लोहा बन गया हूँ मैं और पाँव ये नींव हो गए

लोहा बन गया हूँ मैं
सरल मार्गों का
अनुसरण कब किया मैंने
खाई-खन्दक से भरी जमीन पर
योद्धा बन कर गुजरा हूँ मैं
धूप में तपकर
अनगिनत रूपों में ढला हूँ मैं
वक्त ने सौंपे जो भी काम
हॅंसते हुए पूरा किया उन्हें
कभी थका नहीं
पहाड़ों पर चढ़ते हुए
लोहा बन गया हूँ मैं
आघात झेलते-झेलते

अब पाँव हमारे दुखते नहीं
ये खड़े-खड़े, अच्छे दिनों के इंतजार में
बाँस हो गए हैं
धीरे-धीरे सीढ़ी हो गए
घबराहट नहीं होती
जब कोई इन पर चढ़कर ऊपर जाता है
अपनी ध्वजा फहराता है
हम देखते रहते हैं
नहीं दुखते सचमुच हमारे पाँव
अब ये नींव हो गए हैं

नरेश अग्रवाल झारखंड के निवासी हैं और कवि और कविताओं की दुनिया में एक सुपरिचित नाम है, इनकी कविताओं के काई किताबें प्रकाशित हुई हैं

ग़ज़ल

कहां पहुंचेगा वो कहना ज़रा मुश्किल सा लगता है
मगर उसका सफ़र देखो तो खुद मंज़िल सा लगता है

कभी बाबू कभी अफ़सर कभी थाने कभी कोरट
वो मुफ़लिस रोज़ सरकारी किसी फ़ाइल सा लगता है

न पंछी को दिये दाने न पौधों को दिया पानी
वो ज़िन्दा है नहीं बाहर से ज़िन्दादिल सा लगता है

वो बस अपनी ही कहता है किसी की कुछ नहीं सुनता
वो बहसों में कभी जाहिल कभी बुज़दिल सा लगता है

नहीं सुन पाओगे तुम भी ख़मोशी शोर में उसकी
उसे तनहाई में सुनना भरी महफ़िल सा लगता है

बुझा भी है वो बिखरा भी कई टुकड़ों में तनहा भी
वो सूरत से किसी आशिक़ के टूटे दिल सा लगता है

वो सपना सा है साया सा वो मुझमें मोह माया सा
वो इक दिन छूट जाना है अभी हासिल सा लगता है

ये लगता है उस इक पल में कि मैं और तू नहीं हैं दो
वो पल जिसमें मुझे माज़ी ही मुस्तक़बिल सा लगता है

उसे तुम ग़ौर से देखोगे तो दिलशाद समझोगे
वो कहने को है इक शायर मगर नॉविल सा लगता है.

भवेश दिलशाद उर्दू शायरी और हिंदी शायरी की दुनिया में एक जाना पहचाना नाम हैं। वह मध्य प्रदेश के शिवपुरी निवासी हैं। उनकी ‘नील’, ‘सुर्ख’ और ‘सियाही’ जैसी किताबों की काफी मांग है।

निहाल

जब-जब मनवा हो दुखी,
नैन बहे जलधार।
पलक भीग कर सो गई,
कुंठित पुतली खार॥

दोनो नैना सोचते,
क्या है अपना दोष?
क्यूँ हम दोनों रो रहे,
हम बिल्कुल निर्दोष॥

सुन उनके आक्रोश को,
द्रवित नासिका द्वार।
गंगा-जमुना बह रही,
हम भी हैं लाचार॥

दिल था जो आहत हुआ,
सहन नासिका नैन।
किस विधि करूँ निहाल[1] मैं,
सोचूँ मैं दिन रैन॥

किया कर्ण से मशविरा,
नहीं सूझती राह।
कर देना तुम अनसुनी,
देना सबको चाह॥

जिह्वा पर कटुता कभी,
कभी स्नेह उद्गार।
जो मधु भाषी तुम बनो,
हो निहाल संसार॥

नैना रोएँगे नहीं,
नाक रहे खुशहाल।
सुने कर्ण संगीतियाँ,
मन सौंदर्य निहाल

मधु खरे वर्जिनिया में लॉजिस्टिक विशेशज्ञ के रूप में कार्यरत थी। भारत के लखनउ के पूर्वनिवासी मधु जी की  काव्य सुमन, 2022, My Memoirs,, 2022, प्रियंवद (काव्य संग्रह), 2022, जैसी एकल पुस्तक प्रकाशित हुई है। कई काव्य गोष्ठी के सदाशय होने का साथ-साथ इन्हें काव्य पाठ और संचालन में भी रुचि है।


[1] प्रफुल्ल, प्रसन्न

मौसम के नाम

मौसम के नाम लिखा
ख़त एक अनाम ने,
बेच रही पुरवाई
हर घर के सामने.
कजरारे मेघ तेरे
यहाँ-वहाँ बरसे,
चातक की प्यास के लिए
होथ यहाँ तरसे,
रात भर जगी सुबह
शबनम की आस
शबनम की आस मुझमें
छीन लिया जिसे कोई मदमाती शाम ने

रातों ने फैलाई जब
लंबी बातें,
भोर तलक तड़प उठी भर ठंडी आहें,
चादर से बाहर जब
कुहरे का पाँव हुआ,
टैब छिड़का चुटकी भर
धूप दिनमान ने

‘बौराये’ आमों के बौर-बौर महके,
‘रसमातल’ गन्ने कि पोर-पोर दहके,
कनफुसिया करे मटर
चना भरे आह रे,
लगता है छोड़ दिया एक तीर काम ने!

जल जाए धरती का
हरा -भरा अँचरा ,
तब भी पसीजे ना
निर्मोही बदरा
कोयल पपीहे भी
मौन हुए खौफ से,
लगता है दे डाला
फतवा इमाम ने!

ओम प्रकाश धीरज नवभारत टाइम्स में सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत हैं। इन्हें ऑटोमोबाइल, टेक्नॉलजी, एंटरटेनमेंट, एजुकेशन, सोशल, पॉलिटिक्स और इंटरनैशनल अफेयर्स जैसे टॉपिक्स पर लिखने का अनुभव है। फ्री टाइम में फोटोग्राफी और ट्रैवलिंग के साथ ही नेचर एक्सप्लोर करना पसंद है

श्री राम वन्दना

श्री रामचन्द्र दया निधान,
दयालु हे! जगदीश्वरम्।
तम तोम तारक सुर सुधारक,
सौम्य हे! सर्वेश्वरम्।
मन मणि खचित रवि निकर
सम, छविधाम आप जगत्पते।
सौन्दर्य की उस राशि के
आधार हों सीतापते!
लखि रूप मोहित देव सब
ब्रम्हा, उमा-महेश्वरम्।
श्री रामचन्द्र दया निधान,
दयालु हे! जगदीश्वरम्।
शत् काम लज्जित राम तव
आनन निहारि निहारि के।
सँग नारि सीता रूप छवि,
नव कलित रूप निवारि के।
अस सुयश गावहिं जगत के
सब मनुज हे! अखिलेश्वरम्।
श्री रामचन्द्र दया निधान,
दयालु हे! जगदीश्वरम्

राजेश तिवारी “विरल”

ज्ञान के बारे में माई का अंतर्ज्ञान

किताबें फर्राटेदार पढ़ जाना
अपराध से कम न था माई के लिए
कहती-हड़बड़-तड़बड़ बांचने से
झुरा जाते हैं शब्द,मर जाते हैं भाव
बिना रुके-थमे पढ़ जाना
सरासर अपमान है-अक्षरों का
शब्दों को हिक्क भर निहारती थी माई
शब्दों को शब्द कहना अज्ञानता थी उसके लिए
मन ही मन शब्दों से
न जाने किस भाषा में बतियाती
अर्थ से बहुत वजनी थे एक-एक शब्द
पांच लाइनें पढ़ जाना
पांच नदियाँ डूबकर पार करना था,
पूरी किताब पढ़ जाने की हिम्मत
माई चाहकर भी न जुट पायी
न जाने किस मोड़ पर
भीतर जमे बादल बरस पड़ें
मुंह से बोलते समय
रोवाँ-रोवाँ बज उठते थे शब्द
किताबों से पेश आने का सलीका
धुर चौकीदार से बढ़कर था
वक्त की क्या मजाल
जो जम जाय,धूल-धक्कड़ की शक्ल में
माई के रहते हुए
पन्नों पर हाथ फेरती
मानो पांव छू लिया हो
साक्षात विचारों की आत्मा का
किताबें बिना पढ़े ही
ज्ञान के बारे में माई का अंतर्ज्ञान
सदैव अज्ञात ही रहा हमसे।

भरत प्रसाद

बसंत

धानी चुनर ओढ़ कर धरा है मुस्काई
पीले खेत सरसों के ले रही अँगड़ाईं ।
चली बसंती बयार ऋतुराज आगमन
फिजा पे छाया खुमार महका है चमन।
पुष्पित हो रहे बाग में सुमन हैं अनंत
बेला, जूही, गुलाब खिल रहे दिगंत।
पेड़ों में लगे हैं बेर बौरा गये आम भी
हरियाली छाई चहुँ ओर झूम रही डाली।
हलधर भी प्रफुल्लित हो दे रहे हैं ताल
मना रहे बसंतोत्सव बजा रे हैं झाँझ।
माँ शारदे की करें वंदना देती विद्या ज्ञान
वीणा के मधुर स्वर में छेड़े अद्भुत तान।
हंसवाहिनी सरस्वती माता बुद्धि की दाता
मन का तिमिर दूर कर है भाग्य विधाता ।
भ्रमर, तितली, पखेरू कर रहे गुंजार
प्रकृति का स्वरूप देख कर रहे मनुहार।
ज्ञान ज्योतिस्वरूपा चेतना उर में भर दे
सद्भावों का दीप जला राग-द्वेष हर ले।
श्वेतवस्त्र धारिणी माँ के चरणों में वंदन
करते अर्चना,पूजा जय जयते बसंत।।

मंजु बंसल “मुक्ता मधुश्री”

शक्ति

भावनाओं की कोमल
           मृदुल शक्ति

भौतिकता की
अर्थनैतिक शक्ति
नैतिकता की
आदर्शात्मक शक्ति
आध्यात्म की
             अटल-अगाध शक्ति

व्यक्त-अव्यक्त
चेतन-जड़ शक्ति
और भी अनेक
रूपों में शक्ति
‘शक्ति’ शब्द अनायास ही
भर देता है मन में
             सकारात्मक छवि

और हम
नमन कर मगन हो जाते हैं
परंतु
यही शक्ति
जब नकारात्मक हो जाए
तब
शक्तिवान के अहंकार
             की शक्ति

प्रलयवान के
ध्वंस की शक्ति
मानव से दानव बने
दम्भ की शक्ति
रक्षक से भक्षक बने
             स्वामित्व की शक्ति

क्रूरता से भरी
             वीभत्सता की शक्ति
और भी न जाने
कितने अधोरूप में शक्ति
इनका विस्तृत प्रसार
 बन कर ज्वाला की आग
कर रहा है सावधान …
‘शक्ति’ को नमन करो
             पर देख-भाल कर!

अर्थ का अनर्थ न हो
‘नमन’ दुरूपयुक्त न हो
हर पल विवेकयुक्त
             रहना है हो सतर्क
             यही है युग का धर्म!

केसरिया

प्रखर दीक्षित, फर्रुखाबाद


स्वर्णिम भोर सा
वर्ण सुहावन
प्रवाह शौर्य का
तेज सुपावन। ।
ध्वज भारत की
गौरव माथा
समक्ष इसी के
झुकता माथा
दग्ध मनों की
यही प्रेरणा,
प्राच्य धरोहर
सिद्ध सनातन। ।
उन्नति अवनति
जीत पराजय
सृष्टि उदय से
बिंबित लय
प्रतिक्षण लहरे
धर्म ध्वजा,
अर्पण भारत भू पर
स्व तन मन धन। ।
कैवल्य आर्ष का
शिव का हर हर
वीरों का उद्घोष
पवन की फर फर
देवालय की
शिखा पताका
देवदण्ड का अर्चन। ।
मानवता की
मील शिला यह
लिखे प्रलेख
भारती के कह
स्वतंत्रता का
क्रांति गान तू
केसरिया को वंदन। ।

आजादी अमृत महोत्सव

मुझे बोनसाई नहीं होना

केसरिया

कठपुतली

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कठपुतली

डॉ रचना निगम, अहमदाबाद


कठपुतली सा नाच रहा
मानुष तेरा तन
कभी नचाये ऊपरवाला
कभी नचाये मन
हाड़ मांस के पिंजरे में
रहती रूह निसंग
जब बुलावा आये उसका
छोड़ जाये ये तन
बंद मुठ्ठी में लाये किस्मत
खोल पिटारा कर्म गठरिया
बने राजा, कभी रंक
उस जादूगर ने भेजा सबको
करके साँसों का अनुबंध
खेल हो जाये पूरा
कर दे साँसें बंद
उम्र भर जो जोड़ी दौलत
करके अनेक जतन
कभी कमाई मेहनत से
कभी दुखा कर मन
आसमान में ऊपर बैठा
वह देख रहा साँसों का नर्तन
एक इशारे पर उसके
रूह छोड़ जाये ये तन
दिए कई किरदार जगत के
रंगमंच पर निभाने को
कभी बने सफल अभिनेता
कभी चूक जाये ये मन
उस मायावी की नगरी में
हम चंद दिनों के मेहमान बने
कब चुक जाये उसकी झोली
कर दे साँसें बंद
रिश्ते-नाते, सगे-सम्बन्धी
हैं कुछ समय का रेला-मेला
आये जब बुलावा उसका नहीं जाये कोई संगी तेरा।

आजादी अमृत महोत्सव

मुझे बोनसाई नहीं होना

केसरिया

कठपुतली

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