उम्मीद की किरण कुमुद शर्मा

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नमिता थकी हारी घर पहुँची…दोपहर का समय था सो खाना परोसने सीधे किचन में चली गई।
“आज फिर धमाल चौकड़ी कर आई…”नमिता की सास ने कहा।
नमिता ने कोई जवाब नहीं दिया…क्योंकि वे दोनों एक दूसरे की अपेक्षाओं पर कभी खरी नहीं उतरी…काम खत्म कर बॉलकनी में आ बैठ गई…हताश हो सोचने लगी आज भी नौकरी नहीं मिली…खर्च कैसे चलेगा…एक्सीडेंट के बाद अमित की नौकरी भी जा चुकी है…इलाज भी चल रहा है।
तभी उसकी नजर छज्जे पर पड़ी…चिड़िया चूजों के मुंह में दाने डाल रही थी…उसे याद आया…”कुछ दिनों पहले ही मैंने इसे घोंसला बनाते देखा था”…नमिता के हौसलों को भी उम्मीद की किरण मिल गई।
कुमुद शर्मा

कुमुद शर्मा: मॉम्सप्रेस्सो, हिंदी प्रतिलिपी, आदि लेखक मंचो की ब्लॉगर वनिता, गृहलक्ष्मी आदि कई पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, रचनाएँ प्रकाशित।

मेघालय की मातृवंशीय संस्कृति व परंपरा

वीरेन्द्र परमार

Matriliny by Bah Raphael Warjri

प्रकृति की सुकुमार गोद में बसा मेघालय पूर्वोत्तर भारत का एक लघु पर्वतीय प्रदेश है। यहाँ की शस्य-श्यामला धरती के गर्भ में अनेक रहस्य, कहानियाँ, पौराणिक आख्यान, रोमाँचकारी किस्से और मिथक छिपे हुए हैं। प्रकृति यहाँ के निर्दोष और निष्पाप लोगों की सहचरी है। मेघालय अपने अद्भुत और अनिर्वचनीय सौन्दर्य के मोहपाश में बाँध लेता है, अपने निष्कपट हाव–भाव से सम्मोहित कर लेता है, अपने अकृत्रिम आचरण से बार–बार आने के लिए आमंत्रित करता है। यहाँ के निवासी भविष्य की चिंता में दुबले नहीं होते, बैंक बैलेंस के व्यामोह में तनाव नहीं पालते और आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी परंपराओं को तिलांजलि नहीं देते। वे वर्तमान में जीते हैं और जो मिल गया उसी से संतुष्ट हो जाते हैं। मेघालयवासियों का पाखंडहीन जीवन और निष्पाप आचरण किसी भी सभ्य समाज के लिए वरेण्य है। यहाँ की हरियाली, खूबसूरत घाटी, मनमोहक सूर्योदय और सूर्यास्त किसी कवि की कल्पना से भी अधिक चित्रात्मक, भावपूर्ण और अर्थगर्भित है। अगर कोई व्यक्ति प्रकृति के आँचल पर अपनी कल्पना के रंग भरना चाहे है तो उसे मेघालय से बेहतर कोई जगह नहीं मिलेगी। यहाँ की मनमोहक जलवायु किसी श्रांत–क्लांत और तनावग्रस्त पथिक को चंदन का अवलेप लगाती है। मेघालय का अर्थ है मेघों का आलय अर्थात मेघों का आवास। सचमुच यहाँ बादल अठखेलियाँ करते हैं। यहां खासी, जयंतिया और गारो तीन प्रमुख आदिवासी समुदाय के अतिरिक्त तिवा, राभा, हाजोंग, लाखेर, कार्बी, बाइते, कुकी आदि जनजातियों के लोग निवास करते हैं। मेघालय का इतिहास यहाँ निवास करनेवाली तीन प्रमुख जनजातियों खासी, जयंतिया और गारो से जुडा हुआ है। ये जनजातियां सदियो से यहाँ निवास करती हैं। मेघालय की अधिकांश जनसंख्या ईसाई धर्म ग्रहण कर चुकी है। खासी लोग कैथोलिक हैं जबकि गारो लोग बैपटिस्ट हैं। पनार अथवा नार मेघालय का एक प्रमुख समुदाय है जिसे जयंतिया के नाम से जाना जाता है। जयंतिया शब्द एक पूर्व सम्राज्य जयंतिया सम्राज्य से लिया गया है जिसके शासक सिन्तेंग समुदाय के थे। जयंतिया का मूल आदिवासी धर्म नीमत्रे युग ता युग के नाम से जाना जाता है। एक लोककथा के अनुसार तूफान के देवता के साथ आकाश के देवता ने स्वर्ग के पेड़ को हिलाकर उससे बीज गिरा दिया जिसे एक पक्षी ने उठाया और उस बीज को जमीन में बो दिया। वह और कुछ नहीं बल्कि चावल का बीज था। ईश्वर ने मनुष्य को कुछ दिव्य बीज तथा चावल की खेती के लिए आवश्यक निर्देश दिए। मेघालय की जनजातीय संस्कृति और लोक परंपरा अत्यंत समृद्ध है। बांसुरी और मृदंग से निकली स्वर लहरियों के साथ नृत्य और मदिरापान यहाँ के सामाजिक समारोहों और धार्मिक अनुष्ठान का अभिन्न अंग है। पांच दिनों तक मनाया जानेवाला “का पाबलांग-नोंगक्रेम” खासी समुदाय का प्रमुख त्योहार है। इसे ‘नोंगक्रेम’ के नाम से जानते हैं। यह शिलांग से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘स्मित’ नामक गाँव में मनाया जाता है। “शाद सुक मिनसीम” भी खासी जनजाति का पर्व है। हर साल हर्ष और उत्साह के साथ अप्रैल माह में यह त्योहार आयोजित किया जाता है। इसका आयोजन शिलांग में किया जाता है। “बेहदीनखलम” जयंतिया समुदाय का त्योहार है जो प्रायः जुलाई में मनाया जाता है। “बेहदीनखलम” का शाब्दिक अर्थ है “छड़ी से शैतान को भगाना”। इसका आयोजन जोवाई नामक कस्बे में किया जाता है। गारो समुदाय अपने देवता “सलजोंग” (सूर्य) के सम्मान में अक्टूबर-नवंबर महीने में ‘वांगला’ त्योहार मनाता है। मेघालय में सदियों से युवागृह की परंपरा विद्यमान है। गारो समुदाय के युवागृह को ‘नोकपंते’ के नाम से जानते हैं। प्रत्येक गाँव में कम से कम एक नोकपंते अवश्य होता है। इसमें ग्रामीण युवक पारंपरिक कला और शिल्प का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। नोकपंते में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। गाँव के सभी युवक नोकपंते में ही रात्रि विश्राम करते हैं, परन्तु पूर्वोत्तर की अन्य जनजातियों के युवागृह की भांति गारो समुदाय के युवागृह भी आधुनिकता के प्रवाह में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
मेघालय का समाज मातृसत्तात्मक है। सबसे छोटी पुत्री समस्त संपत्ति की मालकिन होती है। छोटी पुत्री ही वृद्ध माता-पिता एवं अविवाहित भाई-बहनों की देखभाल करती है। परिवार में कोई पुत्री नहीं होने पर माता-पिता किसी निकटतम महिला संबंधी को अपनी संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाते हैं। खासी और जयंतिया समुदाय के लोग अपने पारंपरिक मातृवंशीय नियमों का पालन करते हैं जहां सबसे छोटी पुत्री परिवार की सभी जिम्मेदारियां निभाती है। गारो जनजाति में भी सबसे छोटी बेटी मूल रूप से पारिवारिक संपत्ति की वारिस होती है। जब माता-पिता किसी अन्य लड़की को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हैं तो उसका दावा स्वतः समाप्त हो जाता है। गारो जनजाति के गोत्र अनेक उपगोत्रों में विभक्त है जिसे ‘मचोंग’ कहा जाता है। मचोंग का शाब्दिक अर्थ मातृत्व (मदरहुड) है। मचोंग इस समुदाय की सबसे छोटी इकाई है। यह परिवार से भिन्न संस्था है। मचोंग के सभी सदस्य एक ही माँ की संतान माने जाते हैं। खासी और गारो दोनों जनजातियों में पिता को बाहरी व्यक्ति माना जाता है। बच्चे अपनी माता के नाम से जाने जाते हैं। परिवार की सम्पूर्ण सत्ता माँ के हाथों में होती है। इस समाज में पिता की कोई निर्णायक भूमिका नहीं होती है। सभी संपत्ति पर माँ का अधिकार होता है। माँ की मृत्यु के बाद माता की संपत्ति पर उसकी सबसे छोटी बेटी का अधिकार हो जाता है। यदि किसी महिला को कोई संतान नहीं हो तो उस मचोंग की किसी अन्य महिला को वह संपत्ति मिल जाती है। सबसे छोटी पुत्री को ‘नोकना’ कहते हैं जिसका अर्थ है उत्तराधिकारिणी। ‘नोकना’ की अनुमति के बिना उसकी बड़ी बहनें भी मकान में नहीं रह सकती हैं। बच्चों का गोत्र वही होता है जो माँ का गोत्र होता है। यदि माँ संगमा हो और पिता मोमीन हो तो बच्चों का गोत्र संगमा माना जाता है। जयंतिया समाज में गोत्र को ‘कुर’ कहा जाता है। ‘कुर’ समाज की लघुतम इकाई है। गोत्र कई उपगोत्रों में विभक्त है जिसे ‘कपोह’ कहा जाता है। एक गोत्र के सभी सदस्यों को एक ही माता (पूर्वज) की संतान माना जाता है। जयंतिया समुदाय में लगभग 38 गोत्र हैं। परिवार में पिता का कोई महत्वपूर्ण स्थान नहीं है। बच्चों का परिचय माता के नाम से दिया जाता है। विवाह के बाद पति अपनी पत्नी के साथ उसके घर में रहता है, फिर भी पति को आजीवन बाहरी व्यक्ति ही माना जाता है। पत्नी की सम्पति में पति का कोई अधिकार नहीं होता है। विवाहित पुत्र द्वारा अर्जित संपत्ति पर उसकी माता का अधिकार होता है, पत्नी का नहीं। इस समाज में माँ ही परिवार की मुखिया होती है, परिवार पर माँ का ही पूर्ण नियंत्रण होता है। वह परिवार की एकमात्र रक्षिका होती है। विवाह के बाद दामाद सम्पूर्ण रूप से अपनी पत्नी के माता–पिता के घर रहने के लिए नहीं आता है, बल्कि सूर्यास्त के उपरांत वह अपनी पत्नी के साथ रात व्यतीत करने के लिए आता है और प्रातःकाल में काम करने एवं खाने–पीने के लिए अपनी माँ के घर चला जाता है। मृत्यु के बाद भी उसकी अंत्येष्टि पत्नी के सगे–संबंधियों द्वारा नहीं की जाती, वरन उसके ‘कुर’ के सदस्यों द्वारा की जाती है। मेघालय की भूमि लोकसाहित्य की दृष्टि से अत्यंत उर्वर है। यहाँ के आदिवासी पर्वतशिखरों एवं सुदूर जंगलों में प्राकृतिक जीवन व्यतीत करते हैं जहाँ गीत गाते झरनों, बलखाती नदियों, वन्य–जीवों और नयनाभिराम पक्षियों का उन्मुक्त संसार है। यहाँ का जीवन सरल और स्वच्छंद है। यहाँ जीवन की आपाधापी नहीं, समय की व्यस्तता नहीं, कोई कोलाहल नहीं। यहाँ तनावरहित जीवन और न्यूनतम आवश्यकताएं हैं। इन परिस्थितियों में इनके उर्वर मस्तिष्क में कल्पना की ऊंची उड़ान उठती है। फलतः लोकगीतों, लोककथाओं, मिथकों, कहावतों, पहेलियों का सृजन होता है। मेघालय की पुरानी पीढ़ी को लोकसाहित्य का जीवंत भंडार गृह कहा जा सकता है। लोकसाहित्य वाचिक परंपरा में पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता है जो नई पीढ़ी के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम करता है।

वीरेन्द्र परमार: भारत सरकार के राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय में हिन्दी प्राध्यापक के रूप में हिन्दी शिक्षण योजना के केंद्रों पर प्राध्यापन। जल संसाधन मंत्रालय (भारत सरकार) के अधीनस्थ कार्यालय केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड, फरीदाबाद में उपनिदेशक (राजभाषा) के पद पर कार्य। राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय में उपनिदेशक (कार्यान्वयन) पद पर पूर्वोत्तर भारत के समाज, लोक परंपरा, लोकजीवन, लोकसाहित्य और आदिवासी जीवन के उपर विपुल लेखन। सम्प्रति असम विश्वविद्यालय, सिलचर में पदस्थ।

महादेव खोला धाम

अनुपमा प्रधान

महादेव खोला धाम एक बहुत ही पौराणिक और प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर मेघालय, अप्पर शिलांग, इस्ट खासी हिल्स में स्थित हैं। उमशिरपी नदी मंदिर के सामने अपने शांत स्वभावके साथ बहती रहती है। कहा जाता है यह मंदिर डेढ़ सौ साल पहले स्थापित की गई थी।
अनेको कहानियाँ सुनने में आती है इस मंदिर के बारे में, मंदिर कैसे, क्यों और कब स्थापित हुई इस बारे में। कहा जाता है इस जगह पहले काफी घना जंगल था जहाँ लखिया बाबा वर्षो से धयान में लीन बैठे थे। वही एक 2/8 गोर्खा राइफल्स के सूबेदार मेजर को सपने में एक गहरे लाल वस्त्र पहने, गले में रूदराकश और एक हाथ में त्रिशूल लिए तपस्या में लीन बैठे दिखाई दिए। अकसमात एक रोशनी के बीचों-बीच से आवाज़ आई और सूबेदार जी को आदेश दिया, कहा उस साधु की तलाश करे और साथ ही वहाँ मंदिर की स्थापना भी करें।
अगले ही दिन सूबेदार जी आदेशानुसार उन महात्मा की खोज में निकल पड़े और उस जगह पहुँचे आज जहाँ महादेव खोला धाम है। लखिया बाबा के मिलते ही उनहोंने मंदिर स्थापना का कार्य भी आरंभ कर दिया। हैरानी की बात यह थी मंदिर स्थापना के कार्य करते समय उन्हे वहाँ एक शिवलिंग प्राप्त हुआ।
मंदिर के पंडितों का आज भी कहना है यह शिवलिंग उन्हे वही गुफा से प्राप्त हुई थी।
इस धाम के बारे में यह भी कहा जाता है कि यहाँ एक गुफा है जहा से अंदर ही अंदर गुवाहाटी, कामखया मंदिर पहुँच सकते है। लोगों का यह भी कहना तब के समय लोग यही से आया जाया करते थे।
150 साल पहले सूबेदार जी द्वारा स्थापित किया गया छोटा सा शिव मंदिर आज बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर है। हर शिव भक्त का यह मानना है कोइ भी सच्चे दिल से मुराद माँगते है वह कभी निराश नहीं होते है।
यहाँ के पंडितों का यह भी कहना है मंदिर के अंदर जो छोटे-छोटे मंदिर हैं। उन्हें भक्त जनो ने अपनी मुराद पूरी होने पर बनवाया है।
आज जो इस मंदिर की देख-रेख कर रहे है, वह पंडित सुखराम दास मिश्रा जी की छठी पीढ़ी है। सुखराम जी इस मंदिर के पहले पंडित थे।
शादी, यज्ञ और बहुत सारी हिन्दु रस्मों-रिवाज़ का इस मंदिर में आयोजन किया जाता है।
बात जब तीज-त्योहार की आती है महा शिवरात्रि के मेले का आयोजन बड़े धूम-धाम से होता हैं। हजारों के तादात में लोग जगह-जगह से इस मंदिर के दर्शन के लिए एकत्रित होते हैं। आज भी शिवरात्रि के उत्सव पर गोरखा राइफल्स अपना योगदान देते हैं।
सावन के महीने में बोलबम का नारा लगाते हुए भक्त जन नंगे पाँव कावड पद यात्रा के लिए महादेव खोला धाम में आते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ अपनी भक्ति ईश्वर को अर्पित करते हैं।
सच्चाई कुछ भी हो पर भक्त जन पूरी श्रद्धा से अपनी भक्ति ईश्वर को अर्पित करते हैं। यह धाम बहुत ही लोकप्रिय है और श्रद्धालुओं की अटूट भक्ति ने इस धाम को पूरे देश में प्रसिद्ध कर दिया है।

अनुपमा प्रधान,  अध्यापिका हिन्दी में कविता, आलेख और कहानियाँ पत्रिकाओं में प्रकाशित। पूर्वोत्तर सेवा आकाशवाणी, दूरदर्शन, शिलांग से कविता और कहानी प्रसारण और अन्य कार्यक्रम में भागीदारी।

का पुङ वेइक्यान- एक लोककथा

एहसिंग खिएवताम्

मेघालय के पूर्वी खासी पहाड़ी जिला के पेनुर्स्ला खंड में उम्न्युह् त्मार नामक एक ग्राम है। यह ग्राम बांग्लादेश सीमा से लगकर स्थित है। यहाँ के ग्रामवासी में आज भी ‘उ रेन्’ के बारे में एक लोककथा प्रचलित है। यह लोककथा आज भी ग्रामवासी अपने अगले पीढ़ी को सुनाते आए है।
कहा जाता है कि कई वर्षों पूर्व ‘उ रेन्’ नामक युवक इस ग्राम में अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहता था। ‘उ रेन्’ बहुत ही मेहनती तथा फुर्तीला युवक था। प्रतिदिन खेत-बागानों में काम करके शाम को घर लौटता था। इसी प्रकार रेन् का दिनचर्या होता था। एक दिन कड़ाके की धूप हो रही थी तथा रेन् को खेत में काम करते-करते थकावट का अनुभव हो रहा था। तभी रेन् खेत का काम छोड़कर पास के ‘वेइक्यान’ नदी की ओर मछ्ली पकड़ने एवं विश्रांम करने जाने लगा। मछ्ली पकड़ने में व्यस्त था तभी एकाएक उसकी दृष्टि नदी के दूसरी छोर पर गयी। एक अप्सरा सी युवती नहाकर धूप में आराम कर रही थी। मुखमंडल पर अद्भुत तेज था, अद्वितीय सुंदरता से शोभित थी, नदी की रानी सी प्रतीत हो रही थी। रेन् कुछ देर के लिए उस अद्वितीय सुंदरता को अवाक देख रहा था क्योंकि उसके नदी आने के क्रम में आज पहली बार कोई युवती इस सुनसान नदी में अकेली नहाने आई थी। अश्चार्यवश रेन् झट से नदी के उस पार चला गया और उस सुंदर युवती से पूछताछ करने लगा। दोनों ने पर्याप्त समय तक शब्दों का आदान-प्रदान किया। दोनों आपस में सहज अनुभव कर रहे थे। उनके ह्रदय में एक दूसरे के लिए प्रेम पल्लवित हो रही थी तभी युवती ने रेन् से कभी उसके एवं उसकी भावना के साथ छल न करने का वचन लिया एवं उसे अपने घर ले जाने को सहमत हो गयी। रेन् तुरंत ही उस सुंदरी के वचन को मान उसके साथ उसके घर चलने को तैयार हो गया। सुंदरी ने अपने दोनों हाथों से नदी के पानी को अलग कर अपने घर के द्वार तक का रास्ता खुला कर दिया था। रेन् की आँखों को यह घटना पहली बार अनुभव करने का अवसर प्राप्त हो रहा था तथा उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। नदी के अंदर प्रवेश करते ही पानी अपने आप फिर से जुड़ने लगा। सुंदरी का घर बहुत ही सुंदर था, साज-सज्जा की कोई दूसरा उदाहरण नहीं था। रेन् उस चकाचौंध में खोने लगा था। कुछ देर सुंदरी के साथ रहने के बाद अचानक उसे अपनी माँ का ध्यान हो आया तथा अपनी माँ से मिलने व्याकुल हो रहा था। अपनी सुंदरी को वापस आने का वचन देकर रेन् वहाँ से चलने लगा।
अपने बेटे को घर लौटते देख उसकी माँ खुशी से समा नहीं पा रही थी। रेन् को अपने सीने से लगाकर चूमने लगी। उनकी आँखों से आँसू निरंतर प्रवाहित हो रही थी। यद्यपि रेन् की माँ कुछ हैरान भी थी क्योंकि रेन् की खोज ग्रामवासी ने निरंतर तीन दिन तक की थी। रेन् अपनी सुंदरी के घर तीन दिन तक रहा था इसकी सुध उसे तनिक भी नहीं था। माँ बहुत खुश थी। रेन् अपनी माँ से सारी घटना का जिक्र करने लगा तथा अपनी माँ से उसकी बहू की पहली बार घर आने की तैयारी करने के लिए भी अनुरोध करने लगा। रेन् ने अपनी माँ से विशेष सूचना भी दिया कि जब उसकी बहू घर में प्रवेश करे तो उसकी दृष्टि में घर का झाडू नहीं आना चाहिए। रेन् की माँ वृद्ध थी। माँ ने अपने सभी सहेलियों से तैयारी की सहायता करने के लिए बुलाई। तुरंत ही घर की साफ-सफाई, सजावट, सुशोभिकरण में सब व्यस्त होने लगे थे।
अंततःवो दिन भी आ ही गया जिसकी प्रतीक्षा रेन् की माँ के साथ-साथ पूरे ग्रामवासी भी उत्सुकता से कर रहे थे। रेन् की पत्नी का ग्राम में आगमन होते ही ग्रामवासी उसे अवाक होकर देख रहे थे। उन्होने अपने सपने में भी ऐसी सुंदर स्त्री की कल्पना नहीं की थी। लोगों में काना-पुसी होने लगी। लोग आपस में बाते करने लगे कि रेन् ने एक परी से विवाह किया है। रेन् की माँ बहुत ही खुश थी। अपनी बहू का स्वागत करने लगी थी। आगे-आगे चलकर बहू को अपने घर में प्रवेश करा रही थी। अपनी सासु माँ के पीछे-पीछे चलकर बहू घर के चौखट तक पहुँच गयी थी। घर में प्रवेश कर ही रही थी तभी उसकी दृष्टि द्वार के पास कोने में रखे झाड़ू की ओर पड़ी। आहत होकर वही से पीछे मुड़ गयी। पलटते ही रेन् से कहने लगी कि यदि वह चाहता है तो अपनी माँ के साथ रह सकता है परंतु वह इस घर में क्षणभर भी रुक नहीं सकती और वहाँ से चलने लगी। रेन् धीरे-धीरे अपनी माँ के पास बढ़ा उनसे अपनी पत्नी को दिया वचन से बद्ध होने की भावना को प्रकट किया। साथ ही खासी संस्कृति से बद्ध होने का एहसास भी अपनी माँ को दिलाने लगा, जहाँ खासी परिवार का पुरुष अपनी पत्नी एवं उसके भावी संसार की रक्षा, भरण-पोषण एवं संवर्धन के लिए उसके साथ अथवा उसे लेकर अपनी माँ का घर छोडता है। अपनी माँ को दिलासा देकर कहने लगा कि यदि मैं जीवित हूँ तो वर्षा के ऋतु में आपको ‘वेइक्यान’ नदी से अंगड़ाई नुमा गूँज सुनाई देगी अतः यही गूँज मेरे जीवित होने का प्रमाण होगा। रेन् अपनी माँ को अंतिम बार सीने से लगाकर विदाई लेने लगा एवं अपनी पत्नी के घर चलने लगा।
आज भी ‘उम्न्यु-त्मार’ एवं ‘वेइक्यान’ के ग्रामवासी का मानना है कि वर्षा के ऋतु में रेन् की गूँज कभी-कभी सुनाई देता है।

सन्दर्भ-
१. Golden Vine of Ri Hynniewtrep – The Khasi Heritage : Sumar Sing Sewian : page no. 28.
२.Unbelievable : C T Sangma
३.गारो पहाड़ियों से : अनीता पंडा : pg. 10 – 12.

एहसिंग खिएवताम्
एम.फिल. शोधार्थी, नेहू

आखिर कब तक दया शर्मा

मैं जब भी सुबह की सैर के लिये निकलती तो रास्ते में सड़क की ढलान पर स्थित हवेलीनुमा घर पर मेरी नज़र अनायास टिक जाती मानो बाहर की वीरानगी अन्दर की कुछ कहानी कहना चाहती हो। एक दिन जब मैं वहाँ से सुबह गुज़र रही थी तो एक दर्दनाक चीख सुन मेरे पैर वहीं ठिठक गये। आवाज़ घर के अन्दर से ही आई थी। ढलान से ऊपर आती एक औरत मुझे देख रुक गई और बोली, “मैडम, शायद आपने भी वही चीख सुनी है।” फिर कुछ रुक कर बोली “यहाँ तो आए दिन कुछ न कुछ होता रहता है। पता नहीं ये लोग बहू के साथ ऐसा बर्ताव क्यों करते हैं। खैर, हम तो ठहरे गरीब आदमी ऐसे झंझटों में खुद को डालकर मुसीबत क्यों लें।” यह कहकर मेरी प्रतिक्रिया देखे बिना मुड़ गई । पता नही क्यों उसकी बात सुनकर मन कसैला हो गया और मैं बिना गये वापस घर की और लौट आई।
उसी शाम मुझे कुछ जरूरी काम के लिए बाजार जाना पड़ा। मैनें उसी घर की तरफ से रूख किया जबकि जाने का दूसरा रास्ता भी था। जैसे ही उस घर के नजदीक पहुँची वहाँ से कुछ लड़ाई- झगड़े की आवाज़ सुनी। सामने जो दो चार छोटे-छोटे मकान नज़र आ रहे थे वहाँ ठण्ड में लोग अपने अपने घरों में दुबके पड़े थे। सड़क पर भी इक्का दुक्का ही आदमी नजर आ रहे थे। मैं भी भारी मन से आगे की ओर चल पड़ी।
नित्य की भान्ति मैं दूसरे दिन सुबह की सैर के लिये निकल पड़ी। उस हवेलीनुमा घर के जब नजदीक पहुंची तब मन बहुत घबराया सा था। देखा बाहर कुछ लोग जमा थे। पूछने पर पता चला कि कल रात घर की बहु चल बसी है। “क्या हुआ था बहू को ?” मैं पूछे बिना न रह सकी। उसी व्यक्ति ने जवाब दिया “ ज्यादा तो मुझे भी पता नही। घर के लोगों का कहना है कि काफी दिनों से बीमार चल रही थी।” न तो मैं घर के लोगों से परिचित थी और न ही बहू को कभी देखा था फिर भी अन्दर से एक आवाज़ आ रही थी कि बहूत से घरों के न जाने और कितने ऐसे अनकहे राज़ होंगे जो मनुष्य की मौत के साथ ही दफन कर दिए जाते हैं। न ही कोई केस और न ही कोई पैरवी बस अनकही दास्तान बन कर रह जाते हैं।
जैसे ही मैं वापिस अपने घर की तरफ मुड़ने को तैयार हुई ऐसे लगा मानो मेरी अंतरात्मा मुझे धिक्कार रही हो। मैंने उसी क्षण निर्णय लिया कि मैं इसे अनकही दास्तान नहीं बनने दूँगी आखिर बहू की मौत का रहस्य उजागर होना ही चाहिए ताकि कुसूरवार को सजा मिल सके। मेरे हाथ स्वतः मोबाइल की ओर उठे ताकि मैं पुलिस को सूचित कर सकूँ। इसके लिए मैंने अपने आप को जरुरत पड़ने पर ‘महिला सेल‘ जाने के लिए भी तैयार कर लिया। मुझे आन्तरिक प्रसन्नता हुई कि मैं एक माँ व एक नारी होने के नाते एक सही निर्णय ले रही हूँ। आखिर कब तक बहू – बेटियाँ ससुराल में शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलती रहेगी उन्हें भी तो तथाकथित सभ्य समाज में जीने का हक और अपनी निष्पक्ष बात कहने का अधिकार मिलना चाहिए।

श्रीमती दया शर्मा-गृहिणी महिला काव्य मंच मेघालय इकाई की सदस्य रचनाएं समाचार पत्र व पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। पूर्व इम्फाल (मणिपुर ) मे AIR मे casual announcer के तौर पर कार्यरत रह चुकी है। शिलांग AIR में भी विभिन्न विषयों पर कार्यक्रम देती है।

गुड़िया की ओढ़नी तूलिका श्री


‘ओ दादी’, रूआंसी होती हुई मीनल बोली- ‘मुझे भूख लगी है, माँ आप कहाँ हो?’ जोर जोर से आवाजें लगाती हुई मीनल माँ को ढूँढने लगी।
पांचवी कक्षा में पढ़ने वाली मीनल की सबसे अच्छी दोस्त थी राजकुमारी दोनों साथ मिलकर मीनल की हवेली की तीसरी मंजिल से भी ऊपर की ओर छत पर जाने वाली सीढ़ियों पर छुप कर बैठ जाते, पकी हुई इमली, अमरूद, लाल मिर्च भरी हुई बड़े सुख से खाते, उन दोनों की जिंदगी का सबसे बड़ा खुशहाली का वक्त वही होता था। दोपहर में जब सब सो जाते थे, राजकुमारी के आँगन में अमरूद का पेड़ था बिल्कुल कच्चे नारियल जैसा स्वाद था, वाह कितना अच्छा था सब कुछ औरअब 15 दिन बीत गए। सब्र की हद हो गई। एक दिन सुबह-सुबह ही सहेली के घर जा पहुंची वो। आँगन में सिलबट्टी पर पड़ी गीली हल्दी आज अपनी रंगत से अलग ही दीखरही थी। ‘राजकुमारी कहाँ हो तुम? अरे आंटी जी ! बहुत दिनों से वो स्कूल क्यों नहीं आ रही है? बहुत ज्यादा पढ़ाई हो रही है’ उसकी मम्मी अपनी आँखों से आँसू पूछती हुई दूसरे कमरे में चली गई। भैया ने बोला ‘चिंता मत करो हम उसे खबर कर देंगे।’ भोली मीनल उदास सी अपने घर लौटी, तो माँ ने डाँट लगाई- ‘सुबह-सुबह भला किसी के घर जाते हैं क्या? अब से वहाँ गई, तो समझना।’
रूआाँसी मीनल अपनी गुड़िया की ओढ़नी में अटकी हुई थी। राजकुमारी बोल कर गई थी ‘मैं इस गुड़िया की ओढ़नी सजाऊ ँगी। बस नानी के घर से जल्दी ही लौट कर आऊ ँगी तुम सब सामान जुटा कर रखना।’ कितनी मिन्नतों के बाद दादी ने थोड़ा सा गोटा दे दिया था, देते हुए बोली थीं- ‘यह ठाकुर जी (कृष्ण भगवान) के लिए म ँगाया है, दे रही हूं तुम्हें खराब मत करना।’ छत पर अकेली बैठी मीनल का मन नहीं लग रहा था। उसने सोचा चलो क्यों न दादी से ही किरन, गोटा लगवा लेते हैं, और सारा सामान ले गुड़िया को खूब सारा प्यार कर उसे दुपट्टे में लपेट वह सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी कि बाबा की आवाज सुनाई दी, ‘हमारी मीनू बिटिया उदास हो जाएगी अभी मत कुछ बताना।’
सन्नाटा था बरामदे में, दादी ने उसे यह कहकर वापस कर दिया कि ‘मैं थक गई हूं, बाद में कर लेंगे।’ बुआ को भी जाने क्या हुआ था बोली- ‘आँखों में दर्द है और मम्मी, अभी उनके आराम करने का वक्त है।’ उदासी, दुख और गुस्सा सब मीनल के सिर पर नाचने लगे थे तभी बाबा ने प्यार से सिर सहलाते हुए कहा- ‘कल मिथिला आएगी न काम पर बस सबसे पहले तुम्हारे गुड़िया की ओढ़नी, ठीक है।’ मीनल को मन माँगी मुराद मिल गई थी अपने सपनों को दुपट्टे में समेटे नाचते-कूदते यह बात अपनी छोटी बहन को बताने चली गई।
अगले दिन स्कूल में हिंदी का पीरियड था और कक्षा में काव्य पाठ का आयोजन, जो कि हिंदी की अध्यापिका हर महीने करवाती थी। कोई भी कविता देखकर पढ़ने का मन हो या याद करके बोलने का मन हो, खूब अच्छे ढंग से अभिनय के साथ जो पढ़ता उसे टीचर अपनी तरफ से इनाम देती। मीनल से भला कोई कहाँ जीत पाता था पर आज सदा मुस्कुराने वाली मीनल पनियाली आँखें लिए बैठी थी। सारी लड़कियाँ एक के बाद एक कविता पढ़ रही थीं लेकिन टीचर की आँखें तो अपनी प्यारी मीनल अभिनेत्री को ढूँढ रही थी तभी उनकी नजर उस पर पड़ी, ‘क्यों उदास क्यों बैठी हो अभिनेत्री?’(टीचर हमेशा इसी नाम से उसे बुलाया करती थीं)
‘टीचर वो राजकुमारी आज-कल स्कूल नहीं आती, घर पर भी नहीं है मम्मी बोलती हैं वह नानी के घर चली गई है।’ पल भर में ही टीचर को सारी वस्तु स्थिति समझ में आ गई थी। उनकी भी आँखें भर भरा उठी, बोली- ‘बेटी जो लोग भगवान के घर चले जाते हैं वह वापस कभी नहीं आते तुम्हें किसी ने बताया नहीं, उसको ब्लड कैंसर हो गया था। और बेटा इस रोग का इलाज अभी तक नहीं निकला है। उसके लिए प्रार्थना सभा तो रखी थी स्कूल में, शायद तुम उस दिन नहीं आई थी।’ मीनल को अपनी गुड़िया, ओढ़नी, गोटा-किरन, अपनी सहेली सब धुँधले होते नजर आ रहे थे।

तूलिका श्री, बड़ौदा : बड़ौदा से प्रकाशित हिंदी त्रैमासिक पत्रिका नारी अस्मिता में समीक्षक के रूप में कार्यरत। अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनंदन समिति मथुरा द्वारा राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय कवि का सम्मान प्राप्त। संप्रति- ऑक्जिलियम कन्वेंट हाई स्कूल, बड़ौदा में हिंदी संस्कृत की अध्यापिका के रूप में कार्यरत।

पुस्तक समीक्षा

डेजी शर्मा


पुस्तक- साक्षात्कार: संभावना और यथार्थ (पूर्वोत्तर के हिंदी रचनाधर्मियों से साक्षात्कार)
लेखन – पंकज मिश्र ‘अटल’
प्रकाशक – बोधि प्रकाशन, जयपुर (राजस्थान)
प्रकाशन वर्ष – जुलाई 2020
पूर्वोत्तर का नाम लेते ही एक सुंदर और मनोरम जगह का एहसास होता है। असम से लेकर मणिपुर तक पूर्वोत्तर के आठों राज्यों में जनजातीय लोगों तथा शेष अन्य जातियों के लोगों ने अपनी साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक विरासत को संभाल कर और संजो कर रखा है।
यहाँ पूर्वात्तर में अनेक ऐसे महान व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने अपनी कलाकारी से, अपने लेखन से, अपने अन्य योगदानों से पूर्वात्तर के राज्यों को प्रगति और प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचाया है।
यहाँ ढेरों ऐसे प्रतिभाशाली लोग हैं, लेकिन कुछ तो हमेशा पर्दे के पीछे ही रहे हैं। ऐसे ही लोगों की सोच को, उनके हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति योगदान को हमारे सामने साक्षात करने की कोशिश की है पंकज मिश्र ‘अटल’ जी ने।
पंकज जी ने साक्षात्कारः संभावना और यथार्थ नामक पुस्तक के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत में हिंदी लेखन को भी एक नई दिशा देने की पहल की है। पुस्तक में उन्नीस रचनाकारों की मनोवृत्ति को, उनके हिंदी में लेखन को उजागर किया गया है। पंकज जी मानते हैं कि अगर वे यहाँ के रचनाकारों से जुड़ेंगे, तो यहाँ की मिट्टी से जुड़ेंगे। रचनाओं के माध्यम से यह जानने की चेष्टा की गई है कि यहाँ अर्थात पूर्वात्तर के आठों राज्यों में हिंदी के विकास की संभावनाएँ यदि हैं तो किन रूपों में हैं।
अनुवाद के माध्यम से भी यहाँ की सभ्यता, संस्कृति दूर-दूर तक जा चुकी है। कुल मिलाकर इस पुस्तक के माध्यम से हम विभिन्न कलमकारों के विचारो से अवगत होंगे। पुस्तकें तो हम कई पढ़ते हैं, लेकिन कई साक्षात्कारों को एक साथ किसी धागे में मोतियों की तरह पिरोना एक नई पहल के रूप में ही है यह साक्षात्कारों पर केंद्रित पुस्तक।
पंकज जी ने इसको एक नया रूप दिया है। वर्तमान में पंकज मिश्र ‘अटल’ असम के बरपेटा में जवाहर नवोदय विद्यालय में कार्यरत हैं और अपनी लेखनी से हिंदी के विकास के पथ पर अग्रसर हैं।
पंकज जी विशेषकर अतुकांत कविता, नवगीत और समीक्षात्मक लेख लिखते हैं। बाल साहित्य में भी उनकी लेखनी चली है। ये आकाशवाणी से भी जुड़े हुए हैं।
आइए, पुस्तक की गहराइयों में अवगाहन करते हैं। सबसे पहले मैं इसकी भूमिका पर अपने विचार प्रस्तुत करना चाहती हूँ। इसमें पूर्वोत्तर के कई रचनाधर्मियों से लिए गए साक्षात्कार हैं। यहाँ पूर्वोत्तर के आठों राज्यों के रचनाकारों को समेटा गया है। इन साक्षात्कारों में अगर अतीत का विवरण है, तो वर्तमान की विवेचना और व्याख्या भी निहित है तथा भविष्य में झाँकने की जिजीविषा भी समाहित है। पंकज जी ने अपनी कलम से इन साक्षात्कारों में ऐसी जान फूँकी हैं कि पाठक उनकी लेखनी में डूब जाएंगे।
पहला साक्षात्कार अरूणाचल प्रदेश की लेखिका डॉ. जमुना बीनी तादर का है। पढ़ने के बाद हम लेखिका के व्यक्तित्व, कृतित्व और विचारधारा से रूबरू होंगे। दूसरा साक्षात्कार सिलचर के रचनाकार गुलशन राय मोंगा का हैं, जो कि एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार हैं। इनकी रचनाओं में वर्तमान व्यवस्था, सामाजिक विकृतियों और नारी शोषण के खिलाफ हुंकार दिखाई देती है। वहीं डॉ. देवेन चंद्र ‘सुदामा’, रूनू बरुवा ‘रागिनी तेजस्वी’, मदन सिंघल, कुंतला दत्त, किशोर कुमार जैन, जीना बरुवा, सौमित्रम्, हरकीरत हीर, डॉ. प्रवीन कोच, डॉ. नवकांत शर्मा, एमी मेहजाफी हुसैन ‘आयशा’, डॉ. बी.पी. फ़िलिप जुविचु, राधा गोविंद थोंडाम ‘कविराज’, ड़ॉ. अनिता पंडा, डॉ. वानलाल रेमरूअता राल्ते, अर्जुन चामलिड. ‘यावा’, रमेंद्र कुमार पाल के विचारों को पढ़ लेते हैं तो हम समग्र पूर्वोत्तर को जान जाएंगे। इस प्रकार यह पुस्तक अपने नए सोच और विचारों के साथ हमारे सामने आई है।
पंकज जी ने इन समस्त साक्षात्कारों के माध्यम से पूरे पूर्वोत्तर को साहित्यिक दृष्टि से एक धागे में पिरो दिया है, जो कि एक अनूठा कार्य है।
पंकज मिश्र ‘अटल’ द्वारा पूर्वात्तर भारत में हिंदी की स्थिति, हिंदी में लेखन, अनुवाद कार्य की स्थिति आदि को स्वयं जानने और पूर्वात्तर में हिंदी में हो रहे लेखन से शेष भारत के बुद्धिजीवियों और हिंदी रचनाधर्मियों से परिचित कराने हेतु किया गया यह कार्य पूर्वात्तर के तमाम साहित्यिक संदर्भों में अपना विशेष स्थान और महत्व रखता है। इस प्रकार कई लेखकों को एक साथ एक जगह पर प्रस्तुत करना, वह भी अलग-अलग राज्यो से, एक दुर्लभ कार्य है।
पंकज मिश्र ‘अटल’ ने बुद्धिजीवियों द्वारा साक्षात्कारों के रूप में दिए गए विवरण के अलावा इस पुस्तक की भूमिका में समग्र पूर्वोत्तर को ही व्याख्यायित सा कर दिया है। आपने पूर्वोत्तर भारत में जो जनजातीय भाषाएं हैं उनके साहित्य, उनकी भाषाओं, बोलियों, उन भाषाओं में जो साहित्य है उसके हिंदी में अनुवाद की स्थिति, पूर्वोत्तर की बहुरंगी संस्कृति, लोकसाहित्य, और हिंदी में हो रहे लेखन की गुणात्मकता तथा क्षेत्रीय भाषाओं में हिंदी साहित्य के अनुवाद की स्थिति को भी उभारने की चेष्टा की है।
पंकज मिश्र ‘अटल’ ने भूमिका के माध्यम से ही इस पुस्तक और इस वृहद कार्य के सन्दर्भ में अपने मनोभाव और कार्य की महत्ता और अवश्यकता को भी स्पष्ट कर दिया है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि बहुत से स्थापितों के साथ नए हस्ताक्षरों को भी आपने राष्ट्रीय फलक पर अपने आपको स्थापित करने और साबित करने हेतु अवसर भी दिया है, कहीं न कहीं साक्षात्कारों के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत के ये रचनाकर पूर्वोत्तर में बुद्धिजीवियों के मध्य चर्चा में आए, उनकी पहचान को मजबूती मिली और विस्तृत साहित्यिक फलक भी मिल सका।
साक्षत्कार विधा को चुनने के संदर्भ में पंकज मिश्र ने कहा है कि, “मेरा ध्यान सीधे-सीधे साक्षात्कार विधा की ओर गया, क्योंकि साक्षात्कार विधा ही वह माध्यम है जिसके द्वारा व्यक्तित्व से कृतित्व तक की गहराइयों का अवगाहन किया जा सकता है, आदर्श से यथार्थ तक की दूरी तय की जा सकती है, और किसी भी व्यक्ति के योगदान को सूक्ष्मता से विश्लेषित और व्याख्यायित भी कर सकते हैं।”
पंकज मिश्र ‘अटल’ इस पुस्तक के संदर्भ में अपने उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि, “इस पुस्तक के माध्यम से मैं कई महत्वपूर्ण उद्देश्यों को आधार बनाकर चला हूं। इन उद्देश्यों में पूर्वोत्तर में हिंदी की जमीनी हकीकत को जानना, हिंदी के संदर्भ में किए जा रहे प्रयासों को परखना, पूर्वोत्तर के हिन्दी लेखन पर समीक्षात्मक चर्चा करना, पूर्वोत्तर की क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य तथा जनजातीय लोक साहित्य के हिंदी में हो रहे अनुवाद से जुड़कर अनुवाद तथा अनूदित साहित्य पर विश्लेषणात्मक और विवेचनातमक संवाद करना आदि मुख्य हैं।”
अंत में मैं यही कहना चाहूँगी कि पूर्वोत्तर में हिंदी लेखन और हिंदी के प्रचार तथा प्रसार की अपार संभावनाएँ हैं।
अगर इस प्रकार के साहित्यिक कार्य होते रहे, तो पूर्वोत्तर किसी भी परिचय के लिए मोहताज नहीं रहेगा और यहाँ के भी रचनाकारों की गिनती पूरे भारतवर्ष में होने लगेगी।
अंततः मैं यही कहना चाहती हूं कि साक्षात्कार विधा पर जारी यह पुस्तक जिन मन्तव्यों और संदर्भों को केंद्र में रखकर लिखी गई और प्रकशित की गई है, पूर्ण रूप से पूर्वोत्तर भारत में हिंदी की वास्तविकता को जानने और समझने में सहायक है।
शोधार्थियों को पूर्वोत्तर में हिंदी लेखन के सन्दर्भ में यह पुस्तक सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में मार्गदर्शन भी करेगी। पंकज मिश्र ‘अटल’ ने पूर्वोत्तर भारत काफ़ी गहराई और गंभीरता के साथ न केवल स्वयं महसूस किया है अपितु साक्षात्कार विधा की इस पुस्तक को पूर्वोत्तर वासियों और शेष भारत के तमाम-तमाम बुद्धिजीवियों तक पहुँचा कर बौद्धिक स्तर पर पूर्वोत्तर और शेष भारत के प्रबुद्ध वर्ग को, साहित्यिक समाज को एक-दूसरे को समझने और एक-दूसरे से जुड़ने में सेतु की भूमिका भी निभाई है।
पूर्वोत्तर भारत में हिंदी भाषा और साहित्य की स्थिति को जानने और परखने की मनोभावना के साथ-साथ यह पुस्तक पंकज मिश्र ‘अटल’ के साहित्यिक तथा साकारात्मक सोच, पूर्वोत्तर भारत के प्रति उनकी आत्मीयता को तो उजागर करती ही है पूर्वोत्तर में हिंदी के संदर्भ में अपार संभावनाएं और हिंदी के उज्ज्वल भविष्य की ओर भी संकेत करती है। क्योंकि पंकज मिश्र ‘अटल’ की मनोभावनाओं और पुस्तक के संदर्भ में निहित विचारों को समाहित करते हुए आगे बँढ़ू तो बेहतर होगा।
पंकज मिश्र ‘अटल’ लिखते हैं कि, “पुस्तक ‘साक्षात्कार: संभावना और यथार्थ (पूर्वोत्तर में हिंदी रचनाधर्मियों से साक्षात्कार)’ पूर्वोत्तरमें हिंदी भाषा और साहित्य को लेकर चर्चा और संवाद की पर्याय मात्र न होकर नवीनतम संदर्भों में परिष्कृत दृष्टि की परिचायक है और स्वयं में अनंत अपेक्षाओं और संभावनाओं के साथ उस कल की ओर उन्मुख है जो कि पूर्वोत्तर के बुद्धिजीवियोंं, हिंदी प्रेमियों का संभावित सच है। ” पंकज मिश्र ‘अटल’ का यह कथन उनकी व्यापक दृष्टि, उनके बहुआयामी सोच और वैचारिक गहराई का द्योतक तो है ही, साथ ही साथ यह साक्षात्कार ग्रंथ इन आधारों, तथा मानकों पर भी खरा उतरता है। यही नहीं यह पुस्तक पूर्वोत्तर भारत में हिंदी को, हिंदी लेखकों और उनके लेखन को सुदृढ़ आधार भी प्रदान करता है।
निश्चय ही पूर्वोत्तर भारत के हिंदी रचनाकारों, हिंदी सेवी विद्वानों के हिंदी के प्रति योगदानों और हिंदी लेखन को साहित्य के फलक पर उकेरने और आकार देने की दृष्टि से पुस्तक “साक्षात्कार: संभावना और यथार्थ (पूर्वोत्तर के हिंदी रचनाधर्मियों से साक्षात्कार)” एक महत्तवपूर्ण सन्दर्भ ग्रन्थ तो है ही साथ-साथ पूर्वोत्तर के संदर्भों में पूर्वोत्तर वासियों को एवम शेष भारत के प्रबुद्ध वर्ग को पंकज मिश्र ‘अटल’ की अप्रतिम साहित्यिक भेंट भी है।

डेजी शर्मा जी स्वयं एक लेखिका भी हैं, अनुवाद विधा में भी आपकी विशेष रुचि है, लेखन के अतिरिक्त आपकी पत्रकारिता में अभिरुचि है। आपने गुवाहाटी से प्रकाशित हो रहे हिंदी समाचार पत्रों पूर्वांचल प्रहरी तथा सेंटिनल (हिंदी) में उप सम्पादक के पद का दायित्व निर्वहन किया है।
वर्तमान में आप गुवाहाटी (आसाम) में अध्यापन के साथ लेखन भी कर रहीं हैं।

(पुस्तक समीक्षा)

पुस्तक- मिथक और लोककथा गारो पहाड़ियों से

लेखन- श्रीमती सी. टी. संगमा

अनुवाद- डॉ अनीता पंडा

प्रकाशक- सन्मति पब्लीशर्स ऐंड डिट्रीब्यूटर्स, हापुड़ (उ.प्र.)

मेघालय में अवस्थित गारो पहाड़ियाँ और उनसे उपजे मिथक आज भी जुबान पर थिरकते हुए अनायास ही अपनी ओर खींचते हैं। इसको शिद्दत से अनुभूत किया अवकाश प्राप्त राज्य प्रशासनिक अधिकारी, मेघालय सरकार और ख्यातिलब्ध लेखिका श्रीमती सी.टी. संगमा ने। तत्पश्चात शिलॉंग (शिवलिंग) में तीन दशकों से शिक्षण/प्रशिक्षण, शोध और लेखन में अग्रणी रहीं डॉ अनीता पंडा ने श्री मती संगमा द्वारा लिखित “Myriad Colours Of North East – 1,2,3” को आधार बनाकर चिंतन के ताने-बाने से वितान बुना। डॉ अनीता पंडा जी ने राजभाषा हिंदी में न केवल अनुवाद किया बल्कि स्वाध्ययन, अवलोकन एवं जनश्रुतियों द्वारा प्रत्युत्पन्न निष्कर्ष से कथा-विन्यास विकसित किया।

इस पुस्तक में पौराणिक एवं मिथक, शौर्य कथाएँ, लोक कथाएँ, प्रेम कथाएँ तथा रहस्यमयी कथाओं सहित 5 अध्याय निहित हैं। लेखिका ने सदैव अनुवाद की मूल संचेतना को सुरक्षित एवं संरक्षित रखा है। प्रो. दिनेश कुमार चौबे ने अनुवाद के बारे में बहुत स्पष्ट मत रखते हुए कहा है कि अनुवाद का मतलब परकाया में प्रवेश है। दूसरे शब्दों में ‘एकात्म’ हो जाना अनुवाद का आवश्यक गुण एवं आवश्यकता है। अनुवादक लेखिका ने इसके प्रति सजगता का परिचय दिया है। यद्यपि भाषा के रूप में हिंदी व्यवहृत है तथापि स्थानीय जीवन, संस्कृति, गाथा एवं मिथक के साथ तादात्म्य में कमी नहीं आने दी गई, जो अनुभवी लेखिका की कुशल लेखनी की पुष्टि हेतु पर्याप्त है।

मिथक क्या है? जानना महत्वपूर्ण है और आवश्यक भी विशेषतः इस पुस्तक के संदर्भ में। मिथक परम्परागत या अनुश्रुत कथा है जो किसी अतिमानवीय तथाकथित प्राणी या घटना से सम्बंध रखती है। विशेषतः इसका सम्बंध देवताओं, विश्व की उत्पत्ति तथा विश्वासों से है। यह एक ऐसा विश्वास है जो बिना तर्क के स्वीकार किया जाता है। प्रसाद जी की कामायनी के मूल्यांकन से हिंदी साहित्य में मिथक पर विचार का प्रारम्भ माना जाता है। दूसरे शब्दों में लेखन को एक मिथकीय प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया गया है। जैसा कि डॉ नगेन्द्र ने कहा था कि ‘……नये कवि वर्तमान के अतीतत्व और अतीत के वर्तमानता में विश्वास करते हैं’, डॉ अनीता पंडा ने अनुवाद करते समय मिथक की इस विशेषता को पूर्णतः सिद्ध करते हुए संरक्षित किया है।

बंदर, मकड़ा, सियार, जुगनू, हाथी, लंगूर, सूअर, कुत्ता, मुर्गी और मेंढक आदि जीव-जंतुओं और कुछ लड़के/लड़कियों के चरित्रों के माध्यम से सुदक्ष लेखिका/अनुवादिका ने लोककथा को नवजीवन और नूतन कलेवर प्रदान किया है। बंदर की नकलची प्रकृति और फलस्वरूप असफलता की ओर भी बारम्बार इंगित किया गया है। लोककथा किसी मानव-समूह की उस साझी अभियक्ति को कहते हैं जो लोककथाओं, कहावतों, चुटकुलों आदि अनेक रूपों में अभिव्यक्त होता है। इस पुस्तक में पैनी नजर और बेबाकीपन से इसका अनुपालन किया गया है। डॉ अनीता जी ने गारो पहाड़ियों की मूल संज्ञा को हिंदी शब्दार्थ के साथ सजाया है जिससे पाठक बिना भटकाव के सटीक एवं वांछित छवि बना सके। बाल्पक्रम की खूबसूरती, चमत्कार, किंवदंती, मिथकाधारित लोककथा पर लेखनीचलाते हुए अनुवादिका ने देखी और सुनी बातों में फर्क के प्रति पूर्ण सजगता का परिचय दिया है।

यह पुस्तक लेखिका श्रीमती संगमा और अनुवादिका श्रीमती पंडा के सान्द्रित शोध का सकारात्मक परिणाम है। पाठकों के चक्षु – पटल पर गारों पहाड़ियाँ जीवंत हो उठती हैं। संस्कृति, सोच और दिनचर्या सजीव हो जाती हैं। पुस्तक का आकर्षक आवरण और सुरुचिकर विषयवस्तु पाठक-हृदय को संतृप्त करते हैं और अतिरिक्त गहन शोध हेतु प्रेरित भी।

पुस्तक- मिथक और लोककथा गारो पहाड़ियों से

लेखन- श्रीमती सी. टी. संगमा

अनुवाद- डॉ अनीता पंडा

प्रकाशक- सन्मति पब्लीशर्स ऐंड डिट्रीब्यूटर्स, हापुड़ (उ.प्र.)

प्रकाशन वर्ष- 2020

पृष्ठ-114

मूल्य- रुपये 135/-

सौतेला

डॉ अन्नपूर्णा बाजपेयी, ‘अंजू’, कानपुर
साहित्यकार, ब्लॉगर, समाज सेविका, योगा ट्रेनर।


“रे! कलुआ, जरा इधर तो आ! “खटिया पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ करते हुए कलुआ के बापू ने जोर से पुकारा।
कलुआ खेल में मग्न था सुना नहीं।
“जरा जोर से बुलाइयो, खेल रहा है छोरा न सुनैगो!”अपने सिर के पल्लू को सँवारती हुई माई उधर ही आ बैठी।
“इतनी देर से पुकार रहा हूँ सुनता ही न है पाजी कहीं का!” झुंझलाते हुए बापू बोला।
“बालक ने दिनभर खेलते रहना अच्छा न है गोलू के बापू! इसको जरा कस के रखियो!”और घी गुड़ रोटी पर चुपड़ कर दूसरे पुत्र गोलू को खिलाने लगी।
उसने प्रेम से पुकारा, “कल्लू जरा सुन तो!”
“हाँ माई!” कल्लू लपकता हुआ आ पहुंचा। और ललचाई नजरों से घी गुड़ लगी रोटी खाते हुए छोटे भाई का मुँह ताकने लगा।
“सुन मैं तुझे पाठशाला भेजना चाहवे हूँ तू जावेगा न, जैसे गोलू जावे है!” माई बोली।
“हाँ माई!”कहते हुए वह खुशी से उछल पड़ा फिर कुछ सोचता हुआ बोला, “माई तू मन्ने सच्ची में पढ़ने भेजेगी।” “हाँ रे! छोरा!” तू काहे पूछे है माई बोली।
“बगल वाली चाची कह रही थी कि इसको कौन पढावेगा ये तो सौतेला है! इसकी माई अपने बालक ने पढावेगी और अफसर बनावेगी!” भोलेपन से बोला कल्लू।
“इसीलिए तो तुझे जरूर पढ़ाना चाहूँ हूँ, तू तो मेरा कान्हा है सौतेला नहीं, जैसे कान्हा जी की दो-दो माई थी वैसे ही तेरी भी दो दो माई।” मुस्कुराते हुए माई ने उसके गाल पर एक प्यार भरी चपत लगाई।
“तो माई तूने घी गुड़ की रोटी मन्ने क्यों न दी!“ भोलेपन में बोल गया कल्लू और उसके माँ बाप एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।

भागते गए

जीत- जीत
कर भी हम
हारते गए।
बार- बार
खुद को ही
संवारते गए।
कथन,
रेशमी सभी
चुभन से भरे।
जो भी मिले
हाथ पर ही
हाथ थे धरे।
खींचतान
में ही दिन
गुजारते गए।
मौन रहे
फिर भी
प्रश्नचिह्न थे लगे।
पहचानना
हुआ कठिन कि
कौन हैं सगे?
अपने,
हर मोड़ पर
नकारते गए।
लोग मिले
दूरियों से
समझ न सका।
फूंक- फूंक
रखे कदम
हर कदम थका।
ज़िन्दगी में
बेवजह ही
भागते गए।