत के पूर्वोत्तर में स्थित राज्यों में ये विविधता अपने अधिकतम रूप में हमारे सामने आती है। सिक्किम पूर्वोत्तर का प्राकृतिक छटा से भरपूर एक छोटा सा राज्य है। एक ऐसा राज्य जिसकी भौगोलिक सीमा कई देशों की सीमा से लगी हुई है। सिक्किम, नेपाल की पश्चिमी सीमा सिंगली ला, उत्तर -पूर्व में चीनी तिब्बत के छोह ला और दक्षिणी भाग पश्चिम बंगाल से लगा हुआ है। संसार की दूसरी सबसे बड़ी चोटी कंचनजंगा के पदचिन्ह इस राज्य को छूते हैं। 16 मई 1975 में भारत—का बाईसवा राज्य बनकर इसने भारत के भौगोलिक क्षेत्र को विस्तार दिया। यह भारत के लघुतम राज्यों में से एक है, जिसकी जनसंख्या भी न्यूनतम है और क्षेत्रफल की दृष्टि से यह भारत में गोवा के बाद दूसरा छोटा राज्य है।
भारत विभिन्न जातियों का संगम स्थल है और इसी की सबसे पुरजोर प्रतिध्वनि सिक्किम की भूमि में प्रतिफलित होती है,—सिक्किम में निवास करने वाली जातियों में लेप्चा मूल निवासी माने जाते हैं। उनके साथ भूटियाऔर नेपाली जातियाँ यहाँ निवास करती हैं। नेपाली जाति के अंतर्गत कई जाति और जनजातियाँ शामिल हैं। सिक्किम में लगभग सोलह सत्रह जातियाँ निवास करती हैं। स्थानीय लोगों के अलावा सिक्किम में सरकारी नौकरी, व्यापार और सेना से सम्बद्ध देश के विभिन्न भागों से भारी संख्या में लोग यहाँ बसते हैं। हिन्दू, बौद्ध, सिख, ईसाई, मुस्लिम, दुनिया में विकसित सभी धार्मिक संप्रदाय के लोग सिक्किम में हैं, परन्तु साम्प्रदायिक वैमनस्य की स्थिति कतई देखने को नहींं मिलती।—
सिक्किम कहने से लेप्चा, भूटिया, लिम्बू जातियों का ध्यान सबसे पहले—आती हैं, यही वो प्राचीन जातियाँ हैं जो सिक्किम के मूल निवासी के रूप में जाने जाते हैं । इनके प्राचीन समय से ही यहाँ होने का और महत्वपूर्ण योगदान का ऐतिहासिक प्रमाण मिलता है। सिक्किम में लेप्चा, भूटिया और लिम्बू के पश्चात नेपाली जातियों का आगमन हुआ है, जिसकी संख्या राज्य की जनसंख्या का 80 प्रतिशत है।—नेपाली जाति के भीतर कई उपजातियां आती हैं जिनमें गुरुंग, तामंग, नेवार, मगर, राई, लिम्बू, सुनुवार, शेरपा, कुलुंग, थामी, भुजेल, माझी जातियाँ आती हैं। इनमें गुरुंग, तामंग, शेरपा जातियाँ भी बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। एक बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म को मानने वाले इस प्रान्त में रहते हैं। लगभग राज्य के 28% लोग बौद्ध धर्म को मानते हैं।
सिक्किम के लोग बहुत सरल सहज स्वभाव के होते हैं। धर्म और उससे जुड़े संस्कारों का निर्वाह सभी अनुयायियों और भक्तों के द्वारा अपने सामर्थ्य के अनुसार किया जाता है। महात्मा बुद्ध के साथ बोधिसत्वों को भी यहाँ लोग पूजते हैं, जिनमें गुरु पद्मसंभव का विशेष महत्त्व है। बौद्ध धर्मावलम्बी अपने परिवार में से एक सदस्य को बौद्ध भिक्षु बनाने का प्रयास करती हैं क्योंकि वे मानते हैं कि धर्म उनके इहलौकिक जीवन—में ही नहींं बल्कि मृत्यु के बाद के जीवन में भी मदद करता है। सिक्किम में लगभग 75 बौद्धमठ हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि आठवी शताब्दी में गुरु पद्मसंभव ने सिक्किम का दौरा किया था और उनके प्रयास से ही सिक्किम में बौद्ध धर्म का प्रचार संभव हुआ। ऐसी किंवदंती बौद्ध धर्मावलम्बियों में प्रचलित है कि गुरु पद्मसंभव के आगमन से पूर्व सिक्किम की धरती मनुष्य के रहने योग्य नहींं था । प्रेतात्माओं ने इस भूमि को अपना गढ़ बना रखा था, मनुष्य समाज इनकी उपस्थिति से बहुत पीड़ित हुआ करती थी। सिक्किम वासी गुरु रिम्बुछी अर्थात्‌ गुरु पद्मसंभव के ऋणी हैं क्योंकि उनके प्रयास से प्रेतात्माओं को वश में किया गया। गुरु पद्मसंभव ने अपनी तांत्रिक शक्ति के माध्यम से सभी प्रेतात्माओं को अपने अधीन किया और यहाँ से प्रस्थान करने से पूर्व सभी प्रेतात्माओं को इस भूमि के संरक्षण का दायित्व सौंप गए। एक एक—प्रेतों के लिए विशेष क्षेत्रों का निर्धारण किया गया। जैसे किसी को पहाड़ों का देवता, किसी को वन जंगल, ऐसे अनेकों क्षेत्रों में उनके कर्म क्षेत्र का विभाजन कर उनकी हिंसक शक्ति को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया। अब वे देवता की स्थिति में आ गए।—यहाँ की स्थानीय जनजाति अपने पर्व त्यौहारों में किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में उन संरक्षक देवताओं को स्मरण करती हैं, उन्हें सेर्केम (चढ़ावा, भेंट) चढ़ाती हैं। वर्ष में एक बार अपने उन संरक्षक (ज़िब्दा) देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पूजा-पाठ, दान दक्षिणा का काम—करते हैं। परिवार में जब किसी व्यक्ति की तबियत ख़राब होती है, तब—सबसे पहले उन्हीं देवताओं की पूजा की जाती है तत्पश्चात ही अस्पताल में उस बीमारी का इलाज आरम्भ होता है।
महायान बौद्ध धर्म का आगमन सिक्किम में आठवी शताब्दी में गुरु पद्मसंभव के द्वारा हुआ था, उस समय सिक्किम में नामग्याल वंश के छोगयाल (राजा) का शासन था।—छोगयाल के संरक्षण में कई बौद्ध मठ और स्तूपों का निर्माण किया गया। उस समय बौद्ध धर्म को सिक्किम का राजधर्म भी घोषित किया गया था। महायान बौद्ध धर्म की सभी शाखाओं न्यिंगमापा, काग्युपा, साक्यापा और गेलुक्पा को मानने वाले यहाँ निवास करते हैं,—सिक्किम में कई बौद्ध साहित्य उपलब्ध हैं। यहाँ की स्थानीय जनजातियों के जीवन में धर्म का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है । उनके सभी पर्व, उत्सव धर्म पर केन्द्रित हैं। इनके द्वारा मनाए जानेवाला पर्व—“गुरु रिम्बुछी ठुनकर छिछु”—तिब्बती केलेंडर के छठे महीने की 10 तारीख़ को “महा गुरु पद्मसंभव” के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। इसमें मठों और घरों में पूजा-पाठ होते है, गुरु पद्मसंभव की भव्य मूर्ति को उठाए भक्त गण रैली निकालते हैं और लोग बड़े उत्साह के साथ इसमें भाग लेते हैं। वे इस भव्य मूर्ति के दर्शन भर से—समझते हैं कि गुरु का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हो गया है।—“पांग लाब्सोल” एक अनोखा पर्व है। यह पर्व भूटिया और लेप्चा भाईचारे और मैत्री संधि से संबंधित है। जो 13 शताब्दी में पर्वत कंचनजंगा को साक्षी मानकर लेप्चा प्रमुख थेकोंग थेक और भूटिया प्रमुख खये बुम्सा के मध्य संपन्न हुई थी। “फुम्छु”—पर्व तिब्बती केलेंडर के प्रथम महीने के 14वें दिन मनाया जाता है। यह भी एक धार्मिक पर्व है। “ल्हाबाब थिंचे”, “थूको छिजी”, “सागा दावा” – इन सभी पर्वों का सम्बन्ध भी बौद्ध धर्म से संबंधित है। निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि इनके उत्सव और खुशियों में सदैव धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।—मठों में बसने वाले गुरुओं का दर्शन किया जाता है। घरों में बौद्ध भिक्षुओं को आमंत्रित कर पूजा अर्चना और देवताओं को प्रसाद चढ़ाया जाता है। इन्हीं धार्मिक पर्वों में विशेष अवसर पर छाम नृत्य का भी आयोजन किया जाता है।
छाम नृत्य का संबंध बौद्ध अनुयायियों से संबंधित—है।—इन नृत्यों में नर्तक के द्वारा चेहरे में विशेष तरह का मास्क पहना जाता है। प्रतीकों के रूप में इन मास्क का प्रयोग होता है। इन नृत्यों के माध्यम से वे अपने जीवन और मृत्यु संबंधित धारणाओं को अभिव्यक्त करते हैं। कईयों के लिए यह नृत्य आज भी रहस्यमय हैं।
मास्क नृत्य मठों में संपन्न होता है। जितने भी बड़े बौद्ध मठ हैं, उनमें मास्क नृत्य का आयोजन होता है। इसके आयोजन में बहुत श्रम लगता है। राज्य के दूर दराज के क्षेत्रों से लोग बड़े उत्साहित होकर इसमें सम्मिलित होते हैं, यहाँ तक कि विदेशों से भी बौद्ध धर्मावलम्बी इन आयोजनों में भाग लेते हैं। दिन भर होने वाले इन रंगारंग कार्यक्रम का लोग आनंद लेते हैं। छोटे और युवाओं को इस नृत्य के प्रति उत्साह का कारण मनोरंजन हो सकता है, पर यह मास्क नृत्य असल में—भक्तोंको शिक्षित करने का एक माध्यम है।—
मास्क नृत्य (छाम)
छाम का शाब्दिक अर्थ धार्मिक नृत्य है। यह विशेष अवसर पर बोद्ध मठों में बोद्ध भिक्षुओं द्वारा किया जाने वाला नृत्य—यह एक तांत्रिक योग अनुष्ठान और ध्यान की प्रक्रिया है, जो मन और शरीर को एकाग्रता की और ले जाती है।—उसी एकाग्रता में नृतक को अपने देवताओं को पहचानना होता है, उन्हें अपने मानस बिम्ब में उतारना होता है और उनकी हाव भाव और प्रकृति को जनसभा के समक्ष—प्रदर्शित करना पड़ता है। इस नृत्य में शरीक होने वाले नृतकों के मास्क में बने चेहरे देवता और राक्षस दोनों के होते हैं। ध्यान से देखे तो इन—में बने चेहरों को कुछ चेहरे भगवान के चेहरों के समान, शांत, स्वच्छ और महिमा से मंडित होते हैं वहीँ कुछ चेहरे भयानक, क्रोध से युक्त होते हैं और कुछ चेहरे जानवरों के बने रहते है। इनमें जो शांत है उनकी प्रभामंडल में आभा है और जो क्रोधित हैं उनके चेहरे के आस पास क्रोध के चिह्न के रूप में चेहरे की चारों और आग का गोला है। वर्ष में दो बार छाम का मंचन मठों में किया जाता है। बोद्ध भिक्षु कई सप्ताह पहले से इसकी तैयारी में लग जाते हैं।—भिक्षु हफ़्तों तक ध्यान करते हैं, मनुष्य की सुरक्षा करने वाले देवताओं की कल्पना होती है और उनका आह्वान करते हैं। छाम के मंचन वाले दिन वे खुद को देवताओं के रूप में मंचित करते हैं।—नृत्य के समय पवित्र मन्त्रों का जाप होता है और ऐसी मान्यता है कि इससे निर्मित भव्य वातावरण में इकट्ठी भीड़ और उसके आस पास के इलाकों की नकारत्मक शक्तियां खिंची चली आती हैं, जिसको वश में करने का कार्य भी इस नृत्य की अगुवाई करने वाले करते हैं।
नर्तक इस अवसर पर ऊपर से नीचे तक रेशम का चमकीला परिधान पहनते हैं, उस पर सभी के चेहरों में भिन्न भिन्न मास्क या मुखौटा लगा होता है। कई बार नृत्यों में नर्तक के हाथ में उस देवता और राक्षस से—सम्बन्धित विशेष आनुष्ठानिक वाद्य यंत्र और अस्त्र होता है । कई बोद्ध भिक्षु हाथों में धार्मिक अनुष्ठान में बजाया जाने वाला वाद्य बजाते हैं जिसमें बाँसुरी जैसे यंत्र के साथ ढोल, ड्रम जैसे कई वाद्य यंत्र होते हैं। इन सबके एक साथ बज उठने से माहौल में—रौनक आ जाती है। यह वाद्य यंत्र जहाँ नर्तक के लिए एक लय और ताल उत्पन्न—करती है, वहीँ वातावरण में मौजूद नकारत्मक उर्जा को अपनी आवाज से—पवित्र करने का काम भी साथ ही साथ होता जाता है।
नृत्य करने से पूर्व लामाओं द्वारा आटे का एक मानव पुतला बनाया जाता है और नृत्य के माध्यम से आस पास के माहौल से जो नकारत्मक शक्तियां—आती हैं उन्हें उसी पुतले में आकर्षित किया जाता है और नृत्य में अगुवाई करने वाले छाम मास्टर उन बुरी शक्तियों को शान्ति और मुक्ति का रास्ता दिखाते हैं। नृत्य के अंत में उस पुतले को काटकर बुराई के अंत की घोषणा होती है। यह छाम प्रदर्शन कई दिनों तक चलता है। इकट्ठी जन सभा इस नृत्य को देखकर एक सकारत्मक उर्जा के साथ अपने घरों में लौटते हैं।
छाम के सम्बन्ध में कहा जाता है कि मूल छाम में पैरों का काम कम रहता था, अपनी आनुष्ठानिक वेशभूषा में लामा मठों के प्रांगण में जटिल मुद्राएँ बनाकर धीरे धीरे चला करते थे । पहले छाम का प्रदर्शन जनसामान्य के समक्ष नहींं होता था,—बोद्ध भिक्षुओं को भी इससे अलग रखा जाता था परन्तु बाद के दिनों में जनसामान्य के समक्ष इसकी प्रस्तुति की परंपरा आरम्भ हुई। नृत्य के माध्यम से वे महाकाल और गुरुओं का स्मरण करते है, उन्हें इस आयोजन पर निमंत्रण भेजते हैं , और उनको प्रसन्न करने की चेष्टा होती है ताकि सिक्किम प्रदेश और यहाँ बसने वाले सभी—पर देवताओं की सदैव कृपा बनी रहे।
एक प्रश्न स्वाभाविक है कि छाम नृत्य का आरम्भ कब और कहाँ हुआ होगा ? यह नृत्य एशिया महाद्वीप के कई देशों में किया जाता है, जहाँ बोद्ध धर्मावलम्बी हैं । इनमें तिब्बत, भूटान, भारत और नेपाल है। ‘छाम’ शब्द तिब्बती मूल का है जिसका अर्थ है नृत्य । इस नृत्य के सम्बन्ध में एक किवदंती प्रचलित है, राजा त्रिशोंग देत्सेन के निमंत्रण पर भारतीय संत गुरु पद्मसंभव ने तिब्बत के साम्ये मठ में 760-770 के आस पास छाम नृत्य का प्रदर्शन किया था, उस समय साम्ये मठ का निर्माण किया जा रहा था, जबकि उसके निर्माण में बुरी आत्माओं के द्वारा कई—बाधा किए जा रहे थे। दिन भर मठ के निर्माण का कार्य होता और रात्रि में वह तहस नहस हो जाता। इससे तंग आकर राजा ने गुरु पद्मसंभव को निमन्त्रण दिया। पद्मसंभव ने अपने तांत्रिक मुद्राओं से छमारा देवता का आह्वान करते हुए छाम नृत्य किया। कुछ सूत्रों का मानना है कि साम्ये में गुरु पद्मसंभव के द्वारा की गयी छाम नृत्य के पश्चात तिब्बत के अन्य मंदिरों में भी धीरे धीरे यह परंपरा आरम्भ हुई।
मास्क नृत्य और छाम का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व और इसकी प्रासंगिकता पर चर्चा की जाएँ तो सिक्किम की बोद्ध अनुयायी छाम नृत्य को देखने की इच्छा रखते हैं और यह नृत्य उनकी आध्यात्मिक तृष्णा को तृप्त करता हैं। सिक्किम के बोद्ध अनुयायियों का विश्वास है कि व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात 49 दिनों तक उसकी आत्मा भटकती रहती है, उसे नया शरीर 49 दिनों के बाद नसीब होता है। इन दिनोंतक मृतक की आत्मा अनेकानेक देवताओं से भेंट करती हैं, और यह देवता था दरअसल उनके अंतर में से निकलता है । बोद्ध अनुयायी कर्म में गहरी आस्था रखते हैं। जो व्यक्ति जीवित अवस्था में सांसारिक बन्धनों की चपेट में जितना उलझा रहता है उसके लिए मौत के बाद का जीवन उतना ही तकलीफ देय होता है। जो जीवन में पुण्य-फल कमाता है, उसे आसानी से नया जीवन मिल जाता है। अगर अपने शरीर से निकलने वाले चेहरे जो वास्तव में ईश्वर हैं उन्हें आत्मा नहींं पहचान पाती और उसके भयानक चेहरे को देखकर भयभीत हो जाती है तो मृतक की आत्मा को और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बोद्धों में किसी की मौत के बाद 49 दिनों तक “ठिदोल” का पाठ किया जाता है, उसके अनुरूप उसका पालन होने से आत्मा को मुक्ति मिलती है। ठिदोल के पाठ के सम्बन्ध में माना जाता है कि जब कोई लामा उसका पाठ करते हैं तब मृतक के करीबी को उसे सुनना चाहिए क्योंकि मृतक की आत्मा हवा की भांति यहाँ वहाँ विचरण करती है, एक स्थान पर टिकना उसका स्वभाव नहींं होता है । ऐसे में अनजान व्यक्तियों के मध्य वह और ज्यादा भयभीत होता है लेकिन जब कोई करीबी इस पाठ को सुनता है तब उसे बैठा देख मृतक की आत्मा भी करीब आकर पाठ सुनती है। उसमें प्रत्येक बढ़ते दिन के साथ आत्मा को कैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है उसका वर्णन रहता है ताकि इन सबकी जानकारी से आत्मा उसी अनुरूप व्यवहार कर सके तो उसके मुक्ति का मार्ग आसान होता है। यहाँ मुक्ति का तात्पर्य निर्वाण से नहींं, बल्कि एक नए जीवन की प्राप्ति से है जो उसके कर्म द्वारा निर्धारित होती हैं। इस पाठ के माध्यम से आत्मा को मृत्यु के पश्चात होने वाली परिवर्तनों की जानकारी होती है। इसी में वर्णित होता है कि प्रत्येक बढ़ते दिन के क्रम में कैसे कैसे चेहरे उसके समक्ष आते हैं और वह असल में कौन है ? अगर आत्मा ने कभी जीवित अवस्था में छाम नृत्य को दर्शन किया है तो मृत्यु के पश्चात वह उन्हें पहचान जायेगा। तभी वह देवता उसे मुक्ति मार्ग की ओर ले जाता है।
“ठिदोल” में “शेठो” लाह (देवता ) के बारे में वर्णन मिलता है। शेठो शब्द दो शब्दों का योग है। उनमे “शे” का तात्पर्य शांत और “ठो” से भयानक का आशय निकलता है। “ठिदोल” में कुल सौ देवी देवताओं का उल्लेख है, जिसमें शांत दिखने वाले देवताओं की संख्या 42 है तो क्रोधित देवताओं की संख्या 58 हैं। यूं तो सभी देवता शांत होते हैं पर जब उन्हें उस रूप में नहींं पहचाना जाता, आत्मा अपने को मृत्यु के पश्चात भी मोह माया के बंधन से मुक्त नहींं कर पाती, लोभ और प्रेम के वशीभूत होकर बारम्बार वहीँ लौटती है, तब वही शांत देवताओं का मुखमंडल भयानक मुद्रा धारण करती है। इन सौ देवताओं का उद्भव मृतक के शरीर से ही होता है। “ठिदोल” में वर्णित “शेठो” लाह (देवता) के मास्क बने हैं, जो छाम नृत्य में नर्तकों के द्वारा पहना जाता है। उनको प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है ताकि व्यक्ति मौत के पश्चात की परिस्थितियों से परिचित हो सकें। इसलिए मंदिरों में उन्हें यह ज्ञान देने के मकसद से इन नृत्यों का आयोजन किया जाता है। इसमें “कागे छाम” का महत्त्व बहुत अधिक है क्योंकि इस अवसर पर उन सौ देवताओं के नकाब पहनकर लामा नृत्य करते हैं, जीवित अवस्था में इन्हें देखा जाए तो मृत्यु के पश्चात निकलने वाली उस अनेकानेक देवताओं से मृतक आत्मा भयभीत नहींं होगी बल्कि उसे अपना सहायक जान उसके बताए मार्ग पर चलकर अपने को मुक्त करेगी।
सिक्किम के निवासी बहुत ही सरल सहज स्वभाव के होते हैं। धर्म और धार्मिक कर्मकांडों तथा उसकी परंपरा को पढ़े लिखे लोग भी बिना किसी शंका के व्यहवार में लेते हैं। धर्म और आस्था के नाम पर किसी तरह के सवाल उनके जहन में नहींं आता है। जीवन में विपरीत परिस्थितियां, दुख और कष्ट से देवता उनकी रक्षा करते हैं,—ऐसा लोग आज भी मानते हैं। महामारी के परिस्थिति में भी अपने घरों में पूजा पाठ कर कोरोना के पुतले जलाते, उसे खदेड़ते हुए देख सकते हैं। उनके धार्मिक आस्था में वैज्ञानिक दृष्टि का अभाव मिलता है, परन्तु जब तक उनकी आस्था किसी के लिए कष्टकर न हो, उस पर किसी तरह का प्रश्न अनुचित ही है।
सिक्किम में मास्क नृत्य का आयोजन वर्ष में दो बार होता है। अगस्त सितम्बर माह में मनाया जाने वाला “पांगलाब्सोल” स्थानीय जनजाति लेप्चा और भूटिया के मध्य भाईचारे का पर्व है। सिक्किम में नामग्याल वंश का शासन रहा है, जो भूटिया जनजाति से सम्बन्धित हैं। लेप्चा जाति उपेक्षित न हो इसलिए लेप्चा नेता और भूटिया नेता के मध्य कंचनजंगा को साक्षी मानकर भाईचारे का वचन लिया गया था, जिसमें कहा गया था कि भूटिया और लेप्चा आपस में नाख़ून और मांस की भांति एक दुसरे से जुड़े रहेंगे। इस दिन सभी देवताओं का आह्वान किया जाता है, ताकि राज्य सुख, शान्ति और समृद्धि से संपन्न रहे। “कागे छाम” दशहरे के समय होता है। लोगों में यह विश्वास है कि छाम नृत्यों की प्रस्तुति से एक सकारात्मक प्रभाव वातावरण पर पड़ता है, उससे धरती पर आने वाले बहुत से संकट, से मुक्ति मिलती है, वातावरण का शुद्धिकरण होता है।—वहीँ इन नृत्यों के माध्यम से व्यक्ति के मानस पर जो बिम्ब छप जाते हैं वो उन्हें मृत्यु के बाद के जीवन में काम आता है।
सन्दर्भ ग्रन्थ.
J.R. Subba, History, Culture and Customs of Sikkim
P.T Gyamtso, The History, Religion, Culture and Traditions Of Bhutia Communities, (Gangtok: Shomon House. 2011).
Indubala Aribam and Devi(ed), Amazing North East Sikkim, vol 7 (New Delhi: Books India Pvt.Ltd.)
K Sarit, K Carisma Lepcha, and Sameera Maithi, The Cultural Heritage Of Sikkim, (New Delhi: Manohar Publisher & Distributors)
डॉ. चुकी भूटिया: सहायक प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, भाषा एवं साहित्य संकाय, सिक्किम विश्वविद्यालय। उनके विशेष अध्ययन में हैं भूटिया समुदाय का लोक साहित्य, नारीवादी अध्ययन और उत्तर पूर्व में हिंदी की स्थिति।

क्विन्टन हॉल से विवेकानन्द कल्चरल सेंटर की यात्रा

शिलाँग के मेरे संस्मरणों की तीसरी किस्त में मैं ‘विवेकानन्द कल्चरल सेंटर (VCC)’, जो उन दिनों ‘क्विन्टन हॉल’ के नाम से ही सर्वपरिचित था, उसके सम्बन्ध में कुछ रोचक, गौरतलब तथ्य लिखने जा रहा हूँ। प्रथम किस्त में ही मैंने सूचित किया था कि रामकृष्ण मिशन के मुख्यालय ने मुझे इस कार्य को प्राथमिकता देने का आदेश दिया था।
शिलाँग पहुँचने के चंद दिन बाद ही मैंने इस सम्बन्ध में उपलब्ध फाइलो को गौर से पढ़ाई शुरू कर दी थी। अन्य बहुत से जरुरी प्रशासनिक कार्य, व्याख्यान, यात्राएँ, अन्य शहरों से आगंतुक निवासी भक्त-गणों की व्यवस्था, दैनंदिन पत्रव्यवहार इसी में भी बहुत सा समय व्यतीत होता था। और फिर यहां की ठण्ड, लोगों की रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज़ इत्यादी से परिचित होने में थोड़ी प्रारम्भिक कठिनाई हो रही थी। इसीलिए कार्य धीमी गति से चल रहा था। श्रद्धेय रघुनाथानंद जी के साथ भी उस सम्बन्ध में परामर्श करता था। क्विन्टन हॉल की न्यायालयीन लड़ाई से जड़ित कई भक्त और कार्यकर्ता गण के साथ भी चर्चा चलती थी। इनमें प्रमुख रूप से उल्लेखनीय नाम हैं – एड्. बिष्णु बाबू दत्त, एड्. सनतकुमार राय, दिलीप सिंग, बासू सिंग और क्विन्टन हॉल का कार्यभार देखने वाले स्वामी समचित्तानन्द जी।
एक महत्वपूर्ण बात समझ में आई : शिलाँग के साधारण लोगों के मन में जो धारणा बन चुकी थी कि शिलाँग शहर के मध्य भाग में, कई दृष्टि से किसी मौके के इस क्विन्टन हॉल की जमीन तथा वास्तु का जनसेवा हेतु कुछ भी उपयोग नहींं किया जा रहा है। कानून के द्वारा रामकृष्ण मिशन ने उसे अपनी प्रॉपर्टी तो बना ली है, किन्तु इसका कोई उचित उपयोग नहींं हो रहा है।
वहाँ के जनसाधारण की इस धारणा में परिवर्तन लाना जरूरी था। यह संस्था उनकी सेवा के लिए, उनकी भलाई के लिए है इसका एहसास स्थानिय लोगों के बीच जगाना बड़ा जरूरी था। यह नियम सर्वथा ही उपयुक्त है; शिलाँग जैसे क्षेत्रों में (जहाँ स्थानिय आदिवासी खासी – जयंतिया – गारो समुदाय का रामकृष्ण मिशन के साथ भावनात्मक नाता कम था) तो यह अनिवार्य ही था। यदि जनसाधारण का विरोध हो, तो प्रशासकीय दृष्टि से क्विन्टन हॉल का हस्तांतरण पूरा हो तो भी सर्वथा स्थानिय लोग और उनके राजकीय नेता कई मुश्किलें खड़ी कर सकते थे।
इसीलिए वहाँ नि:शुल्क डिस्पेन्सरी, ग्रंथालय, कोचिंग क्लास, संगणक-प्रशिक्षण ये सारे कार्य प्रारम्भ करने का निर्णय लिया गया। आश्रम की संचालक मंडली (Managing Committee) में भी इस निर्णय की चर्चा हुई और सभी ने इस विषय में सहमति जताई। जब संचालक मंडली की रिपोर्ट रामकृष्ण मिशन के मुख्यालय में पहुंची तो वहाँ से इस निर्णय पर आपत्ति उठायी गयी। उनका कथन था कि वह स्थान केवल स्वामी विवेकानन्द जी के स्मारक के रूप में संरक्षित हो, वहाँ पर उपर्युक्त किसी प्रकार का कार्य नहींं चलाया जाये। मैंने इसपर अपना स्पष्टीकरण दिया, जो उन्हें उचित लगा और फिर मुख्यालय से सानंद सम्मति-पत्र भी भेजा गया।
ये सारे कार्य क्रमश: शुरू होने लगे। दूसरी ओर हस्तांतरण का मसला हल करने हेतु संचालक मंडली की एक उपसमिती बनायी गयी। इस सम्बन्ध में पुराना पत्र व्यवहार देखा तो एक आवेदन-पत्र मिला, जो एक साल पहले कलेक्टर को भेजा गया था, और जिसका कोई जवाब उनकी तरफ से प्राप्त नहींं हुआ था। यहाँ एक अजीब बात जानकार लोगों ने बताई, जिसे सुनकर मैं तो हैरान हो गया। कलेक्टर का दफ्तर यह नहींं चाहता था कि यह कार्य आगे बढ़े; इसलिए हमारे पत्र का उन्होंने उत्तर “दिया” किन्तु हमें “भेजा” नहींं ! सुनने में आया कि ऐसा हथकंडा प्राय: अपनाया जाता है, जिससे मामला आगे ही न बढ़े। अब क्या किया जाए?
उपसमिति के सदस्य बासु सिंग इस कार्यशैली से परिचित थे। जब हमने कहा कि क्यों न हम उस दफ्तर जाकर वहाँ के अधिकारी से हमारे पत्र का उत्तर माँगे, तो बासु सिंग समेत सभी ने कहा कि इससे मामला बिगड़ जाएगा। वहाँ वे अधिकारी केवल टालमटोल करेंगे, क्योंकि ये सारा वे जानबूझकर कर रहे हैं। मेघालय की सरकार रामकृष्ण मिशन से कानूनी लड़ाई तो हार गयी, परन्तु अब प्रशासनिक स्तर पर वह रोड़े पैदा कर इस प्रॉपर्टी का हस्तांतरण रोक सकती थी। जबतक हस्तांतरण नहींं होता, तब तक रामकृष्ण मिशन वहाँ न कोई निर्माण कार्य कर सकता था, न उसे किसी भी काम के लिये प्रशासन की अनुमति मिल सकती थी।
और फिर? सरकार की धारणा थी कि अनुपयोगी दिखाकर उस प्रॉपर्टी को रामकृष्ण मिशन से छीन सकेगी। मुझे यह सारा क्रमशः समझाया गया। सभी ने कहा कि इस सम्बन्ध में जल्दबाजी करना ठीक नहींं होगा; चतुराई से आगे बढ़ना होगा। १९९६ के अप्रैल महीने से लेकर मेरी दैनंदिनी (Diary) में कई बार इस का उल्लेख मिलता है।
यहाँ पाठकों को इस समूचे अध्याय की कुछ रोचक पृष्ठभूमि अति संक्षेप में बता दूँ। १९०१ के अप्रैल में स्वामी विवेकानन्द उस इलाके के चीफ कमिशनर सर हेनरी कॉटन के अतिथि के रूप में शिलाँग आए थे। उनका स्वास्थ्य तब ठीक नहींं था; ज्वर, खांसी, अस्थमा इन का प्रकोप बढ़ गया था। इसलिए वे सार्वजनिक व्याख्यान देना टाल रहे थे। परन्तु वहाँ के सारे भक्त और प्रतिष्ठित नागरिकों के अनुरोध पर शनिवार दि. २७ अप्रैल १९०१ को इसी क्विन्टन हॉल में उन्होंने व्याख्यान दिया। स्वयं सर हेनरी कॉटन सभाध्यक्ष के रूप में उपस्थित थे। यही स्वामीजी के जीवन का अन्तिम सार्वजनिक व्याख्यान था और क्विन्टन हॉल का शुभारम्भ भी।
इसके कई वर्षों बाद यह हॉल आग में जल जाने के कारण पुननिर्मित किया गया। फिर कई दशकों के बाद वह अवैध तरीके से सिंघानिया टॉकीज ने अपने कब्जे में ले लिया। वह फिर सिंघानिया सिनेमा हॉल बन गया। क्विन्टन मेमोरियल ट्रस्ट ने लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद सिनेमा हॉल को फिर अपने कब्जे में ले ही लिया था। जब क्विन्टन हॉल ट्रस्ट फिर उसे अपने हाथों में ले ही रहा था कि मेघालय की सरकार ने एक प्रशासनिक अधिसूचना (administrative notification) जारी करते हुए इसे अपने कब्जे में ले लिया।
इस अवैधानिक कब्जे के खिलाफ क्विन्टन मेमोरियल ट्रस्ट ने कोर्ट में मामला दाखिल किया। ट्रस्ट ने यह प्रॉपर्टी रामकृष्ण मिशन को दान करने का अपना मकसद भी अपने आवेदन में अंतर्भूत किया। न्यायालय ने ट्रस्ट के पक्ष में निर्णय दिया; मेघालय सरकार ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, किन्तु वहाँ भी उसकी हार हुई। इस समस्त मामले का विस्तृत विवरण देना इस लेख का उद्देश नहींं है, इच्छुक पाठकगण ‘Quinton Memorial Hall vs Special Commissioner, East Khasi Hills’ को गूगल खोज कर पढ़ सकते हैं।
ये समूची जानकारी यहाँ केवल इसलिए दे रहा हूँ ताकि पाठकों को यह समझ में आये कि मेघालय की सरकार को इस प्रॉपर्टी से हाथ धोना बिल्कुल ही रास नहींं आया था और अब कुछ प्रशासनिक हथकंडों का और कुछ अनैतिकता का आश्रय लेकर वह रामकृष्ण मिशन के कार्य में बाधां पहुँचाने पर उतारू हो गयी थी। इस में सरकार का कुछ विशेष लाभ नहींं था, केवल उसकी नजर जिस प्रॉपर्टी पर थी, वह उसके न मिलने का गुस्से के रूप में प्रकट हो रहा था।
सरकार का कहना था कि हस्तांतरण (Mutation) के लिए हमे उनसे अनुमति प्राप्त करनी होगी। हमारा पक्ष इसके खिलाफ था। क्यों ? इसकी चर्चा इसी लेख में बाद में करूँगा। यहाँ हमलोग सोच रहे थे कि हमारे पत्र का DC के दफ्तर ने जो उत्तर दिया होगा (जो हमें प्राप्त न हो, इसकी व्यवस्था की गयी थी) उसे किस प्रकार प्राप्त किया जाय। कुछ खोज-बीन के बाद बासू सिंग को पता चला कि उनका एक परिचित DC के दफ्तर में नौकरी करता है! उसकी सहायता से कोशिश की जाए। और हाँ – बासू सिंग सफल हो गए। अपेक्षा के अनुरूप इस उत्तर में मांग की थी कि हमें मेघालय शासन की अनुमति के लिये आवेदन करना होगा, यही हस्तांतरण का नियम है।
मेघालय प्रशासन के कुपित होने का और भी एक कारण था। जब यह प्रॉपर्टी रामकृष्ण मिशन ने दान के रूप में प्राप्त की थी तो उसका पंजीकरण (Registration) कराना होता है। साधारण तौर पर यह शिलाँग के पंजीकरण दफ्तर में ही कराया जाता है। किन्तु मेघालय की सरकार उसे यदि नकार दें तो ? इस संभावना को देखते हुए रामकृष्ण मिशन के कानूनी विशेषज्ञों ने इसका एक पर्याय संविधान से खोज निकाला। वह यह था कि पंजीकरण जहाँ प्रॉपर्टी है वहाँ या भारत के चार महानगर – दिल्ली – मुम्बई – चेन्नई – कलकत्ता – इनमें से किसी भी एक स्थान पर किया जा सकता है। मेघालय प्रशासन का रुख देखते हुए रामकृष्ण मिशन कोई ख़तरा मोल लेना नहींं चाहती थी; इसीलिए कानून की इस सहूलियत को आधार बनाकर प्रॉपर्टी का पंजीकरण, बजाय शिलॉंग के कलकत्ता में किया गया।
इससे प्रशासन कितना तिलमिला गया था इसकी कुछ झलक मुझे बाद में D.C. और रेव्हेन्यू सेक्रेटरी जैसे अधिकारियों से बात करते समय मिली।
जो भी हो, D.C. के पत्र का उत्तर देते हुए हमारे विधिज्ञ सनत कुमार राय की सलाह के अनुसार हमने उत्तर दिया कि रामकृष्ण मिशन सरकार से कतई अनुमति नहींं माँगेगी; क्योंकि इसका तात्पर्य होगा कि सरकार का अनुमती न देने का अधिकार भी हम स्वीकार करते हैं।
यह पत्र लेकर मैं D.C. के दफ्तर मैं स्वयं गया था। D.C. साहब ने हमारा उत्तर पढ़ने के बाद कुछ वक्त मांगा और फिर चंद दिनों में उनका उत्तर मिला कि हमारा पत्र यथोचित निर्णय और कार्यवाही के लिए रेह्वेनयू सेक्रेटरी के पास भेज दिया गया है।
हमारे अन्य एक विधिन, बिष्णु बाबू दत्त, जिनका क्विंटन मेमोरियल ट्रस्ट के सरकार-विरुद्ध मामला जीतने में विशेष योगदान रहा, उन्होंने D.C. के इस प्रकार के कृति की सम्भावना पहले से ही जतायी थी, और कहा था कि यह हमारे लिए सरकार के खिलाफ मामला करने का सुनहरा मौक़ा होगा। जो निर्णय D.C. स्वयं लेने का अधिकार रखते हैं, उसे वरिष्ठ अधिकारी के पास भेजना गलत है, और फिर कोर्ट में ही हमें प्रापर्टी के हस्तांतरण का आदेश मिल सकेगा।
इसी बीच एक खुशखबर आयी कि रामकृष्ण मिशन के भक्त श्री दिलीप कुमार गंगोपाध्याय मेघालय सरकार के प्रधान सचिव (Chief Secretary) के रूप में नियुक्त हुए हैं। प्रधान सचिव होने के कारण प्रशासन में उनका अधिकार तो था ही; साथ ही साथ अपने मधुर स्वार्थ-रहित स्वभाव और चुस्त, कर्तव्यदक्ष, अनुशासन-प्रिय कार्यशैली के कारण वे सभी का सम्मान प्राप्त कर चुके थे। १९९६ के अक्टूबर में दुर्गा पूजा के समय वे आश्रम आये थे, तभी उनके साथ पहली मुलाक़ात हुई थी। फिर कभी किसी काम से या कभी एक भक्त के रूप में उनके साथ मिलना जुलना होता था, कभी उनके दफ्तर में, कभी आश्रम में, कभी बाहर किसी अन्य कार्यक्रम में और एक-आध बार उनके निवास स्थान पर भी। उनके साथ मेरा संपर्क उनकी सेवानिवृत्ति के बाद भी बना रहा, मेरे अमरीका आने के बाद भी, जब वे कोलकत्ता में रहते थे, तब भी उनके निवास स्थान पर उनसे मुलाक़ात हुई थी।
स्वामी समचित्तानंद जी , जो उन दिनों क्विंटन हॉल का कार्यभार संभालते थे, वे नवम्बर में उनसे मिलने सचिवालय गए और क्विन्टन हॉल के हस्तांतरण की समस्याओं से उन्हें अवगत कराया। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे इसकी पूरी जानकारी लेकर उचित कार्यवाही करेंगे। हस्तांतरण शीघ्र ही हो जाएगा ऐसा भी उन्होंने कहा। इसके दो-तीन दिन बाद मेरी डायरी में लिखा है कि उनसे मेरी फोनपर बातचीत हुई और उन्होंने क्विन्टन हॉल के काम के साथ आश्रम के अन्यान्य कार्यों में भी पूरा सहयोग देने का वादा किया – एक भक्त के तौर पर और प्रशासकीय अधिकारी के रूप में भी। मुझे यह कहने में ज़रा भी संकोच नहींं कि यह वादा उन्होंने पूर्णरूप से निभाया।
इस के बाद मैं व्याख्यानों के दौरों में और आश्रम के चिकित्सालय के विस्तार के कार्य में व्यस्त रहा। गंगोपाध्याय महोदय को भी कई बार दिल्ली जाना पड़ा। इसके बाद १९९७ के प्रारम्भ से ही मैं और हमारे साधु-कर्मचारी-स्वयंसेवी आश्रम के षष्ट्यब्दि-पूर्ति (Diamond Jubilee) के आयोजन में व्यस्त हो गए। इस विशेष समारोह का ब्यौरा आगे के किसी किस्त में सम्भव हो तो लिखूंगा।
जून १९९७ के प्रारम्भ में D.C. का पत्र, जिसमे उन्होंने इस मामले को रेह्वेनयू सचिव के पास निर्णय के लिए अग्रेषित किया था, मैंने प्रधान-सचिव के कार्यालय में भेजकर इस पर निर्णय चर्चा के लिए उनसे समय (appointment) मांगी थी। वहाँ से फोन आया कि गुरूवार, ५ जून १९९७ को ४ बजे मुलाकात का समय ठीक किया है, जिसमे प्रधान सचिव, रेह्वेनयू सचिव और कुछ कार्यालयीन कर्मचारी भी रहेंगे।
यह समाचार मैंने इस कार्य से जड़ित हमारे दोनों विधिज्ञों को दिया और उनसे अनुरोध किया कि वे दोनो, या कम से कम एक मेरे साथ चले तो शायद अधिक अच्छा होगा। दोनों ने कहा कि, ‘नहींं, इससे लाभ नहींं, नुक्सान ही होगा क्योंकि ऐसे अधिकारी जब वकीलों को देखते हैं तो उन्हें संदेह होता है कि कहीं ये वकील हमें अदालत में न फंसा दे’। इसीलिए सनत कुमार राय ने हमें अच्छी तरह सिखाकर केवल मुझे ही वहाँ जाने के लिए कहा। उन्होंने यह भी परामर्श दिया कि ‘यदि वे लोग कहेंगे कि हस्तांतरण के लिए सरकार की अनुमति कानून द्वारा आवश्यक है, तो उनसे पूछना कि क़ानून की किस धारा के किस बिंदू में यह लिखा है, इसका संदर्भ उनके पास है क्या?’
बस, निर्धारित समय पर मैं वहाँ पहुँच गया। प्रमुख सचिव गंगोपाध्याय जी ने मुझे रेह्वेनयू सेक्रेटरी (पेरियट उनका नाम) से मिला दिया और कहा कि वे मसले को जल्द सुलझाने की कोशिश करें। फिर मैं रेह्वेनयू सचिव के कक्ष में उनके साथ ही गया। हमारे वार्तालाप का सारांश यहां दे रहा हूँ।
वे : पहला सवाल है कि आपने पंजीकरण शिलांग में न करवाकर कलकत्ते में क्यों किया?
मैं : रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय कलकत्ते के पास है, हमारे पंजीकरण पर स्वाक्षरी करने वाले भी वहीं आसपास रहते हैं, और क़ानून इसकी अनुमति देता है।
वे : हाँ, पर कानून की यह बात अपवादात्मक स्थिति के लिए है।
मैं : ऐसा तो कानून में लिखा नहींं है।
वे : अच्छा तो छोड़िये उस बात को। आपको प्रशासन की अनुमति लेना एक कानूनी आवश्यकता है, आपको एक छोटा सा फॉर्म हस्ताक्षर करना है।
मैं : क्या आप मुझे उस कानून का संदर्भ और उद्धरण दे सकेंगे ? हम लोग भी कानून मानकर ही चलना चाहते हैं।
वे : हाँ, ऐसा कानून तो है; मुझे थोड़ा समय दो; कल शाम तक मैं उसे आपको दे सकुँगा।
उनको धन्यवाद देकर मैं चला आया और मैंने सनत बाबू को सारी बात बता दि। उन्होंने कहा कि देखे वे क्या संदर्भ देते हैं – जहाँ तक उनकी जानकारी है, ऐसा कोई कानून नहींं है। बस दूसरे ही दिन पेरियट साहब ने वह ‘कानून’ का संदर्भ और उद्धरण एक कागज़ पर दे दिया।
जब मैंने वह सनत बाबू को दे दिया, तो गौर से देखने के बाद उन्होंने हँसते हुए कहा कि ये कोई ‘कानून’ नहींं है, ये उनके प्रशासनिक नियमों में से है; अदालत में उसका कोई मूल्य नहींं। फिर उन्होंने समझाया ‘कानून’ और प्रशासनिक ‘नियम’ इन में क्या भेद है। कानून वह है जो विधि मंडल (Legislative Assembly) में सम्मत किया जाता है, फिर उसपर राज्यपाल (Governor) की स्वाक्षरी और मुहर लग जाती है और उसे सरकारी पत्रिका (Gazzette) में प्रकाशित किया जाता है, तब कहीं उसे कानून की संज्ञा प्राप्त होती है। प्रशासनिक नियम, प्रशासन का अन्दरुनी मामला है, उससे जनता का संबंध नहींं होता, जनता के ज्ञान का वह साधन नहींं है (Not instrument of public information)। ‘वाह! कैसा अच्छा समझाया आपने’ मैंने उनसे कहा। फिर उन्होंने पत्र में और एक महत्त्वपूर्ण कारण लिखने को कहा : ‘ये प्रॉपर्टी हमें अदालत के उस निर्णय से मिली है, जिस मामले में मेघालय की सरकार भी एक पक्षकार (party) थी। तो अब यदि हमें उसी सरकार से अनुमति माँगनी होगी, जो इस मामले में हार गयी है, तो ये न्यायालय की अवमानन होगी। फिर सरकार से अनुमति माँगने का तात्पर्य यह हुआ कि सरकार का अनुमति न देने के अधिकार को भी हम स्वीकार करते हैं। हम यह नहींं चाहते हैं। अब सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह हस्तांतरण को अविलम्ब कर दे।’
उनके कथनानुसार मैंने रेह्वेनयू सचिव के नाम से पत्र बनाया, जिसकी प्रतिलिपि प्रधान सचिव को भी दी। जब मैं स्वयं इस पत्र को लेकर पेरियट जी से मिला (वे विधान IAS और LLB थे) तो पत्र पढ़कर वे बिलकुल चौंक गये। उनके पास कोई जवाब नहींं था।
इसके थोड़े दिन बाद ही हस्तांतरण की प्रक्रिया पूर्ण हो गयी। क्विन्टन हॉल के पुनर्निर्माण का पथ प्रशस्त हो गया।

फन्ने खान और दीनदयाल

रुनू बरुवा ‘रागिनी तेजस्वी’

फन्ने खान अपने जमाने का बड़ा ही होनहार तबलावादक था। रिकार्डिंग स्टूडियों में हमेशा उसकी मौजूदगी रहती थी। शायद सफलता का नशा था जो सर चढ़कर बोलने लगा था। बचपन की साथी नजमा जिसे कभी दिलोजान से प्यार करता था और शादी के सपने देखा करता था, अब उससे मिलने या बात करने की भी उसे जरुरत महसूस नहींं होती थी। शराब और शराबी दोस्त ही उसकी ज़िंदगी बन चुके थे। जैसा की ऐसी स्थिति में होता है, उसके साथ भी हुआ। बदतमीजी और शराब की लत की वजह से उसे काम मिलना बंद हो गया। दोस्तों और अपनों से आए दिन लड़ाई -झगड़ा होने लगा। उसके पैसे भी खत्म होने लगे। ऐसी हालत में एक दिन शराब के नशे में उसका एक्सीडेंट हो गया और उसे अपने दोनों पैरों से हाथ धोना पड़ा। दुनिया में अब उसका कोई नहींं था। खाने के लाले पड़ने लगे। तभी उसके जीवन में दीनदयाल आया जो एक लंगड़ा था और उम्र के इस पड़ाव पर अकेले जीवन का बोझ ढो रहा था। लोग बाग आते-जाते उसे कुछ न कुछ देते थे। दीनदयाल ने एक दिन फन्ने खान को दिनभर से भूखे पेट घिसटते देखा। दीनदयाल खाने बैठा ही था, तभी फन्ने को देखकर वह उठा और अपने पास से कुछ पैसे फन्ने को दे डाला। फन्ने खान का चेहरा आँसू से भीग गया। दीनदयाल ने उसे अपने हिस्से का खाना दिया और उसकी कहानी भी सुनी। दीनदयाल को बाँसुरी बजाने का शौक हुआ करता था। उसने अपने बचाए रुपयों से तबला और बाँसुरी खरीद ली। अब दोनों की जोड़ी जहाँ भी बजाने बैठती, लोगों का जमघट हो जाता। धीरे-धीरे दोनों के पास पैसा भी आने लगा। हालत भी सुधरने लगी। अब दोनों मंदिर में भजन गाने वाली टोली के सदस्य हो गए थे। दीनदयाल को जयपुरी पैर लग गए थे और फन्ने खान को ह्वील चेयर। हालांकि फन्ने खान मुस्लिम था मगर वह कहता था कि अगर बिस्मिल्लाह खान मंदिर में बजा सकते थे तो मैं क्यों नहींं! वह शिव भक्त थे और मैं दीनदयाल का!
डाॅ. (मा) रुनू बरुवा “रागिनी तेजस्वी” अखिल भारतीय साहित्यकार सम्मान, साहित्य रत्न सम्मान, साहित्य श्री सम्मान , साहित्य गौरव सम्मान, मात्सुओ ‘बासो’ सम्मान, सरस्वती सम्मान आदि से सम्मानित डिब्रूगढ़ की प्रतिष्ठित साहित्यकारों हैं।

500 रुपए का एक नोट

मेघा पी यादव

मैं 500 रुपए का एक नोट हूँ। मुझे ये याद नहींं की मेरा जन्म कहां और कैसे हुआ था। छोटे से बक्से में मुझे मेरे जैसे कुछ पैसे मिले थे। उनकी शक्ल बिल्कुल मेरे जैसी ही थी। हम बहुत दिनों तक एक साथ रहते थे। एक दिन अचानक से उस बक्से में बहुत रोशनी आ पड़ी और किसी ने मुझे वहाँ से निकल लिया फिर मैं जा पहुँचा किसी व्यक्ति की जेब में। दुःख बहुत था उन पैसों से जुदा होने का लेकिन नई जगह घूमने का उत्साह मुझे बहुत खुशी दे रहा था। फिर मैं उसके साथ बहुत जगह गया। कभी-कभार मैं अपना सर थोड़ा सा बाहर निकाल कर देखने की कोशिश भी कर रहा था। फिर मैं जा पहुंचा किसी अजीब से जगह में जहां पर मुझे कुछ नए दोस्त मिले। एक का नाम 2 रुपए था एक का 5 और एक का 1000 था और बाकी को मैं नहींं जानता था। मैंने उन लोगो के साथ बहुत वक्त बिताया। कुछ पैसे आते रहे और कुछ पैसे जाते रहे मेरे इस सफर में। हमेशा मानों मेरे मन में एक डर रहता था की कब मुझे भी इस परिवार से जुदा कर दिया जाएगा। एक दिन मुझे वहाँ से निकाल कर एक छोटे से बच्चे के हाथ में दे दिया गया। उस बच्चे ने मुझे बहुत प्यार से अपनी गुल्लक में पनाह दी। वहाँ पर मुझे बहुत सारे अच्छे पैसे मिले जो हमेशा खिलखिलाते रहते थे। हर सुबह वो बच्चा उस गुल्लक को बहुत जोर से हिलाया करता था और हम सब पैसे उस गुल्लक के अंदर लोट – पोट के हँसा करते थे। एक दिन अचानक से पैसों की दुनिया में जहाँ मैं बेखौफ घूम रहा था और सबके पास एक खबर पहुंची थी की सारे 500 और 1000 के नोट को मार दिया जाएगा। सब पैसे आ कर मुझे दिलासा दे रहे थे लेकिन जो डर मेरे अंदर था मैं उसको काबू नहीं कर पा रहा था। बहुत देर तक मैं इस इंतजार में था कि आज रोशनी इस गुल्लक के अंदर न आए। बहुत सारी चीखें 500 और 1000 के नोट के मुझे सुनाई दे रहे थे और इसके कारण मेरे अंदर का डर बढ़ रहा था। न चाहते हुए भी अचानक से इस गुल्लक में रोशनी आई। बच्चे ने अपने प्यार भरे हाथों—से मुझे बाहर निकाला। उसने पहली बार मुझे कसके गले लगाया और मुझसे बाते भी कर रहा था। उसने मुझसे कुछ ऐसा कहा जो शायद मैं ज़िंदगी में कभी ना भूल पाऊंगा। उसने ये कहा कि “तुम मेरी ज़िंदगी के सबसे कीमती तोहफे हो। पापा ने मुझे तुम्हे तब दिया था, जब मैं क्लास में प्रथम आया था। तुम चुपचाप इस गुल्लक में ही रहना क्योंकि तुम्हारी कीमत 500 से कहीं ज्यादा है और तुम अनमोल हो मेरे लिए।”

पुस्तक समीक्ष

नीतू थापा पुस्तक- ‘विक्रमवीर थापा मेरा आँखीझ्यालबाट’ लेखन – विशाल के सी प्रकाशक – भारतीय साहित्य प्रतिष्ठान, तेजपुर। प्रकाशन वर्ष – जुलाई 2021

‘हिन्दी’ एवं ‘नेपाली’ साहित्य जगत के लिए सैनिक कवि ‘विशाल के सी’ उभरते हुए ध्रुव के समान हैं। जो अपनी पकड़ लगातार हिन्दी एवं नेपाली साहित्य जगत में बनाए हुए हैं। मूलतः विशाल के सी भारत के सबसे पुराने अर्ध सैनिक बल (आसाम राइफल) में सैनिक के पद पर सेवारत हैं, किन्तु उन्हें केवल बन्दूक पकड़कर देश की सेवा करना गवारा नहींं, बल्कि वे कलम लेकर साहित्य के रणभूमि में हिन्दी एवं नेपाली भाषा के प्रचार प्रसार एवं सामाजिक उत्थान के लिए भी उतर पड़े हैं। विभिन्न सम्मानों से सम्मानित विशाल के सी की हिन्दी एवं नेपाली में कई रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘सम्झना’ (नेपाली-2013), ‘आमा’ (नेपाली-2014), ‘शहीद’ (हिन्दी-2015), ‘पोस्टर’ (हिन्दी-2017), ‘चटयाङ्ग’ (नेपाली-2019), तथा cc नेपाली भाषा में है जो हाल (2021) में प्रकाशित हुई है।
संबन्धित पुस्तक ‘विक्रमवीर थापा मेरा आँखीझ्यालबाट’ अर्थात् ‘विक्रमवीर थापा मेरे आँखों के झरोकों से’ पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ साहित्यकार ‘विक्रमवीर थापा’ के आलेखों, अनुभूतियों, साक्षात्कार तथा उनके कृतियों को आधार बनाकर नेपाली भाषा में लिखी गई है। जो एक शोधपरक पुस्तक है। यह पुस्तक वर्तमान में नेपाली साहित्य जगत में चर्चा का विषय बनी हुई है। पुस्तक के चर्चा में होने का विशेष कारण स्वयं विक्रमवीर थापा हैं जो अपनी कृति ‘बीसौं शताब्दीको मोनालिसा’(नेपाली) सन् 1999 में साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत है। हाल विशाल के सी द्वारा लिखित पुस्तक न केवल भारत में बल्कि यूके एवं पड़ोसी देश नेपाल में भी चर्चित है। जिसके लिए विशाल के सी को रेडियो तथा अन्य संघ संस्थानों द्वारा साक्षात्कार के लिए भी निमंत्रण दिये गए।
पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ साहित्यकार ‘विक्रमवीर थापा’ अति मिलनसार तथा ज्ञान के धनी हैं। किन्तु शिक्षा के संबंध में वे स्वयं स्वीकारते हैं कि उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त नहींं की बावजूद इसके उन्होंने नेपाली साहित्य जगत को ‘सात’ अनमोल कृतियाँ प्रदान की जिनमें से एक कृति ‘टिस्टादेखि सतलजसम्म’ उत्तर बंग विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है। कम शिक्षित होने के बावजूद साहित्य में उनकी पकड़ गहरी होने के विषय में वे रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण देते हुए कहते हैं- “सर्वप्रथम अध्ययनशील होना आवश्यक है। पढ़ने के लिए विद्यालयी शिक्षा की आवश्यकता नहींं। इच्छा शक्ति प्रबल हो तो घर में ही शिक्षा प्राप्त किया जा सकता है। नौकरी के लिए डिग्री की आवश्यकता है। साहित्य के लिए नहींं। साहित्य के लिए अध्ययनशीलता एवं अनुभूति चाहिए। किसी भी कार्य में मन लगाकर कार्य करने से अनुभव बढ़ता है जिस कारण आप अपने कार्य से सभी का विश्वास जीत सकते हैं। उदाहरण परमहंस रामकृष्ण को ले सकते हैं।”1 अपनी शिक्षा से संबन्धित विक्रमवीर थापा के उत्तर प्रति उत्तर जो भी रहे हो किन्तु बचपन से लेकर बुढ़ापे तक संघर्ष ने उनका साथ कभी नहींं छोड़ा।
‘विक्रमवीर थापा’ को न पहचानने वालों को यह जानकार आश्चर्य होगा कि वे भारत के भूतपूर्व सैनिक रह चुके हैं। एक सैनिक का सफल रचनाकार होना आश्चर्य में डालता है किन्तु सत्य तो यही है कि वे जितनी वीरता से सन् 1972 में बांग्लादेश के युद्ध में राइफल लेकर देश की सेवा में डटे रहें उतनी ही सिद्दत से कलम भी चलाया और सन् 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कर नेपाली साहित्य जगत के पन्नों में ऐतिहासिक घटना को मूर्त रूप दिया। ‘विक्रमवीर थापा मेरा आँखीझ्यालबाट’ के लेखक विशाल के सी स्वयं एक सिपाही होने के नाते कहते हैं कि फौज में होने तक सैनिक को याद रखा जाता है अवकाश प्राप्ति के पश्चात् वे नाम भुला दिये जाते हैं। किन्तु विक्रमवीर थापा का नाम आज भी फौज में उतने ही सम्मान पूर्वक लिया जाता है कारण उनकी रचना ‘बीसौं शताब्दीको मोनालिसा’ है। मेजर जनरल इयान कारडोजो द्वारा लिखित पुस्तक “The fifth Gorkha Rifle frontier force” के पृष्ट संख्या-65 में लिखा है – June 2000 however brought in happy tidings. Rifleman Bikram Bir Thapa (Retired) was honoured with ‘Sahitya Akademi Award’ for the Year 1999 for his Book ‘The Monalisa Of the 20th Century”2 अवकाश प्राप्ति के पश्चात् भी फौज के मेजर जनरल द्वारा लिखित पुस्तक में स्वयं को सुसज्जित होते पाना किसी जंग जीतने से कम नहींं, भले ही वह साहित्यिक जंग क्यों न हो? (नोट- इस पुस्तक के लेखक Major General Ian Cardozo वही व्यक्ति हैं जिन्होंने Gorkha Regiment का नेतृत्व किया था एवं वर्तमान में उन्हें केंद्र में रखकर हिन्दी फिल्म Gorkha फिल्माया जा रहा है जिसके अभिनेता अक्षय कुमार हैं।)
विक्रमवीर थापा वरिष्ठ साहित्यकार के साथ ही साथ अच्छे चित्रकार भी हैं। अभी तक वे लगभग तीन सौ चित्र अंकित कर चुके हैं। वे अपने चित्रकला में स्थूल में भी सुंदरता की खोज करते हैं, चित्रकारी के संबंध में उनका मानना है कि यह कला उन्हें जन्मजात प्राप्त हुई। इसीलिए वे कला के संबंध में स्वयं को चित्रकार के रूप में प्रथम तथा साहित्य के क्षेत्र में द्वितीय स्थान पर रखते हैं। किन्तु उनका नाम साहित्यकार के रूप में अधिक चर्चित हुआ। किन्तु दुःख की बात है कि साहित्य के क्षेत्र में उनका नाम जीतना चर्चा में हैं, अपने समाज में वे उतना ही गुमनाम है।—कारण, वे स्वयं स्वीकारते हैं उनका स्वयं का निर्धन होना। स्वाभाविक है कि साहित्य रचने का उद्देश्य केवल पैसा कमाना नहींं। साहित्य का उद्देश्य अपने समाज, भाषा अपने लोगों को सशक्त बनाना है किन्तु विक्रमवीर थापा यहीं हार जाते हैं और कहते हैं- “मेरा सुझाव है कि यदि आपके पास पैसे नहींं है तो कुछ नहींं है क्योंकि मैंने स्वयं इसे भोगा है। यदि आज मेरे पास पैसे होते तो मेरे कमरे में लोगों का तांता लगा होता। मेरे पास पैसे नहींं है इसीलिए कोई मेरी खबर भी नहींं लेता।”3 एक साहित्यकार होने के नाते विक्रमवीर थापा हमेशा अपने समाज को उन ऊँचाइयों में देखना चाहते हैं जहाँ हर व्यक्ति पहुँचने के सपने देखता है, किन्तु कई बार वे ठीक इसके विपरीत देखते हैं। जिस कारण उनके मन में हमेशा टीस रहती—है और कभी-कभार यह टीस सामाजिक संजाल में आलेख के रूप में फुट पड़ता है। इनके इसी शिकायत के कारण कई लोग, संघ-सभाएँ स्वयं को इनसे दूर रखते हैं। पुस्तक से ही संदर्भ देख लीजिए- “लेकिन आजकल समय के चक्र के साथ वर्तमान साहित्यकार अपने साहित्यिक पन्ने से विक्रमवीर थापा का नाम मिटाते जा रहे हैं, जिसका जीवन्त उदाहरण है ‘संयुक्त अधिवेशन’ जैसे सभा का विक्रमवीर थापा को आमंत्रण न करना।”4 पूर्वोत्तर भारत में रहकर अपने जाति, भाषा, साहित्य तथा समाज प्रति सजग होना, समाज को चेतनाशील होने का संदेश देना एक साहित्यकार का धर्म होता है। किन्तु समाज के कुछ पक्षपाती व्यक्ति ऐसे सजग साहित्यकार को बार-बार चोट देकर समाज से काटने का प्रयत्न करते हैं। ऐसे अवहेलना तथा चोट के पंक्ति में केवल विक्रमवीर थापा ही नहींं अन्य नाम भी जुड़े हैं।
कहा जाता हैं कि कला का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति न केवल वर्तमान बल्कि भविष्यद्रष्टा भी होता है और अपने कला के माध्यम से मनुष्य-मनुष्य को जोड़े रखता है। अतः विक्रमवीर थापा द्वारा चित्रित चित्र ‘सन् 1999 को कार्गिल युद्ध’ के संदर्भ में वे स्वयं कहते हैं- “यह चित्र हिन्दू-मुस्लिम या अन्य जाति का व्यक्तिगत परिचय नहींं अपितु भारतभूमि में निवास करने वाली जनता की एकता का प्रतीक है। शत्रु द्वारा जितना भी आक्रमण किया जाए हम सभी एक ही रहेंगे। हमें कोई अलग नहींं कर सकता क्योंकि हम भारतीय है और संसार का कोई शत्रु हमें अलग नहींं कर सकता बल्कि संकट आने पर उसे कैसे दूर करना है हमें आता है।”5 साहित्यकार अपने समाज के सुधार-जागरूकता के लिए जितनी कठोरता तथा व्यंग्य से अपनी कलम उठाता है उसका हृदय उससे अधिक कोमलता, अपनेपन से भरा रहता है। वह साहित्य भी रचता है तो केवल अपने समाज अपने लोगों के हित के लिए।
साहित्य समाज का दर्पण होता है जहाँ समाज में हो रहे घटनाओं को विभिन्न विधाओं के माध्यम से उजागर किया जाता है। समाज के बिना मनुष्य का निर्माण असंभव है। समाज की व्यवस्था परिवार से उसमें रहने वाले लोगों से बनता है तथा उस परिवार में एक पुरुष की जितनी अहमियत होती है स्त्री की भी अहम भूमिका होती है। प्राचीन काल से हमारे समाज में स्त्री को देवी और कई रूपों से पूजा जाता है। सम्मान दिया जाता है। इसे प्रसाद की इस पंक्ति से जानते हुए आगे बढ़ते हैं-
‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास रजत नग पगतल में
पीयूष स्रोत से बहा करो
जीवन के सुंदर समतल में’
प्रस्तुत पंक्ति यह स्पष्ट करती हैकि नारी का सम्मान साहित्य में भी उतना ही है जितना शास्त्रों में। विक्रमवीर थापा के जीवन में दिया छेत्री, तुलसी छेत्री, कमला बहिनी आदि अनेक स्त्रियों का आगमन बहन-बेटी के रूप में हुआ। किन्तु जीवन संगिनी के रूप में जिसे उन्होंने चाहा वह कभी उसे पा न सके और वह ईश्वर को प्यारी हो गयी।
संबन्धित पुस्तक में विक्रमवीर थापा अपनी मुँह—बोली बहन तुलसी छेत्री को याद करते हुए बहुत सुंदर घटना का उल्लेख करते हैं जिसके कारण उन्हें ‘माटो बोलदो हो’ उपन्यास लिखने की प्रेरणा मिली – “बहन, मांग में सिंदूर भरने के पश्चात् बेटी पराई धन हो जाती है, इसीलिए जब बेटी का विवाह हो जाता है फिर मायके के मिट्टी से उसका कोई संबंध नहींं रह जाता। किन्तु अभी तक तुम्हारे मांग में सिंदूर भरा नहींं गया है इसीलिए तुम अभी मायके के मिट्टी से पराई नहींं हुई हो। तुम्हारे जन्मभूमि, तुम्हारे लालन-पालन हुए स्थान से तुम्हारा नाता टूटा नहींं है, न जीवनभर टूटेगा। जीवनभर अपने जन्मभूमि से तुम्हारा नाता बना रहे इसीलिए तुम्हारे लिए में तुम्हारे जन्मभूमि की मिट्टी लेकर आया हूँ। तुम्हारा गरीब भाई तुम्हें हीरे-मोती, या सोफ़ासेट नहींं दे सकता, दे सकता है तो- गोड़धुवा के रूप में तुम्हारी जन्मभूमि की मिट्टी।”6 (गोड़धुआ अर्थात् विवाह से पूर्व लड़की के मायके वाले उसके पैरों को जल से धोते हैं।) इस घटना से यह जान पड़ता है कि विक्रमवीर थापा स्त्री जाति के प्रति सहृदय हैं। वे नारी अस्मिता के प्रति सम्मान देते हुये कहते हैं “नारी अस्मिता के प्रति में क्यों सचेत हूँ या विश्वास करता हूँ इसका कारण मेरी माँ है। मेरे जन्म के पश्चात् माँ के दुग्धपान से मैं पला-बढ़ा। इसी कारण में सर्वप्रथम एक स्त्री में अपनी माँ का स्वरूप देखता हूँ तत् पश्चात् और। इसी कारण मैं नारी-अस्मिता के प्रति सचेत हूँ।”7 शास्त्रों एवं साहित्य में भी अंकित है कि जहाँ स्त्री का सम्मान होता है वहाँ देवता निवास करते हैं। इसे ऐसे ले कि वर्तमान में जिस समाज में स्त्री का सम्मान होता है वह समाज सम्पन्न, शिक्षित तथा उनमें सद्भाव बना रहता है।
निष्कर्षतः पुस्तक का अध्ययन कर यह स्पष्ट होता है कि विशाल के सी ने इस पुस्तक में विक्रमवीर थापा के विचारों को, जीवन में घटित उनके तमाम अनुभूतियों को, अपने समाज के प्रति उनके जागरूकता को, उनके बौद्धिक ज्ञान के साथ-साथ उनके कला को केंद्र में रखा है। जिसे कलाहिन व्यक्ति या यों कहे की एक भीड़ उनके कला को समझ नहींं पाता और तमाम तरह के आक्षेप लगाता जाता है किन्तु उसी भीड़ में विशाल के सी जैसे साहित्यकार और अन्य व्यक्ति भी हैं जो उन्हें समझते हैं उनके साहित्य, कला, ज्ञान की सराहना भी करते हैं जिसका सबसे बड़ा उदाहरण यह पुस्तक है। अंततः साहित्य लिखना सभी के बस का नहींं उसके लिए प्रतिभा का होना आवश्यक है और लेखन का बुलंद होना आवश्यक है। लेखक जो भी लिखे उससे समाज का हित हो न की केवल कागजों की ढ़ेर। अन्यथा अर्थ का अनर्थ होते समय नहींं लगता।
संदर्भ सूची
विशाल के सी, विक्रमवीर थापा मेरा आँखीझ्यालबाट, (तेजपुर: भारतीय साहित्य प्रतिष्ठान, 2021),107
विशाल के सी, विक्रमवीर थापा मेरा आँखीझ्यालबाट, (तेजपुर: भारतीय साहित्य प्रतिष्ठान, 2021),37
विशाल के सी, विक्रमवीर थापा मेरा आँखीझ्यालबाट, (तेजपुर: भारतीय साहित्य प्रतिष्ठान, 2021),34
विशाल के सी, विक्रमवीर थापा मेरा आँखीझ्यालबाट, (तेजपुर: भारतीय साहित्य प्रतिष्ठान, 2021),19
विशाल के सी, विक्रमवीर थापा मेरा आँखीझ्यालबाट, (तेजपुर: भारतीय साहित्य प्रतिष्ठान, 2021),31
विशाल के सी, विक्रमवीर थापा मेरा आँखीझ्यालबाट, (तेजपुर: भारतीय साहित्य प्रतिष्ठान, 2021),64
विशाल के सी, विक्रमवीर थापा मेरा आँखीझ्यालबाट, (तेजपुर: भारतीय साहित्य प्रतिष्ठान, 2021),103
नीतू थापा: एम.फिल (महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा), पीएचडी शोधार्थी-पूर्वोतर पर्वतीय विश्वविद्यालय, शिलांग

एकादशी

एकादशी

वह एक है ,
अलौकिक है
मैं दास ही हूँ
वह परम है
उन्हें पूजना ही मेरा धर्म है
वह विशाल है
जीवन को जीने के लिए भगवत गीता में कहें सीख और मिसाल है
वही परमात्मा है
वही परम सत्य है
बाकी सब मिथ्या है
वो वासुदेव, नारायण , देवकीनन्दन और मधुसूदन है
उनमें लीन हो जाए मेरी आत्मा हर पल
वही प्रारंभ भी है
और वही अंत है।
वही सुदर्शन धारी है
अब मेरे कष्टों को काटने कि उनकी तैयारि है
वही सुबह और श्याम है
वही रुक्मिणी, राधा और मीरा के श्याम है।
वही नारायण है
वही सत्य है
वो जीव है
वो अजीव है
उनके आशिर्वाद से तुलसी भी नहींं निर्जीव है
वही शक्ति है

Anik

मनोरमा प्रकृति

मालविका ‘मेधा’

झर झर झर झर गिरता झरना,
कल कल कल कल बहती नदियाँ।
सी-सी-सी-सी स्निग्ध शीतल हवाएं,
सबमें देख प्रकृति के रूप हैं समाए।।

धवल घन विराजे नीले आसमा में,
सूरज उगे संदेशा नए दिन के लिए।
चंदा फैलाएँ चाँदनी बदन तड़पाए,
ऊँचा नग कहे सिर उच्च अटल रहे।।

पेड़ो से हैं बढ़ी धरती में हरियाली,
जीव जगत अविघ्न घूमे दिवा-रात्रि।
पुष्प खिल मनोरम बनी सुंदर पृथ्वी,
लहरे उठती-गिरती होकर मतवाली।।

अद्भुत वरदान यह मिला प्रभु से है,
प्रकृति अविरत हमें सींचती आई है।
निश्चित जीवन सुखमय बन पाया है,
इसी नैसर्गिक सौंदर्य में मिटना है।।

प्रकृति की देखभाल धर्म अपना हैं,
गोदी में सर रख जहाँ सोना हमें हैं।
अंधी कटाई यूँ पेड़ो की रोकना है,
शस्य श्यामला रूप देकर जीना हैं।।

पहाड़ से उतरती औरतें

देखा था कभी
सुदूर पहाड़ की
बेहद ख़ूबसूरत पहाड़ी औरतें
उनकी ललाई एवं लुनाई में
गया था खो आसक्त मन
पर एक अलग ही रूप देख
अब भी स्तब्ध हूँ
हिम की ख़ूबसूरती को
बसाए हुए दिल में
हिम पर खेल लौट रही थी
और सामने ही अपने अश्वों की
रास थामे दोनों हाथों की कठोरता से
एक पहाड़ी औरत
पथरीली ढलाऊँ पर
उतरती गई झट धड़ाधड़
यायावरों के साथ
दोपहर तक के कठोर श्रम के बाद
पलक झपकते ओझल तीनों
बुला रहा था शायद उसे
कोई बीमार, वृद्ध, अशक्त
स्कूल से लौटा उसका लाल
या फिर खेतों की हरियाली
इंतज़ार सेब बगान का
अभी भी मेहनत के नाम
लिखने को बचा था
बहुत सारा काम
उस ख़ूबसूरत युवती का,
बदल देने को भविष्य
पहाड़ों का
अबकी जाना पहाड़ तो
उसका चेहरा, चेहरे की रंगत
लावण्य का पैमाना
उसकी देह न देखना
बस, देखना केवल
जड़ सम कठोर पैर,
उसकी खुरदुरी हथेलियाँ!