भागते गए

जीत- जीत
कर भी हम
हारते गए।
बार- बार
खुद को ही
संवारते गए।
कथन,
रेशमी सभी
चुभन से भरे।
जो भी मिले
हाथ पर ही
हाथ थे धरे।
खींचतान
में ही दिन
गुजारते गए।
मौन रहे
फिर भी
प्रश्नचिह्न थे लगे।
पहचानना
हुआ कठिन कि
कौन हैं सगे?
अपने,
हर मोड़ पर
नकारते गए।
लोग मिले
दूरियों से
समझ न सका।
फूंक- फूंक
रखे कदम
हर कदम थका।
ज़िन्दगी में
बेवजह ही
भागते गए।

जानो इन्सान को…

उन लोगों को मैं
चुनौती देता हूं
जो कहते हैं कि
वे ईश्वर तक हमें पहुंचा सकते हैं.
अरे! पहले इंसानियत को तो पूजो फिर बात करो ईश्वर की।
इंसान ही इंसान को भूलने के लिए कहता है।
आओ मूल जड़ों की ओर
मूल क्या है ?
मूल वह धारा है
जो पृथ्वी को माता मानती है।
मूल वह है जो कहता है –
“नर सेवा नारायण सेवा”
Tip briew, tip blei
अर्थात इंसान को जानो
फिर ईश्वर को जानो।
क्यो हो गई है
इस अंधेरे में रहने की आदत?
ईश्वर है लेकिन उस तक पहुंचने के लिए,
किसी मंदिर मस्जिद गिरजाघर की जरूरत नहीं,
मानवता में ही ईश्वर उत्पन्न होता है लौट जाओ अपने मूल की ओर।

केतली

विशाल के सी

जलती हुई अंगारो की भट्टी पर
एक सहमी हुई
खौलती केतली
चुप-चाप से बैठी थी
सुबह से लेकर शाम तक
वह भट्टी पर जरूरत मंद लोगो
के लिए तपी रहती
खुद को बर्दाश्त कर के
मैं हर रोज देखता था
उसके अंदर का चमत्कार
कभी उस में पानी का
उबाल होता
तो कभी चाय, आलू
कभी कुछ तो कभी कुछ
मगर भट्टी पर ही अढी़ रहती
शाम को जब भट्टी सो जाता थी
उसे ढककर अगली सुबह के लिए
वह अपने घर को जाता था
पर कोने के उस तरफ़ विवश केतली
अपने दर्द के साथ
पड़ी रहती थी
ना मालिक ने
उससे पूछा
उसका हाल
ना आग के तपिश ने
ना उन हाथों ने
जो हर सुबह
उसे भट्टी पर रखने आते थे
फिर एक दिन विवश केतली
भट्टी के ताप पर ही फट गई
और भट्टी का वजूद
पल में ही धराशायी
हो गया
घमंडी अंगारे भी
पल में
शान्त हो गए
एक ऐसी केतली
आज हर एक उस
घर पर सजती है
शायद उसे हम जानते हैं
जो रोज किसी एक
भट्टी पर तपती है।
रोक लो उन हाथों को
जो यह सेज सजाती हैं
बुझादो उस भट्टी के अंगार को
ना फट सके फिर
कोई विवश केतली

मजदूर





 डॉ.मधुकर देशमुख

 भट्टियां तेरे कारखाने की जलाने में 
 मैं खुद जला हूँ।
 महल तेरे बनाने में
 मैं खुद जला हूँ।
 रोशन तुझे कराने में, 
 मैं खुद जला हूँ।
 चिराग तेरा जलाते- जलाते
 रखा मैंने खुद को अँधेरे में।
 देश को आत्मनिर्भर बनाने में
 हर जुल्म सहे मैंने।
 समाज की इन बंदिशों से 
 टूट कर चूर हो गया हूँ मैं…
 जीवन में संघर्ष करते- करते
 बिखर गया हूँ मैं।
 परिवार को खुश रखूँ, 
 पेटभर खाना खिलाऊँ
 ये सपना मैंने भी तो पाला था।
 तो क्या बुरा किया था. ..?
 पर नहीं बुझाई पेट की आग तुमने…!!
 समय अब आ गया है…
 हिम्मत न हारने का
 अब भी हिम्मत रखता हूँ
 जेठ के इस तपती धुप में
 परिवार का बोझ उठाने की।
 अब भी हिम्मत रखता हूँ
 जिस मिटटी में जन्म लिया
 उस मिटटी का कर्ज चुकाने की।
 अब भी हिम्मत रखता हूँ
 चलने की… 
 चलूंगा… चलता रहूँगा…
 अपनी मंजिल तक
 पर अब न रूकूंगा. ..
 पीछे मुड़कर न देखूंगा, 
 अब मैं चल पड़ा हूँ. ..
 अपनी मिटटी का कर्ज चुकाने. ..
 माँ-बाप की सेवा करने
 चलते - चलते अगर मिट भी गया
 तो समझूँगा; मेरे जैसा खुशनसीब और कोई नहीं…
 पर पीछे मुड़कर ना देखूंगा…!!
 बावजूद इसके
 अगर लौट सका तो…
 तेरा शहर बसाने अवश्य लौटूंगा 
 पर पीछे मुड़कर न देखूंगा…!!