जैसा कि एक पूर्व किश्त में लिख चुका हूँ, मैं २००१ के २० जून को अमरीका पहुंचा। वहाँ बोस्टन और प्रॉव्हिडेंस के आश्रमो का ३-४ दिन बाद ही ग्रीष्मकाल के अवकाश की छुट्टी शुरू हो रही थी। वैसे तो इसका नाम ग्रीष्मावकाश (Summer Vacation) था; वस्तुतः वह अवकाश न हो कर उन दिनों, दोनों आश्रमों द्वारा मार्शफील्ड नामक ग्राम में एक और आश्रम गर्मी के समय में (यहाँ अमरीका में जुलाई और अगस्त महीने गर्मी के माने जाते हैं) चलाया जाने का समय था। समुन्दर के किनारे अवस्थित, वृक्ष-पौधों पुष्पों से भरपूर यह सुन्दर ग्राम प्रॉव्हिडंस से करीब ६० मी (९६ कि.मि) और बोस्टन से ३० मी (४८ कि.मि.) के दूरी पर स्थित था। प्रॉव्हिडंस पहुंचने के चंद दिनो बाद ही (३ जुलाई २००१)। मैं भोर में कई भक्तो के साथ प्रॉव्हिडेंस से निकला। वहाँ पहुँचा तो सुबह के सात बजने जा रहे थे। हरे भरे ओक और पाइन वृक्ष, कई पुष्प -भरे पौधे तथा लताएँ हमारे स्वागत के लिए मानो उत्साह से हास्य कर रहे थे। मेरे प्रिय मित्र स्वामी त्यागानन्दजी भी बोस्टन से उसी समय आ पहुंचे थे। प्रायः एक दर्जन भक्त लोग थे। एक भक्त - जो ड्वायर (Joe Dwyer) उनका नाम- इस समूचे सौलोह एकड़ के सुरम्य स्थान की देखभाल किया करते थे। ऑपेरा शैली के अप्रतिम गायक होने के साथ ही साथ वे एक हरहुन्नरी (हरफनमौला) रख-रखाव (Maintenance) कर्मी भी थे प्लम्बिंग, इलेक्ट्रिकल्स, टेलिफोन, इण्टरनेट वगैरह सभी प्रकार के कार्य वे स्वयं अपने हाथों से अकेले किया करते थे। उनसे मित्रता करने में मुझे बिल्कुल देरी नहीं लगी। उनके बारे में बाद में कभी लिखूँगा। वहाँ ४ छोटे-बड़े मकान थे। मिट्टी-पत्थर की कच्ची सड़क से भीतर आते ही बाई तरफ एक मध्यमाकार मकान था जहाँ जो ड्वायर स्वयं रहते थे और प्रायः सभी पुरुषों के रहने की व्यवस्था भी इसी वास्तु में होती थी। वहाँ से, उसी सड़क से आगे बढ़ते ही इस आश्रम का प्रमुख मकान था, जहाँ छोटासा रसोई-घर, भोजन-कक्ष, सभागृह और २-३ निवासी कमरे थे। फिर वही सड़क और दो छोटे मकानों से होकर, एक वृत्त पूरा कर प्रथम मकान से मिल जाती।
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३ जुलाई २००१ से मेरा यहाँ आना शुरु हुआ और २००७ के अगस्त में आखरी बार इस स्थान पर रहा। वहाँ की मेरी स्मृतियाँ लिखने से पहले यहाँ के आश्रम का कुछ इतिहास पाठकों के सामने रखना अच्छा होगा।
इ.स. १९४० के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में स्वामी अखिलानन्दजी - जिन्होंने १९२८ में प्रॉविडेंस वेदान्त सोसायटी की स्थापना की थी और बाद में १९४१ में. वर्तमान बोस्टन के आश्रम की भी - एक रमणीय वनक्षेत्र की तलाश में थे। उद्देश्य था कि गर्मी के अवकाश में संन्यासी गृही भक्त वहाँ शान्ति से साधना कर सकें। तब उन्हें यहाँ लगभग ६४ एकड़ की जमीन का सन्धान मिला। यह स्थान उन्होंने खरीद किया। एक-दो सालो के बाद वहाँ ४ मकान भी बनाए गये| उन दिनों वह आज का मार्शफील्ड नगर नहीं था, बल्कि वह समूचा स्थान प्रायः निर्मनुष्य इलाका ‘मार्शफील्ड हिल्स' नाम से जाना जाता था। दलदल से सारा क्षेत्र भरा होने के कारण ही उसकी यह नाम हुआ था (मार्श= दलदल)।
उन दिनों कई साधक निजी साधना, ध्यान जप आदि के लिए इस जन- कोलाहल से मुक्त स्थान में आया करते थे। उन मकानों में निवास भोजन की सामान्य सुविधा थी।
१९६२ मैं स्वामी अखिलानन्दजी का देहान्त हुआ और स्वामी सर्वगतानन्दजी, जो १९५४ से उनके सहयोगी के रूम में कार्यरत थे, वे प्रॉविडेंस और बोस्टन के आश्रमों के प्रमुख नियुक्त हुए। मार्शफील्ड के आश्रम का कार्य भी वे संभाल रहे थे। किन्तु कुछ ही वर्षों के बाद एक अनपेक्षित आपत्ती खड़ी हुई। जो मार्शफील्ड हिल्स नाम से ज्ञात एक निर्जन वनस्थान था, वहीं एक नगर का निर्माण हो रहा था। नगर के अधिकारी, अच्छी सड़के, अन्य नागरी और प्रशासकिय सुविधाएँ, आवास, स्कूल आदि के लिए उचित जमीन खोज रहे थे तब उनकी निगाहें इस ६४ एकड़ के विशाल भूमिखण्ड पर पड़ी। चूंकि यह भूमी धार्मिक संस्था की थी, कानून से वह टॅक्स-फ्री थी। जब उन अधिकारियों ने स्वामी सर्वगतानन्द तथा आश्रम के अन्य कार्यकारी सदस्यों से पूछताछ की, तो उन्होंने निर्णय किया कि इतनी बड़ी जमीन कुछ दो महीनों के लिए और मुख्यत व्यक्तिगत साधना के किए ही प्रयुक्त होती है। उन्होंने सर्वगतानन्दजी से स्पष्ट रूप में कहा कि आप के कार्य हेतु करीब १५ एकड़ की जमीन पर्याप्त है, बाकी सारी आप को नगर को सौंप देनी होगी। अन्यथा पूरी जमीन पर पूरा टैक्स देना होगा।
एक दृष्टि से उन अधिकारियों का तर्क सही था। जब उस जमीन पर साधारण जनता के लिए कोई विशेष धार्मिक गतिविधियाँ नहीं हो रही थी, तो उसका अधिग्रहण आम जनता के लिये होना उचित ही था।
इसके बाद करीब १५-१६ एकड़ को इस भूमी पर चारों मकान एकत्रित किए गए। जुलाई -अगस्त में बोस्टन और प्रॉविडेंस के सन्यासी और भक्तगण यहाँ आते थे। हर साल एक सप्ताह बालकों का शिविर, एक सप्ताह भक्तों के लिए अध्ययन शिविर, चार जुलाई को अमरीका का स्वातंत्र्य दिन, गुरु-प्रार्णमा अदि कार्यक्रम इन दो महीनों में होते थे, जिनका समापन ‘श्रीकृष्णोत्सव’ ‘Krishna Festival’ में लगभग दो सौ भक्कों के उत्साह- पूर्ण समागम से होता था।
अब आइये, फिर मेरे यहाँ के संस्मरणों की ओर
दि. ३ जुलाई को नास्ता- चाय इत्यादि के बाद, पास ही जो सुन्दर समुंदर का बालुकामय किनारा था, वहाँ टहलने गया। स्वामी त्यागानन्दजी भी साथ थे। करीब डेढ़-दो घण्टे टहलने के बाद भोजन के लिए लौट आए। यहाँ भोजन, खान-पान आदि सब भारतीय पद्धति का भी होता था-जैसे कि सुबह के नास्ते में इडली- चटनी जैसे पदार्थ थे; उसके साथ ही सीरियल, दूध, ब्रेड, बटर ऐसे पदार्थ भी थे। चंद वर्षों पहले भारतीय पद्धति का आहार पाना उतना सहज नहीं था। अब वह सारा और भी अधिक सरल बन गया है। दोपहर के भोजन में भी दाल-चावल, रोटि-सब्जी जैसी भारतीय खाद्य वस्तुएँ थी।
दूसरे दिन- ४ जुलाई, जीसे अमरीका के स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है, इसे वेदान्त सोसाइटी के बोस्टन -प्राविडेंस शाखाएँ मार्शफील्ड में मनाते थे। कारण स्पष्ट है- जुलाई-अगस्त में दोनों आश्रमों के कार्यक्रम मार्शफील्ड में स्थानांतरित होते थे।
सुबह से ही कई भक्तों का आगमन होने लगा। ग्यारह बजे कार्यक्रम का प्रारम्भ हुआ। विवेकानन्दजी श्री सुप्रसिद्ध कविता ‘Song of Sannyasin’ का गान हुआ। इस स्पूर्तिप्रद गीत को स्वर दिया था जो डायर ने। उनका गाना अत्युच्च स्वर का था। विवेकानन्दजी के मर्मस्पर्शी शब्दों को उन्ही के अनुरूप सशक्त धुन में जो ड्वायर ने बाँधा था। इस कविता का गायन मैं पहले भी सुन चुका था - किन्तु ऐसी बेमिसाल धून और उसके साथ जब जो ड्वायर ने अपनी शक्तिशाली और तीनों सप्तकों में बिना किसी अवरोध विचरने वाली आवाज में प्रस्तुत किया तो उसका जो प्रभाव मुझ पर हुआ वह बड़ा ही अद्भुत था। मैंने और त्यागानन्दजी ने इस सम्बंध में व्याख्यान दिए। फिर और कुछ संगीत के बाद कार्यक्रम की समाप्ती भोजन में हुई। केवळ २५-३० भक्त ही इस कार्यक्रम में शरीक हुए थे।
दूसरे दिन गुरुपूर्णिमा थी। इसका विशेष कार्यक्रम शाम के साढ़े, छः बजे शुरू हुआ। इस दिन बड़ा भारी वर्षा और आँधी आयी थी। फिर भी कई भक्त आए थे। सुन्दर भक्तिगीत और मेरा और त्यागानन्दजी का व्याख्यान हुआ।
उपर लिखे गये सारे संस्मरण मेरी दैनंदिनी में लिपिबद्ध है। मार्शफील्ड में इसी प्रकार दिन बड़े ही आनन्द से गुजर रहे थे। कई भक्त बीच बीच में आते थे जो और अन्य कई भक्त मुझे अमेरिकन चाल-चलन (Manners and customs) भाषा, व्यवहार, संगीत-लिपी इत्यादि सारी शिक्षा दे रहे थे। कभी-कभार एक-दो दिन, प्रॉविडेंस जाकर फिर मार्शफील्ड लौट आना था। इन्ही दिनों ब्राज़िल से हमारे स्नेही स्वामी निर्भयात्मानन्दजी का शुभागमन हुआ। वे, त्यागानन्दजी और मैं फिर वॉशिंग्टन D.C., न्यूयॉर्क, रिजली मैनर, थाउजेंड आईलैण्ड पार्क आदि महत्त्वपूर्ण स्थानों को भेंटकर फिर मार्शफील्ड लौट आये।
वहाँ जल्द ही बच्चों का कैम्प शुरू हुआ। काफी वर्षों से बच्चों के लिए यह मार्शफील्ड में चलाया जाता। मैं उनके लिए एक क्लास लिया करता। अन्य समय उनके लिए खेल-कुद, गाना-बजाना, तैराकी ऐसे कार्यक्रम रहते। मैं भी यथासम्भव सम्मीलित्त हो जाता था।
मार्शफील्ड के वास्तव्य का औपचारिक समापन दिन था रविवार अगस्त २६, २००१. भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिन के आसपास। अगस्त महीने का अंतिम रविवार इसके लिए चिह्नित था। अतिथि स्वामी निर्मलात्मानन्दजी का मुख्य व्याख्यान था। इस के पहले भगवान श्रीकृष्ण की पूजा हुई। पू० सर्वगतानन्दजी, शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद कार्यक्रम में सम्मीलित हुए थे। एक सुन्दर सा मण्डप बनाया गया था। घने वृक्षों के बीच, सैकड़ों भक्तों से भरा हुआ नीले छत का वह मण्डप बहुत सुन्दर दिखता था। कई भक्तों ने मिलकर स्वादिष्ट भोजन की बड़े पैमाने पर व्यवस्था की थी। वैसे तो इस साल की मार्शफील्ड वास कृष्णोत्सव (Krishna Festival) के साथ समाप्त हुआ। एक-दो दिन रुककर ३१ अगस्त २००१ को मैं प्राविडेंस लौट आया। सन २००७ तक हर जुलाई-अगस्त में यह सिलसिला चलता रहा। कई कारणों से २००७ अगस्त के बाद मार्शफील्ड की सारी कार्यवाही कई कारणों से बन्द करनी पड़ी। परन्तु वहाँ के मधुर स्मृतियाँ अभी भी मेरे तथा कई पुराने भक्तों के दिल में सदा के लिए बसी है। उन में से कौन सी यहाँ लिखें, कौनसी नहीं, इसका निर्धारण बड़ा मुश्किल है।
कहा जाता है कि, जो कानों सुना है उस पर विश्वास न करो, जो अपनी आंखों से देखा उसीपर विश्वास करो। चक्षुर्वै सत्यम्। किन्तु जो आंखों से देखा जाता है, वह भी क्या हमेशा सच होता है?
एक बार सर्दी के मौसम में मार्शफील्ड गया था। वहाँ तब केवल मैं और जो थे। जुलाई -अगस्त के बाद वहाँ कुछ कार्यक्रम नहीं चलता था। चार में से तीन मकान पूर्णतया बंद किए जाते थे। पानी और नालियों बंद की जाती थी; सुरक्षा की दृष्टि से सारी खिड़कियों, दरवाजे प्लायवूड के बोर्ड ठोक कर सील किये जाते। मात्र जहाँ जो रहता था वह मकान खुला रहता। उस समय ठंड भी बहुत होता था, -१५० के नीचे तापमान प्रायः ही हुआ करता है। मैं वहाँ था तो ऐसा ही कुछ तापमान था। फिर भी अच्छे गरम कपड़े पहन कर उस ठण्ड में बाहर घूमना एक अलग सुखद अनुभव था।
वहाँ मार्शफील्ड के आश्रम में, मुख्य मकान से लगकर एक छोटा सा जलकुण्ड था जिसमें १५-२० छोटी बड़ी मछलियाँ थीं। पास ही एक डिब्बे में उनके लिए उपयुक्त खाद्य भी रखा जाता। वहाँ रहते समय मैं भी कभी-कभार वही मछलियों के खाने के लिये पानी में डालता था। अब ठण्ड पड़ी है तो ये मछलियाँ किस अवस्था में होंगी, सोचकर मैंनै वहाँ जाकर देखा तो मछलियाँ पानी के भीतर तैर रही थी, किन्तु कहाँ कोई खाद्य नहीं दिखा। “जो, आजकल आप मछलियों को खाना नहीं डालते क्या?” भीतर लौटने के बाद मैंने उनसे प्रश्न किया। आश्चर्य से उन्होंने मुझे उल्टा प्रश्न किया, “अरे भाई वह सारा तो जमकर बरफ बन गया है, खाद्य कैसा वहाँ डाला जाएगा?”
“अरे नहीं जो, मैं अभी वहाँ गया था। मछलियाँ पानी में थीं।”
“अरे स्वामीजी ऐसे तापमान में पानी का तो बरफ ही होता है; में निश्चय से आप को कह रहा हूँ, वहाँ केवल बरफ ही है।”
चूंकि मैंने अपनी आखों से अभी देखा था मैं जो की बात मानने वाला नहीं था। थोड़ी और कहासुनी के बाद मैंने उसे मेरे साथ वहाँ चलकर बात परखने को कहा, वह भी हँसते हुए मेरे साथ वहाँ पहुँचा।
“देखो जो, वो मछलियाँ जल में तैरती हुई आपको नहीं दीख रही हैं क्या?” “स्वामीजी, मछलियाँ तो हैं, परंतु आप को जो जल प्रतीत हो रहा है, वह वास्तविक बरफ है। यह कहते हुए उन्होंने पास पड़ी एक टहनी उठाकर मुझे दी और उसे ‘जल’ में डुबाने को कहा।
शर्म के मारे चुप्पी साधकर मुझे वहाँ से लौटना पड़ा। टहनी के ‘जल’ के स्पर्श के साथ यह सिद्ध हुआ कि वह बरफ है, पानी नहीं।
यही तो माया है ‘जल’ दिखता है ‘बर्फ’ होता है। ऐसे ही जगत संसार दीखता है, वास्तविक ब्रह्म होता है। जो ने हँसकर बात समाप्त की।
२००७ के मध्य में जो को कुछ स्वास्थ्य को शिकायत होने लगी। खोजबीन करने के बाद पता चला कि उन्हें कैंसर हुआ है। उनके बाहर से मजबूत खेलकूद मेहनत का काम करने वाले शरीर को कैंसर की बीमारी ने अंदर से खोखला करना शुरू किया था। २००७ का जुलाई -अगस्त का कार्यक्रम उन्हीं की व्यवस्था, देखभाल में सुसम्पन्न हुआ; किन्तु अगले साल के, (२००८ के) प्रारम्भ से उन्हें मार्शफील्ड छोड़कर चिकित्सा के लिए सुविधा युक्त स्थान पर जाना पड़ा। मार्शफील्ड में गर्मी के दिनों में होने वाले बोस्टन -प्राविडेंस के कार्यक्रम भी २००७ के बाद बंद हुए। दि १० अगस्त २००८ को जो ड्वायरजी का शरीर अनन्त में विलीन हुआ। And that is the end of Marshfield- स्वामी सर्वगतानन्दजी ने यह खबर सुनते ही कह दिया। अगले साल उनका ९७ साल का शरीर भी छूट गया।
कुछ वर्षों बाद मार्शफील्ड के आश्रम की जमीन का भी विक्रय कर दिया गया।