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Poesy - कवितायन

है एक मात्र अभिलाषा

डॉ ममता बनर्जी   |   ISSUE IX

माँ, मुझे मातृभाषा में ही, पढ़ना अच्छा लगता है।
तेरा हाथ थाम के आगे, बढ़ना अच्छा लगता है।
मुझे सिखाते रहो निरंतर, निज समृद्ध मातृभाषा।
है एक मात्र अभिलाषा।
जिस भाषा को समझ सकूँ मैं, बोल सकूँ आसानी से।
जिस भाषा पर कहानियाँ मैं, सतत सुना हूँ नानी से।
लोरी जिस भाषा पे तुमने, मुझे सुनाया करती थी।
जिस भाषा से दुलराकर, मुझे अंक में भरती थी।
उसी मधुर भाषा में मुझको, पढ़ने का अवसर दे दो।
निज भाषा की पाठ्य-पुस्तकें , चाहे तुम जितनी ले दो।
पाठ पढँूगा अंतर्मन से, करता हूँ तमु से वादा।
जितना अंक आज लाता हूँ, लाऊँगा उससे ज्यादा।
निज भाषा से भर दूंगा मैं, नित शब्दों का मंजूषा।
है एक मात्र अभिलाषा।
स्वागत योग्य वही भाषा है, जो कठिन न लगती हो।
जो भाषा पढ़ने से मन में, ज्योति प्रेम की जगती हो।
जो भाषा व्यवहार मात्र से, भाव जगे मन में भारी।
जिस भाषा पे अपना जीवन, यँ ू हो जा…


author
डॉ ममता बनर्जी