एक ओर युध्द की विभीषिका, तो दूसरी ओर असंतुलित पर्यावरण दो शत्रु मानव जाति को समूल नष्ट करने के लिए घात लगाकर बैठे हैं। सभी इस सत्य को भली-भाँति जानते हैं पर अहम् के पोषक अन्धी दौड़ लगा रहे हैं। विनाश और उससे उपजी वेदना मानव-मन को आहत करती है और आत्मबल को क्षीण। नैराश्य के काले घन के बीच पथ-प्रदर्शक बन स्वामी विवेकानंद द्वारा रचित कविता “अपनी आत्मा के प्रति" (To the Soul) एक अत्यंत प्रेरणादायक, आध्यात्मिक एवं प्रासंगिक है। यह संसार संघर्ष-सागर है, जहाँ प्रतिक्षण लहरें रूपी चुनौतियों से व्यक्ति का सामना होता है। परिस्थितियाँ कदाचित सम-विषम होती हैं तथा जय-पराजय इसका परिणाम। जय आंदोलित करता है किन्तु पराजय अधीर। यह कविता मनुष्य को जीवन के कठिन संघर्षों में अडिग रहने,आंतरिक शक्ति को पहचानने और अनवरत अपने मार्ग पर अग्रसर होने का संदेश देती है। स्वामी विवेकानंद जी कर्तव्य और संघर्ष का आह्वान करते हैं -
"मेरे कठिन हृदय कंधे पर साधे रखो,
जुआ, जो कि जीवन की भर का है, उसे न छोड़ो,"
वे कहते हैं कि उत्तरदायित्व का भार जन्मत: मानव लेकर ही आता है। वह उससे पलायन नहीं कर सकता है अत: उसे सदा सजग रहना होगा। वे अपनी अंतरात्मा (या मनुष्य की आत्मा) को संबोधित करते हुए कहते हैं कि जीवन का मार्ग सरल नहीं है। स्वयं को "कठिन हृदय" बनाओ अर्थात परिस्थितियों का सामना करने के लिए खुद को भीतर से मजबूत और कठोर बना लो, जिससे कोई भी विषमता कर्तव्य-पथ से डिगा न पाए। "जुआ" (यहाँ इसका अर्थ बैलगाड़ी या हल के ऊपर रखा जाने वाला भारी काठ/बोझ है) रूपी जीवन की जिम्मेदारियों, कर्तव्यों और संघर्षों का निर्वहन करो। जीवन भर चलने वाले इस कर्तव्य रूपी बोझ को बीच में कभी नहीं छोड़ना है। चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, हमें अपनी जिम्मेदारियों से पलायन नहीं करना है। जीवन के भारी जुए या बोझ को कंधे पर उठाए रखना और विघ्नों के बीच भी स्थिर रहना ही महानता है। कवि हरिवंश राय बच्चन की प्रसिद्ध कविता "अग्निपथ" जीवन को एक कठिन मार्ग बताते हुए वे मनुष्य को बिना रुके आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है:
"तू न थकेगा कभी, तू न थमेगा कभी, तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!"
परिणाम की चिंता किए बिना और विपरीत परिस्थितियों की परवाह किए बिना अपने कर्तव्य पथ पर डटे रहना ही सच्चा कर्मयोग है। स्वामीजी अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए संघर्ष की प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि जब तक यह संसार रहेगा, तब तक हमें अपने पैरों पर विश्वास करना होगा। हमारे कदम कई बार डगमगाएंगे, उखड़ेंगे पर अदम्य जिजीविषा तथा दृढ़संकल्प हमें हारने नहीं देते।
स्वामी जी कहते थे, "सारा सामर्थ्य तुम्हारे भीतर है। अपनी दिव्यता को प्रकट करो।" उनके अनुसार, स्वयं को दुर्बल या दयनीय समझना ही सबसे बड़ी भूल है, क्योंकि हमारी आत्मा स्वयं ईश्वर का अंश है किन्तु हम उसे पहचान नहीं पाते। आवश्यकता है - विपरीत परिस्थितियों में धैर्य धारण कर डटे रहने की।
"यद्यपि अपना वर्तमान है विकृत,
भविष्य अंधकारमय, फिर भी ठहरो।"
स्वामी जी जीवन के यथार्थ को स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं कि हो सकता है कि आज हमारा "वर्तमान विकृत" हो अर्थात सर्वत्र निराशा, मिथ्या, पराजय, अन्याय के काले बादल छाए हों और आगे देखने पर "भविष्य अंधकारमय" दिखाई दे रहा हो, जहाँ आशा की कोई किरण न दिखे। ऐसी घोर निराशा के क्षणों में भी "ठहरो" यानी धैर्य रखो। अंधकार कितना भी गहरा हो, अपनी आंतरिक लौ को बुझने नहीं दो। शीघ्र ही हार मत मानो अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानो । यह समय भी बीत जाएगा क्योंकि समय सतत प्रवहमान है। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की भाँति सुख-दुख आते-जाते हैं। ये क्षणभंगुर हैं क्योंकि सांसारिक जीवन ही सीमाओं से बँधा हुआ है। मात्र आत्मा अमर और असीम ऊर्जा का स्रोत है अत: स्वामीजी का आग्रह है कि इन सांसारिक दुखों को देखकर विचलित न हो और अपने वास्तविक स्वरूप में ठहरे।
स्वामी विवेकानंद जी के "भविष्य अंधकारमय" की तरह सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' – "राम की शक्ति-पूजा" की यह कविता जीवन के घोर अंधकार और निराशा के क्षणों में भी ठहरने और संघर्ष करने का सबसे बड़ा उदाहरण है। जब श्रीराम देखते हैं कि ‘अन्याय जिधर है शक्ति उधर’ अर्थात रावण अन्यायी होकर भी शक्ति संपन्न है, तो वे निराश होते हैं। श्रीराम अपने स्वयं के जीवन को धिक्कारते हुए कहते हैं कि मेरे इस जीवन को धिक्कार है, जिसे आरंभ से ही केवल विरोध, संघर्ष और विषमताएँ ही मिली हैं।
"दिक् साधन को ही, जिसके लिए सदा ही किया शोध,
जानकी हाय उद्धार प्रिया का हो न सका,
एक और मन रहा राम का जो न थका।"**
वे कहते हैं कि मैंने जीवनभर अथक प्रयास और खोज कर जिन अस्त्र-शस्त्र, नीति और साधनों का अनुसंधान किया उनको भी धिक्कार है क्योंकि आज संकट के समय वे सब निष्फल साबित हो रहे हैं।
श्रीराम क्षण भर के लिए अपनी आत्म-शक्ति को विस्मृत कर अत्यंत भावुक होकर विलाप करते हैं कि हे सीता (जानकी)! इस विपरीत परिस्थिति में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मैं अपनी प्रिय पत्नी को रावण के बंधन से कभी मुक्त नहीं करा पाऊँगा। तब वयोवृद्ध जामवंत उन्हें अपनी आंतरिक शक्ति को जगाने का संदेश देते हैं: तब उनके भीतर की अदम्य इच्छाशक्ति जागती है। राम का एक 'दूसरा मन' जागता है। यह वह मन है जो निराशा, थकावट, दीनता और आत्मसमर्पण (दैन्य और विनय) को नहीं जानता यह श्रीराम की मानसिक दृढ़ता, अटूट संकल्प और कभी न हार मानने वाले आत्मबल को दर्शाती है।
बाहरी परिस्थितियां कितनी भी विकृत हों, मनुष्य का एक आंतरिक कोना (आत्मा) कभी हार नहीं मानता। जब इंसान चारों तरफ से घिर जाए और उसका साधारण मन हार मानने लगे, तब उसके भीतर का अदम्य और साहसी आत्मबल ही उसे संकट से पार ले जाता है जैसा कहा गया है – मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। आत्मा ऊर्जा की स्त्रोत है। आत्मा और प्राणी के अस्तित्व की यात्रा अनंत काल से चली या रही है। स्वामी जी कहते हैं -
"जब हमने-तुमने मिलकर आरंभ किया था,
जीवन के शिखरों का आरोहण-अवरोहण,
तब से एक युग बीत गया।"
तात्पर्य है - मनुष्य-शरीर/मन (हमने) तथा उसकी आंतरिक "आत्मा" (तुमने) संयोग से ही यह अस्तित्व निर्मित है। स्वामी जी कहते हैं कि यह सफर आज का नहीं है। आत्मा और जीव ने मिलकर युगों पहले इस जीवन यात्रा को शुरू किया था। एक युग बीत जाने के बाद भी हमारी आत्मा का अस्तित्व बना हुआ है। ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में वासुदेव कर्तव्य-पथ से विचलित होने वाले पार्थ अर्जुन को आत्मा का गूढ़ रहस्य समझाते हैं –
न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः∣
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे∣∣२.२०∣∣
अर्थात आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है। यह जन्म रहित, नित्य, अमर एवं सनातन है। शरीर की मृत्यु के बाद भी नष्ट नहीं होती। स्वामी जी जीवात्मा और परमात्मा (या चेतना और स्वरूप) के अनादि काल के संबंध को दर्शाते हैं। वे कहते हैं कि सृष्टि के निर्माण से लेकर अब तक (एक युग बीत जाने तक) आत्मा ने चेतना के साथ हर उतार-चढ़ाव (आरोहण-अवरोहण) को देखा है। इस लंबी यात्रा में कई बार "आरोहण" यानि सफलता, सुख, ऊंचाइयाँ मिली और कई बार "अवरोहण" यानि असफलता, दुःख, पराजय आए हैं। समय के साथ-साथ सुख-दुख का यह चक्र बेहद पुराना है। इसलिए वर्तमान में मिले छोटे-मोटे दुख एवं असफलता से घबराकर या भागकर इस सनातन यात्रा को बीच में रोकना मूर्खता है। स्मरण रहे - मनुष्य केवल हाड़-मांस से निर्मित काया नहीं है, वह अनंत शक्तिशाली आत्मा है। रामधारी सिंह 'दिनकर' जी ने भी जीवन के उतार-चढ़ाव (आरोहण-अवरोहण) और संघर्ष को ही मनुष्य की असली पहचान माना है। उनके अनुसार जो दुखों और बाधाओं के सामने रुकता नहीं, वही विजेता बनता है -
"वसुधा का नेता कौन हुआ? भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?
अतुलित यश-क्रेता कौन हुआ? नव-धर्म-प्रणेता कौन हुआ?
जिसने न कभी आराम किया, विघ्नों में रहकर नाम किया। (रश्मिरथी)
विलियम अर्नस्ट हेनले (William Ernest Henley), जो जेल की काल कोठरी के अंधकार और गंभीर बिमारी से जूझ रहे थे, उन्होंने अपनी आत्मा की ऊर्जा को पहचाना। उन्होंने आत्मा की असीमित शक्तियों पर विश्व प्रसिद्ध कविता "इन्विक्टस" (Invictus) की ये पंक्तियाँ लिखी थीं।
"Out of the night that covers me, Black as the pit from pole to pole,
I thank whatever gods may be For my unconquerable soul."
इस गहन अंधकार से घिरा मैं रात के बीच, उनका आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने मुझे एक अजेय आत्मा दी है। वे खुद को अपने भाग्य का विधाता और अपनी आत्मा का कप्तान मानते हैं -
"I am the master of my fate, I am the captain of my soul."
यह कविता विवेकानंद जी के विचारों के सबसे करीब है। स्वामीजी युवाओं को जागृत करते है और संदेश देते हैं कि मनुष्य में असीम शक्तियाँ अंतर्निहित हैं पर बाह्य जगत में भ्रमित हो वह उसकी अनुभूति नहीं कर पाता।
निष्कर्षत: स्वामी विवेकानंद की कविता "अपनी आत्मा के प्रति" विषम परिस्थितियों में अटूट धैर्य रख अपने दायित्व का पूर्णरूपेण निर्वाह करने के लिए प्रेरित करती है। कविता संदेश देती है - जीवन को एक निरंतर लंबा संघर्ष मान अपनी आंतरिक चेतना (आत्मा) को सुदृढ़ कर अंधकारमय भविष्य में भी आत्मा की ऊर्जा का साथ ले व्यक्ति को अडिग रहना है क्योंकि बाहरी परिस्थितियां कितनी भी विकृत हों, मनुष्य कीआंतरिक शक्ति (आत्मा) कभी हार नहीं मानती। जीवन के उतार-चढ़ाव (आरोहण-अवरोहण) और संघर्ष ही मनुष्य की असली पहचान है। अंततोगत्वा जो दुखों और बाधाओं के समक्ष नतमस्तक नहीं होता, विजयश्री उसे ही सुशोभित होती है।