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लघुकथा

बिंदी

Vidya Singh   |   ISSUE VIII

पति की मृत्यु के बाद भारती आज पहली बार नौकरी पर जा रही थी। एक महीने का अवकाश लिया था और कितना लेती! नौकरी पर तो जाना ही था। उसने एक क्रीम कलर की साड़ी निकाली, पैरों पर ध्यान गया, बिछिया और नेल पॉलिश बिना पैर बहुत सूने लग रहे थे। उसने हल्के रंग की नेल पॉलिश पैरों के नाखूनों पर लगा दी, मैचिंग चूड़ियाँ निकाली किंतु उन्हें पहनने का दिल नहीं किया। एक हाथ में दो सोने की चूड़ी, एक हाथ में घड़ी ठीक है; कांच की चूड़ियों के बिना भी हाथ इतने बुरे नहीं लग रहे हैं। उसने हल्के रंग की लिपस्टिक भी लगा ली। अब उसके सामने असली समस्या बिंदी की थी। पति के रहते वह बहुत बड़ी बिंदी लगाती थी। बिना बिंदी के वह अपना चेहरा स्वयं नहीं देख पाती किंतु लोग क्या कहेंगे, यह सोच कर हाथ में बिंदी का पत्ता लिए  समझ नहीं पा रही थी कि बिंदी लगाए अथवा नहीं । एक बार उसने माथे पर बिंदी लगा ली किंतु अगले ही पल उसे बिंदी  के पत्ते में चिपका दिया।

      तभी उसे पति की तेरहवीं की घटना याद आई। उसके मायके से साड़ी के साथ- साथ रस्म के मुताबिक श्रृंगार का सामान भी आया था। पंडित जी के साथ जेठ जी बैठे सामान देख रहे थे। बिंदी देखते ही वह बिदक गए,"मर्यादा भी निभानी पड़ती है, बिंदी हटा दो इसमें से।" उन्होंने बेटी से कहा लेकिन बेटी अड़ गई थी।

" मेरी माँ बाहर जाती है; ज़रूरी नहीं है कि वह मनहूस शक्ल लेकर जाए। जमाना अब पहले वाला नहीं है ताऊ जी। माँ बिंदी लगाएगी।" और भारती ने हाथ में देर से पकड़े हुए पत्ते से बिंदी‌ निकाली और माथे पर लगा ली।


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Vidya Singh