संस्कार

“अरे रवि जल्दी उठो और ये लो बाहर गेट पर गौमाता रम्भा रही हैं, दे दो उन्हें,” कंप्यूटर पर गेम खेलते हुए अपने बेटे को रोटियाँ पकड़ाते हुए महिमा बोली।

“अनु से कह दो, वो दे आएगी, मेरी गेम का टाइम आऊट हो जायेगा।” कंप्यूटर पर नजर गड़ाए रवि बोला।

“अनु बेटा, जाओ तुम ही दे आओ रोटियाँ,” प्यार से पुचकारते हुए महिमा बोली।

“नहीं मैं नहीं जाऊंगी, भाई गेम ही तो खेल रहा है, मैं तो होमवर्क कर रही हूँ,” मुंह बनाते हुए बेटी ने कहा।

“ये क्या बदतमीजी है, बाहर इतनी धूप में खड़ी गौमाता कब से रम्भा रही है और तुम दोनों  बहाने बना रहे हो। जल्दी उठो,ये लो।” गुस्से में तमतमाती महिमा चिल्लाई।

“क्या हुआ भाई! क्या दे रही हो बच्चों को?” कमरे में घुसते अमित ने पूछा।

“संस्कार!” कहकर मुस्कुरा दी महिमा।

नीता शर्मा: सफल गृहिणी और लेखिका होने के साथ-साथ आकाशवाणी के कार्यक्रम और नियमित उद्घोषणाएँ भी करती हैं

बिंदी

पति की मृत्यु के बाद भारती आज पहली बार नौकरी पर जा रही थी। एक महीने का अवकाश लिया था और कितना लेती! नौकरी पर तो जाना ही था। उसने एक क्रीम कलर की साड़ी निकाली, पैरों पर ध्यान गया, बिछिया और नेल पॉलिश बिना पैर बहुत सूने लग रहे थे। उसने हल्के रंग की नेल पॉलिश पैरों के नाखूनों पर लगा दी, मैचिंग चूड़ियाँ निकाली किंतु उन्हें पहनने का दिल नहीं किया। एक हाथ में दो सोने की चूड़ी, एक हाथ में घड़ी ठीक है; कांच की चूड़ियों के बिना भी हाथ इतने बुरे नहीं लग रहे हैं। उसने हल्के रंग की लिपस्टिक भी लगा ली। अब उसके सामने असली समस्या बिंदी की थी। पति के रहते वह बहुत बड़ी बिंदी लगाती थी। बिना बिंदी के वह अपना चेहरा स्वयं नहीं देख पाती किंतु लोग क्या कहेंगे, यह सोच कर हाथ में बिंदी का पत्ता लिए  समझ नहीं पा रही थी कि बिंदी लगाए अथवा नहीं । एक बार उसने माथे पर बिंदी लगा ली किंतु अगले ही पल उसे बिंदी  के पत्ते में चिपका दिया।

      तभी उसे पति की तेरहवीं की घटना याद आई। उसके मायके से साड़ी के साथ- साथ रस्म के मुताबिक श्रृंगार का सामान भी आया था। पंडित जी के साथ जेठ जी बैठे सामान देख रहे थे। बिंदी देखते ही वह बिदक गए,”मर्यादा भी निभानी पड़ती है, बिंदी हटा दो इसमें से।” उन्होंने बेटी से कहा लेकिन बेटी अड़ गई थी।

” मेरी माँ बाहर जाती है; ज़रूरी नहीं है कि वह मनहूस शक्ल लेकर जाए। जमाना अब पहले वाला नहीं है ताऊ जी। माँ बिंदी लगाएगी।” और भारती ने हाथ में देर से पकड़े हुए पत्ते से बिंदी‌ निकाली और माथे पर लगा ली।

डॉ. विद्या सिंह निजी रचनाओ के अलावा कइ पुस्तकों का सम्पादन कर चुकी हैं, जिनमें  उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार, बी.ए. द्वितीय वर्ष के लिए पाठ्य पुस्तक प्रमुख हैं। अनगीनत साहित्य सम्मान से सम्मनित विद्या जी सम्प्रति महिला काव्य मंच, उत्तराखंड और अध्यक्ष धाद साहित्य एकांश, देहरादून के अध्यक्ष हैं। भ्रमण में रुचि के करण विद्या जी नेपाल, कम्बोडिया, वियतनाम, थाईलैण्ड, दुबई, मॉरिशस, स्विट्जरलैण्ड, बेल्जियम, हॉलैण्ड, फ्रांस, दुबई,मिस्र, उज़्बेकिस्तान, अमेरिका आदि देशों का भ्रमण कर चुके हैं

मोबाइल

“जब देखो मुए मोबाइल में घुसी रहती है।”

जया की सास का मानो ये तकिया कलाम हो गया था।

“बहू उ उ उ……,कब से आवाज दे रही हूँ,जब देखो मुए मोबाइल में घुसी रहती  हो” जया की सास लगभग चिल्लाकर बोली।

“आ ई ई ई…..

मम्मीजी,ये देखिए आपके लिए मदर्स डे का उपहार।”

पुराने वाले फोन का सिम नये स्मार्ट फोन में डालकर जया ने सासू माँ को देते हुए चलाना सिखाया।

इसके बाद सासू माँ ने कभी तकिया कलाम नहीं दोहराया।

सासू माँ भी खुश,जया भी खुश।

ज्योति अग्रवाला जोरहाट, असम  पत्रिकाओं, समाचार पत्रों ,सांझा संकलन में कविताएं,लेख आदि छपे हैं।कई साहित्यिक मंचो से भी जुड़ी  हैजहाँ साहित्यिक सम्मान मिले।

गांव व्यवहार    

खालिकपुर ग्राम पंचायत का मजरा, अड़ौवा। लगभग सौ घर का पुरवा। यहां की अधिकतर आबादी लाल राशन कार्ड वाली। परधानी की शुरुआत बदरी महाराज से हुई और लगातार चलती रही। बीच-बीच में जब आरक्षित सीट आई तो उन्होंने अपने ताबेदार के जरिए गांव की नेकी खैरियत संभाली। इसी गांव के खोड़हुनू के बेटे गोजई ने बदरी महराज की चक्की में लगे एसटीडी बूथ में उस दिन शहर से संदेश दिलाया कि, ‘अम्मा तुम चिंता ना करिहो।  मालिक छुट्टी नहीं दइ रहा। पइसा जल्द ही भेजब। तीज त्यौहार का समय है सामान कपड़ा लइ लेहें। बड़न का पैंलगी छोटन का राम राम।’

और फिर अगले ही दिन गोजई की…।

पूरे गांव में मातम छा गया। जैसे तैसे क्रिया-कर्म संपन्न हुआ। विद्या पंडित ने सलाह दिया कि उत्तम-मध्यम ही सही संस्कार तो होना ही चाहिए। खोड़हुनू से बोलते ना बन रहा था वही कमासुत बेटा था। बिन पैसे के तो तेरहवीं ना होगी? किससे कहे?

बदरी परधान और महाजन ने खोड़हुनू को ढांढ़स बंधाया, यही विधि का विधान है, दुखी ना हो। तुम तैयारी करो। हम लोग के रहते कउनो चिंता नाहीं। सब लोग तुम्हारे साथ हैं। पैसे का इंतजाम हो जाएगा। महाजन ने बही निकाली और नाम दर्ज किया खोड़हुनू वल्द कोदे…।

‘सबसे डेढ़ टका ब्याज लिया जाता है तुमसे सवा टका…।’

बेटे को खो चुका बूढ़ा पिता  इस गांव व्यवहार  से कैसे उऋण होगा!

डॉ. श्यामबाबू शर्मा संप्रति भारत सरकार के एक राजभाषा सेवक हैं। राष्ट्रभाषा भूषण सम्मान से सम्मानित इनकी कुछ लघु कथाएँ पाठ्यपुस्तकों में समाहित हैं। इनके 14 से ज्यादा पुस्तकप्रकाशित है।

कैथरीन

”देख लल्ला मै तेरे लिए दो साल से चाँद सी बहू ढूंढ रही थी , पर अब तूने अपनी मर्ज़ी से शादी विदेश में कर ली चल कोई बात नहीं ,तू खुश तो हम भी खुश पर तूने तो बहू की फोटो भी नहीं भेजी अब सीधे मुंह दिखाई ही होगी । सारे मेहमान घर पर होंगे , बहू से कहना घूँघट डाल कर ही कार से उतरे । मुँह दिखाई के बाद ही पल्ला सिर से हटेगा अब इतनी रीत तो निभानी ही पड़ेगी ।’  माँ  की बातें विपिन के दिमाग में घूम रही थी । । शादी तो उसने अमेरिकन अफ्रीकन कैथरीन से कर ली पर अब अम्मा की फरमाइश पूरी करने के लिए अमेज़ाॅन से मंगाई गई रेडीमेड साड़ी में सजी जब कैथरीन के साथ वो कार से उतरा तो माँ सीता देवी तो उसका डील डौल देख कर बेहोश होते होते बची ,ऐसा विपिन ने परख लिया।

दरवाज़े पर आरती के बाद कोहबर पूजने की रस्म हुई फिर मुंह दिखाई शुरू हुई । एक एक कर मुंह देखने के बाद सभी महिलायें एक कोने में फुसफुसा कर बात कर रही थी

“हाय हाय  कोयले की खान से निकाल कर लाया है क्या ।”
“ओंठ तो ऐसे जैसे सुअरिया का मुँह ।”
 ”हथिनी लग रही है ।”
“सीता बहन जी के तो अरमानों पर बेटे ने पानी फेर दिया ।”

सभी की बातें सीता जी के कान तक भी पंहुच रही थी। अचानक से उठी बहू का घूँघट हटा दिया बोली-

 ”काली है ,मोटी है तो क्या ? यह क्यों भूल रही हो एक विदेशी लड़की मेरी खातिर साड़ी पहन कर ,सिर ढक कर इतनी देर से सारी रस्में जो उसे समझ भी नहीं आ रही होंगी पूरी कर रही है क्या कम है ?मेरा बेटा खुश है तो मैं भी खुश हूँ ।कैथरीन ,गो, चेंज योर क्लोद्ज़ । रिलेक्स इन योर रूम।”

 सीता देवी की बात सुनकर सभी महिलाओं के मुंह उतर गये और विपिन के चेहरे पर मां के लिये श्रद्धा का भाव द्विगुणित हो गया था ।

मंजु श्रीवास्तव’मन’ संप्रति भारत सरकार के राजभाषा सेवी है। आलोचना और लघुकथा संग्रह सहित १४ पुस्तकें प्रकाशित, कतिपय यंत्रस्थ। अर्द्धशताधिक लघुकथाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित, कुछ पाठ्यक्रम में समाविष्ट। २०२१ का राष्ट्र भाषा भूषण सम्मान से सम्मानित।

कर्नल साहब

नीता शर्मा

आज माँ को सिधारे पंद्रह दिन हो गए। सब नाते रिश्तेदार जा चुके थे। घर में कर्नल साहब तथा बेटा बहु और बेटी रह गए थे। रिटायर्ड कर्नल थे वो। रुतबे के मुताबिक ही खूब रौबदार और निहायत ही सख़्त किस्म के फौजी थे। रिटायर हुए लगभग दो वर्ष हो गए थे पर क्या मजाल किसीकी की घर को छावनी से बदलकर घर में परिवर्तित किया जा सके। आज भी पूर्णतया फौज के अनुशासन वाला कड़ा कानून ही चलता था घर में। माँ बेचारी ने जाने कैसे सारी उम्र काट दी एक फौजी का हुक्म सहते सहते। सारा परिवार अपने अफसर के आगे सदैव “यस सर” की मुद्रा में ही दिखाई देता।

कभी भी माँ से एक पति की तरह बात करते या हँसते-बोलते नहीं देखा था उनको। माँ भी तो बिना किसी शिकवा-शिकायत के, एक आदर्श भारतीय नारी के समान उनकी सेवा में रत रहती दिन रात। बस एक ही शौक बचा था माँ को, रेडियो पर फिल्मी गाने सुनने का। एक छोटा-सा ट्रांजिस्टर छुपा कर रखती थी अपने पास। जब भी समय मिलता अक्सर माँ गाने लगा कर साथ में गुनगुनाती थी। मगर पिताजी की गैर हाजिरी में ही ये संभव हो पाता। कर्नल साहब जानते थे माँ के इस शौक को पर क्या मजाल की कभी साथ मिलकर आनंद ले लेते। पिछले पंद्रह दिनों में बेशक मायूसी दिखी थी कर्नल साहब के चेहरे पर, लेकिन आँखों से एक बूंद ऑंसू बहते न दिखा किसीको।इतना भी क्या सख्त होना की जिस औरत ने सारी उम्र दे दी उनके घर परिवार को, उसके जाने का भी गम नहीं। सभी रिश्तेदार भी आपस में कानाफूसी करते दिखे।

“अजीब ही कड़क इंसान हैं ये! अरे इतना भी क्या सख़्त होना कि सावित्री जैसी पत्नी पर भी दो बूँद ऑंसू नहीं दिखे इनकी आँखों में। ”
“अरे कितने सख्त दिल हैं अपने कर्नल साहब। मजाल है जो एक ऑंसू भी निकला हो आँख से।”बेटा, बेटी को पिता की आदत पता थी पर इतने संगदिल होंगे उन्होंने भी सोचा न था। माँ के जाने से ज्यादा पिता के इस रूप को देखकर दिल व्यथित था दोनों का। एक बार भी पिता ने माँ की किसी बात का ज़िक्र तक नहीं किया। बिल्कुल चुप्पी साध ली थी। हमेशा की तरह काम की या कोई जरूरी बात ही की थी इतने दिन से।
आज भी रोजमर्रा की तरह रात को ठीक 8 बजे खाना खाकर आधा घंटा बाहर लॉन में टहलने के बाद ठीक नौ बजे अपने कमरे में चले गए थे कर्नल साहब।
सुबह ठीक 6 बजे उठ जाते थे और माँ हाथ में चाय का कप लिए खड़ी होती थी। चाय पीकर सुबह की सैर को निकल जाया करते थे। बीते पंद्रह दिन से भी यही दिनचर्या की शुरुआत थी उनकी। फर्क बस इतना था कि चाय अब बेटी बनाकर तैयार कर देती है। आज भी चाय का कप लेकर पापा को देने कमरे में चली गई। दरवाजे से झाँका तो स्तब्ध हो गई। अरे ये क्या? पापा और माँ का ट्रांजिस्टर! अपनी आँखों पर यकीन न हुआ ये देखकर कि कर्नल साहब आराम कुर्सी पर माँ का ट्रांजिस्टर गोद में रखे आंखे मूंदे कुछ सुन रहे थे। क्या ये कर्नल साहब ही हैं, उसके रौबीले पिता। बुत बनी देखती रही। आँखों में पानी भर आया और दरवाजा खटखटा सीधे अंदर घुस गई।
“पापा आपकी चाय?”
पर ये क्या? किसको पुकार रही थी वो। एक निर्जीव शरीर पड़ा था वहां तो। सख़्त दिल पापा तो माँ के पास जा चुके थे
नीता शर्मा, लेखिका, आकाशवाणी की पूर्वोत्तर सेवा में हिंदी उद्घोषिका।

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रोटी

सीमा सिंह ‘स्वस्तिका’

माँ, आज नाश्ते में क्या बना है?
-पूछ तो ऐसे रहा है जैसे नवाब का नाती है।
-फिर भी बोलना न माँ, नाश्ते में क्या है?
-मुरमुरे।
-माँ, आज भी वह नमक वाली रोटी दे ना?
-नहीं, वो रोटी सुरेश के लिए है। तूने तो कल ही खाई थी ना।
आज तू मुरमुरे खा लेना।
-पर माँ, तू क्या खाएगी?
-मैं मालकिन के यहां सुबह का चाय पी लूंगी।
-चलती हूँ। कहकर गंगूबाई कांधे पर
झोला लेकर काम पर निकल गई।
सीमा सिंह: प्रतिष्ठित लेखिका एवं अध्यापिका।

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लघुकथाएँ

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वास्तुशास्त्र

डॉ श्यामबाबू शर्मा

प्लाट की रजिस्ट्री करवा कर राजीव ने तुरंत ही प्लाट की बांउन्ड्री कराना उचित समझा। अनुभवी लोगों ने मशविरा दिया कि नक्शा बनवाकर बाउन्ड्री कराने से डबल खर्च नहीं होगा। राजीव हर काम को चुस्त दुरुस्त करने के हिमायती। पश्चिम मुखी घर में किस दिशा में कौन-कौन से कमरे रहेंगे इसकी वास्तुशास्त्री से पूरी तफ्सीस की।
बिल्कुल उत्तर पश्चिम में बैठक कक्ष। आग्नेय कोण में अन्नपूर्णा वास। पानी का निकास वायव्य दिशा में। बच्चों का कमरा दक्षिण पश्चिम की ओर। टेबल चेयर की दिशा पूरब को। वंदना की जिद अटैच पर थी परंतु इस आधुनिक संस्कृति में वास्तु दोष के कारण वंदना रुक गई। जल स्रोत मल निस्तारण के स्थान इंगित किए गए। बेड रूम की दिशा भी। श्लील अश्लील अब ग्रंथों के शब्द हैं! पूजा घर देवस्थान के लिए ईशान कोण

भूमि पूजन, आहुतियां और प्रसाद वितरण। पंडित श्रीधर ने दक्षिणा ली और बगल में खड़े जजमान सुख नंदन की ओर निहारते राजीव से पूछा ‘भैकरा का कमरा?’
. . . जीजी जी बाबू जी बैठक कमरे में. . वंदना ने स्वर विस्तारित कर संपूर्ति की ‘हां हां पंडित जी यह बैठक कमरा है ना!
डॉ श्यामबाबू शर्मा संप्रति भारत सरकार के राजभाषा सेवी है। आलोचना और लघुकथा संग्रह सहित १४ पुस्तकें प्रकाशित, कतिपय यंत्रस्थ। अर्द्धशताधिक लघुकथाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित, कुछ पाठ्यक्रम में समाविष्ट। २०२१ का राष्ट्र भाषा भूषण सम्मान।

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लघुकथाएँ

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फन्ने खान और दीनदयाल

रुनू बरुवा ‘रागिनी तेजस्वी’

फन्ने खान अपने जमाने का बड़ा ही होनहार तबलावादक था। रिकार्डिंग स्टूडियों में हमेशा उसकी मौजूदगी रहती थी। शायद सफलता का नशा था जो सर चढ़कर बोलने लगा था। बचपन की साथी नजमा जिसे कभी दिलोजान से प्यार करता था और शादी के सपने देखा करता था, अब उससे मिलने या बात करने की भी उसे जरुरत महसूस नहींं होती थी। शराब और शराबी दोस्त ही उसकी ज़िंदगी बन चुके थे। जैसा की ऐसी स्थिति में होता है, उसके साथ भी हुआ। बदतमीजी और शराब की लत की वजह से उसे काम मिलना बंद हो गया। दोस्तों और अपनों से आए दिन लड़ाई -झगड़ा होने लगा। उसके पैसे भी खत्म होने लगे। ऐसी हालत में एक दिन शराब के नशे में उसका एक्सीडेंट हो गया और उसे अपने दोनों पैरों से हाथ धोना पड़ा। दुनिया में अब उसका कोई नहींं था। खाने के लाले पड़ने लगे। तभी उसके जीवन में दीनदयाल आया जो एक लंगड़ा था और उम्र के इस पड़ाव पर अकेले जीवन का बोझ ढो रहा था। लोग बाग आते-जाते उसे कुछ न कुछ देते थे। दीनदयाल ने एक दिन फन्ने खान को दिनभर से भूखे पेट घिसटते देखा। दीनदयाल खाने बैठा ही था, तभी फन्ने को देखकर वह उठा और अपने पास से कुछ पैसे फन्ने को दे डाला। फन्ने खान का चेहरा आँसू से भीग गया। दीनदयाल ने उसे अपने हिस्से का खाना दिया और उसकी कहानी भी सुनी। दीनदयाल को बाँसुरी बजाने का शौक हुआ करता था। उसने अपने बचाए रुपयों से तबला और बाँसुरी खरीद ली। अब दोनों की जोड़ी जहाँ भी बजाने बैठती, लोगों का जमघट हो जाता। धीरे-धीरे दोनों के पास पैसा भी आने लगा। हालत भी सुधरने लगी। अब दोनों मंदिर में भजन गाने वाली टोली के सदस्य हो गए थे। दीनदयाल को जयपुरी पैर लग गए थे और फन्ने खान को ह्वील चेयर। हालांकि फन्ने खान मुस्लिम था मगर वह कहता था कि अगर बिस्मिल्लाह खान मंदिर में बजा सकते थे तो मैं क्यों नहींं! वह शिव भक्त थे और मैं दीनदयाल का!
डाॅ. (मा) रुनू बरुवा “रागिनी तेजस्वी” अखिल भारतीय साहित्यकार सम्मान, साहित्य रत्न सम्मान, साहित्य श्री सम्मान , साहित्य गौरव सम्मान, मात्सुओ ‘बासो’ सम्मान, सरस्वती सम्मान आदि से सम्मानित डिब्रूगढ़ की प्रतिष्ठित साहित्यकारों हैं।

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500 रुपए का एक नोट

मेघा पी यादव

मैं 500 रुपए का एक नोट हूँ। मुझे ये याद नहींं की मेरा जन्म कहां और कैसे हुआ था। छोटे से बक्से में मुझे मेरे जैसे कुछ पैसे मिले थे। उनकी शक्ल बिल्कुल मेरे जैसी ही थी। हम बहुत दिनों तक एक साथ रहते थे। एक दिन अचानक से उस बक्से में बहुत रोशनी आ पड़ी और किसी ने मुझे वहाँ से निकल लिया फिर मैं जा पहुँचा किसी व्यक्ति की जेब में। दुःख बहुत था उन पैसों से जुदा होने का लेकिन नई जगह घूमने का उत्साह मुझे बहुत खुशी दे रहा था। फिर मैं उसके साथ बहुत जगह गया। कभी-कभार मैं अपना सर थोड़ा सा बाहर निकाल कर देखने की कोशिश भी कर रहा था। फिर मैं जा पहुंचा किसी अजीब से जगह में जहां पर मुझे कुछ नए दोस्त मिले। एक का नाम 2 रुपए था एक का 5 और एक का 1000 था और बाकी को मैं नहींं जानता था। मैंने उन लोगो के साथ बहुत वक्त बिताया। कुछ पैसे आते रहे और कुछ पैसे जाते रहे मेरे इस सफर में। हमेशा मानों मेरे मन में एक डर रहता था की कब मुझे भी इस परिवार से जुदा कर दिया जाएगा। एक दिन मुझे वहाँ से निकाल कर एक छोटे से बच्चे के हाथ में दे दिया गया। उस बच्चे ने मुझे बहुत प्यार से अपनी गुल्लक में पनाह दी। वहाँ पर मुझे बहुत सारे अच्छे पैसे मिले जो हमेशा खिलखिलाते रहते थे। हर सुबह वो बच्चा उस गुल्लक को बहुत जोर से हिलाया करता था और हम सब पैसे उस गुल्लक के अंदर लोट – पोट के हँसा करते थे। एक दिन अचानक से पैसों की दुनिया में जहाँ मैं बेखौफ घूम रहा था और सबके पास एक खबर पहुंची थी की सारे 500 और 1000 के नोट को मार दिया जाएगा। सब पैसे आ कर मुझे दिलासा दे रहे थे लेकिन जो डर मेरे अंदर था मैं उसको काबू नहीं कर पा रहा था। बहुत देर तक मैं इस इंतजार में था कि आज रोशनी इस गुल्लक के अंदर न आए। बहुत सारी चीखें 500 और 1000 के नोट के मुझे सुनाई दे रहे थे और इसके कारण मेरे अंदर का डर बढ़ रहा था। न चाहते हुए भी अचानक से इस गुल्लक में रोशनी आई। बच्चे ने अपने प्यार भरे हाथों—से मुझे बाहर निकाला। उसने पहली बार मुझे कसके गले लगाया और मुझसे बाते भी कर रहा था। उसने मुझसे कुछ ऐसा कहा जो शायद मैं ज़िंदगी में कभी ना भूल पाऊंगा। उसने ये कहा कि “तुम मेरी ज़िंदगी के सबसे कीमती तोहफे हो। पापा ने मुझे तुम्हे तब दिया था, जब मैं क्लास में प्रथम आया था। तुम चुपचाप इस गुल्लक में ही रहना क्योंकि तुम्हारी कीमत 500 से कहीं ज्यादा है और तुम अनमोल हो मेरे लिए।”

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