“देखो दादी, मैंने कितने डोड़ा बीन डाले?” संजू ने विहँस कर कहा। उसकी दादी भी प्रसन्न हो गयी। खेतों में गन्ना कट जाने के बाद जहाँ-तहाँ सूखे गन्ने के टुकड़े अर्थात डोड़े सानू की दादी बीन ले जाती थी और उन्हें चूल्हे में जलाकर खाना बनाती थी। “अब घर चलो दादी, भूख लगी है” संजू ने कहा तो उसकी दादी ने प्यार से उसके माथे का पसीना पोछ दिया। डोड़े का एक-एक गट्ठर सिर पर रख कर दोनों घर की ओर चल दिये। घर जाकर दादी ने झप्पर पर फैली बेल से एक लौकी तोड़ी। लौकी की शब्जी बनायी और रोटियाँ सेंकने लगी। संजू ने लौकी की शब्जी देख कर कहा-
“रोज-रोज वही लौकी-तुरई। कभी दाल बनाओ न दादी।” संजू की बात सुन कर दादी भावुक हो गयी। फिर सँभल कर बोली- “कल बाजार से गेहूँ बेच कर अरहर की दाल ले आना, फिर दाल बना दूँगी।”
“अच्छा दादी” संजू ने संतुष्ट होकर कहा।
संध्या-काल वह अपने सखा करीम के घर पहुँच गया। उस समय कटोरे में बड़े-बड़े खिले हुए बासमती चावलों के साथ पीली-पीली अरहर की दाल सान कर करीम खा रहा था। संजू ललचाई हुई दृष्टि से देखने लगा। करीम की माँ से यह छिपा न रहा, वह संजू से बोली- “खाओगे बेटा? परस दूँ? … लेकिन तुम्हारी दादी से डरती हूँ। उनको पता चला कि तुमने मुसलमान के घर खाया है तो बहुत नाराज होंगी।”
“दादी को नहीं बताऊँगा, अम्मी।” संजू ने सहज भाव से कह दिया। दाल-चावल का कटोरा पलक झपकते आ गया और वह करीम के साथ खाने लगा। बीच में रुक कर दरवाजे की ओर देखने लगा।
करीम की माँ ने पूछ लिया- “क्या हुआ बेटा?”
“दरवाजा बंद कर दो अम्मी। कहीं दादी न आ जायें।”