Ka Jingshai
RKMSHILLONG
Search:
Poesy - कवितायन

कठपुतली

Dr.Rachna Nigam   |   ISSUE VI

कठपुतली सा नाच रहा
मानुष तेरा तन
कभी नचाये ऊपरवाला
कभी नचाये मन
हाड़ मांस के पिंजरे में
रहती रूह निसंग
जब बुलावा आये उसका
छोड़ जाये ये तन
बंद मुठ्ठी में लाये किस्मत
खोल पिटारा कर्म गठरिया
बने राजा, कभी रंक
उस जादूगर ने भेजा सबको
करके साँसों का अनुबंध
खेल हो जाये पूरा
कर दे साँसें बंद
उम्र भर जो जोड़ी दौलत
करके अनेक जतन
कभी कमाई मेहनत से
कभी दुखा कर मन
आसमान में ऊपर बैठा
वह देख रहा साँसों का नर्तन
एक इशारे पर उसके
रूह छोड़ जाये ये तन
दिए कई किरदार जगत के
रंगमंच पर निभाने को
कभी बने सफल अभिनेता
कभी चूक जाये ये मन
उस मायावी की नगरी में
हम चंद दिनों के मेहमान बने
कब चुक जाये उसकी झोली
कर दे साँसें बंद
रिश्ते-नाते, सगे-सम्बन्धी
हैं कुछ समय का रेला-मेला
आये जब बुलावा उसका नहीं जाये कोई संगी तेरा।


author
Dr.Rachna Nigam