उम्मीद की किरण कुमुद शर्मा

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नमिता थकी हारी घर पहुँची…दोपहर का समय था सो खाना परोसने सीधे किचन में चली गई।
“आज फिर धमाल चौकड़ी कर आई…”नमिता की सास ने कहा।
नमिता ने कोई जवाब नहीं दिया…क्योंकि वे दोनों एक दूसरे की अपेक्षाओं पर कभी खरी नहीं उतरी…काम खत्म कर बॉलकनी में आ बैठ गई…हताश हो सोचने लगी आज भी नौकरी नहीं मिली…खर्च कैसे चलेगा…एक्सीडेंट के बाद अमित की नौकरी भी जा चुकी है…इलाज भी चल रहा है।
तभी उसकी नजर छज्जे पर पड़ी…चिड़िया चूजों के मुंह में दाने डाल रही थी…उसे याद आया…”कुछ दिनों पहले ही मैंने इसे घोंसला बनाते देखा था”…नमिता के हौसलों को भी उम्मीद की किरण मिल गई।
कुमुद शर्मा

कुमुद शर्मा: मॉम्सप्रेस्सो, हिंदी प्रतिलिपी, आदि लेखक मंचो की ब्लॉगर वनिता, गृहलक्ष्मी आदि कई पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, रचनाएँ प्रकाशित।

सौतेला

डॉ अन्नपूर्णा बाजपेयी, ‘अंजू’, कानपुर
साहित्यकार, ब्लॉगर, समाज सेविका, योगा ट्रेनर।


“रे! कलुआ, जरा इधर तो आ! “खटिया पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ करते हुए कलुआ के बापू ने जोर से पुकारा।
कलुआ खेल में मग्न था सुना नहीं।
“जरा जोर से बुलाइयो, खेल रहा है छोरा न सुनैगो!”अपने सिर के पल्लू को सँवारती हुई माई उधर ही आ बैठी।
“इतनी देर से पुकार रहा हूँ सुनता ही न है पाजी कहीं का!” झुंझलाते हुए बापू बोला।
“बालक ने दिनभर खेलते रहना अच्छा न है गोलू के बापू! इसको जरा कस के रखियो!”और घी गुड़ रोटी पर चुपड़ कर दूसरे पुत्र गोलू को खिलाने लगी।
उसने प्रेम से पुकारा, “कल्लू जरा सुन तो!”
“हाँ माई!” कल्लू लपकता हुआ आ पहुंचा। और ललचाई नजरों से घी गुड़ लगी रोटी खाते हुए छोटे भाई का मुँह ताकने लगा।
“सुन मैं तुझे पाठशाला भेजना चाहवे हूँ तू जावेगा न, जैसे गोलू जावे है!” माई बोली।
“हाँ माई!”कहते हुए वह खुशी से उछल पड़ा फिर कुछ सोचता हुआ बोला, “माई तू मन्ने सच्ची में पढ़ने भेजेगी।” “हाँ रे! छोरा!” तू काहे पूछे है माई बोली।
“बगल वाली चाची कह रही थी कि इसको कौन पढावेगा ये तो सौतेला है! इसकी माई अपने बालक ने पढावेगी और अफसर बनावेगी!” भोलेपन से बोला कल्लू।
“इसीलिए तो तुझे जरूर पढ़ाना चाहूँ हूँ, तू तो मेरा कान्हा है सौतेला नहीं, जैसे कान्हा जी की दो-दो माई थी वैसे ही तेरी भी दो दो माई।” मुस्कुराते हुए माई ने उसके गाल पर एक प्यार भरी चपत लगाई।
“तो माई तूने घी गुड़ की रोटी मन्ने क्यों न दी!“ भोलेपन में बोल गया कल्लू और उसके माँ बाप एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।

पंकजा


नीता शर्मा, लेखिका, आकाशवाणी की पूर्वोत्तर सेवा में हिदी उद्घोषिका।


कचरे के ढेर में पड़ी हुई वो मासूम धीरे धीरे सिसक रही थी और आस पास खड़े कु त्तेज़ोर – ज़ोर से भौक रहे थे। राह से गुजरते एक बच्चे की नजर पड़ गई उसपर। उसने लपककर उठा लिया और सीने से चिपका लिया उसको जैसे कोई जिदा खिलौना मिल गया हो खेलने के लिए। भागता हुआ घर ले आया।
“माँ, माँ देखो कितनी प्यारी परी मिली मुझे कचरे के ढेर में।
“परी, कचरे में ? हँसकर मां उसकी बात को सुनी अनसुनी करते हुए बोली। उसे लगा फिर कोई टूटा – फू टा खिलौना मिल गया होगा बेटे को।
“हाँ माँ, देखो कितनी प्यारी है। पर देखो आँखो से ऑं सू निकल रहे हैं। शायद भूख लगी होगी।”
अब माँ चौकी औं र पलटकर देखा। क्या सच में एक बच्ची है और वह भी जिदा ? कुछ दो – चा र दिन की रही होगी। एकदम मासूम सहमा – सा चेहरा, न कोई ईर्ष्या न द्वेष, शांत बिल्कुल शांत। आंसू आंखो की पो रो के पास सूख चुके थे। धीरे से आंख खोलती बं द करती। उसकी ममता चीत्कार उठी। क्या पता था बेचारी कै से क्रूर और वासना के अंधे जगत में आ गई थी लड़की बनकर।
उसका पाँच वर्ष का बेटा था जो इसी तरह कु छ साल पहले ही कचरा बीनते मिला था। दोनो माँ- बेटा पेट की आग बुझाने की खातिर दिन भर घूम घूमकर गली मोहल्लों में कच ल्लों रा बीनते। यदा कदा कोई टूटा फू टा खिलौना, गाड़ी या गेंद आदि मिल जाता कचरे के ढ़ेर से तो चेहरा कै से खिल जाता था खुशी से बच्चे का। और आज जब बेटा उसी कचरे से अनमोल हीरा बीन लाया तो उसका चेहरा भी खिल गया था खुशी से। दोनो हाथ जोड़क र ऊपरवाले को कृ तज्ञता से बोली, “कु छ के लिए कचरा और हम जैसो के लिए खजाना! कितना दयालु है तू प्रभु! जिसको पति और समाज ने बांझ कहकर ठुकरा दिया था उसकी झोली तूने एक बार फिर इतने बड़ेखजाने से भर दी और उसकी आंखो से झ र झर ऑं सू बहने लगे। बच्ची के माथे को चूमकरबुदबुदायी-पंकजा।

शेरू का निर्णय

कीर्ति श्रीवास्तव, भोपाल
बाल साहित्यकारा, कवियत्री, संम्पादिका ‘साहित्य समीर दस्तक”, सरकारी एवं प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित एवं पुरस्कृत, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन मध्यप्रदेश से रचनाओं का प्रसारण। 7 पुस्तकें प्रकाशित एवं राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशन।
Suravy Mukherjee


शेरू शेर का आतंक उसके ही नहीं अपितु आस-पास के सभी जंगलों में फैला हुआ था। सभी जंगलों के जानवर शेरू के नाम से ही थर-थर कांपते थे। वो रोज शिकार के लिए निकलता था। किसी को अंदाजा ही नहीं रहता था कि वो कब किस जंगल में आ जाये शिकार करने के लिए। इस कारण सभी जानवर अपने-अपने घरों में दुबके रहते थे। वह दूसरे जंगल के जानवरों के साथ स्वयं के जंगल के जानवरों का भी शिकार करने से नहीं कतराता था।
सभी जानवर डरते-डरते अपने भोजन की व्यवस्था के लिए बाहर निकलते थे। वो लोग कितनी भी सावधानी बरतें फिर भी कोई न कोई जानवर शेरू के हत्थे चढ़ ही जाता था। किंतु उसके जंगल के जानवरों को उसके शिकार पर जाने का समय पता था तो वे उस समय बाहर नहीं निकलते थे। बारी-बारी सभी ये देखते रहते थे कि शेरू कब बाहर गया तभी सभी अपने भोजन की तलाश में निकलते थे।
एक बार शेरू पास के जंगल मे शिकार के लिए निकला। उस दिन उसे कोई शिकार नहीं मिला। वह बहुत गुस्से में आ गया। गुस्से में वह दूसरे से तीसरे और तीसरे से चौथे जंगल की ओर चल पड़ा। वह इतने गुस्से में था कि उसे पता ही चला कि वो किस ओर चल दिया है। आगे के जंगल पहुँचते-पहुँचते उसे रात हो चुकी थी। अंधेरे में उसका पेर रास्ते मे पड़ी एक कुल्हाड़ी पर पड़ गया और उसे चोट लग गई। खून भी बहने लगा था और वो हड़बड़ाहट में रास्ता भटक गया।
वह अपने जंगल के साथ दूसरे कई जंगलों की सीमा पार आ गया था। जब उसे इस बात का एहसास हुआ तो वह डर गया। उसकी चोट से खून बराबर बह रहा था और चोट में दर्द भी हो रहा था। थोड़ी दूर लडख़ड़ाते हुए वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया।
तभी उसने देखा कि कुछ लोग उसकी ही तरफ आ रहे हैं। उसे लगा अब तो मैं दर्द के कारण भाग भी नहीं पाऊँगा ये लोग मुझे मार डालेंगे। मेरी खाल बेचकर पैसा कमाएंगे। दर्द के कारण वह कराह भी रहा था। उसकी आवाज सुनकर लोग उस तरफ बढ़ चले।
शेर को देखकर कुछ लोग घबरा गए। किंतु कुछ लोगों ने उसका बहता खून देख लिया था।
‘अरे इसे तो चोट लगी है। खून भी बह रहा है। हमें इसका इलाज करना चाहिये।’
‘पागल हो क्या! ये तो हमे ही खा जाएगा।’
‘पर इसे इस तरह छोड़ भी तो नहीं सकते। दया, भावना नाम की भी तो कोई चीज होती है।’
‘नहीं-नहीं, हम खतरा नहीं ले सकते। चलो, हम तो चलते हैं।’
वे लोग आपस में बात कर रहे थे। तभी उनमें से एक समझदार बुजुर्ग ने कहा कि – ‘हम पहले इसके ऊपर पिंजरें में कैद कर देते हैं फिर इसके पैर का इलाज करेंगे। और पिंजरा खुला छोडक़र चले जायेंगे। जब ये ठीक होगा अपने आप अपने जंगल की ओर चला जायेगा।’
‘इस बात का क्या भरोसा कि वो जंगल की ओर ही जाएगा। वो हमारे गाँव की ओर भी तो आ सकता है।’ किसी ने पीछे से कपकपाती आवाज में कहा।
‘डरो नहीं, भगवान सच्ची सेवा करने वाले को नुकसान नहीं पहुँचाते।’ उन बुजुर्ग दादा ने कहा।
उन बुजुर्ग की सलाह सबको अच्छी लगी। उनमें से कुछ लोग जल्दी ही पास के गाँव से पिंजरा ले आये और कुछ दवाई का इंतजाम करने लगे। शेरू सबकी बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था और उन्हें देख भी रहा था।
गाँव वालों ने जैसे-तैसे डरते हुए शेरू को पिंजरे में कैद किया। उसके बाद उसके पैर की मलहम-पट्टी की और पिंजरा खुला छोडक़र चले गए।
शेरू ने जब गावँ वालों की सेवा भावना देखी तो खुद पर बड़ी ग्लानि महसूस हुई। वह सोचने लगा कि – ‘मैं तो राजा हूँ फिर भी अपने ही जंगल के लोगों की रक्षा नहीं करता। सभी मुझसे डरे रहते हैं। मैं सिर्फ अपनी ही सोचता हूँ जंगल के विकास के बारे में नहीं सोचता। वो जो मेरी एक दहाड़ भरे आदेश पर ही आ जाते हैं। ये गाँव वाले तो मेरे हैं भी नहीं, फिर भी इन्होंने मुझे बचाया मेरा इलाज किया। मैं इन्हें खा भी सकता था इससे भी वह नहीं डरे और मानव धर्म का पालन किया।’
उसी समय शेरू शेर ने निर्णय लिया कि अब वह अपने जंगल के जानवरों की रक्षा करेगा। उनकी जरूरतों का ध्यान रखेगा।
सुबह हो चुकी थी। उसके पैर का दर्द भी कम हो गया था। वह पिंजरे से बाहर आया और खुशी-खुशी जंगल पहुँचकर सबसे पहले उसने ढोल बजाकर ये एलान कर दिया कि ‘आज से उसके जंगल के सभी जानवरों की रक्षा करना उसका कर्तव्य है। कोई भी उससे डरे नहीं। अब वह अपनी सीमा में रहने वाले जानवरों को नहीं खायेगा।’ उसने रात का किस्सा भी सभी को सुनाया।
ये सुन सभी जानवर बहुत खुश हुए और उन गाँव वालों को बहुत दुआएं देने लगे।