(पुस्तक समीक्षा)

पुस्तक- मिथक और लोककथा गारो पहाड़ियों से

लेखन- श्रीमती सी. टी. संगमा

अनुवाद- डॉ अनीता पंडा

प्रकाशक- सन्मति पब्लीशर्स ऐंड डिट्रीब्यूटर्स, हापुड़ (उ.प्र.)

मेघालय में अवस्थित गारो पहाड़ियाँ और उनसे उपजे मिथक आज भी जुबान पर थिरकते हुए अनायास ही अपनी ओर खींचते हैं। इसको शिद्दत से अनुभूत किया अवकाश प्राप्त राज्य प्रशासनिक अधिकारी, मेघालय सरकार और ख्यातिलब्ध लेखिका श्रीमती सी.टी. संगमा ने। तत्पश्चात शिलॉंग (शिवलिंग) में तीन दशकों से शिक्षण/प्रशिक्षण, शोध और लेखन में अग्रणी रहीं डॉ अनीता पंडा ने श्री मती संगमा द्वारा लिखित “Myriad Colours Of North East – 1,2,3” को आधार बनाकर चिंतन के ताने-बाने से वितान बुना। डॉ अनीता पंडा जी ने राजभाषा हिंदी में न केवल अनुवाद किया बल्कि स्वाध्ययन, अवलोकन एवं जनश्रुतियों द्वारा प्रत्युत्पन्न निष्कर्ष से कथा-विन्यास विकसित किया।

इस पुस्तक में पौराणिक एवं मिथक, शौर्य कथाएँ, लोक कथाएँ, प्रेम कथाएँ तथा रहस्यमयी कथाओं सहित 5 अध्याय निहित हैं। लेखिका ने सदैव अनुवाद की मूल संचेतना को सुरक्षित एवं संरक्षित रखा है। प्रो. दिनेश कुमार चौबे ने अनुवाद के बारे में बहुत स्पष्ट मत रखते हुए कहा है कि अनुवाद का मतलब परकाया में प्रवेश है। दूसरे शब्दों में ‘एकात्म’ हो जाना अनुवाद का आवश्यक गुण एवं आवश्यकता है। अनुवादक लेखिका ने इसके प्रति सजगता का परिचय दिया है। यद्यपि भाषा के रूप में हिंदी व्यवहृत है तथापि स्थानीय जीवन, संस्कृति, गाथा एवं मिथक के साथ तादात्म्य में कमी नहीं आने दी गई, जो अनुभवी लेखिका की कुशल लेखनी की पुष्टि हेतु पर्याप्त है।

मिथक क्या है? जानना महत्वपूर्ण है और आवश्यक भी विशेषतः इस पुस्तक के संदर्भ में। मिथक परम्परागत या अनुश्रुत कथा है जो किसी अतिमानवीय तथाकथित प्राणी या घटना से सम्बंध रखती है। विशेषतः इसका सम्बंध देवताओं, विश्व की उत्पत्ति तथा विश्वासों से है। यह एक ऐसा विश्वास है जो बिना तर्क के स्वीकार किया जाता है। प्रसाद जी की कामायनी के मूल्यांकन से हिंदी साहित्य में मिथक पर विचार का प्रारम्भ माना जाता है। दूसरे शब्दों में लेखन को एक मिथकीय प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया गया है। जैसा कि डॉ नगेन्द्र ने कहा था कि ‘……नये कवि वर्तमान के अतीतत्व और अतीत के वर्तमानता में विश्वास करते हैं’, डॉ अनीता पंडा ने अनुवाद करते समय मिथक की इस विशेषता को पूर्णतः सिद्ध करते हुए संरक्षित किया है।

बंदर, मकड़ा, सियार, जुगनू, हाथी, लंगूर, सूअर, कुत्ता, मुर्गी और मेंढक आदि जीव-जंतुओं और कुछ लड़के/लड़कियों के चरित्रों के माध्यम से सुदक्ष लेखिका/अनुवादिका ने लोककथा को नवजीवन और नूतन कलेवर प्रदान किया है। बंदर की नकलची प्रकृति और फलस्वरूप असफलता की ओर भी बारम्बार इंगित किया गया है। लोककथा किसी मानव-समूह की उस साझी अभियक्ति को कहते हैं जो लोककथाओं, कहावतों, चुटकुलों आदि अनेक रूपों में अभिव्यक्त होता है। इस पुस्तक में पैनी नजर और बेबाकीपन से इसका अनुपालन किया गया है। डॉ अनीता जी ने गारो पहाड़ियों की मूल संज्ञा को हिंदी शब्दार्थ के साथ सजाया है जिससे पाठक बिना भटकाव के सटीक एवं वांछित छवि बना सके। बाल्पक्रम की खूबसूरती, चमत्कार, किंवदंती, मिथकाधारित लोककथा पर लेखनीचलाते हुए अनुवादिका ने देखी और सुनी बातों में फर्क के प्रति पूर्ण सजगता का परिचय दिया है।

यह पुस्तक लेखिका श्रीमती संगमा और अनुवादिका श्रीमती पंडा के सान्द्रित शोध का सकारात्मक परिणाम है। पाठकों के चक्षु – पटल पर गारों पहाड़ियाँ जीवंत हो उठती हैं। संस्कृति, सोच और दिनचर्या सजीव हो जाती हैं। पुस्तक का आकर्षक आवरण और सुरुचिकर विषयवस्तु पाठक-हृदय को संतृप्त करते हैं और अतिरिक्त गहन शोध हेतु प्रेरित भी।

पुस्तक- मिथक और लोककथा गारो पहाड़ियों से

लेखन- श्रीमती सी. टी. संगमा

अनुवाद- डॉ अनीता पंडा

प्रकाशक- सन्मति पब्लीशर्स ऐंड डिट्रीब्यूटर्स, हापुड़ (उ.प्र.)

प्रकाशन वर्ष- 2020

पृष्ठ-114

मूल्य- रुपये 135/-

सौतेला

डॉ अन्नपूर्णा बाजपेयी, ‘अंजू’, कानपुर
साहित्यकार, ब्लॉगर, समाज सेविका, योगा ट्रेनर।


“रे! कलुआ, जरा इधर तो आ! “खटिया पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ करते हुए कलुआ के बापू ने जोर से पुकारा।
कलुआ खेल में मग्न था सुना नहीं।
“जरा जोर से बुलाइयो, खेल रहा है छोरा न सुनैगो!”अपने सिर के पल्लू को सँवारती हुई माई उधर ही आ बैठी।
“इतनी देर से पुकार रहा हूँ सुनता ही न है पाजी कहीं का!” झुंझलाते हुए बापू बोला।
“बालक ने दिनभर खेलते रहना अच्छा न है गोलू के बापू! इसको जरा कस के रखियो!”और घी गुड़ रोटी पर चुपड़ कर दूसरे पुत्र गोलू को खिलाने लगी।
उसने प्रेम से पुकारा, “कल्लू जरा सुन तो!”
“हाँ माई!” कल्लू लपकता हुआ आ पहुंचा। और ललचाई नजरों से घी गुड़ लगी रोटी खाते हुए छोटे भाई का मुँह ताकने लगा।
“सुन मैं तुझे पाठशाला भेजना चाहवे हूँ तू जावेगा न, जैसे गोलू जावे है!” माई बोली।
“हाँ माई!”कहते हुए वह खुशी से उछल पड़ा फिर कुछ सोचता हुआ बोला, “माई तू मन्ने सच्ची में पढ़ने भेजेगी।” “हाँ रे! छोरा!” तू काहे पूछे है माई बोली।
“बगल वाली चाची कह रही थी कि इसको कौन पढावेगा ये तो सौतेला है! इसकी माई अपने बालक ने पढावेगी और अफसर बनावेगी!” भोलेपन से बोला कल्लू।
“इसीलिए तो तुझे जरूर पढ़ाना चाहूँ हूँ, तू तो मेरा कान्हा है सौतेला नहीं, जैसे कान्हा जी की दो-दो माई थी वैसे ही तेरी भी दो दो माई।” मुस्कुराते हुए माई ने उसके गाल पर एक प्यार भरी चपत लगाई।
“तो माई तूने घी गुड़ की रोटी मन्ने क्यों न दी!“ भोलेपन में बोल गया कल्लू और उसके माँ बाप एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।

भागते गए

जीत- जीत
कर भी हम
हारते गए।
बार- बार
खुद को ही
संवारते गए।
कथन,
रेशमी सभी
चुभन से भरे।
जो भी मिले
हाथ पर ही
हाथ थे धरे।
खींचतान
में ही दिन
गुजारते गए।
मौन रहे
फिर भी
प्रश्नचिह्न थे लगे।
पहचानना
हुआ कठिन कि
कौन हैं सगे?
अपने,
हर मोड़ पर
नकारते गए।
लोग मिले
दूरियों से
समझ न सका।
फूंक- फूंक
रखे कदम
हर कदम थका।
ज़िन्दगी में
बेवजह ही
भागते गए।

जानो इन्सान को…

उन लोगों को मैं
चुनौती देता हूं
जो कहते हैं कि
वे ईश्वर तक हमें पहुंचा सकते हैं.
अरे! पहले इंसानियत को तो पूजो फिर बात करो ईश्वर की।
इंसान ही इंसान को भूलने के लिए कहता है।
आओ मूल जड़ों की ओर
मूल क्या है ?
मूल वह धारा है
जो पृथ्वी को माता मानती है।
मूल वह है जो कहता है –
“नर सेवा नारायण सेवा”
Tip briew, tip blei
अर्थात इंसान को जानो
फिर ईश्वर को जानो।
क्यो हो गई है
इस अंधेरे में रहने की आदत?
ईश्वर है लेकिन उस तक पहुंचने के लिए,
किसी मंदिर मस्जिद गिरजाघर की जरूरत नहीं,
मानवता में ही ईश्वर उत्पन्न होता है लौट जाओ अपने मूल की ओर।

केतली

विशाल के सी

जलती हुई अंगारो की भट्टी पर
एक सहमी हुई
खौलती केतली
चुप-चाप से बैठी थी
सुबह से लेकर शाम तक
वह भट्टी पर जरूरत मंद लोगो
के लिए तपी रहती
खुद को बर्दाश्त कर के
मैं हर रोज देखता था
उसके अंदर का चमत्कार
कभी उस में पानी का
उबाल होता
तो कभी चाय, आलू
कभी कुछ तो कभी कुछ
मगर भट्टी पर ही अढी़ रहती
शाम को जब भट्टी सो जाता थी
उसे ढककर अगली सुबह के लिए
वह अपने घर को जाता था
पर कोने के उस तरफ़ विवश केतली
अपने दर्द के साथ
पड़ी रहती थी
ना मालिक ने
उससे पूछा
उसका हाल
ना आग के तपिश ने
ना उन हाथों ने
जो हर सुबह
उसे भट्टी पर रखने आते थे
फिर एक दिन विवश केतली
भट्टी के ताप पर ही फट गई
और भट्टी का वजूद
पल में ही धराशायी
हो गया
घमंडी अंगारे भी
पल में
शान्त हो गए
एक ऐसी केतली
आज हर एक उस
घर पर सजती है
शायद उसे हम जानते हैं
जो रोज किसी एक
भट्टी पर तपती है।
रोक लो उन हाथों को
जो यह सेज सजाती हैं
बुझादो उस भट्टी के अंगार को
ना फट सके फिर
कोई विवश केतली

मजदूर





 डॉ.मधुकर देशमुख

 भट्टियां तेरे कारखाने की जलाने में 
 मैं खुद जला हूँ।
 महल तेरे बनाने में
 मैं खुद जला हूँ।
 रोशन तुझे कराने में, 
 मैं खुद जला हूँ।
 चिराग तेरा जलाते- जलाते
 रखा मैंने खुद को अँधेरे में।
 देश को आत्मनिर्भर बनाने में
 हर जुल्म सहे मैंने।
 समाज की इन बंदिशों से 
 टूट कर चूर हो गया हूँ मैं…
 जीवन में संघर्ष करते- करते
 बिखर गया हूँ मैं।
 परिवार को खुश रखूँ, 
 पेटभर खाना खिलाऊँ
 ये सपना मैंने भी तो पाला था।
 तो क्या बुरा किया था. ..?
 पर नहीं बुझाई पेट की आग तुमने…!!
 समय अब आ गया है…
 हिम्मत न हारने का
 अब भी हिम्मत रखता हूँ
 जेठ के इस तपती धुप में
 परिवार का बोझ उठाने की।
 अब भी हिम्मत रखता हूँ
 जिस मिटटी में जन्म लिया
 उस मिटटी का कर्ज चुकाने की।
 अब भी हिम्मत रखता हूँ
 चलने की… 
 चलूंगा… चलता रहूँगा…
 अपनी मंजिल तक
 पर अब न रूकूंगा. ..
 पीछे मुड़कर न देखूंगा, 
 अब मैं चल पड़ा हूँ. ..
 अपनी मिटटी का कर्ज चुकाने. ..
 माँ-बाप की सेवा करने
 चलते - चलते अगर मिट भी गया
 तो समझूँगा; मेरे जैसा खुशनसीब और कोई नहीं…
 पर पीछे मुड़कर ना देखूंगा…!!
 बावजूद इसके
 अगर लौट सका तो…
 तेरा शहर बसाने अवश्य लौटूंगा 
 पर पीछे मुड़कर न देखूंगा…!! 

पंकजा


नीता शर्मा, लेखिका, आकाशवाणी की पूर्वोत्तर सेवा में हिदी उद्घोषिका।


कचरे के ढेर में पड़ी हुई वो मासूम धीरे धीरे सिसक रही थी और आस पास खड़े कु त्तेज़ोर – ज़ोर से भौक रहे थे। राह से गुजरते एक बच्चे की नजर पड़ गई उसपर। उसने लपककर उठा लिया और सीने से चिपका लिया उसको जैसे कोई जिदा खिलौना मिल गया हो खेलने के लिए। भागता हुआ घर ले आया।
“माँ, माँ देखो कितनी प्यारी परी मिली मुझे कचरे के ढेर में।
“परी, कचरे में ? हँसकर मां उसकी बात को सुनी अनसुनी करते हुए बोली। उसे लगा फिर कोई टूटा – फू टा खिलौना मिल गया होगा बेटे को।
“हाँ माँ, देखो कितनी प्यारी है। पर देखो आँखो से ऑं सू निकल रहे हैं। शायद भूख लगी होगी।”
अब माँ चौकी औं र पलटकर देखा। क्या सच में एक बच्ची है और वह भी जिदा ? कुछ दो – चा र दिन की रही होगी। एकदम मासूम सहमा – सा चेहरा, न कोई ईर्ष्या न द्वेष, शांत बिल्कुल शांत। आंसू आंखो की पो रो के पास सूख चुके थे। धीरे से आंख खोलती बं द करती। उसकी ममता चीत्कार उठी। क्या पता था बेचारी कै से क्रूर और वासना के अंधे जगत में आ गई थी लड़की बनकर।
उसका पाँच वर्ष का बेटा था जो इसी तरह कु छ साल पहले ही कचरा बीनते मिला था। दोनो माँ- बेटा पेट की आग बुझाने की खातिर दिन भर घूम घूमकर गली मोहल्लों में कच ल्लों रा बीनते। यदा कदा कोई टूटा फू टा खिलौना, गाड़ी या गेंद आदि मिल जाता कचरे के ढ़ेर से तो चेहरा कै से खिल जाता था खुशी से बच्चे का। और आज जब बेटा उसी कचरे से अनमोल हीरा बीन लाया तो उसका चेहरा भी खिल गया था खुशी से। दोनो हाथ जोड़क र ऊपरवाले को कृ तज्ञता से बोली, “कु छ के लिए कचरा और हम जैसो के लिए खजाना! कितना दयालु है तू प्रभु! जिसको पति और समाज ने बांझ कहकर ठुकरा दिया था उसकी झोली तूने एक बार फिर इतने बड़ेखजाने से भर दी और उसकी आंखो से झ र झर ऑं सू बहने लगे। बच्ची के माथे को चूमकरबुदबुदायी-पंकजा।

शेरू का निर्णय

कीर्ति श्रीवास्तव, भोपाल
बाल साहित्यकारा, कवियत्री, संम्पादिका ‘साहित्य समीर दस्तक”, सरकारी एवं प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित एवं पुरस्कृत, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन मध्यप्रदेश से रचनाओं का प्रसारण। 7 पुस्तकें प्रकाशित एवं राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशन।
Suravy Mukherjee


शेरू शेर का आतंक उसके ही नहीं अपितु आस-पास के सभी जंगलों में फैला हुआ था। सभी जंगलों के जानवर शेरू के नाम से ही थर-थर कांपते थे। वो रोज शिकार के लिए निकलता था। किसी को अंदाजा ही नहीं रहता था कि वो कब किस जंगल में आ जाये शिकार करने के लिए। इस कारण सभी जानवर अपने-अपने घरों में दुबके रहते थे। वह दूसरे जंगल के जानवरों के साथ स्वयं के जंगल के जानवरों का भी शिकार करने से नहीं कतराता था।
सभी जानवर डरते-डरते अपने भोजन की व्यवस्था के लिए बाहर निकलते थे। वो लोग कितनी भी सावधानी बरतें फिर भी कोई न कोई जानवर शेरू के हत्थे चढ़ ही जाता था। किंतु उसके जंगल के जानवरों को उसके शिकार पर जाने का समय पता था तो वे उस समय बाहर नहीं निकलते थे। बारी-बारी सभी ये देखते रहते थे कि शेरू कब बाहर गया तभी सभी अपने भोजन की तलाश में निकलते थे।
एक बार शेरू पास के जंगल मे शिकार के लिए निकला। उस दिन उसे कोई शिकार नहीं मिला। वह बहुत गुस्से में आ गया। गुस्से में वह दूसरे से तीसरे और तीसरे से चौथे जंगल की ओर चल पड़ा। वह इतने गुस्से में था कि उसे पता ही चला कि वो किस ओर चल दिया है। आगे के जंगल पहुँचते-पहुँचते उसे रात हो चुकी थी। अंधेरे में उसका पेर रास्ते मे पड़ी एक कुल्हाड़ी पर पड़ गया और उसे चोट लग गई। खून भी बहने लगा था और वो हड़बड़ाहट में रास्ता भटक गया।
वह अपने जंगल के साथ दूसरे कई जंगलों की सीमा पार आ गया था। जब उसे इस बात का एहसास हुआ तो वह डर गया। उसकी चोट से खून बराबर बह रहा था और चोट में दर्द भी हो रहा था। थोड़ी दूर लडख़ड़ाते हुए वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया।
तभी उसने देखा कि कुछ लोग उसकी ही तरफ आ रहे हैं। उसे लगा अब तो मैं दर्द के कारण भाग भी नहीं पाऊँगा ये लोग मुझे मार डालेंगे। मेरी खाल बेचकर पैसा कमाएंगे। दर्द के कारण वह कराह भी रहा था। उसकी आवाज सुनकर लोग उस तरफ बढ़ चले।
शेर को देखकर कुछ लोग घबरा गए। किंतु कुछ लोगों ने उसका बहता खून देख लिया था।
‘अरे इसे तो चोट लगी है। खून भी बह रहा है। हमें इसका इलाज करना चाहिये।’
‘पागल हो क्या! ये तो हमे ही खा जाएगा।’
‘पर इसे इस तरह छोड़ भी तो नहीं सकते। दया, भावना नाम की भी तो कोई चीज होती है।’
‘नहीं-नहीं, हम खतरा नहीं ले सकते। चलो, हम तो चलते हैं।’
वे लोग आपस में बात कर रहे थे। तभी उनमें से एक समझदार बुजुर्ग ने कहा कि – ‘हम पहले इसके ऊपर पिंजरें में कैद कर देते हैं फिर इसके पैर का इलाज करेंगे। और पिंजरा खुला छोडक़र चले जायेंगे। जब ये ठीक होगा अपने आप अपने जंगल की ओर चला जायेगा।’
‘इस बात का क्या भरोसा कि वो जंगल की ओर ही जाएगा। वो हमारे गाँव की ओर भी तो आ सकता है।’ किसी ने पीछे से कपकपाती आवाज में कहा।
‘डरो नहीं, भगवान सच्ची सेवा करने वाले को नुकसान नहीं पहुँचाते।’ उन बुजुर्ग दादा ने कहा।
उन बुजुर्ग की सलाह सबको अच्छी लगी। उनमें से कुछ लोग जल्दी ही पास के गाँव से पिंजरा ले आये और कुछ दवाई का इंतजाम करने लगे। शेरू सबकी बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था और उन्हें देख भी रहा था।
गाँव वालों ने जैसे-तैसे डरते हुए शेरू को पिंजरे में कैद किया। उसके बाद उसके पैर की मलहम-पट्टी की और पिंजरा खुला छोडक़र चले गए।
शेरू ने जब गावँ वालों की सेवा भावना देखी तो खुद पर बड़ी ग्लानि महसूस हुई। वह सोचने लगा कि – ‘मैं तो राजा हूँ फिर भी अपने ही जंगल के लोगों की रक्षा नहीं करता। सभी मुझसे डरे रहते हैं। मैं सिर्फ अपनी ही सोचता हूँ जंगल के विकास के बारे में नहीं सोचता। वो जो मेरी एक दहाड़ भरे आदेश पर ही आ जाते हैं। ये गाँव वाले तो मेरे हैं भी नहीं, फिर भी इन्होंने मुझे बचाया मेरा इलाज किया। मैं इन्हें खा भी सकता था इससे भी वह नहीं डरे और मानव धर्म का पालन किया।’
उसी समय शेरू शेर ने निर्णय लिया कि अब वह अपने जंगल के जानवरों की रक्षा करेगा। उनकी जरूरतों का ध्यान रखेगा।
सुबह हो चुकी थी। उसके पैर का दर्द भी कम हो गया था। वह पिंजरे से बाहर आया और खुशी-खुशी जंगल पहुँचकर सबसे पहले उसने ढोल बजाकर ये एलान कर दिया कि ‘आज से उसके जंगल के सभी जानवरों की रक्षा करना उसका कर्तव्य है। कोई भी उससे डरे नहीं। अब वह अपनी सीमा में रहने वाले जानवरों को नहीं खायेगा।’ उसने रात का किस्सा भी सभी को सुनाया।
ये सुन सभी जानवर बहुत खुश हुए और उन गाँव वालों को बहुत दुआएं देने लगे।

महिला सशक्तिकरण – भारतीय संस्कृति का अंग


उज्ज्वला संदीप देसाई,

श्रीमती उज्जवला देसाई आई.टी. कम्पनियों में विभिन्न पदों पर 20 वर्ष से ज्यादा कार्यरत रहीं हैं। सम्प्रति वे पूना की एक साफ्टवेयर कम्पनी की बोर्ड आफ डायरेक्टर्स में एक हैं। पिछले पाँच वर्ष से स्वैच्छिक सामाजिक मुद्दों पर कार्य कर रही हैं यथा देशप्रेम के प्रति जागरूकता, युवा -निर्माण आदि।

Priyanka Jhunjhunwala


नमस्ते, आज २१वी शताब्दी में हम महिला सशक्तीकरण के बारे में सोचते, लिखते या पढ़ते हैं तो बहुत अच्छा लगता है पर थोड़ा विचित्र नहीं लगता?
जिन महिलाओं ने सृष्टि की रचना से लेकर आज तक अनेकों पीढ़ियों को या महापुरुषों की निर्मात्री बनीं, उनका सशक्तिकरण अबतक क्यों नहीं हुआ? क्या वो सशक्त नहीं है? जब निसर्गत: उसे बड़ा ही उच्च, माता का दर्जा मिला हुआ है। मातृत्व एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी का काम है, एक माता न सिर्फ अपने बच्चों पर बल्कि आनेवाली अनेक पीढ़ियों पर संस्कार देने का काम करती है। एक तरह से देखा जाय तो वो एक कुम्हार की तरह माटी को, अंदर और बाहर से सुधार कर मटके में रूपांतरित करती है। आज अगर उस पर अत्याचार हो रहे हैं या उसे एक भोगवस्तु के रूप में देखा जा रहा है, तो उसके लिए वो खुद भी तो जिम्मेदार है। समस्या का समाधान अगर चाहिए तो उस समस्या की जड़ तक जाना पड़ेगा, निरपेक्ष भाव से काम करना होगा, अगर हमारी गलती है, तो उसे भी स्वीकार करना होगा।
हम अपने पुराणों में या इतिहास में झाँककर देखेंगे तो पाएँगे कि स्त्री कभी अबला नहीं थी। इस सृष्टि के सृजन में पुरुष के साथ प्रकृति का कार्य भी महत्वपूर्ण है। हमारी प्रमुख देवताओं में स्त्री देवता अर्थ, शस्त्र, शास्त्र, कला सहजतासे संभाल रही है। मां लक्ष्मी के साथ श्री विष्णू जो सत्विक्तता का प्रतीक है, मां शक्ति के साथ शिव जो समदर्शिकता का प्रतीक है, हमे बता रहे है कि संपन्न होने पर सात्विकता और शक्ति आने पर समदर्शिता का त्याग नहीं करना चाहिए। माँ सरस्वती कला और विद्या दोनों की देवता हैं। शक्तिस्वरुपा दुर्गा सर्व शस्त्रों से सुसज्ज है और उसने अनेक दैत्यों का संहार करके संसार की रक्षा की है।
इतिहासमें कैकयी ने देव दानव युद्ध में अपने पति की सारथी बन कर उसके प्राणों की रक्षा की है। महाभारत काल में अंबाने अपने ऊपर हुए अन्याय का बदला घोर तपश्चर्या करके पूर्ण किया। इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त भीष्माचार्य के मृत्यु का कारण बनी। कुंतीने अपने पुत्रों को अपने बहू पर हुए अन्याय को प्रत्युत्तर देनेके लिए प्रेरित किया, उसी समय धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ वनवास जाकर, उनकी सेवा भी की। न्याय और कर्तव्य दोनोंका समानता से निर्वाह किया। अनेक प्रसंग उसके धैर्य और संतुलित मन का परिचय देते है। द्रौपदी तो इतिहास में अमर हो गई। बंधक बने अपने पाँच बलशाली पतियों को मुक्त कराया। अपने केश खुले रखकर, सतत अपने पतियों को उनके कर्तव्य की याद दिलाती रही। राजदरबार में भीष्म, द्रोण, विदुर जैसे दिग्गजों को उनकी हतबलता और कर्तव्यबोध का आइना दिखाया। पति बंधन में होते हुए भी खुद की स्वतंत्रता का मान रखा। माता सीता ने भी अपना निर्णय खुद लिया। चाहे वनवास जाना हो या रावण की कैद में खुद का मनोबल संभालना या भूमिगत होना हो।
अध्यात्मशास्त्र में पारंगत अनेक स्त्रियोंका वर्णन पुराणों में आता है, लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषियों की ऋचाएँ वेदों में आती है। आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य और मंडन मिश्र के विवाद में मंडन मिश्र की पत्नी उभयाभारती ने पंच की भूमिका निभाई थी।
भक्ति योगमें मीराबाई, मुक्ताई, जनाई और अशिक्षित समझी जानेवाली बहिणाबाई, रामकृष्ण परमहंस की अर्धांगनी शारदा देवी शिखर पर थी। धैर्य और सामर्थ्य में जीजाबाई, रानी लक्ष्मीबाई, ओनके अव्वाक्का, केलाडी चेंनंमा, बेलावडी मल्लंमा, राणी अबाक्का, राणी वेलू नचीयार व कित्तुर चेल्लंमा, नागालैण्ड की रानी गिइदिन्ल्यू आदि पुरुषों से कम नहीं है अपितु विदेशी आक्रांताओं से मातृभूमि की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने अपने जीवन सार्थक कर आने वाले पीढ़ियों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया।
आज भी अनेक महिलाएँ शास्त्र, कला, संरक्षण जैसे विविध क्षेत्रों में उत्तम कार्य कर रही हैं। फिर क्या भूल हो गई हमसे या हमारे अज्ञान का फायदा लिया गया, जो आज स्त्रियों पर अत्याचार होते हैं और महिला सशक्तिकरण का नारा बुलंद करना पड़ता है।
दुर्दैव से बीच के काल में हम पर बहुत से आक्रमण हुए। उसके परिणाम स्वरूप स्त्रियोंपर बहुत सी पाबंदियां आ गई, क्यों कि आक्रांता राक्षसी वृत्ति के थे। ७००/८०० साल की गुलामी से समाज की मनोदशा गुलामवत हो गई फिर भी हमारी शूरवीर महिलाओं और पुरुषों ने समय-समय पर संघर्ष कर स्वयं को पारतंत्र्य से बाहर लाने की कोशिश अनवरत की। अन्य किसीभी देशमें उनकी पुरानी सभ्यता दिखाई नहीं पड़ती। पर आज स्वातंत्र्य के पश्चात धर्मनिरपक्षता जैसे लुभावने नाम से हमारी संस्कृति पर चारो और से आघात हो रहे है और हम भी उस दलदलमे फँसते जा रहे है। अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण, आक्रांताओं का उदात्तीकरण करनेवाला इतिहास व हिंदू मन पर आघात करनेवाला सिनेमा जगत, इन सबके कारण आज हमारा युवावर्ग अपने ही गौरवशाली इतिहास को भूलकर, पाश्चत्य संस्कृति के आधीन होता दिखाई दे रहा है। महिला वर्ग भी बाजारीकरण के अधीन हो रहा है।
स्त्री को सक्षम और सशक्त होना है तो इस आभासी दुनियासे बाहर आकर, सत्य का सामना करना पड़ेगा। आज जागरूक होनेकी आवश्यकता है।
अगर समाज हमे भोगवस्तू न माने ऐसे लगता है तो सबसे पहले जो सिनेमा स्त्रियोंको भोगवस्तु(आइटम) बनाकर प्रस्तुत करता है उसपर बहिष्कार होना चाहिए। अगर बदलाव चाहते हो, तो उसकी शुरुआत खुद से करो। लड़कों के कपड़े पहननेसे या उनकी तरह रात को बाहर टहलने से महिला सशक्त नहीं हो सकती, वो सिर्फ ऊपरी दिखावा मात्र है। स्त्रियों कों कराटे या तत्सम स्वसंरक्षण सिखाने वाली कला में पारंगत होना पड़ेगा, दूसरी ओर लड़कों को पाक कला का शिक्षण देना होगा। दोनों को सब जीवनावश्यक कला आनी चाहिए, जिससे वो सही तरह से आत्मनिर्भर हो सकेंगे। हर चीज सरकार नहीं कर सकती, आज भविष्य के लिए तैयार होना पड़ेगा। महाभारत में भीम पाक कला और अर्जुन नृत्य कला जानने के कारण विपरीत परिस्थितियों भी बच गए।
प्रत्येक माता ने अगर अपने बच्चों को सही शिक्षण दिया तो ये समाज सक्षम और सशक्त होगा। समाज का कोई भी घटक, स्त्री या पुरुष कमजोर नहीं होना चाहिए। अपने गौरवशाली इतिहास को याद करो, नहीं तो पैसा और प्रसिद्धि का हवस समाज को नष्ट कर देगा। कल जो प्रसिद्धिके जाल में फँसे थे वो आज ईडी के जाल में दिखाई दे रहे है।
हमारे सच्चे नायक/नायिका सैनिक, स्वास्थ्य कर्मचारी, समाज सेवी, वैज्ञानिक शास्त्रज्ञ, कृषक एवं श्रमिक वर्ग हैं, जो हमारे समाज का भरण, पोषण और संरक्षण कर समाज को आगे ले जा रहे है, उन्हें छोड़कर झूठे नायक/नायिका के मायाजाल में न फँसिए। आपका आदर्श अगर सही है तो आपकी दिशा भी सही होगी। भारत ही विश्वगुरुका स्थान ले सकता है अगर हम देवी/देवताओंकी तरह स्त्रियों का भी सम्मान कर सके। सन् 1893 मार्च 25 को स्वामी विवेकानंद के ‘भारतीय नारी’ विषय पर अपने भाषण में कहा था –
भारत में नारी ईश्वर की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और उसका सम्पूर्ण जीवन इस विचार से ओत-प्रोत है कि वह माँ है। पश्चिम में स्त्री पत्नी है, पूर्व में वह माँ है। हिन्दू माँ-भाव की पूजा करते हैं और संन्यासियों को भी अपनी माँ के सामने अपने मस्तक से पृथ्वी का स्पर्श करना पड़ता है।

मेघालय के जयंतिया पहाड़ियों के क्रांतिकारी उ कियांग नंगबाह


आलोक सिंह, सीनियर रिसर्च फेलो पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय, शिलांग हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं जैसे वाक, परिकथा, बयां, समन्वय पूर्वोत्तर, लमही, अभिनव मीमांसा, अक्षर पर्व, राष्ट्रभाषा सेवक, मेघालय दर्पण, नेहू ज्योति, साहित्य वार्ता आदि पत्रिकाओं में कविताएं, समीक्षा, लेख आदि प्रकाशित।

आज मेघालय राज्य के जयंतिया हिल्स के स्वतंत्रता सेनानी उ कियांग नंगबाह की 158 वीं पुण्यतिथि है। जिन्होंने ब्रिटिश सेना के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया और लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उ कियांग नंगबाह ने अंग्रेजों के खिलाफ तब विद्रोह किया था जब खासी जयंतिया स्वतंत्र राज्य हुआ करते थे। यह वाकया उस समय का है जब 18 वीं शताब्दी में मेघालय की पहाड़ियों पर अंग्रेजी सत्ता का शासन नहीं था। वहाँ खासी और जयंतिया जनजातियाँ स्वतन्त्र रूप से निवास करती थीं। इस क्षेत्र में वर्तमान में सटे बांग्लादेश और सिलचर के 30 छोटे-छोटे राज्य थे। इनमें से एक का नाम जयन्तियापुर था। अंग्रेजों ने जब यहाँ हमला किया, तो उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के अन्तर्गत जयन्तियापुर को पहाड़ी और मैदानी भागों में बाँट दिया। इसी के साथ उन्होंने निर्धन वनवासियों का धर्मांतरण करना भी प्रारम्भ कर दिया। राज्य के शासक ने अंग्रेजों के भयवश इस विभाजन को मान लिया, पर जनता और मन्त्रिपरिषद ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने राजा के बदले उ कियांग नंगबाह को अपना नेता चुन लिया। उ कियांग नंगबाह ने जनजातीय वीरों की सेना बनाकर जोवाई क्षेत्र की ओर बढ़ रहे अंग्रेजों का मुकाबला किया और उन्हें पराजित कर दिया। पर अंग्रेजों की शक्ति असीम थी। उन्होंने 1860 में सारे क्षेत्र पर दो रुपये कर के रूप में लगा दिया। जयंतिया समाज ने इस कर का विरोध किया और इसी कारण उ कियांग नंगबाह की अगुवाई में वहां के लोगों ने मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उ कियांग नंगबाह की बात करें तो वह वीर योद्धा के साथ-साथ एक अच्छे बाँसुरीवादक भी थे। वह बाँसुरी की धुन के साथ लोकगीत गाते थे। इस प्रकार वह अपने समाज को तीर और तलवार उठाने का आह्नान करते थे। अंग्रेज इसे नहीं समझते थे पर स्थानीय लोग इस कारण संगठित हो गये और वेे हर स्थान पर अंग्रेजों को चुनौती देने लगे।
अब अंग्रेजों ने कर वसूली के लिए कठोर उपाय अपनाने प्रारम्भ किये तो उ कियांग नंगबाह के आह्नान पर किसी ने कर नहीं दिया। इस पर अंग्रेजों ने उन सीधे-साधे लोगों को जेलों में ठूँस दिया। इतने सब संघर्ष के बाद भी उ कियांग नंगबाह उनके हाथ नहीं लगे। वह गाँवों और पर्वतों में घूमकर देश के लिए मर मिटने को समर्पित युवकों को संगठित कर रहे थे। धीरे-धीरे उनके पास अच्छी सेना हो गयी। उ कियांग नंगबाह ने योजना बनाकर एक साथ सात स्थानों पर अंग्रेज टुकड़ियों पर हमला बोला। सभी जगह उन्हें अच्छी सफलता मिली। यद्यपि वनवासी वीरों के पास उनके परम्परागत शस्त्र ही थे; पर गुरिल्ला युद्ध प्रणाली के कारण वे लाभ में रहे। वे अचानक आकर हमला करते और फिर पर्वतों में जाकर छिप जाते थे। इस प्रकार 20 माह तक लगातार युद्ध चलता रहा।अंग्रेज इन हमलों और पराजयों से परेशान हो गये। वे किसी भी कीमत पर उ कियांग नंगबाह को जिन्दा या मुर्दा पकड़ना चाहते थे। उन्होंने पैसे का लालच देकर उनके साथी उदोलोई तेरकर को अपनी ओर मिला लिया। उन दिनों उ कियांग नंगबाह बहुत घायल थे उनके साथियों ने इलाज के लिए उन्हें मुंशी गाँव में रखा हुआ था। उ कियांग नंगबाह के मित्र उदोलोई ने अंग्रेजों को यह सूचना दे दी, फिर क्या था? सैनिकों ने साइमन के नेतृत्व में मुंशी गाँव को चारों ओर से घेर लिया। उस समय उ कियांग नंगबाह की स्थिति लड़ने की बिल्कुल नहीं थी। इस कारण वह साथी नेता के अभाव मेंअंग्रेजों के सामने टिक नहीं सके। फिर भी उन्होंने समर्पण नहीं किया और युद्ध जारी रखा। अंग्रेजों ने घायल उ कियांग नंगबाह को पकड़ लिया।
उन्होंने प्रस्ताव रखा कि यदि तुम्हारे सब सैनिक आत्मसमर्पण कर दें, तो हम तुम्हें छोड़ देंगे, पर वीर उ कियांग नंगबाह ने इसे स्वीकार नहीं किया। अंग्रेजों के अमानवीय अत्याचार भी उनका मस्तक झुका नहीं पाये। अंततः अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह के कारण उन्हें 30 दिसंबर 1862 को पश्चिम जयंतिया जिले के जोवाई शहर के उसममियंग में सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई। 30 दिसंबर, 1862 की शाम को जब उन्हें फांसी पर चढ़ाया जा रहा था, तो उ कियांग नंगबाह ने कुछ भविष्यवाणी करते हुए कहा, “भाइयों और बहनों, कृपया मेरे चेहरे पर ध्यान से देखें जब मैं फांसी पर मर जाऊं। यदि मेरा चेहरा पूर्व की ओर मुड़ता है, तो मेरा देश (खासी जयंतिया) अगले 100 वर्षों में विदेशी शासन से मुक्त हो जाएगा और यदि यह पश्चिम में बदल जाता है, तो यह अच्छे के लिए बंधन में रहेगा। भारत सरकार द्वारा सन 2001 में एक डाक टिकट भी उनकी याद में जारी किया गया। उनकी बहादुरी के किस्से हमारे दिलों में हमेशा रहेंगे।