एकादशी

एकादशी

वह एक है ,
अलौकिक है
मैं दास ही हूँ
वह परम है
उन्हें पूजना ही मेरा धर्म है
वह विशाल है
जीवन को जीने के लिए भगवत गीता में कहें सीख और मिसाल है
वही परमात्मा है
वही परम सत्य है
बाकी सब मिथ्या है
वो वासुदेव, नारायण , देवकीनन्दन और मधुसूदन है
उनमें लीन हो जाए मेरी आत्मा हर पल
वही प्रारंभ भी है
और वही अंत है।
वही सुदर्शन धारी है
अब मेरे कष्टों को काटने कि उनकी तैयारि है
वही सुबह और श्याम है
वही रुक्मिणी, राधा और मीरा के श्याम है।
वही नारायण है
वही सत्य है
वो जीव है
वो अजीव है
उनके आशिर्वाद से तुलसी भी नहींं निर्जीव है
वही शक्ति है

Anik

मनोरमा प्रकृति

मालविका ‘मेधा’

झर झर झर झर गिरता झरना,
कल कल कल कल बहती नदियाँ।
सी-सी-सी-सी स्निग्ध शीतल हवाएं,
सबमें देख प्रकृति के रूप हैं समाए।।

धवल घन विराजे नीले आसमा में,
सूरज उगे संदेशा नए दिन के लिए।
चंदा फैलाएँ चाँदनी बदन तड़पाए,
ऊँचा नग कहे सिर उच्च अटल रहे।।

पेड़ो से हैं बढ़ी धरती में हरियाली,
जीव जगत अविघ्न घूमे दिवा-रात्रि।
पुष्प खिल मनोरम बनी सुंदर पृथ्वी,
लहरे उठती-गिरती होकर मतवाली।।

अद्भुत वरदान यह मिला प्रभु से है,
प्रकृति अविरत हमें सींचती आई है।
निश्चित जीवन सुखमय बन पाया है,
इसी नैसर्गिक सौंदर्य में मिटना है।।

प्रकृति की देखभाल धर्म अपना हैं,
गोदी में सर रख जहाँ सोना हमें हैं।
अंधी कटाई यूँ पेड़ो की रोकना है,
शस्य श्यामला रूप देकर जीना हैं।।

पहाड़ से उतरती औरतें

देखा था कभी
सुदूर पहाड़ की
बेहद ख़ूबसूरत पहाड़ी औरतें
उनकी ललाई एवं लुनाई में
गया था खो आसक्त मन
पर एक अलग ही रूप देख
अब भी स्तब्ध हूँ
हिम की ख़ूबसूरती को
बसाए हुए दिल में
हिम पर खेल लौट रही थी
और सामने ही अपने अश्वों की
रास थामे दोनों हाथों की कठोरता से
एक पहाड़ी औरत
पथरीली ढलाऊँ पर
उतरती गई झट धड़ाधड़
यायावरों के साथ
दोपहर तक के कठोर श्रम के बाद
पलक झपकते ओझल तीनों
बुला रहा था शायद उसे
कोई बीमार, वृद्ध, अशक्त
स्कूल से लौटा उसका लाल
या फिर खेतों की हरियाली
इंतज़ार सेब बगान का
अभी भी मेहनत के नाम
लिखने को बचा था
बहुत सारा काम
उस ख़ूबसूरत युवती का,
बदल देने को भविष्य
पहाड़ों का
अबकी जाना पहाड़ तो
उसका चेहरा, चेहरे की रंगत
लावण्य का पैमाना
उसकी देह न देखना
बस, देखना केवल
जड़ सम कठोर पैर,
उसकी खुरदुरी हथेलियाँ!

चाँद पर मकान

शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’

चाँद पर मकान एक
संयमित जमीन है,
साँस एक बॉस और
बाँसुरी नवीन है।
चार हैं भूखंड, विश्व
योजना की गोद में,
गीत है अनंत भरा,
शांति के सरोद में,
हर क्लेश झेलती है,
जिन्दगी ज़हीन है।
आयु का आदित्य नित्य
झाँकता है झील में,
जाति-पाँति, व्यक्तिवाद,
पूँजी की करील में,
काम, काम, काम, रहा,
आदमी मशीन है।
हर समाज में कहीं न,
दृष्टिगत समानता,
भौतिकी भूकंप की,
न जान सकी ज्ञानता,
मित्रभाव का वसंत,
पाक है, न चीन है।
स्वर समासबद्ध है,
विकास में निरुद्ध है,
सत्य एक सत्य है, न
नीति के विरुद्ध है,
पेट की दीवार के,
व्यंजना अधीन है।

भागते गए

जीत- जीत
कर भी हम
हारते गए।
बार- बार
खुद को ही
संवारते गए।
कथन,
रेशमी सभी
चुभन से भरे।
जो भी मिले
हाथ पर ही
हाथ थे धरे।
खींचतान
में ही दिन
गुजारते गए।
मौन रहे
फिर भी
प्रश्नचिह्न थे लगे।
पहचानना
हुआ कठिन कि
कौन हैं सगे?
अपने,
हर मोड़ पर
नकारते गए।
लोग मिले
दूरियों से
समझ न सका।
फूंक- फूंक
रखे कदम
हर कदम थका।
ज़िन्दगी में
बेवजह ही
भागते गए।

जानो इन्सान को…

उन लोगों को मैं
चुनौती देता हूं
जो कहते हैं कि
वे ईश्वर तक हमें पहुंचा सकते हैं.
अरे! पहले इंसानियत को तो पूजो फिर बात करो ईश्वर की।
इंसान ही इंसान को भूलने के लिए कहता है।
आओ मूल जड़ों की ओर
मूल क्या है ?
मूल वह धारा है
जो पृथ्वी को माता मानती है।
मूल वह है जो कहता है –
“नर सेवा नारायण सेवा”
Tip briew, tip blei
अर्थात इंसान को जानो
फिर ईश्वर को जानो।
क्यो हो गई है
इस अंधेरे में रहने की आदत?
ईश्वर है लेकिन उस तक पहुंचने के लिए,
किसी मंदिर मस्जिद गिरजाघर की जरूरत नहीं,
मानवता में ही ईश्वर उत्पन्न होता है लौट जाओ अपने मूल की ओर।

केतली

विशाल के सी

जलती हुई अंगारो की भट्टी पर
एक सहमी हुई
खौलती केतली
चुप-चाप से बैठी थी
सुबह से लेकर शाम तक
वह भट्टी पर जरूरत मंद लोगो
के लिए तपी रहती
खुद को बर्दाश्त कर के
मैं हर रोज देखता था
उसके अंदर का चमत्कार
कभी उस में पानी का
उबाल होता
तो कभी चाय, आलू
कभी कुछ तो कभी कुछ
मगर भट्टी पर ही अढी़ रहती
शाम को जब भट्टी सो जाता थी
उसे ढककर अगली सुबह के लिए
वह अपने घर को जाता था
पर कोने के उस तरफ़ विवश केतली
अपने दर्द के साथ
पड़ी रहती थी
ना मालिक ने
उससे पूछा
उसका हाल
ना आग के तपिश ने
ना उन हाथों ने
जो हर सुबह
उसे भट्टी पर रखने आते थे
फिर एक दिन विवश केतली
भट्टी के ताप पर ही फट गई
और भट्टी का वजूद
पल में ही धराशायी
हो गया
घमंडी अंगारे भी
पल में
शान्त हो गए
एक ऐसी केतली
आज हर एक उस
घर पर सजती है
शायद उसे हम जानते हैं
जो रोज किसी एक
भट्टी पर तपती है।
रोक लो उन हाथों को
जो यह सेज सजाती हैं
बुझादो उस भट्टी के अंगार को
ना फट सके फिर
कोई विवश केतली

मजदूर





 डॉ.मधुकर देशमुख

 भट्टियां तेरे कारखाने की जलाने में 
 मैं खुद जला हूँ।
 महल तेरे बनाने में
 मैं खुद जला हूँ।
 रोशन तुझे कराने में, 
 मैं खुद जला हूँ।
 चिराग तेरा जलाते- जलाते
 रखा मैंने खुद को अँधेरे में।
 देश को आत्मनिर्भर बनाने में
 हर जुल्म सहे मैंने।
 समाज की इन बंदिशों से 
 टूट कर चूर हो गया हूँ मैं…
 जीवन में संघर्ष करते- करते
 बिखर गया हूँ मैं।
 परिवार को खुश रखूँ, 
 पेटभर खाना खिलाऊँ
 ये सपना मैंने भी तो पाला था।
 तो क्या बुरा किया था. ..?
 पर नहीं बुझाई पेट की आग तुमने…!!
 समय अब आ गया है…
 हिम्मत न हारने का
 अब भी हिम्मत रखता हूँ
 जेठ के इस तपती धुप में
 परिवार का बोझ उठाने की।
 अब भी हिम्मत रखता हूँ
 जिस मिटटी में जन्म लिया
 उस मिटटी का कर्ज चुकाने की।
 अब भी हिम्मत रखता हूँ
 चलने की… 
 चलूंगा… चलता रहूँगा…
 अपनी मंजिल तक
 पर अब न रूकूंगा. ..
 पीछे मुड़कर न देखूंगा, 
 अब मैं चल पड़ा हूँ. ..
 अपनी मिटटी का कर्ज चुकाने. ..
 माँ-बाप की सेवा करने
 चलते - चलते अगर मिट भी गया
 तो समझूँगा; मेरे जैसा खुशनसीब और कोई नहीं…
 पर पीछे मुड़कर ना देखूंगा…!!
 बावजूद इसके
 अगर लौट सका तो…
 तेरा शहर बसाने अवश्य लौटूंगा 
 पर पीछे मुड़कर न देखूंगा…!!