केसरिया

प्रखर दीक्षित, फर्रुखाबाद


स्वर्णिम भोर सा
वर्ण सुहावन
प्रवाह शौर्य का
तेज सुपावन। ।
ध्वज भारत की
गौरव माथा
समक्ष इसी के
झुकता माथा
दग्ध मनों की
यही प्रेरणा,
प्राच्य धरोहर
सिद्ध सनातन। ।
उन्नति अवनति
जीत पराजय
सृष्टि उदय से
बिंबित लय
प्रतिक्षण लहरे
धर्म ध्वजा,
अर्पण भारत भू पर
स्व तन मन धन। ।
कैवल्य आर्ष का
शिव का हर हर
वीरों का उद्घोष
पवन की फर फर
देवालय की
शिखा पताका
देवदण्ड का अर्चन। ।
मानवता की
मील शिला यह
लिखे प्रलेख
भारती के कह
स्वतंत्रता का
क्रांति गान तू
केसरिया को वंदन। ।

आजादी अमृत महोत्सव

मुझे बोनसाई नहीं होना

केसरिया

कठपुतली

कठपुतली

डॉ रचना निगम, अहमदाबाद


कठपुतली सा नाच रहा
मानुष तेरा तन
कभी नचाये ऊपरवाला
कभी नचाये मन
हाड़ मांस के पिंजरे में
रहती रूह निसंग
जब बुलावा आये उसका
छोड़ जाये ये तन
बंद मुठ्ठी में लाये किस्मत
खोल पिटारा कर्म गठरिया
बने राजा, कभी रंक
उस जादूगर ने भेजा सबको
करके साँसों का अनुबंध
खेल हो जाये पूरा
कर दे साँसें बंद
उम्र भर जो जोड़ी दौलत
करके अनेक जतन
कभी कमाई मेहनत से
कभी दुखा कर मन
आसमान में ऊपर बैठा
वह देख रहा साँसों का नर्तन
एक इशारे पर उसके
रूह छोड़ जाये ये तन
दिए कई किरदार जगत के
रंगमंच पर निभाने को
कभी बने सफल अभिनेता
कभी चूक जाये ये मन
उस मायावी की नगरी में
हम चंद दिनों के मेहमान बने
कब चुक जाये उसकी झोली
कर दे साँसें बंद
रिश्ते-नाते, सगे-सम्बन्धी
हैं कुछ समय का रेला-मेला
आये जब बुलावा उसका नहीं जाये कोई संगी तेरा।

आजादी अमृत महोत्सव

मुझे बोनसाई नहीं होना

केसरिया

कठपुतली

मुझे बोनसाई नहीं होना

राजकुमार जैन ‘राजन’, चित्तौड़

मुझे
उस रास्ते की तलाश है
जो बचा सके
संस्कारों की दरकती हुई
सीमा रेखा को
और जो याद दिलाए
लोगों को
क्षणभंगुर अस्तित्व की
मुझे अपनी जिंदगी से
बहुत उम्मीदें हैं
अपने मन की
अबोध शाखाओं में उगे
बड़े-बड़े सपनों को
सच होते देखना चाहता हूँ
मुझमें है उद्भट संघर्षशीलता
उन्मुक्त जिजीविषा
और हिलोरें मारता जुनून
पता नहीं जीवन क्रम
कहाँ टूट जाये
मैं अपने
हिमालयी अहसासों के साथ
देश व समाज के लिए
कांटों से खुद को बचाते हुए
मेहनत के खूब फूल
उगाना चाहता हूँ
सिरहाने पड़े ख्वाबों को
श्रम-मंत्र बनाकर
सफलता का स्वर्णिम
प्रकाश फैलाने के लिए
हमारे सपनों के
पेड़ों की टहनियाँं
छोटी होगी
तो बेवक्त सूख जायेगी
पतझड़ रचने लगेंगे षड्यंत्र
हमारा अपना होने का अर्थ
मिट जाएगा
क्योंकि सत्य सदा सत्य है
बौने सपने देखकर
मुझे बोनसाई नहीं होना!

आजादी अमृत महोत्सव

मुझे बोनसाई नहीं होना

केसरिया

कठपुतली

आजादी अमृत महोत्सव

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हेमलता गोलछा, गुवाहाटी
आजादी की उमंग दिलों में जगाने को
नव स्वर्णिम युग का उत्थान हुआ।
बिगुल बजा विकास का भारत में
चहुँमुखी उन्नति का सूत्रपात हुआ।
तोड़ पराधीनता की बेड़ियों को
जीवंत लोकतंत्र का निर्माण हुआ।
ग्रामीण विकास योजना की नींव रखी
संविधान के आदर्श स्वरूप का निर्माण हुआ।
शिक्षा को मिला आधार स्तंभ
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की धारा का प्रवाह हुआ।
खंड खंड में बंटे भारत को अखंड बना
370 धारा का सफाया कश्मीर से हुआ।
आतंकी हमलों का मुँहतोड़ जवाब दिया
सर्जिकल स्ट्राइक का कीर्तिमान नाम हुआ।
मिटाने को भ्रष्टाचार उठाए ठोस कदम
नोट, वोट और खोट में नव चमत्कार हुआ।
सैन्य का सीना चौड़ा, महाशक्ति मिसाइल से
अंतरिक्ष में छलांग से प्रगति क्षेत्र को मकाम मिला।
स्वच्छ भारत अभियान है जोरों पर
‘नमामि गंगे’ से नदियों का जीर्णोद्धार हुआ।
देश विनिर्माण में कड़ियाँ जोड़ दी लाखों
आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न का संचार हुआ।
पारदर्शिता है चुनौतिशील है राष्ट्रीय नायक
तीन तलाक मिटा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का आग़ाज़ हुआ।

आजादी अमृत महोत्सव

मुझे बोनसाई नहीं होना

केसरिया

कठपुतली

एकादशी

एकादशी

वह एक है ,
अलौकिक है
मैं दास ही हूँ
वह परम है
उन्हें पूजना ही मेरा धर्म है
वह विशाल है
जीवन को जीने के लिए भगवत गीता में कहें सीख और मिसाल है
वही परमात्मा है
वही परम सत्य है
बाकी सब मिथ्या है
वो वासुदेव, नारायण , देवकीनन्दन और मधुसूदन है
उनमें लीन हो जाए मेरी आत्मा हर पल
वही प्रारंभ भी है
और वही अंत है।
वही सुदर्शन धारी है
अब मेरे कष्टों को काटने कि उनकी तैयारि है
वही सुबह और श्याम है
वही रुक्मिणी, राधा और मीरा के श्याम है।
वही नारायण है
वही सत्य है
वो जीव है
वो अजीव है
उनके आशिर्वाद से तुलसी भी नहींं निर्जीव है
वही शक्ति है

Anik

मनोरमा प्रकृति

मालविका ‘मेधा’

झर झर झर झर गिरता झरना,
कल कल कल कल बहती नदियाँ।
सी-सी-सी-सी स्निग्ध शीतल हवाएं,
सबमें देख प्रकृति के रूप हैं समाए।।

धवल घन विराजे नीले आसमा में,
सूरज उगे संदेशा नए दिन के लिए।
चंदा फैलाएँ चाँदनी बदन तड़पाए,
ऊँचा नग कहे सिर उच्च अटल रहे।।

पेड़ो से हैं बढ़ी धरती में हरियाली,
जीव जगत अविघ्न घूमे दिवा-रात्रि।
पुष्प खिल मनोरम बनी सुंदर पृथ्वी,
लहरे उठती-गिरती होकर मतवाली।।

अद्भुत वरदान यह मिला प्रभु से है,
प्रकृति अविरत हमें सींचती आई है।
निश्चित जीवन सुखमय बन पाया है,
इसी नैसर्गिक सौंदर्य में मिटना है।।

प्रकृति की देखभाल धर्म अपना हैं,
गोदी में सर रख जहाँ सोना हमें हैं।
अंधी कटाई यूँ पेड़ो की रोकना है,
शस्य श्यामला रूप देकर जीना हैं।।

पहाड़ से उतरती औरतें

देखा था कभी
सुदूर पहाड़ की
बेहद ख़ूबसूरत पहाड़ी औरतें
उनकी ललाई एवं लुनाई में
गया था खो आसक्त मन
पर एक अलग ही रूप देख
अब भी स्तब्ध हूँ
हिम की ख़ूबसूरती को
बसाए हुए दिल में
हिम पर खेल लौट रही थी
और सामने ही अपने अश्वों की
रास थामे दोनों हाथों की कठोरता से
एक पहाड़ी औरत
पथरीली ढलाऊँ पर
उतरती गई झट धड़ाधड़
यायावरों के साथ
दोपहर तक के कठोर श्रम के बाद
पलक झपकते ओझल तीनों
बुला रहा था शायद उसे
कोई बीमार, वृद्ध, अशक्त
स्कूल से लौटा उसका लाल
या फिर खेतों की हरियाली
इंतज़ार सेब बगान का
अभी भी मेहनत के नाम
लिखने को बचा था
बहुत सारा काम
उस ख़ूबसूरत युवती का,
बदल देने को भविष्य
पहाड़ों का
अबकी जाना पहाड़ तो
उसका चेहरा, चेहरे की रंगत
लावण्य का पैमाना
उसकी देह न देखना
बस, देखना केवल
जड़ सम कठोर पैर,
उसकी खुरदुरी हथेलियाँ!

चाँद पर मकान

शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’

चाँद पर मकान एक
संयमित जमीन है,
साँस एक बॉस और
बाँसुरी नवीन है।
चार हैं भूखंड, विश्व
योजना की गोद में,
गीत है अनंत भरा,
शांति के सरोद में,
हर क्लेश झेलती है,
जिन्दगी ज़हीन है।
आयु का आदित्य नित्य
झाँकता है झील में,
जाति-पाँति, व्यक्तिवाद,
पूँजी की करील में,
काम, काम, काम, रहा,
आदमी मशीन है।
हर समाज में कहीं न,
दृष्टिगत समानता,
भौतिकी भूकंप की,
न जान सकी ज्ञानता,
मित्रभाव का वसंत,
पाक है, न चीन है।
स्वर समासबद्ध है,
विकास में निरुद्ध है,
सत्य एक सत्य है, न
नीति के विरुद्ध है,
पेट की दीवार के,
व्यंजना अधीन है।

भागते गए

जीत- जीत
कर भी हम
हारते गए।
बार- बार
खुद को ही
संवारते गए।
कथन,
रेशमी सभी
चुभन से भरे।
जो भी मिले
हाथ पर ही
हाथ थे धरे।
खींचतान
में ही दिन
गुजारते गए।
मौन रहे
फिर भी
प्रश्नचिह्न थे लगे।
पहचानना
हुआ कठिन कि
कौन हैं सगे?
अपने,
हर मोड़ पर
नकारते गए।
लोग मिले
दूरियों से
समझ न सका।
फूंक- फूंक
रखे कदम
हर कदम थका।
ज़िन्दगी में
बेवजह ही
भागते गए।

जानो इन्सान को…

उन लोगों को मैं
चुनौती देता हूं
जो कहते हैं कि
वे ईश्वर तक हमें पहुंचा सकते हैं.
अरे! पहले इंसानियत को तो पूजो फिर बात करो ईश्वर की।
इंसान ही इंसान को भूलने के लिए कहता है।
आओ मूल जड़ों की ओर
मूल क्या है ?
मूल वह धारा है
जो पृथ्वी को माता मानती है।
मूल वह है जो कहता है –
“नर सेवा नारायण सेवा”
Tip briew, tip blei
अर्थात इंसान को जानो
फिर ईश्वर को जानो।
क्यो हो गई है
इस अंधेरे में रहने की आदत?
ईश्वर है लेकिन उस तक पहुंचने के लिए,
किसी मंदिर मस्जिद गिरजाघर की जरूरत नहीं,
मानवता में ही ईश्वर उत्पन्न होता है लौट जाओ अपने मूल की ओर।