हृदय के अनगढ़ अंचल में
अनाम नदियों का कलकल निनाद
उठता रहता है निरंतर।
झूठ है कि नदियाँ कभी रुकती नहीं
कहीं विश्राम नहीं लेतीं।
वे अमर हैं भीतर
बह रही हैं अंग-अंग में
घुल-मिल गयी हैं रक्त के साथ-साथ।
हर बेजुबान की तरह
नदियों की भाषा होती है
हवाओं, दिशाओं और मिट्टी पर लिखी हुई
नदी बतियाती है
जड़ों से,हरियाली से
सन्नाटों से,अपने तटों से भी
जो डुबकी लगाया,उसके रोम-रोम से
जो नहीं लगाया,उससे भी।
नदी सिर्फ नदी नहीं
नि:शब्द। कल्पना की धारा है
अनगिनत हृदयों का अश्रुपाठ
पक्षियों के कलरव का कारण
रोम-रोम समर्पण का संगीत है।
नदी को छू लेना
जमीन पर बहते हुए
पृथ्वी के ऑंसू पी लेना है।
नदी में उतरना
अपने ही वजूद के
उस पार उतर जाना है।।