श्री राम वन्दना

श्री रामचन्द्र दया निधान,
दयालु हे! जगदीश्वरम्।
तम तोम तारक सुर सुधारक,
सौम्य हे! सर्वेश्वरम्।
मन मणि खचित रवि निकर
सम, छविधाम आप जगत्पते।
सौन्दर्य की उस राशि के
आधार हों सीतापते!
लखि रूप मोहित देव सब
ब्रम्हा, उमा-महेश्वरम्।
श्री रामचन्द्र दया निधान,
दयालु हे! जगदीश्वरम्।
शत् काम लज्जित राम तव
आनन निहारि निहारि के।
सँग नारि सीता रूप छवि,
नव कलित रूप निवारि के।
अस सुयश गावहिं जगत के
सब मनुज हे! अखिलेश्वरम्।
श्री रामचन्द्र दया निधान,
दयालु हे! जगदीश्वरम्

राजेश तिवारी “विरल”

ज्ञान के बारे में माई का अंतर्ज्ञान

किताबें फर्राटेदार पढ़ जाना
अपराध से कम न था माई के लिए
कहती-हड़बड़-तड़बड़ बांचने से
झुरा जाते हैं शब्द,मर जाते हैं भाव
बिना रुके-थमे पढ़ जाना
सरासर अपमान है-अक्षरों का
शब्दों को हिक्क भर निहारती थी माई
शब्दों को शब्द कहना अज्ञानता थी उसके लिए
मन ही मन शब्दों से
न जाने किस भाषा में बतियाती
अर्थ से बहुत वजनी थे एक-एक शब्द
पांच लाइनें पढ़ जाना
पांच नदियाँ डूबकर पार करना था,
पूरी किताब पढ़ जाने की हिम्मत
माई चाहकर भी न जुट पायी
न जाने किस मोड़ पर
भीतर जमे बादल बरस पड़ें
मुंह से बोलते समय
रोवाँ-रोवाँ बज उठते थे शब्द
किताबों से पेश आने का सलीका
धुर चौकीदार से बढ़कर था
वक्त की क्या मजाल
जो जम जाय,धूल-धक्कड़ की शक्ल में
माई के रहते हुए
पन्नों पर हाथ फेरती
मानो पांव छू लिया हो
साक्षात विचारों की आत्मा का
किताबें बिना पढ़े ही
ज्ञान के बारे में माई का अंतर्ज्ञान
सदैव अज्ञात ही रहा हमसे।

भरत प्रसाद

बसंत

धानी चुनर ओढ़ कर धरा है मुस्काई
पीले खेत सरसों के ले रही अँगड़ाईं ।
चली बसंती बयार ऋतुराज आगमन
फिजा पे छाया खुमार महका है चमन।
पुष्पित हो रहे बाग में सुमन हैं अनंत
बेला, जूही, गुलाब खिल रहे दिगंत।
पेड़ों में लगे हैं बेर बौरा गये आम भी
हरियाली छाई चहुँ ओर झूम रही डाली।
हलधर भी प्रफुल्लित हो दे रहे हैं ताल
मना रहे बसंतोत्सव बजा रे हैं झाँझ।
माँ शारदे की करें वंदना देती विद्या ज्ञान
वीणा के मधुर स्वर में छेड़े अद्भुत तान।
हंसवाहिनी सरस्वती माता बुद्धि की दाता
मन का तिमिर दूर कर है भाग्य विधाता ।
भ्रमर, तितली, पखेरू कर रहे गुंजार
प्रकृति का स्वरूप देख कर रहे मनुहार।
ज्ञान ज्योतिस्वरूपा चेतना उर में भर दे
सद्भावों का दीप जला राग-द्वेष हर ले।
श्वेतवस्त्र धारिणी माँ के चरणों में वंदन
करते अर्चना,पूजा जय जयते बसंत।।

मंजु बंसल “मुक्ता मधुश्री”

शक्ति

भावनाओं की कोमल
           मृदुल शक्ति

भौतिकता की
अर्थनैतिक शक्ति
नैतिकता की
आदर्शात्मक शक्ति
आध्यात्म की
             अटल-अगाध शक्ति

व्यक्त-अव्यक्त
चेतन-जड़ शक्ति
और भी अनेक
रूपों में शक्ति
‘शक्ति’ शब्द अनायास ही
भर देता है मन में
             सकारात्मक छवि

और हम
नमन कर मगन हो जाते हैं
परंतु
यही शक्ति
जब नकारात्मक हो जाए
तब
शक्तिवान के अहंकार
             की शक्ति

प्रलयवान के
ध्वंस की शक्ति
मानव से दानव बने
दम्भ की शक्ति
रक्षक से भक्षक बने
             स्वामित्व की शक्ति

क्रूरता से भरी
             वीभत्सता की शक्ति
और भी न जाने
कितने अधोरूप में शक्ति
इनका विस्तृत प्रसार
 बन कर ज्वाला की आग
कर रहा है सावधान …
‘शक्ति’ को नमन करो
             पर देख-भाल कर!

अर्थ का अनर्थ न हो
‘नमन’ दुरूपयुक्त न हो
हर पल विवेकयुक्त
             रहना है हो सतर्क
             यही है युग का धर्म!

केसरिया

प्रखर दीक्षित, फर्रुखाबाद


स्वर्णिम भोर सा
वर्ण सुहावन
प्रवाह शौर्य का
तेज सुपावन। ।
ध्वज भारत की
गौरव माथा
समक्ष इसी के
झुकता माथा
दग्ध मनों की
यही प्रेरणा,
प्राच्य धरोहर
सिद्ध सनातन। ।
उन्नति अवनति
जीत पराजय
सृष्टि उदय से
बिंबित लय
प्रतिक्षण लहरे
धर्म ध्वजा,
अर्पण भारत भू पर
स्व तन मन धन। ।
कैवल्य आर्ष का
शिव का हर हर
वीरों का उद्घोष
पवन की फर फर
देवालय की
शिखा पताका
देवदण्ड का अर्चन। ।
मानवता की
मील शिला यह
लिखे प्रलेख
भारती के कह
स्वतंत्रता का
क्रांति गान तू
केसरिया को वंदन। ।

आजादी अमृत महोत्सव

मुझे बोनसाई नहीं होना

केसरिया

कठपुतली

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कठपुतली

डॉ रचना निगम, अहमदाबाद


कठपुतली सा नाच रहा
मानुष तेरा तन
कभी नचाये ऊपरवाला
कभी नचाये मन
हाड़ मांस के पिंजरे में
रहती रूह निसंग
जब बुलावा आये उसका
छोड़ जाये ये तन
बंद मुठ्ठी में लाये किस्मत
खोल पिटारा कर्म गठरिया
बने राजा, कभी रंक
उस जादूगर ने भेजा सबको
करके साँसों का अनुबंध
खेल हो जाये पूरा
कर दे साँसें बंद
उम्र भर जो जोड़ी दौलत
करके अनेक जतन
कभी कमाई मेहनत से
कभी दुखा कर मन
आसमान में ऊपर बैठा
वह देख रहा साँसों का नर्तन
एक इशारे पर उसके
रूह छोड़ जाये ये तन
दिए कई किरदार जगत के
रंगमंच पर निभाने को
कभी बने सफल अभिनेता
कभी चूक जाये ये मन
उस मायावी की नगरी में
हम चंद दिनों के मेहमान बने
कब चुक जाये उसकी झोली
कर दे साँसें बंद
रिश्ते-नाते, सगे-सम्बन्धी
हैं कुछ समय का रेला-मेला
आये जब बुलावा उसका नहीं जाये कोई संगी तेरा।

आजादी अमृत महोत्सव

मुझे बोनसाई नहीं होना

केसरिया

कठपुतली

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मुझे बोनसाई नहीं होना

राजकुमार जैन ‘राजन’, चित्तौड़

मुझे
उस रास्ते की तलाश है
जो बचा सके
संस्कारों की दरकती हुई
सीमा रेखा को
और जो याद दिलाए
लोगों को
क्षणभंगुर अस्तित्व की
मुझे अपनी जिंदगी से
बहुत उम्मीदें हैं
अपने मन की
अबोध शाखाओं में उगे
बड़े-बड़े सपनों को
सच होते देखना चाहता हूँ
मुझमें है उद्भट संघर्षशीलता
उन्मुक्त जिजीविषा
और हिलोरें मारता जुनून
पता नहीं जीवन क्रम
कहाँ टूट जाये
मैं अपने
हिमालयी अहसासों के साथ
देश व समाज के लिए
कांटों से खुद को बचाते हुए
मेहनत के खूब फूल
उगाना चाहता हूँ
सिरहाने पड़े ख्वाबों को
श्रम-मंत्र बनाकर
सफलता का स्वर्णिम
प्रकाश फैलाने के लिए
हमारे सपनों के
पेड़ों की टहनियाँं
छोटी होगी
तो बेवक्त सूख जायेगी
पतझड़ रचने लगेंगे षड्यंत्र
हमारा अपना होने का अर्थ
मिट जाएगा
क्योंकि सत्य सदा सत्य है
बौने सपने देखकर
मुझे बोनसाई नहीं होना!

आजादी अमृत महोत्सव

मुझे बोनसाई नहीं होना

केसरिया

कठपुतली

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आजादी अमृत महोत्सव

हेमलता गोलछा, गुवाहाटी
आजादी की उमंग दिलों में जगाने को
नव स्वर्णिम युग का उत्थान हुआ।
बिगुल बजा विकास का भारत में
चहुँमुखी उन्नति का सूत्रपात हुआ।
तोड़ पराधीनता की बेड़ियों को
जीवंत लोकतंत्र का निर्माण हुआ।
ग्रामीण विकास योजना की नींव रखी
संविधान के आदर्श स्वरूप का निर्माण हुआ।
शिक्षा को मिला आधार स्तंभ
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की धारा का प्रवाह हुआ।
खंड खंड में बंटे भारत को अखंड बना
370 धारा का सफाया कश्मीर से हुआ।
आतंकी हमलों का मुँहतोड़ जवाब दिया
सर्जिकल स्ट्राइक का कीर्तिमान नाम हुआ।
मिटाने को भ्रष्टाचार उठाए ठोस कदम
नोट, वोट और खोट में नव चमत्कार हुआ।
सैन्य का सीना चौड़ा, महाशक्ति मिसाइल से
अंतरिक्ष में छलांग से प्रगति क्षेत्र को मकाम मिला।
स्वच्छ भारत अभियान है जोरों पर
‘नमामि गंगे’ से नदियों का जीर्णोद्धार हुआ।
देश विनिर्माण में कड़ियाँ जोड़ दी लाखों
आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न का संचार हुआ।
पारदर्शिता है चुनौतिशील है राष्ट्रीय नायक
तीन तलाक मिटा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का आग़ाज़ हुआ।

आजादी अमृत महोत्सव

मुझे बोनसाई नहीं होना

केसरिया

कठपुतली

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एकादशी

एकादशी

वह एक है ,
अलौकिक है
मैं दास ही हूँ
वह परम है
उन्हें पूजना ही मेरा धर्म है
वह विशाल है
जीवन को जीने के लिए भगवत गीता में कहें सीख और मिसाल है
वही परमात्मा है
वही परम सत्य है
बाकी सब मिथ्या है
वो वासुदेव, नारायण , देवकीनन्दन और मधुसूदन है
उनमें लीन हो जाए मेरी आत्मा हर पल
वही प्रारंभ भी है
और वही अंत है।
वही सुदर्शन धारी है
अब मेरे कष्टों को काटने कि उनकी तैयारि है
वही सुबह और श्याम है
वही रुक्मिणी, राधा और मीरा के श्याम है।
वही नारायण है
वही सत्य है
वो जीव है
वो अजीव है
उनके आशिर्वाद से तुलसी भी नहींं निर्जीव है
वही शक्ति है

Anik

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मनोरमा प्रकृति

मालविका ‘मेधा’

झर झर झर झर गिरता झरना,
कल कल कल कल बहती नदियाँ।
सी-सी-सी-सी स्निग्ध शीतल हवाएं,
सबमें देख प्रकृति के रूप हैं समाए।।

धवल घन विराजे नीले आसमा में,
सूरज उगे संदेशा नए दिन के लिए।
चंदा फैलाएँ चाँदनी बदन तड़पाए,
ऊँचा नग कहे सिर उच्च अटल रहे।।

पेड़ो से हैं बढ़ी धरती में हरियाली,
जीव जगत अविघ्न घूमे दिवा-रात्रि।
पुष्प खिल मनोरम बनी सुंदर पृथ्वी,
लहरे उठती-गिरती होकर मतवाली।।

अद्भुत वरदान यह मिला प्रभु से है,
प्रकृति अविरत हमें सींचती आई है।
निश्चित जीवन सुखमय बन पाया है,
इसी नैसर्गिक सौंदर्य में मिटना है।।

प्रकृति की देखभाल धर्म अपना हैं,
गोदी में सर रख जहाँ सोना हमें हैं।
अंधी कटाई यूँ पेड़ो की रोकना है,
शस्य श्यामला रूप देकर जीना हैं।।

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