मिजोरम एक लघु पर्वतीय प्रदेश है। ‘मिजो’ का शाब्दिक अर्थ पर्वतवासी है। यह शब्द ‘मि’, ‘जो’ और ‘रम’ के संयोग से बना है। ‘मि’ का अर्थ ‘लोग’, ‘जो’ का अर्थ ‘पर्वत’ तथा ‘रम’ का अर्थ ‘भूमि’ अर्थात मिजोरम पर्वतीय लोगों के रहने की भूमि है। दूसरी मान्यता के अनुसार ‘मिजोरम’ शब्द ‘मिज़ो’ और ‘रम’ के संयोग से बना है। ‘मिज़ो’ का अर्थ ‘मिजो समुदाय’ और ‘रम’ का अर्थ ‘भूमि’ है। इस प्रकार ‘मिजोरम’ का अर्थ ‘मिज़ो लोगों की भूमि’ है। मिजोरम उत्तर–पूर्वी भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य है। इसके पश्चिम में बंगलादेश और त्रिपुरा तथा पूरब एवं दक्षिण में म्यांमार है। इसके उत्तर में मणिपुर और असम का कछार जिला स्थित है। सामरिक दृष्टि से इस प्रदेश का विशिष्ट महत्व है क्योंकि लगभग 650 मील की अंतर्राष्ट्रीय सीमा म्यांमार एवं बंगलादेश को स्पर्श करती है। इस क्षेत्र को पहले लुशाई हिल्स के नाम से जानते थे। बाद में लुशाई हिल्स का नाम परिवर्तित कर इसे मिज़ो हिल्स नाम दिया गया। वर्ष 1972 तक यह असम राज्य का अंग था। 21 जनवरी 1972 को इसे केन्द्रशासित प्रदेश घोषित किया गया। 20 फ़रवरी 1987 को मिजोरम को भारत का 24वां राज्य बनाया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ब्रिटिश मिशनरियों ने मिजोरम में ईसाई धर्म का प्रसार किया। राज्य की प्रमुख भाषाएँ मिज़ो, जाहू, लखेर, मार, पाइते, लाई, राल्ते इत्यादि हैं। मिजोरम की राजभाषा मिज़ो है। मिज़ो भाषा चीनी-तिब्बती परिवार की भाषा है। यह मिज़ोरम और म्यांमार के चीन हिल्स राज्य में बोली जाती है। इसे दुहलियन भाषा के नाम से भी जानते हैं। मिज़ो भाषा मुख्य रूप से लुसेई बोली पर आधारित है, लेकिन इस भाषा में मिजोरम के अन्य आदिवासी समूहों की बोलियों के शब्द भी घुलमिल गए हैं। मिज़ो के अतिरिक्त मिजोरम में बंगला, हिंदी और अंग्रेजी भी बोली जाती है। शिक्षा के क्षेत्र में यहाँ त्रिभाषा सूत्र लागू है। कक्षा एक से सातवीं तक की शिक्षा सामान्यतः मिज़ो भाषा में दी जाती है।
मिजोरम में राल्ते, पाइते, बाइते, चकमा, मार, लुसेई, पंग, रियांग, हुलंगो, मघ, पवी, थडाऊ इत्यादि समुदाय के लोग रहते हैं। चकमा, मघ और रियांग समुदाय की जीवन शैली मिजोरम के अन्य समुदायों से थोड़ी भिन्न है। सभी जनजातियों के पास अपनी भाषा है, लेकिन कोई लिपि नहीं है। मिशनरी के प्रभाव से सभी भाषाओँ के लिए रोमन लिपि का प्रयोग होता है। ये भाषाएँ तिब्बती-चीनी परिवार की भाषाएँ हैं। कुछ समुदायों के लोग तो पूर्णतः अपनी मातृभाषा भूल चुके हैं और वे दुहलियन (मिज़ो) भाषा बोलते हैं। लुसेई समुदाय की भाषा दुहलियन मिजोरम की संपर्क भाषा बन चुकी है। अंग्रेजों के आने के बाद लुशाई हिल्स में अनेक बदलाव आए। सर्वप्रथम 1894 में यहाँ ईसाई धर्म का प्रवेश हुआ और धीरे–धीरे ईसाई धर्म ने इस क्षेत्र के पारंपरिक धर्म जड़ात्मवाद अथवा प्रकृतिपूजा का स्थान ले लिया। वर्ष 1947 तक अधिकांश लोगों ने ईसाई धर्म को अंगीकार कर लिया था। जे.एच.लोरेन और एफ.डब्लू.सावीज ने सर्वप्रथम इस क्षेत्र को ईसाई धर्म से परिचित कराया। 13 जनवरी 1894 को सर्वप्रथम आइजोल में दो ईसाई मिशनरी का आगमन हुआ। ईसाई मिशनरी के प्रचारक जे. एच.लोरेन और एफ.डब्लू.सावीज ने पहले मिजो भाषा सीखी और तब बाइबल का मिज़ो में अनुवाद किया। इनके निरंतर प्रयास के बाद 1899 में मिजोरम के दो व्यक्तियों ने ईसाई धर्म को स्वीकार कर लिया। लंदन बैप्टिस्ट मिशनरी सोसायटी ने दक्षिणी मिजोरम में अपनी गतिविधियाँ शुरू की। आरंभ में मिज़ो लोग और उनके चीफ ईसाई धर्म के खिलाफ थे। वे ईसाई मिशनरियों का उपहास उड़ाते थे, लेकिन धारी-धीरे ईसाई धर्म प्रचारकों ने उन पर विजय प्राप्त कर ली। वर्तमान में कुल जनसंख्या के 83 प्रतिशत लोगों ने ईसाई धर्म को अपना लिया है। पहले सभी मिज़ो प्रकृतिपूजक अथवा जड़ात्मवादी थे। वे हितकारी देवी-देवताओं के अस्तित्व में विश्वास करते थे जिसे ‘पथियन’ कहते कहा जाता है। ‘पथियन’ को सृष्टिकर्ता माना जाता है। इनका विश्वास था कि पहाड़ों, पेड़ों, चट्टानों और नदियों में अनिष्टकारी आत्माओं और राक्षसों का निवास होता है। इसलिए उन्हें पशु-पक्षियों की बलि देकर प्रसन्न करने का प्रयास किया जाता था। सभी धार्मिक कार्य पुजारी द्वारा संपन्न कराए जाते थे। पुजारी को ‘पुईथियम’ कहते थे, लेकिन अब अधिकांश लोगों ने ईसाई धर्म को अंगीकार कर लिया है। अब सभी धार्मिक प्रथा और विश्वास में परिवर्तन हो गया है और वर्तमान मिज़ो समाज गिरजाघरों द्वारा निर्देशित और नियंत्रित होता है। ईसाई धर्म के अतिरिक्त मिजोरम में लगभग 8.19 प्रतिशत लोग बौद्ध धर्म में आस्था रखते हैं। चकमा और मघ दोनों समुदाय बौद्ध धर्म को मानते हैं। मिजोरमवासियों का मुख्य भोजन चावल है। इसके अतिरिक्त वेलोग मक्का, गेहूं, बाजरा इत्यादि अनाज खाते हैं। मिज़ोरमवासी मांसाहारी होते हैं। मांस के साथ-साथ यहाँ के लोग सब्जियां भी खाते हैं। बाजरे का उपयोग मदिरा (जु) बनाने में किया जाता है। मदिरा (जु) इनका नियमित पेय है। पहले गाँव का लाल अथवा चीफ गाँव का सर्वोच्च प्राधिकारी होता था। वह गाँव का प्रशासनिक और न्यायिक प्रधान होता था। उसे बेहिसाब अधिकार प्राप्त थे। उसके फैसले को चुनौती नहीं दी जा सकती थी। उसके शब्द अंतिम माने जाते थे। चीफ गाँव के निवासियों के कल्याण के लिए सदा तत्पर रहता था। गाँव के लोग उसे पिता तुल्य समझते थे। सभी प्रकार के राजनैतिक–कानूनी अधिकार चीफ के पास केन्द्रित थे। प्रत्येक गाँव स्वतंत्र रूप से एक चीफ के अधीन होता था। चीफ पारंपरिक नियमों और रीति–रिवाजों के अनुसार गाँव के प्रशासन का संचालन करता था। चीफ की सहायता के लिए ग्रामीण बुजुर्गों की एक परिषद होती थी जिसे ‘उपा’ कहते थे। ग्रामीण प्रशासन और विवादों का निपटान करने एवं परामर्श देने के लिए चीफ उपा सदस्यों का चयन और उनकी नियुक्ति करता था। उपा का जनता द्वारा चुनाव नहीं होता था, बल्कि चीफ अपनी इच्छा के अनुसार उपा सदस्यों का चयन करता था। स्वतंत्रता के बाद मिजोरम में अनेक प्रशासनिक सुधार किए गए। मिज़ो जिला परिषद की स्थापना की गई तथा इसमें ग्राम परिषद को शामिल किया गया। ग्राम परिषद का चुनाव व्यस्क मतदान द्वारा किया जाता है जिसका कार्यकाल तीन वर्षों का होता है। ग्राम परिषद ही गाँव के मामलों की देखभाल करता है और दोषियों को दंड देती है।
‘पुईथियम’ मिजो लोगों के धार्मिक जीवन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। ‘पुईथियम’ की सेवा के बिना किसी धार्मिक अनुष्ठान की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। मिज़ो समाज के दैनिक जीवन में ‘पुईथियम’ सबसे महत्वपूर्ण सदस्यों में से एक था। उसे समाज में अत्यधिक सम्मान प्राप्त था। उसका प्रमुख कार्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराना और पशु बलि देना था। मिजोरम में धूमधाम से अनेक त्योहार मनाए जाते हैं। इन त्योहारों में मिजोरम की परंपरा, परिधान और संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। मिज़ोरम के निवासियों के जीवन में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए यहाँ के प्रायः सभी त्योहार कृषि पर आधारित हैं। ‘चपचर कुत’ मिजोरम का एक प्रमुख त्योहार है। वसंत ऋतु में इस पर्व का आयोजन किया जाता है। सामान्यतः मार्च या अप्रैल माह में अत्यंत धूमधाम से यह त्योहार मनाया जाता है। झूम खेती समाप्त हो जाने और धान की कटाई के बाद यह त्योहार मनाया जाता है। यह देवी–देवताओं को धन्यवाद देनेवाला पर्व है। ‘थल्फावांग कुत’ भी मिज़ोरम का प्रमुख त्योहार है। यह नवम्बर माह में फसल काटने के समय मनाया जाता है। मिज़ोरम के सभी समुदाय के लोग मिलजुलकर हर्ष व उल्लास के साथ ‘थल्फावांग कुत’ का आयोजन करते हैं जिसमें सभी जनजाति के लोग अपनी-अपनी संस्कृति प्रदर्शित करते हैं। ‘मिम कुत’ त्योहार मृत परिजनों और पूर्वजों के सम्मान में आयोजित किया जाता है। इसे ‘मक्का उत्सव’ भी कहते हैं। सामान्यतः अगस्त अथवा सितंबर माह में ‘मिमकुत’ त्योहार का आयोजन होता है। ऐसा विश्वास है कि इस त्योहार के अवसर पर मृतक आत्माएं अपने परिजनों को देखने के लिए धरती पर आती हैं। उन आत्माओं को रोटी, कपड़े, मक्का आदि अर्पित किया जाता है और उनसे धन-धान्य के लिए प्रार्थना की जाती है। यह त्योहार मिज़ोरम के सभी समुदायों के लोग मिलजुलकर मनाते हैं।
मिजोरम के अधिकांश लोगों ने ईसाई धर्म को अंगीकार कर लिया है। वेलोग ईसाई धर्म से संबंधित पर्व–त्योहार मनाते हैं। प्रत्येक गाँव में कम से कम एक गिरजाघर अवश्य होता है। सभी धार्मिक उत्सव गिरजाघर में आयोजित होते हैं। प्रत्येक रविवार को सभी ग्रामवासी प्रार्थना के लिए चर्च में जाते हैं। वे क्रिसमस, नव वर्ष, गुड फ्राईडे आदि त्योहारों के साथ–साथ अपने कुछ पारंपरिक त्योहार भी मनाते हैं। वास्तव में ईसाईकरण के बाद मिज़ो समाज के पारंपरिक त्योहार एवं रीति–रिवाज अपना महत्व खोने लगे थे, लेकिन मिजोरम सरकार ने पहल करते हुए सभी पारंपरिक त्योहारों और उत्सवों का आयोजन करने का निर्णय लिया। अब ये त्योहार प्रत्येक गाँव में उत्साहपूर्वक मनाए जाते हैं।
लोकगीत की दृष्टि से मिजोरम अत्यंत समृद्ध है। यहाँ लोकगीतों की समृद्ध विरासत है। मिजोरम के लोकगीत बहुआयामी, विचारपरक और सारगर्भित हैं। मिजोरम का समाज अनेक जनजातीय समुदायों में विभक्त है और सभी समुदायों में लोकगीतों की उन्नत परंपरा विद्यमान है। लोकगीत की दृष्टि से मिजोरम का समाज पूर्वोत्तर के अन्य समुदायों से विशिष्ट और अनोखा है। यहाँ के लोकगीतों को हम सामान्यतः दो वर्गों में विभाजित कर सकते हैं–पारंपरिक लोकगीत और आधुनिक लोकगीत। पारंपरिक लोकगीत विभिन्न त्योहारों एवं संस्कारों के अवसर पर पुजारियों द्वारा गाए जाते हैं जबकि आधुनिक लोकगीत नई पीढ़ी द्वारा गाए जाते हैं जिनमें नए विचार व नई धुन होती है। मिज़ो लोकगीत मात्रा एवं गुणवत्ता की दृष्टि से विशाल व बहुआयामी है। प्रदेश में लगभग एक सौ प्रकार के लोकगीत प्रचलित हैं। ‘बाव हला’ मिजोरम का युद्धगीत है। जब कोई योद्धा अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है तो ‘बाव हला’ गाकर अपनी विजय का शंखनाद करता है। योद्धा इन गीतों के द्वारा अपने साहस और शौर्य का प्रदर्शन करता है तथा अपने लोगों को अवगत कराता है कि उसने दुश्मन को पराजित कर दिया। शत्रु को मारनेवाला योद्धा ही बाव हला गाने का पात्र है, युद्धक दल के अन्य सदस्य नहीं। ‘ह्लादो’ शिकार संबंधी गीत है। शिकारियों द्वारा शिकार में सफलता प्राप्त करने पर ‘ह्लादो’ गाया जाता है। इसका गायन आखेट स्थल पर भी किया जा सकता है, घर आते समय मार्ग में भी तथा विजय उत्सव के अवसर पर भी। ‘थियम हला’ और ‘दवी हला’ अनुष्ठान के अवसर पर गाए जानेवाले लोकगीत हैं जिसका गायन पुजारियों एवं जादू-टोना करनेवाले लोगों द्वारा किया जाता है। ‘दर हला’ का नामकरण एक वाद्ययंत्र के नाम पर किया गया है। संख्या और लोकप्रियता की दृष्टि से ‘दर हला’ मिज़ो समाज में सर्वाधिक पसंद किये जानेवाले लोकगीत हैं। आनंद और उत्सव के अवसर पर ‘पुईपन हला’ गाए जाते हैं। ‘लेंगजम जई’ मिज़ो समाज के प्रेम गीत हैं। इनका कोई सुनिश्चित रूप विधान नहीं है, परन्तु इन गीतों में प्रणय निवेदन, आत्म बलिदान और आत्म समर्पण की प्रबल भावना होती है। मिज़ो समाज में आदिवासी समूहों के नाम पर आधारित और गाँव के नाम पर आधारित गीत पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हैं। मिजोरम में अनेक गीतों का नामकरण पशु-पक्षी अथवा किसी वाद्य यंत्र की आवाज के आधार पर किया गया है। मिजोरम में व्यक्ति विशेष के नामों पर आधारित गीतों की प्रचुरता है। इस प्रकार के अधिकांश गीतों का नामकरण किसी रचयिता के नाम पर किया गया है। कुछ गीतों का नामकरण किसी सुन्दर महिला अथवा पराक्रमी पुरुष के नाम पर भी किया गया है। मिजोरम का समाज लोकनृत्यों के माध्यम से अपनी कोमल भावनाओं का इजहार करता है। यहाँ युद्ध नृत्य, त्योहार नृत्य, स्वागत नृत्य की उन्नत परंपरा है। सामूहिक स्तर पर नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं। चेरव नृत्य मिज़ो समाज का रंगारंग नृत्य है। इसे बांस नृत्य भी कहा जाता है। इस नृत्य में छह–छह लड़कियों के दो समूह होते हैं। सभी लड़कियाँ पारंपरिक परिधान धारण कर नृत्य करती एवं गीत गाती हैं। सामुदायिक उत्सव के अवसर पर किसी विशिष्ट अतिथि के स्वागत में खुल्लम नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। पारंपरिक वेशभूषा धारण कर पुरुष नर्तकों द्वारा यह नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। यह नृत्य भी अन्य नृत्यों की भांति समूह में प्रस्तुत किया जाता है। सरलामकाई/सोलकिया नृत्य मिज़ोरम के दक्षिणी भाग में निवास करनेवाले पावी और मार समुदायों की प्रभावशाली नृत्य शैली है। इस नृत्य को 'सरलामकाई' के नाम से जानते हैं जबकि लुशाई समुदाय इसे 'रल्लू लाम' कहता है। पुराने दिनों में जब विभिन्न जनजातियाँ एक-दूसरे के साथ लगातार युद्ध करती रहती थीं तो विजयी होने पर विजेता द्वारा समारोह आयोजित कर उत्सव मनाया जाता था। 'चापचर कुत' मिज़ो समाज के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। इस अवसर पर चैलम नृत्य पेश किए जाते हैं। इसमें पुरुष और महिलाएं वैकल्पिक रूप से गोलाकार खड़े होते हैं जिसमें महिलाएं पुरुष की कमर पकड़ती हैं और पुरुष महिला के कंधे। सर्कल के मध्य में ड्रम बजानेवाले और मिथुन के सींग बजानेवाले संगीतकार होते हैं। ड्रम बजानेवाले संगीतकार नृत्य की पूरी बारीकियों को कोरियोग्राफ करते हैं।