स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत ऊ तिरोत सिंग

डॉ. श्रुति पाण्डेय

गतांक से आगे

उन्होंने अंग्रेजों द्वारा कैद किये गये बंदियों को छुड़ा दिया।
इस प्रकार काफी समय से सुलग रही विद्रोह की आग भड़क उठी। इन सफलताओं की खबर जंगल की आग की तरह फैलने लगी। हजारों की संख्या में युवक स्वतंत्रता के संघर्ष में कूद पड़े। तिरोत सिंग ने योद्धाओं की टोली को डेविड स्कॉट को पकड़ने चेरापूँजी भेजा। परन्तु चेरापूँजी के राजा दुवान सिंग ने अंग्रेजों का साथ दिया और चुपचाप उन्हें गुप्त मार्ग से सिलहट भेज दिया।
इस उथल-पुथल का समाचार गुवाहाटी और सिलहट पहुंचने पर बड़ी संख्या में ब्रिटिश सैनिकों को खासी पहाड़ियों की सीमा पर भेजा गया। खासी मुखियों का ख्याल था कि अंग्रेजों को मार भगाना कठिन न होगा। उनका विचार था कि यद्यपि अंग्रेज मैदानों में शक्तिशाली हैं पर पहाड़ियों में उन्हें परास्त करना मुश्किल नहीं होगा। पहाड़ों के दुर्गम रास्ते और घने जंगलों में युद्ध करना अंग्रेजों के लिये मुश्किल होगा। तिरोत सिंग ने अंग्रेजों का मुकाबला करने के लिए कुछ गैर-पारम्परिक तरीकों का प्रयोग कियां उन्होंने नौंग्ख्लाव से रिहा किये गये कैदियों को दूत के रूप में पड़ोसी राज्यों में भेजा। ये दूत असम के राजा कानता, भूटान के भेट और अरुणाचल के सिंहको के पास उनके सहयोग के लिये भेजे गये। अंग्रेजों की सैनिक शक्ति के आकलन के लिये भी कुछ गुप्त दूतों को गुवाहाटी तथा अन्य स्थानों पर भेजा गया।11
विद्रोह खासी पहाड़ियों तक सीमित न रहा। वह पश्चिम की ओर गारो पहाड़ियों तक भी पहुंचा। गोआलपाड़ा जिले में भी विद्रोह की चिंगारियाँ भड़क उठीं। तिरोत सिंग चतुर कूटनीतिज्ञ थे और जानते थे कि असमियों में भीतर ही भीतर अंग्रेजों के खिलाफ असंतोष है और इस असंतोष को जरा सी हवा देते ही पूरा का पूरा असम विद्रोह की आग में जलने लगेगा। उनका अनुमान सही था। असम में खासी पहाड़ियों में हो रही घटनाओं की खबर फैलते ही असम के मैदानों में राजस्व की वसूली को रोक दिया गया। सरकारी टैक्स कलेक्टरों के साथ बदसलूकी की गयी। राजमार्ग पर डकैतियाँ होने लगीं जो अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने वाली थीं।
इस बीच खासी पहाड़ियों की सीमा पर संघर्ष चलता रहा। यह पहला मौका था जब सुसंगठित खासी योद्धाओं से अंग्रेजों का पाला पड़ा था। ये संघर्ष लगभग तीन महीने तक चलते रहे। विख्यात इतिहासकार के. एम. मुंशी तिरोत सिंग द्वारा छापामार (गुरिल्ला) युद्ध शैली के कुशल प्रयोग पर लिखते हैं ‘‘तिरोत सिंग और उनके साथी, 10, 000 के आसपास की सैन्य शक्ति के साथ अंग्रेजों से बचते रहे, पर कभी-कभी मैदानों पर धावा बोल देते, जिससे पूरे असम में खतरे की घंटी बजने लगती और दहशत सी फैल जाती। 12
जब तिरोत सिंग को अहसास हुआ कि इस बार अंग्रेज पूरी तैयारी के साथ सिलहट की सीमा पर हमला करने वाले हैं तो उन्होंने मोन भट और जिडोर सिंग की सहायता से पूरी सेना की कमान संभाल ली। सिलहट की सीमा पर जहाँ स्वयं तिरोत सिंग अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे, वहीं कामरूप में खीन कौंगोर, जरैन सिंग तथा अन्य सरदार अंग्रेजों से जूझ रहे थे। इन्हीं संघर्षों में अंग्रेज अफसर बीडन भी मारे 7 गये। तिरोत सिंग को जब पता चला कि खासी सैनिक नौग्ख्लाव की तरफ वापस आ रहे हैं तो वे तुरन्त नौंग्ख्लाव की ओर आये। नौंग्ख्लाव के नीचे ख्री नदी के पास तिरोत सिंग घायल हो गये। तब सैनिक उन्हें एक गुफा में ले गये जो अब तिरोत की गुफा के नाम से जानी जाती है।13 इस दौरान अंग्रेजों ने नौंग्ख्लाव में प्रवेश किया और युद्ध शुरू होने के तीन महीने बाद 2 जुलाई 1829 को नौंग्ख्लाव पर कब्जा कर लिया।
तिरोत सिंग ने जिस तरह खासी सरदारों को संगठित किया अंग्रेज अधिकारियों ने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। नौंग्ख्लाव पर कब्जे के बाद मैरंग, नौंगरामइ और आसपास के गाँवों में विद्रोह और संघर्ष हुए। अंग्रेजों ने बेरहमी से गाँवों को लूटा और जलाया। आँधी-तूफान से भरे मौसम में युद्ध चलता रहा। मौसमाई और मामलुह में सबसे कठिन संघर्ष हुए। मामलुह के किले पर जीत हासिल करने में अंग्रेजों को एक महीने का समय लग गया।
गुफा में घायल तिरोत सिंग को सभी क्षेत्रों में हो रहे संघर्षों की खबरें मिल रही थीं। पर वे हताश नहीं थे। मिलियम के सिएम बोर मानिक की सहायता से उन्होंने आपातकालीन बैठक बुलाई जिसमें उनके विश्वस्त अधिकारी जिडोर सिंग, मोन भट, लारशोन जराइन, खीनकौंगोर, मन सिंग तथा अन्य लोग शामिल हुए। इस बैठक में एक नयी रणनीति बनायी गयी तथा अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध करने का निर्णय किया गया जो आने वाले चार वर्षों तक चलता रहा।
चेरापूँजी के सिएम ने अंग्रेजों के साथ एक संधि की थी जिसके अंतर्गत चेरापूँजी के नजदीक सइत्सोफेन में कुछ भूमि अंग्रेजों को दे दी गयी। डेविड स्कॉट ने योजनाबद्ध ढंग से अपने एजेंटों को संधि प्रस्ताव के साथ विभिन्न खासी राज्यों में भेजना शुरू किया। कुछ खासी सिएमों को मजबूरी में इन संधि प्रस्तावों को मानना पड़ा क्योंकि वे आर्थिक नाकेबन्दी से त्रस्त थे और अपने गाँवों की और तबाही नहीं चाहते थे। तिरोत सिंग और उनके निष्ठावान साथियों ने युद्ध को जारी रखा। गुरिल्ला छापामार विधि का प्रयोग करते हुए वे अंग्रेजों के ठिकानों पर हमला करते रहे। जंगलों और आसपास के क्षेत्रों में हो रहे इन हमलों से अंग्रेजों को भारी क्षति होती रही।
चेरापूँजी में अपना केन्द्र बनाने के बाद डेविड स्कॉट ने पहला काम यह किया कि तिरोत सिंग को शान्ति और समझौता का प्रस्ताव भेजा। उसने कहा कि वह तिरोत सिंग से स्थायी और शक्तिपूर्ण समझौते के लिये बातचीत करना चाहता है। पर तिरोत सिंग नौंग्ख्लाव समझौते के कटु अनुभव को भूले नहीं थे। वे दुबारा अंग्रेजों की कूटनीतिक चालाकियों का शिकार नहीं होना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अंग्रेजों के शान्ति प्रस्तावों को अनदेखा करते हुए अपना संघर्ष जारी रखा।
जब अंग्रेजों ने समझ लिया कि तिरोत सिंग अब उनके झांसे में नहीं आने वाले हैं, तो उन्होंने ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति अपनाई। उन्होंने तिरोत सिंग के नजदीकी मित्रों में फूट डालने की कोशिश की। अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध सफल रहा था, परन्तु तिरोत सिंग जानते थे कि अंग्रेजी सेना के खिलाफ लम्बे समय तक युद्ध को जारी रखना व्यावहारिक नहीं होगा। वह यह भी जानते थे कि इससे लोगों का मनोबल टूटने लगेगा। उन्होंने अपने विश्वस्त साथियों मोनभट, जिडोर सिंग, ख्रीन कोंगोर, मन सिंग और लोरशोन जराइन के साथ गुप्त बैठक की। जो खासी राज्य अंग्रेजों के कब्जे में आ गये थे 8 उनको फिर से व्यवस्थित और सुसंगठित करने और अंग्रेजों से मुक्त करने के लिए योद्धाओं को भेजा गया। साथ ही अंग्रेजों के साथ खासियों के संघर्ष का दूसरा चरण शुरू हुआ।
इस युद्ध में खासी महिलाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। घरेलू मोर्चे पर अनगिनत कष्टों का सामना करने के साथ ही इन महिलाओं ने युद्ध में पुरुषों का हर कदम पर साथ दिया। युद्ध में उनका मुख्य काम रसद पहुंचाना था। एक बार का फन नौंग्लाइट नाम महिला ने जिसने अपने पिता और भाई का इस युद्ध में खो दिया था, मैरंग और नौग्रमइ के पास देशी फलों और जड़ी-बूटियों को मिलाकर तेज शराब बनाई और अंग्रेज सैनिकों को पिलाकर पूरी बटालियन का सफाया करवाया। एक अन्य घटना में का फेट सिएम तथा उनकी सहेलियों ने नौंग्ख्लाव में अंग्रेज सैनिकों के साथ भोजन करते समय प्रहरियों को मरवाकर दरवाजों को खोल दिया और खासी वीरों ने पूरी छावनी का सफाया कर दिया। इस युद्ध में खासी स्त्रियों के अदम्य साहस, जिजीविषा, त्याग और कठोर परिश्रम की गाथाएँ आज भी लोकप्रिय हैं।
29 जनवरी 1931 को रमब्रइ के सुसंगठित और प्रशिक्षित योद्धा कामरूप के पास तिरोत सिंग की सेना से आ मिले। राजा सुनता सिंग के नेतृत्व में गारो योद्धाओं का एक समूह भी तिरोत सिंग की सेना से मिल गया। डेविड स्कॉट को पूरे बोरदुआर की चिंताजनक स्थिति के विषय में तुरन्त सूचना दी गयी। डेविड स्कॉट ने 1831 में भारत सरकार को भेजी गयी रिपोर्ट में तिरोत सिंग की सेनाओं के घातक हमलों का वर्णन किया है। काफी कठिनाई के बाद कैप्टन ब्रोडी के नेतृत्व में बोरदुआर और आसपास के क्षेत्रों पर ब्रिटिश सेना दुबारा कब्जा कर सकी। कैप्टन ब्रोडी तब बोको की ओर आगे बढ़ा और एक के बाद एक नौंगस्टाइन, जिर्नगम, जिरंग और लौंगमारू आदि क्षेत्रों की सेनाओं को पराजित किया।
1831 में डेबिड स्कॉट की मृत्यु के बाद ग्रेक्रोफ्ट ने उनके स्थान पर एजेंट का कार्यभारत ग्रहण किया। उन्हें सूचना मिली कि नौंगिर्नेन के पास खासी सेनाओं को संगठित और प्रशिक्षित किया जा रहा है। उन्होंने कैप्टेन लिस्टर और लेफ्टिनेंट इंगलिस को खासी पहाड़ियों की दक्षिणी सीमा के पास भेजा। कठिन संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने इन क्षेत्रों पर दुबारा कब्जा जरूरी किया लेकिन उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी।
मोनभट और उसकी सेनाएं मौसिनरम की ओर वापस गयीं और वहाँ अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया। फिर शेला, मोडेन और लीबाह में भी विद्रोह हुए। इन युद्धों में हुई हार के बाद खासी सरदारों ने समझ लिया कि वे अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ लम्बी लड़ाई नहीं लड़ सकते। फलस्वरूप एक के बाद एक उन्होंने गवर्नर जनरल के एजेंट रॉबर्टसन का प्रस्ताव स्वीकार करते हुए ब्रिटिश सरकार के साथ समझौता कर लिया।
तिरोत सिंग के अधिकांश योद्धा भूमिगत हो चुके थे। इस बीच अंग्रेजों को पता चला कि तिरोत सिंग को कई स्रोत से आर्थिक सहायता मिल रही है। ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति का पालन करते हुए उन्होंने मोनभट और उसके सहयोगियों को अपनी तरफ मिलाने का प्रयास शुरू किया। तिरोत सिंग को जब इसकी सूचना मिली तो उन्होंने मोनभट से कहा कि वह अंग्रेजों से बातचीत करे और उन्हें मिलाये रखे। शान्ति समझौते के प्रति तिरोत सिंग के नकारात्मक रुख के बावजूद रॉबर्टसन ने उनकी ओर 9 एक बार फिर दोस्ती का हाथ बढ़ाया। पर जब उसने समझ लिया कि जब तक तिरोत सिंग जीवित हैं और खासियों का नेतृत्व कर रहे हैं, तब तक खासियों से समझौता करना संभव नहीं है, तब उसने शक्ति का प्रयोग करना ही उचित समझा। उसने गोआलपाड़ा और मणिपुर से सेना की टुकड़ियाँ मंगवाई। साथ ही आर्थिक नाकेबन्दी भी तेज कर दी। उसका अन्तिम लक्ष्य था खासी पहाड़ियों को यूरोपीय उपनिवेश में तब्दील कर देना।
इसी समय खिरियम राज्य के मुखिया सिंग मानिक सामने आये और ब्रिटिश सरकार तथा तिरोत सिंग के नेतृत्व में खासी मुखियों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रस्ताव रखा। रार्बटसन ने प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और सभी सैन्य कार्यवाहीयों को स्थगित कर दिया। सिंग मानिक ने दोनों पक्षों के बीच शान्तिपूर्ण समझौते की प्रक्रिया आरंभ कर दी। महीनों के प्रयास के बाद सिंग मानिक अंततोगत्वा सरकारी एजेंट के प्रतिनिधि और तिरोत सिंग के बीच बैठक करवाने में कामयाब हो ही गये। यह बैठक 23 अगस्त 1832 को हुई। यह एक ऐतिहासिक क्षण था। अंग्रेज एजेंट ने तिरोत सिंग द्वारा प्रतिरोध की समाप्ति की शर्त पर शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व की बात की। परन्तु तिरोत सिंग वादों पर भरोसा करने वाले नहीं थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से अपने राज्य में से गुजरने वाली सड़क का प्रयोग बन्द करने की मांग की और नौग्ख्लाव का राज्य वापस दिये जाने की भी मांग की। जब सिंग मानिक ने तिरोत सिंग से कहा कि उन्हें अपना राज्य वापस मिल सकता है, बशर्ते वे अंग्रेजों के साथ समझौते पर हस्ताक्षर कर उनका आधिपत्य स्वीकार करें, तिरोत सिंग ने उत्तर दिया कि ‘‘गुलाम राजा के जीवन से आजाद आम इंसान की मौत अच्छी है।’’ यह बेबाक वक्तव्य ऐतिहासिक था। बिना किसी ठोस नतीजे के इस बैठक का अन्त हो गया। 14
जल्दी ही एक दूसरी बैठक बुलायी गयी जिसमें तिरोत सिंग का प्रतिनिधित्व उनके दो मंत्रियों मान सिंह और जीत रॉय ने किया। उन्होंने अंग्रेजों के प्रतिनिधि कैप्टन लिस्टर से कहा कि वे लगातार चलने वाले युद्ध से तंग आ गये हैं। लिस्टर ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे अपने वादे के प्रति प्रतिबद्ध हैं बशर्ते कि तिरोत सिंग के भतीजे रिजोन सिंग को नया सिएम बनाया जाए। अंग्रेजों को मालूम था कि जब तक तिरोत सिंग को रास्ते से नहीं हटाया जाता तब तक उनकी सेना के मनोबल को नहीं उठाया जा सकेगा। इसलिए तीसरी बैठक की शर्त यह रखी गयी कि इसमें तिरोत सिंग उपस्थित नहीं रहेंगे। अंग्रेजों द्वारा रखी गयी शर्तों में से पहली शर्त यह थी कि यदि तिरोत सिंग आत्मसमर्पण कर दें तो सरकार उनकी जान बख्श देगी। उनके उत्तराधिकारी का चुनाव राजाओं के संघ द्वारा खासियों भी परम्परा को ध्यान में रखते हुए किया जायेगा। ब्रिटिश सरकार चेरा से असम तक सड़क बनाने के लिये स्वतंत्र होगी और कहीं भी पुल और गेस्ट हाउस बनाने का भी अधिकार रखेगी।
मध्यस्थ के रूप में सिंग मानिक की भूमिका से अंग्रेज संतुष्ट थे परन्तु तिरोत सिंग के आत्मसमर्पण के प्रश्न पर वार्ता में गतिरोध आ गया। फिर भी सिंग मानिक शान्तिपूर्ण समझौते के लिये आशान्वित थे। शान्तिवार्ता की प्रक्रिया चलती रही और सिंग मानिक ने जिडोर सिएम को वार्ता में शामिल कर लिया। अंग्रेजों ने जिडोर सिएम को इस बात के लिये राजी करने का प्रयास किया कि वे तिरोत सिंग के आत्मसमर्पण में सहायता करें परन्तु जिडोर अपने लोकप्रिय नेता को धोखा देने के लिये तैयार न थे। इस प्रकार शान्तिवार्ता का अन्त हो गया पर रॉबर्टसन ने सैनिक कार्रवाई जारी रखने का आदेश दिया। खासी 10मुखियों ने भी विदेशी आक्रमण का प्रतिरोध करने की तैयारी कर ली। वे जानते थे कि यह करो या मरो की स्थिति है। रॉबर्टसन ने पहाड़ियों की तराई में पुलिस घेराबन्दी को मजबूत बनाया ताकि आर्थिक नाकेबन्दी को और प्रभावी बनाया जा सके। तीन वर्षों की लगातार लड़ाई के बाद लोगों का आर्थिक और सामाजिक जीवन तबाह हो गया था। व्यापार छिन्न-भिन्न हो चुका था और खेती बर्बाद हो गयी थी। लोग इसी उम्मीद के सहारे सभी कष्ट सह रहे थे कि एक दिन तिरोत सिंग और उनके साथी विजयी होंगे और एक बार फिर वे स्वतंत्र जीवन जी सकेंगे। तिरोत सिंग लोगों के मन में अपने प्रति विश्वास को जानते थे और यह भी जानते थे कि लोग उन्हें अपना एक मात्र नेता और मुक्तिदाता मानते हैं। परन्तु युद्ध की निराशाजनक स्थिति ने उन्हें उसके परिणाम के प्रति सशंकित कर दिया था। उनके गुप्तचरों ने उन्हें सूचना दी कि उनके आसपास के खासी राज्यों और बाहर के पहाड़ी राज्यों ने भी अंग्रेजों के आगे समर्पण कर दिया है। सिंग मानिक ने भी तिरोत सिंग को प्रतिरोध की निरर्थक परिणति को लेकर आगाह किया। इससे केवल उनकी प्रिय प्रजा के कष्टों में वृद्धि होनी थी। भारी मन से तिरोत सिंग ने अपनी प्रजा के दुखों और कष्टों के बारे में विचार किया और अन्त में आत्मसमर्पण करने का फैसला किया। इसके मूल में उनकी प्रजा का हित निहित था। उन्होंने 9 जनवरी 1833 को अपने विश्वस्त मंत्री जीत रॉय को अंग्रेज अधिकारियों से मिलने के लिये भेजा। जीत रॉय ने कैप्टन इंग्लिस को सूचित किया कि उनके स्वामी तिरोत सिंग ने आत्मसमर्पण करने का फैसला किया है और उनका जीवन बख्शा जाए। कैप्टन इंग्लिस के राजी होने पर 13 जनवरी 1833 को लुम मदियांग नामक स्थान पर राजा तिरोत सिंग ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस दुखद घड़ी में अपनी प्रिय प्रजा का ध्यान ही उनके लिए सर्वोपरि था।
राजा तिरोत सिंग ने साहसपूर्वक ब्रिटिश सरकार के एजेंट रॉबर्टसन के कोर्ट में अपने ऊपर चलाये जा रहे मुकदमे का सामना किया। रॉबर्टसन ने उनके ऊपर लगाये गये सभी अभियोगों के लिये उनको आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बाद में इस पर पुनर्विचार करके उन्हें ढाका में नजरबन्द कर दिया गया। कहते हैं कि जब तिरोत सिंग ढाका पहुंचे तो उनके पास कोई व्यक्तिगत सामान नहीं था। उनके शरीर पर सिर्फ एक कम्बल था। पहले उन्हें ढाका जेल में रखा गया पर बाद में सरकारी आदेश पर उन्हें साधारण कैदी नहीं बल्कि राजबन्दी मानकर 63 रुपये का मासिक भत्ता स्वीकार किया गया और दो नौकर रखने की अनुमति दी गयी। उन्हें अपने जीवन का अन्तिम समय एकान्त में और बन्दी के रूप में बिताना पड़ा। तिरोत सिंग की मृत्यु की तिथि के विषय में पहले विवाद था। परन्तु अब यह निश्चित रूप से माना जाता है कि उनकी मृत्यु 17 जुलाई 1845 को हुई। 16
तिरोत सिंग अन्तिम स्वतंत्र खासी राजा थे। यद्यपि वे एक छोटी सी रियासत के मुखिया थे परन्तु उन्होंने शक्तिशाली अंग्रेजी शासन के विरुद्ध मोर्चा लिया। उनका जीवन पीढ़ियों के लिये लीजेंड बन गया और वे अपने जीवन काल के बाद ‘कल्ट फिगर’ बन गये। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहले जिन अंग्रेज उच्चाधिकारियों ने उन्हें बर्बर, खून का प्यासा और हत्यारा कहा था, उन्होंने ही बाद में ‘‘उच्च कोटि के देशभक्त’’ के रूप में उनकी चर्चा की। डेविड स्कॉट ने प्रशंसापूर्ण शब्दों में इस महान खासी नेता की चर्चा की थी। यहाँ तक कि लार्ड कर्जन ने 1903 में तिरोत सिंग के साहस और सहनशीलता की प्रशंसा की थी। तिरोत सिंग एक ऐसे वीर पुरुष थे जो अपने आदर्शों के लिये जिए और अपना सर्वस्व इन्हीं 11आदर्शों और मूल्यों के लिये बलिदान कर दिया। त्याग, बलिदान और साहस के सम्पन्न उनका जीवन खासी युवाओं के लिये आदर्श बन गया। उन्होंने ढाका की जेल में बीमारी और मौत को अंगीकार किया पर उन्हें अंग्रेजों के अधीन मामूली मुखिया बनकर रहना स्वीकार नहीं था। अपनी प्रजा और देश के भले के लिए तिरोत सिंग को अंततः अपने आपको अंग्रेजी हुकूमत के हवाले करना पड़ा। पर भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उनका नाम अमर हो गया
सन्दर्भ

  1. Hamlet Bareh, Tirot Sing, 20
  2. Hamlet Bareh, (New Delhi: Publications Division, 1990) Tirot Sing, 20
  3. Jerlie Tariang, Tirot Sing, (New Delhi: National Publication, 1990), 20
  4. Hamlet Bareh, (New Delhi: Publications Division, 1990) Tirot Sing, 50
  5. Jerlie Tariang, Tirot Sing, (New Delhi: National Publication, 1990), 30
  6. K M Munshi, British Paramountcy and Indian Renaissance 2 parts (Bombay: Bharatiya Vidya Bhavan, 1963), I. 453
  7. Jerlie Tariang, Tirot Sing, (New Delhi: National Publication, 1990), 34
  8. वही, 55
  9. H. K Barpujari, Problem Of The Hill Tribes North-east Frontier 1822-42, (Guwahati: Lawyers Book stall, 1960), 65
  10. वही, 27-29
    डॉ. श्रुति पाण्डेय: सह आचार्य एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, शिलांग कॉलेज, शिलांग

मेघालय के वाहनों की करिश्माई भाषा

चैताली दीक्षित


आप सबने विभिन्न प्रकार के भाषाओं और उनकी विविधताओं के बारे में सुना होगा पर क्या आपको पता है कि मेघालय में वाहन भी आपस में बातें करते हैं? मेघालय की खूबसूरत वादियों में गोल सर्पाकार सड़कों पर सरसराते छोटे-बड़े वाहन आपस में चुपके से हॉर्न की मधुर भाषा में एक दूसरे से बहुत कुछ कह जाते हैंl किसी घर में मौत या गमी हुई हो तो घर के सामने से गुजरते सारे वाहन बहुत ही धीमी रफ्तार से उस घर के सामने से गुजरते हैं, जो मृत व्यक्ति को श्रद्धांजलि का प्रतीक माना जाता है। वाहनों के माध्यम से संवेदनशीलता की ये मिसाल क्या आपने कहीं और देखी या सुनी है? हर जगह ये वाहन धैर्य पूर्वक आपस मे ताल-मेल बिठाकर निकलते हैं। वाहनों के माध्यम से वाहनचालकों की आपसी समझदारी एवं धैर्य बेहद प्रशंसनीय है l पहाडी रास्तों पर संकरी सड़कों पर ऊपर से आते वाहन, चढ़ाई चढ़ते वाहनों को प्राथमिकता देते हैं और किनारे रुक कर उन्हे रास्ता देते हैं l चढ़ाई पूरी कर ऊपर आने वाले वाहन के चालक हॉर्न को धीरे से दबा दूसरे वाहन चालक को धन्यवाद देता है, जिसने ऊपर ही रुक कर चढ़ाई चढ़ते वाहन का मार्ग सुगम किया l इस मधुर धन्यवाद का जवाब प्रतीक्षारत वाहनचालक भी अपने वाहन के हॉर्न को धीरे से दबा कर देता है जिसका मतलब है “वेलकम” l इस प्रकार संकरे सड़कों पर लाखों वाहन बिना वाहन चालकों के अहंकार का शिकार हुए धैर्य पूर्वक गुजरते हैं l है ना करिश्माई? क्या हम यहां की वाहनों की खूबसूरत भाषाई परंपरा को देश के हर कोने तक नहीं पहुंचा सकते? वाहनों के इस खूबसूरत ताल-मेल मे सुकून एवं भयमुक्त वाहन चालन का आनंद बेहद खूबसूरत है चैताली दीक्षित: प्रवक्ता, सेंट एन्थोनी हायर सेकेंडरी स्कूल

(more…)

कर्नल साहब

नीता शर्मा

आज माँ को सिधारे पंद्रह दिन हो गए। सब नाते रिश्तेदार जा चुके थे। घर में कर्नल साहब तथा बेटा बहु और बेटी रह गए थे। रिटायर्ड कर्नल थे वो। रुतबे के मुताबिक ही खूब रौबदार और निहायत ही सख़्त किस्म के फौजी थे। रिटायर हुए लगभग दो वर्ष हो गए थे पर क्या मजाल किसीकी की घर को छावनी से बदलकर घर में परिवर्तित किया जा सके। आज भी पूर्णतया फौज के अनुशासन वाला कड़ा कानून ही चलता था घर में। माँ बेचारी ने जाने कैसे सारी उम्र काट दी एक फौजी का हुक्म सहते सहते। सारा परिवार अपने अफसर के आगे सदैव “यस सर” की मुद्रा में ही दिखाई देता।

कभी भी माँ से एक पति की तरह बात करते या हँसते-बोलते नहीं देखा था उनको। माँ भी तो बिना किसी शिकवा-शिकायत के, एक आदर्श भारतीय नारी के समान उनकी सेवा में रत रहती दिन रात। बस एक ही शौक बचा था माँ को, रेडियो पर फिल्मी गाने सुनने का। एक छोटा-सा ट्रांजिस्टर छुपा कर रखती थी अपने पास। जब भी समय मिलता अक्सर माँ गाने लगा कर साथ में गुनगुनाती थी। मगर पिताजी की गैर हाजिरी में ही ये संभव हो पाता। कर्नल साहब जानते थे माँ के इस शौक को पर क्या मजाल की कभी साथ मिलकर आनंद ले लेते। पिछले पंद्रह दिनों में बेशक मायूसी दिखी थी कर्नल साहब के चेहरे पर, लेकिन आँखों से एक बूंद ऑंसू बहते न दिखा किसीको।इतना भी क्या सख्त होना की जिस औरत ने सारी उम्र दे दी उनके घर परिवार को, उसके जाने का भी गम नहीं। सभी रिश्तेदार भी आपस में कानाफूसी करते दिखे।

“अजीब ही कड़क इंसान हैं ये! अरे इतना भी क्या सख़्त होना कि सावित्री जैसी पत्नी पर भी दो बूँद ऑंसू नहीं दिखे इनकी आँखों में। ”
“अरे कितने सख्त दिल हैं अपने कर्नल साहब। मजाल है जो एक ऑंसू भी निकला हो आँख से।”बेटा, बेटी को पिता की आदत पता थी पर इतने संगदिल होंगे उन्होंने भी सोचा न था। माँ के जाने से ज्यादा पिता के इस रूप को देखकर दिल व्यथित था दोनों का। एक बार भी पिता ने माँ की किसी बात का ज़िक्र तक नहीं किया। बिल्कुल चुप्पी साध ली थी। हमेशा की तरह काम की या कोई जरूरी बात ही की थी इतने दिन से।
आज भी रोजमर्रा की तरह रात को ठीक 8 बजे खाना खाकर आधा घंटा बाहर लॉन में टहलने के बाद ठीक नौ बजे अपने कमरे में चले गए थे कर्नल साहब।
सुबह ठीक 6 बजे उठ जाते थे और माँ हाथ में चाय का कप लिए खड़ी होती थी। चाय पीकर सुबह की सैर को निकल जाया करते थे। बीते पंद्रह दिन से भी यही दिनचर्या की शुरुआत थी उनकी। फर्क बस इतना था कि चाय अब बेटी बनाकर तैयार कर देती है। आज भी चाय का कप लेकर पापा को देने कमरे में चली गई। दरवाजे से झाँका तो स्तब्ध हो गई। अरे ये क्या? पापा और माँ का ट्रांजिस्टर! अपनी आँखों पर यकीन न हुआ ये देखकर कि कर्नल साहब आराम कुर्सी पर माँ का ट्रांजिस्टर गोद में रखे आंखे मूंदे कुछ सुन रहे थे। क्या ये कर्नल साहब ही हैं, उसके रौबीले पिता। बुत बनी देखती रही। आँखों में पानी भर आया और दरवाजा खटखटा सीधे अंदर घुस गई।
“पापा आपकी चाय?”
पर ये क्या? किसको पुकार रही थी वो। एक निर्जीव शरीर पड़ा था वहां तो। सख़्त दिल पापा तो माँ के पास जा चुके थे
नीता शर्मा, लेखिका, आकाशवाणी की पूर्वोत्तर सेवा में हिंदी उद्घोषिका।

भेद

अवनीत कौर ‘दीपाली’
अवनी ने बहुत गुस्से में फोन रखा और वही सोफे में बैठ अपनी आँखे बन्द कर खुद को सहज करने की कोशिश कर रही थी।
उसको रह रह कर फोन पर हुई बात परेशान कर रही थी! उसने कई जगह विज्ञापन दिया था की चार बच्चो को गोद देने के लिए।
उसी विज्ञापन को देखकर एक फोन आया . . .
अवनी ने फोन उठाया तो एक लड़की की आवाज थी. . . हेलो- मैं नीरा बोल रही हूँ! अवनी-हेलो, जी कहिए ! नीरा मैंने आपका विज्ञापन देखा मुझे भी एक बच्चा चाहिए।
अवनी-जी जरूर !
नीरा- बच्चा कितने महीने का है?
अवनी- 2 महीने का है।
नीरा -जी ठीक है, मैं कब लेने आ सकती हूँ?
अवनी- कभी भी आ सकती हैं।
नीरा-ठीक है मैं कल आऊँगी और मुझे मेल बच्चा चाहिए।
अवनी- पर मेरे पास तो सब फीमेल है मेल नहीं हैं।
नीरा- ओह, माफ कीजिए पर मुझे मेल ही चाहिए. . .
इतनी बात होते ही उधर से फोन कट कर दिया।
फोन रखते ही अवनी को गुस्सा आ रहा था। सोफे पर बैठी जब सोच रही थी की इंसानों ने जानवरों में भी लड़का लड़की (लिंगभेद) का भेद न छोड़ा। इतने में उसकी पालतू डॉगी प्यारी आ कर अवनी पास बैठ गई जसने 2 महीने पहले 4 फीमेल बच्चों को जन्म दिया था जिनकी अडॉप्टेशन के लिए उसने विज्ञापन दिया था।
अवनीत कौर दीपाली, का जालंधर पंजाब में जन्म हुआ। इनकी तुकांत, अतुकांत, लघुकथा, कहानी कई समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई है। अनेकों पत्रिका जैसे गृहशोभा, सरिता, वनिता गृहलक्ष्मी और असम की अनेकों पत्रिकाओं में इनकी कविताएं ज्ञापित हुई है। ।

रामकृष्ण मिशन शिलांग की साठवीं वर्षगांठ समारोह

स्वामी योगात्मानन्द

संस्मरणों की इस किश्त में मैं शिलाँग रामकृष्ण मिशन की साठवीं वर्षगांठ समारोह के आयोजन सें सम्बन्धित कुछ रोचक तथ्य लिखने जा रहा हूँ। यह आश्रम १९३७ में स्थापित हुआ था; १९९७ साल में इसकी साठवीं वर्षगांठ समारोह मनाने का विचार १९९६ के नवम्बर से ही साधु-भक्तों के बीच जोर पकड़ रहा था। इस विषय में कई संन्यासी और भक्तों, सहयोगियों गीयों के साथ चर्चा होती थी। इस कार्यक्रम का बड़े पैमाने पर आयोजन करने हेतु सभी में बड़ा उत्साह था।
वैसे तो शिलाँग में आये हुए मुझे मात्र सात-आठ महीने हुए थे उसपर इस स्तर का बड़ा आयोजन। जिसमें कई ज्येष्ठ संन्यासी विशेषतः, जो इस आश्रम से घनिष्ठ रूप से जुड़े थे, और कई क्षेत्रों में कार्यरत थे। इसके अतिरिक्त इस आश्रम से करीबी सम्बन्ध रखने वाले अनेक भक्तों का समागम भी अपेक्षित था। इसे किस प्रकार संपन्न किया जाए? इसके बारे में मैं अनभिज्ञ था। ऐसे आयोजन के लिए आवश्यक धन कैसे जुटाया जाए? यहाँ यह भी एक बड़ी समस्या थी। पाठकों को यहाँ विदित करा दूँ कि इस आश्रम के लिए स्थानीय भक्तों या शुभचिन्तकोंके द्वारा दान कम दिन ही मिलता था। आश्रम के सेवाकार्य पूर्णरूप से शासकीय अनुदान से संचालित होते थे। फिर मंदिर, खान-पान, उत्सव आदिके लिए भक्तों के द्वारा मिलने वाला दान किसी प्रकार पर्याप्त होता था।
किसी अन्य कार्य – कोई बड़ा उत्सव हो या कुछ निर्माण या मरम्मत का कार्य हो, धन जुटाना एक समस्या थी। वहाँ भक्तों में कम ही लोग धनवान कहे जा सकते थे। और व्यक्तिगत रूप से मुझे इस कार्य का कोई अनुभव नहीं था। अन्य साधु – भक्तों से सलाह मशवरा करने के उपरान्त तय किया गया कि इस समारोह के उपलक्ष्य में एक स्मारिका का प्रकाशन किया जाय। इसमें विज्ञापन देने के लिए कई स्थानीय या बाहरी प्रतिष्ठानों से अनुरोध किया जा सकेगा और इसके जरिये कुछ धन मिल सकेगा। स्मारिका में कुछ अच्छे लेख भी छपाये जाएँगे, जिसके द्वारा इस आश्रम के इतिहास और पुराने संन्यासी और भक्तों के मूल्यवान संस्मरण पाठकों के लिए प्रस्तुत किए जा सकेंगे। इस सुझाव पर सभी ने सहमति दर्शायी।
इसी बीच विवेकानन्द संस्कृति-केंद्र (Vivekananda Cultural Centre – क्विण्टन हाल) के अत्यावश्यक मरम्मत का और आश्रम में भक्तों और आगंतुकों के लिए शौचालय के निर्माण का कार्य भी चल रहा था। इस शहर में जल की बहुत बड़ी समस्या थी; जिसका जिक्र मैंने प्रथम किस्त में किया था। आश्रम की गतिविधियाँ चलाने हेतु आवश्यक जल की पूर्ति कैसे करें, यह समस्या आश्रम के प्रारम्भ से ही विद्यमान थी। शिलाँग में बड़ी मात्रा में बारिश होती है – इसे देखकर इस जल के संग्रह से इस समस्या का हल निकल सकेगा, ऐसा एहसास मुझे था। इस विषय में भी लोगों से चर्चा हो रही थी; और इसकी योजना और नक्शा भी बन रहा था। इस कार्य के लिए भी बड़े धन की आवश्यकता थी।
जब साठवीं वर्षगांठ समारोह का चिन्तन चल रहा था और किन विशिष्ठ ज्येष्ठ और महनीय संन्यासियों को निमंत्रण किया जाय इसपर चर्चा हो रही थी, तब श्र. स्वामी विश्वनाथानान्द जी, जो उन दिनों निकटस्थ चेरापुंजी आश्रम के प्रमुख थे और बड़े ही विचारशील और सहदय थे, उन्होंने एक अति महत्त्वपूर्ण परामर्श दिया, जो आज भी मेरे लिए एक दिशा दर्शक तत्त्व के रूप में बना हुआ है। वे मुझसे काफी ज्येष्ठ और वरिष्ठ थे, और विनम्र स्वभाव के बावजूद अपना मन स्पष्ट रूप से कह देते थे। उन्होंने कहा – ‘जब इतने बड़े पैमाने पर आयोजन कर रहे हो तो सर्वप्रथम बेलुड़ मठ जाकर परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज के समक्ष इस बात को रखो, उनसे परामर्श लो, आशीर्वाद लो; फिर व्हाइस प्रेसिडेंट, जनरल सेक्रेटरी आदि सभी को इस संकल्प से अवगत कराओ, उनसे मार्गदर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करो और फिर आगे बढ़ो।’ ‘कच्चा काम मत करो’ – इस वाक्य को वे बारबार दोहरा रहें थे। यह तो निश्चित रूप से प्रथम, प्रधान बात थी। इसी समय पू. स्वामी गहनानन्द जी से फोन पर किसी अन्य प्रसंग को लेकर बात हुई। उन दिनों वे रामकृष्ण संघ के व्हाइस प्रेसिडेंट थे और शिलाँग आश्रम से उन्हें विशेष लगाव था। वे कई वर्षों तक यहाँ कार्यरत थे; इस आश्रम की उन्नती में उनका बड़ा योगदान था। जब साठवीं वर्षगांठसमारोह के बारे में उन्हें बताया तो उन्होंने मुझे अगरतला आकर उनसे मिलने के लिए कहा। वे भक्तों को मंत्रदीक्षा प्रदान करने हेतु अगरतला आ रहे थे। उनका आदेश शिरोधार्य कर मैं आश्रम की जीप लेकर ड्राइवर के साथ अगरतला की यात्रा के लिए निकला। २१ जनवरी १९९७ को, करीमगंज आश्रम में एक रात रुककर, अगरतला आश्रम पहुँचा। उन्होंने मिलने के लिए देर रात का समय दिया।
‘देखो – शिलाँग के आश्रम का सम्बन्ध पुराने असम राज्य से है। (असम का बाद में ७ राज्यों में विभाजन हुआ)। इसीलिए इस साठवीं वर्षगांठ महोत्सव में वहाँ के सभी साधु-भक्तों को आमंत्रित करना चाहिए। कार्यक्रम ६ – ७ दिनों तक पूरे उत्साह के साथ होना चाहिए। एक दिन भक्त-सम्मलेन हो, एक दिन Tribal Welfare Conference होगी, एक दिन सर्व-धर्म सम्मलेन होगा, एक दिन शास्त्रीय संगीत का आयोजन होगा…. ’ वे इस कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे; उन्होंने समारोह की तारीख (संभावित) भी बतायी – मई ६ से १२। उनका आशीर्वाद पाकर शिलाँग लौट आया।
इसके बाद फरवरी के २७ – २८ तारीख को बेलुड़ मठ में परम पूजनीय प्रेसिडेंट भूतेशानन्द जी से मिला। उन्हें इस महोत्सव की खबर दी। वे १९३७ से कई वर्षों तक शिलाँग आश्रम के प्रमुख रहे थे। उन्होंने ढेर सारे आशीर्वाद दिया। उनके स्वास्थ्य के दृष्टि से शिलाँग की यात्रा करना उनके लिए कई कतई संभव नहीं था। फिर भी मैंने उनसे इस महोत्सव में आने का अनुरोध किया। विनोदप्रिय भूतेशानन्द जी ने कहा, ‘अरे, मुझे इन सेवकों ने पूरा बन्दी बना दिया है; अपनी इच्छा से मैं कहीं भी नहीं जा सकता। तुम इन सेवकों से बात करो…। ’
इसी दौरान पू. लोकेश्वरानन्द जी से भी भेंट की। उन्होंने तुरन्त इस महोत्सव में आने का अभिवचन दिया। पूज्य प्रमेयानान्द जी ने भी आने का आश्वासन दिया। कलकत्ते में और भी कुछ काम था। उन्हें समाप्त कर मैं शिलाँग पहुँच गया।
समारोह का आयोजन अब जोर से चलने लगा। धन भी थोड़ा-थोड़ा आ रहा था। मेघालय के मुख्य सचिव श्री दिलीप कुमार गंगोपाध्याय जी ने पूरा सहयोग देने का वचन दिया और उसे पूरा भी किया। North East Electric Power Co. (NEEPCO) के एक प्रधान अधिकारी पी. के. चटर्जी ने भी स्मारिका में एक बड़ा विज्ञापन देने के साथ और भी सहयोग – गाडी-ड्राइवर, गेस्ट हॉउस आदि – देने का वादा किया। दैनिक ‘Shillong Times’ के सम्पादक श्री मानस चौधरी जी ने भी कई प्रकार की सहायता करने का आश्वासन दिया; उनका जनसम्पर्क बहुत अच्छा था और इस क्षेत्र की खासी – जयन्तिया जन जातियों में इस समारोह का प्रचार करने हेतु उनका सहयोग मूल्यवान रहा।
स्मारिका के मुद्रण में विलम्ब हो रहा था और छपाई का स्तर भी अच्छा नहीं था। मुद्रण जब किसी प्रकार पूरा हुआ तो देखा कि उसमें गलतियों की भरमार है। अब कुछ सुधार करने का समय नहीं था। दुसरे दिन से ही समारोह शुरू होने जा रहा था। मई के ३ तारीख से ही कई ज्येष्ठ संन्यासियों का आगमन होने लगा। ५ मई को पू. गहनानन्द जी महाराज उनके समस्त सहयोगी संन्यासी ब्रह्मचारी वृन्द के साथ पधारे। ६ मई को १६२ भक्तों को उन्होंने मन्त्रदीक्षा प्रधान की। सुदूर क्षेत्रों से बड़ी संख्या में भक्तों का भी शुभगमन हो रहा था। कई कार्यक्रम भी एक साथ चल रहे थे – पूजा, भजन, व्याख्यान इत्यादि। दुसरे दिन सुबह भी करीब सौ लोगों की मन्त्रदीक्षा हुई और फिर शाम को मुख्य कार्यक्रम था – जिसमे वहाँ के राज्यपाल महोदय M. M. Jacob और गृहमंत्री राबर्ट लिंगडोह भी थे। आश्रम का सभागृह पूरा भरा था – करीब ४५० – ५०० तक श्रोतागण थे।
८ मई को आदिवासी जनकल्याण के विषय में एक कार्यशाला (workshop) विवेकानंद कल्चरल सेंटर में आयोजित किया गया। आदिवासी क्षेत्रों में कार्यरत रामकृष्ण मिशन के कई संन्यासी और कुछ अन्य ज्ञानी लोगों ने अपने विचार रखे और अच्छे खासे प्रश्नोत्तर भी हुए। दुःख की बात यह थी कि ऐसे उपयुक्त बोधपूर्ण कार्यशाला में श्रोताओं की अच्छी उपस्थिति नहीं थी।
९ मई को कई सन्माननीय अतिथीगण पहुँचे, अगले दिन के सर्वधर्म सम्मलेन के लिए। इन महानुभावों में से कई लोगों के निवास की व्यवस्था शासकीय अतिथि-गृह में की गई थी, जो कि मेघालय सरकार के प्रमुख सचिव दिलीप कुमार गंगोपाध्याय जी ने उपलब्ध करा दिया था।
शुक्रवार ९ मई को सुबह ९ बजे के आसपास एक भूकम्प हुआ। कुछ समय के लिए बिजली गुल हो गयी। कई आगंतुकों को बड़ा भय हुआ। किन्तु पंद्रह मिनिट के उपरांत सब नार्मल हुआ। इसी दिन विवेकानन्द कल्चरल सेंटर में भक्त-सम्मलेन का आयोजन हुआ था जिसमें कई वरिष्ठ संन्यासियों के सुंदर, मार्गदर्शक व्याख्यान हुए। इनमें गोकुलानन्द, जितात्मानन्द, अमरात्मानन्द, प्रमेयानान्द आदि थे। भक्ति संगीत भी बहुत अच्छा था। बड़ी संख्या में भक्तों ने इसका लाभ उठाया। इसी दिन श्रद्धेय लोकेश्वरानन्द जी का शुभगमन हुआ। गुवाहाटी से शिलाँग की यात्रा के दौरान गाड़ी खराब हो जाने के कारण उन्हें बड़ा ही कष्ट हुआ। फिर भी वे प्रसन्नवदन थे। अन्य कई माननीय भक्तगण भी उसी दिन पहुँचे।
शनिवार को सर्वधर्म-सम्मलेन हुआ। मेघालय के शासकीय सभागृह में इसका आयोजन हुआ था। यह कार्यक्रम अतीव बोधप्रद श्रवणीय तथा संस्मरणीय हुआ। विशेष उल्लेख करने योग्य थे बलबीर सिंह जी और स्वामी लोकेश्वरानन्द जी के व्याख्यान। रविवार ११ मई को युवा सम्मलेन हुआ। बड़े ही उत्साह के साथ और बड़ी संख्या में युवकों ने इसमें हिस्सा लिया। फिर दोपहर के बाद लीला -गीती। भक्तिसंगीत का सुंदर कार्यक्रम हुआ। इसके बाद के दो दिन प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद रशीद खान का सुरीला गायन हुआ। इस प्रकार यह पूरे ७ दिन का (७ से १३ मई) कार्यक्रम अच्छी तरह सम्पूर्ण हुआ। इस के आयोजन में कई प्रकार की त्रुटियाँ रही, फिर भी श्रीरामकृष्ण देव की कृपा से मोटे तौर पर वह सफल हुआ।
स्वामी योगात्मानन्द वेदान्त सोसाइटी आफ प्रोविडेन्स के मंत्री एवं अध्यक्ष हैं।

श्री माँ सारदा देवी व नारी जागरण

स्वामी सर्वभूतानन्द

Art By Ms Graciela Caivano, Argentina

श्री माँ सारदा देवी व नारी जागरण

इस विषय को हम दो तरह से देख सकते हैं। श्री माँ को केंद्रित कर नारी जागरण अथवा नारी जागरण के संबंध में माँ का विचार। हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि उनके मुख से ऐसी कोई वाणी उच्चारित नहीं हुई, जो समाज के लिए चरम आदेश स्वरूप हो। वे हमेशा ही अवगुण्ठन में रहती थी, जिन्होंने हमें दिखाया की जीवन कैसे जीना चाहिये। बातों को जीवन में प्रधानता ना देकर वाणी को जीवन में किस तरह उतारना चाहिए यह हम उनके जीवन से पाते है। श्रीमाँ के महाप्रयाण के बाद स्वामी विवेकानन्द के विदेशिनी शिष्या मिस मैक्लाउड एक चिट्ठी में लिख रही हैं ‘वह दीप तो फिर बुझ गया जो दीप हजारों वर्षों तक विश्व के नारी जाति को राह दिखाएगी।

इनके साथ साथ हम भगिनी निवेदिता की विख्यात ग्रंथ “स्वामी विवेकानन्द जैसा उन्हें देखा” का भी उल्लेख कर सकते हैं। वहाँ वह लिखती हैं, ‘श्री माँ क्या प्राचीन आदर्श की अंतिम प्रतिनिधि हैं? या नवीन आदर्श के अग्रदूत?’ स्वामीजी की शिष्यायें ही नहीं बल्कि स्वामीजीने भी अपने गुरु भाइयों को विदेश से जो पत्र लिखा है, वहाँ स्पष्ट उल्लेख करते है, ‘श्री माँ को केन्द्रित कर कितनी गार्गी मैत्रेयीयों का जन्म होगा।’ तो इस प्रकार हम देखते हैं कि देश में माँ को केन्द्रित कर नारी जागरण की बातें, तो दूसरी तरफ समस्त विश्व के नारीयों को किस प्रकार जीवन जीना है उसका संकेत भी हम श्री माँ के जीवन से पाते हैं। माँ के जीवन में हम प्राचीन एवं नवीन का समन्वय देखते हैं। साथ ही प्राच्य नारी व पाश्चात्य नारी के व्यक्तित्व का अपूर्व सम्मेलन हमें उन्हीं की जीवन में देखने को मिलता है। अतः हमें श्री माँ सारदा देवी व नारी जागरण की चर्चा में इन दो पहलुओं को विचार में रखना होगा।जिस समाज में श्रीमाँ का जन्म हुआ, उस समाज में नारीयाँ अपने जीवन को घर के दरवाजे से पूजा घर तक केवल दुख झेलने और आँसू विसर्जन करने का एक कारखाना बना रखा था।
माँ उसी घर में ले आती है युक्ति, विज्ञान, समाजचेतना और प्राचीन आध्यात्मिक दर्शन की रोशनी। वह दिखा देती है कि इसी छोटे से पूजा गृह में नारी अपने जीवन को तैयार करने में समर्थ (सक्षम) है। जीवन को ऐसे रूपान्तरित करना है कि अपने लिए तो आँसू नहीं बहाना है और दूसरों के आँसू पोंछने के लिए भी जीवन को तैयार करना है।

माँ जिस ऐतिहासिक युग में जन्म ग्रहण करती हैं, वह युग है नवजागरण का सन्धिकाल। इस नवजागरण को ऐतिहासिकगण नारी जागरण का दूसरा पहलू बताते हैं। 19वीं शताब्दी के नवजागरण का एक उल्लेखनीय अंग नारी जागरण भी है। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे समाज- सुधारकों ने सती प्रथा रद्द, विधवा विवाह का प्रचलन आदि संस्कार कार्यों में उल्लेखनीय भूमिका प्रदान किया हैं। अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में यदि हम देखे तो देखते हैं कि उस समय अमेरिका में नारी के वोट अधिकार अर्जित करने का आंदोलन तथा फेमिनिस्ट आंदोलन का आरम्भ हो चुका था। ऐसी परिस्थिति में भारत तथा विश्व एक सामंजस्यपूर्ण राह ढूँढने की चेष्टा कर रहीं थी। ऐसे एक महत्वपूर्ण काल में श्रीमाँ जन्म ग्रहण करती हैं।
हम देखते हैं कि निवेदिता कह रहीं हैं, ‘श्रीमाँ प्राचीन आदर्शों की अंतिम प्रतिनिधि हैं।’ वास्तव में प्राचीन नारीयों की आदर्श स्वरूप श्रीमाँ एक ही आधार में गार्गी, मैत्रेयी और लीलावती हैं। जहाँ मैत्रेयी के मुँह से हम सुनते हैं अमृतत्व पाने की वाणी ‘जो धन हमें अमृतत्व प्रदान नहीं करता उस धन से मेरा क्या प्रयोजन…’।
उसी की परछाई हम माँ के जीवन में पाते है। जब माँ दक्षिणेश्वर आती हैं और रामकृष्णदेव एक दिन उनसे पूछते हैं, ‘क्या तुम मुझे संसार के पथ में खींचने के लिए आई हो?’
श्री माँ अनायास ही उत्तर देती है ‘नहीं संसार के पथ में खींचने के लिए क्यों. . । मैं तुम्हें ईष्ट पथ में सहायता करने के लिए आई हूँ।’ श्रीरामकृष्ण का ईष्ट पथ क्या है? इस जगत को अमृतपद लाभ करने के उपयोगी बनाना। इसीलिए उनकी अमोघ वाणी है ‘तुम लोगों का चैतन्य हो’। माँ अवगुण्ठनवती है, उनके भीतर मूर्त है, भारतीय नारी का एकमात्र पति प्रेम मानो वह एक काव्य हो।
श्रीरामचंद्रमयी सीता की तरह श्रीमाँ भी श्रीरामकृष्ण गतप्राणा है। ‘श्रीरामकृष्ण के विश्व प्रेम को धारण करने की एक अपूर्व पात्र है।’
यह उक्ति भगिनी निवेदिता की है। रामकृष्णदेव स्वयं माँ को भार समर्पण करते हैं। काशीपुर में वे श्रीमाँ से कहते हैं, ‘कलकत्ते के लोग कीड़ों की तरह किलबिला रहे हैं। तुम उनको देखना।’ ‘परवर्ती काल में इस संबंध में माँ अपने सेवक से कहती है “मैं और क्या कर पा रही हूँ, कितनों को देख पा रही हूँ। वे तो सभी का भार मुझ पर सौंप गये हैं! सबको देख पाती, तब न होता! पति के जीवनव्रत की तरफ कितनी सजग दृष्टि। दूसरी तरफ आध्यात्मिक गंभीरता को देखें तो पति ही ईष्टदेव है। इस बात का दृष्टान्त, काशीपुर में लीलासंवरण के बाद, श्रीमाँ की मुख से निकली हुई विख्यात वाक्य ‘ओ माँ काली, मुझे छोड़ कहाँ गई’ से मिलता है।
भारतीय आदर्शों के अनुसार! यथार्थ सहधर्मिणी। उधर सिर्फ पतिनिष्ठ स्त्री ही नहीं ज्ञानदायिनी माँ भी है। श्रीमाँ के मुँह से हमेशा भारत की चिरंतन ज्ञान की स्फुलिंग उज्जवल रूप से प्रकाशित होती है।
‘श्रीश्रीमाँ की बातें’ ग्रंथ में एकदिन की वर्णन कि ओर यदि देखें-
‘उद्‌बोधन में एक भिन्न सम्प्रदाय की भगवाधारी साधिका का। उनके प्रिय गुरुदेव ऋणग्रस्त हैं। वह उनके लिये धन संग्रह करने के लिये निकली हैं। अचानक श्रीमाँ से वह प्रश्न करती हैं, (उनके) गुरु देव मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करते। इसमें आपकी क्या राय है! ’ श्रीमाँ पहले गुरुवाक्य में विश्वास करना चाहिये कहकर, उसको निरस्त करती हैं। वे कहने लगी, “नहीं, आपको अपनी राय देनी ही होगी।” माँ ने पुनः अपनी राय देने में असहमति जतायी, पर भगवाधारिणी किसी प्रकार भी छोड़ने को राजी नहीं। तब माँ ने कहा, “वे (तुम्हारे गुरु) यदि सर्वज्ञ होते – यह देखो तुम्हारे जिद के कारण, बात से बात निकली तब वे ऐसी बात नहीं कहते। पुरातन काल से कितने ही लोग मूर्ति की उपासना करके मुक्तिलाभ करते आ रहे हैं। वह क्या कुछ नहीं है? हमारे ठाकुर की उस प्रकार की संकीर्ण भेदबुद्धि नहीं थी । ब्रह्म सभी वस्तुओं में है। पर बात यह है साधु पुरुषगण सब आते हैं मनुष्य को रास्ता दिखाने। अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग प्रकार की बातें कहते हैं। रास्ते अनेक हैं, इसलिए उन सबकी बात ही सही हैं। जैसे एक वृक्ष में सफेद, काला, लाल इत्यादि विभिन्न रंगों के पक्षी आकर बैठते हैं तथा तरह-तरह की बोली बोलते हैं। सुनने में अलग-अलग होने पर भी हम उन सबको पक्षी की बोली कहते हैं। एक ही बोल पक्षि का है और दूसरे नहीं है ऐसा हम नहीं कहते।”
रामकृष्ण देव की सर्वधर्म समन्वय की वाणी को ही माँ ने के भिन्न रूप से प्रकट किया है। फिर एक संतान माँ को पत्र लिखते हैं। उसमें उन्होंने अभिमान प्रकाश किया है, इतना जप-ध्यान करने पर भी अपने प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगा पा रहा हूँ। यहाँ अपने आहत, अक्षम संतान के प्रति माँ के मुँह से अभय वाणी निकलती है, ‘यह जो पानी है, वह सदा नीचे की ओर ही बहती है, उसे भी सूर्य की किरणें ऊपर खींच लेती हैं। उसी प्रकार जिस मन का स्वभाव ही हैं नीचे की तरफ यानि भोग वस्तु में जाने का, उसे भी भगवान की कृपा ऊर्ध्वगामी करती हैं।’
श्रीमाँ का अपने भक्त संतानों को उपदेश देने का ढंग ही अलग था। वे जीवन को दृष्टांत स्वरूप रखकर उपदेश दिया करती थी।
स्वामी शांतात्मानन्द से वे कहती हैं, “बुरे कर्मों की तरफ मन हमेशा आकर्षित होता है, अच्छे कर्म में मन जाना नहीं चाहता। देखो न पहले मैं रोज रात के तीन बजे उठकर जप करती थी, एक दिन आलस वश मैंने जप नहीं किया, तो कुछ दिन बाद बंद ही हो गया। इसलिये अच्छे कार्य करने के लिये बहुत ज़िद चाहिये। नहबत रहते समय, रातों में जब चाँद उठता, तो गंगा में उसके छवि को देख भगवान से रो-रो कर प्रार्थना करती कि चाँद में भी कलंक हैं, मेरे मन में कोई काला न रहे।’ इस प्रकार का आध्यात्मिक विषयों में और सांसारिक विषयों में माँ के परिश्रम को हम मूर्त देखते हैं। उन्होंने हर क्षेत्र में असाधारण साधना का परिचय दिया है। इस विषय को आज के नारी के सशक्तिकरण का अनुपम उदाहरण के रूप मे देखा जा सकता है। श्रीमाँ की नहबत के जीवन में एक ओर जहाँ कर्म निष्ठा थी तो दूसरी तरफ ध्यान व आध्यात्मिकता।
इसीलिए ठाकुर माँ से कहते थे, ‘कर्म करना चाहिए, स्त्री जाति को बैठे नहीं रहना चाहिए बैठे रहने से अनेक प्रकार की कुचिंताए आती है। श्रीमाँ इसे उल्लेख कर कहा करती थी, ‘ठाकुर मुझे कुछ पटसन (jute) लाकर देते और कहते इनसे मुझे रस्सी बना कर दो। मैं इन्हे छत में लटका कर मिठाई आदि रखा करूँगा।’ मैंने एसा ही किया था और उसके बचे हिस्से से तकिया बना कर रात को सिरहाने में रख कर सोती थी। उन्होंने बताया ‘वह तकिया और आजकल जो तकिए में सिर रखकर सोती हूं, उसमे कोई फर्क मालूम नहीं पड़ता। नींद वैसी ही आती है। माँ स्त्रियों के जीवन में संतोष, संसार में शान्ति संचार करती है जो परिवार को सुन्दर बनाती है। समाज को दृढ़ता प्रदान करती है। इस संतोष के लिए जरूरी है आन्तरिक रूप से आध्यात्मिक भाव से भावित होना। आजकल के आधुनिक समाजविज्ञानी नारी जागरण के लिए स्त्रियों में अध्यात्म भावना का होना स्वीकार करते हैं। प्रख्यात समाजविज्ञानी ‘उर्सुला किंग’ अपने ग्रंथ में लिखती है- स्त्रियों को आध्यात्मिक धारक, एवं वाहक बनना है। वे ऐसी एक समाज की कल्पना करती हैं, जहाँ स्त्री के प्रति अत्याचार नहीं है। वे दर्शन, स्वतंत्रता, मुक्त चिंता की अधिकारी है। स्त्रियों के इस रूप को अपने ग्रंथ में सुश्री किंग श्रीमाँ की बात स्पष्ट रूप से उल्लेख करती हैं। प्राचीन भारतीय नारीयों में जो त्याग, तपस्या तितिक्षा आदि हम देखते हैं, श्रीमाँ के जीवन का हर पहलू उसी दृष्टि से उज्जवल है। साधारण व्रत आदि से लेकर वेदान्त के गहन दर्शन भी उनके जीवन में मूर्त हुआ है।
हम जानते हैं श्रीमाँ ने बेलुड़ के नीलांबर मुखर्जी के घर के छत पर पंचतपा का अनुष्ठान किया था। बाद में इस व्रत करने का तात्पर्य के विषय में भक्तों के पूछे जाने पर माँ सहज भाव से उत्तर देती हैं, ‘यह सभी लड़कियों की व्रत है, पार्वती ने शिव के लिए किया था। लोक शिक्षा के लिए इन व्रतों का करना। नहीं तो लोग समझेंगे कि खा पीकर मस्ती में है।’ अत: माँ प्राचीन भारत की मूर्त विग्रह है। ।
भगिनी निवेदिता अपने विदेशिनी संगिनीओ को लेकर कामारहाटी के गोपाल माँ को देखने गई थी। स्वामी विवेकानन्द ने इस सन्दर्भ मे कहा की, ‘तुम लोग आज प्राचीन भारत को देख आई हो। वह त्याग तितिक्षा रूप भारत आज समाप्त हो रहा है। वह फिर कभी वापस नहीं आएगा।’ माँ के जीवन को देख कर भी हम वही बातों को दोहरा सकते हैं। वैदिक युग की नारी हो या की पौराणिक नारी; महाकाव्य की नारी और सत्य युग के नारीयों का सकारात्मक पहलू उनके जीवन में परिलक्षित होता है। ।
और यदि वर्तमान भारत के अग्रदूत के रूप में देखे तो उस क्षेत्र में भी वह अनन्या है, अद्वितीय है। आज के समाज में खड़े होकर हम इससे अवगत हैं कि अस्पृश्यता, जातपात वाली विभेद नीति ये सभी धर्मतत्व नहीं है, बल्कि मनुष्य ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए इस प्रथा का प्रचलन किया है। यह सब आज हम माँ के जीवन को सामने रख समझने में समर्थ होते हैं कि उस युग में खड़ी होकर समाज के लिए उन्होने एक उत्कृष्ट दृष्टान्त रखी है।

वह जात-पात के लक्ष्मण रेखा के ऊपर उठकर अमजद को पुत्र रूप से स्वीकार करती हैं। बागदी (बंगाल के एक अनुसूचित जात) डकैत से पिता-पुत्री का संबंध स्थापित करती है। भगिनी निवेदिता को सादर अपने गोद में स्थान देती है। जिस समय कालापानी (समुद्र) पार करने से जात चली जाती हो, ऐसे समय में सन्यासी सन्तान को विदेश जाने की अनुमति देती है। घर में रहकर भी मन का इस प्रकार विस्तार धर्म इतिहास में आप और कहीं नहीं पायेंगे।
नूतन को ग्रहण करने की उदारता हम माँ के जीवन में मूर्त देखते हैं।
वह गौरी माँ से कहती हैं, ‘उनसे कह दो, सिर्फ घर गृहस्थी करने के लिए उनका जन्म नहीं हुआ है।’ इस तरह नारी जीवन को उन्होने एक सम्यक रूप से विशिष्टता प्रदान की।
कोई अभिभावक उनसे दुख से कहते हैं कि लड़कियों की शादी नहीं करा पा रहे हैं। उनका साफ साफ उत्तर होता, ‘यदि शादी नहीं करवा सकते, तो उन्हें निवेदिता स्कूल में दाखिला कर दो, लिखना पढ़ना सीखें।’ इधर गौरी माँ की एक छात्रा से वे पूछती है कि ‘घर जाकर खाऊँगी’ इसका अंग्रेजी क्या होगा।
इस तरह एक नारी के उन्मुक्त मन को माँ ने सादर से ग्रहण किया है। परंतु दुख की बात है कि आज के तथाकथित नारी आंदोलन के साथ माँ की मानसिकता का उच्च सोच साफ झलकता है।
श्री माँ कभी भी नारी को पुरुषों के समान होने की बात नहीं कहती हैं। कोई भक्त महिला माँ से कहती है लज्जा, घृणा, भय यह तीन नही रहना चाहिए। माँ तुरंत कह उठती है ‘नहीं बेटे यह सन्यासियों के लिए हैं, लड़कियों के लिये लज्जा, घृणा, भय इन तीनों का प्रयोजन है। जिसके पास है भय उसका होगा जय।’ वे तर्कसंगत बातों में विश्वास करती है पर विसंगत बातों को उन्हानें स्थान नहीं दिया। इस प्रकार माँ के जीवन में नवीन एवं प्राचीन के समन्वय के साथ-साथ प्राच्य एवं पाश्चात्य के मिलन को भी पाते हैं। प्राचीन आर्यों में जिस प्रकार की समाज चेतना और विभित्र नागरिक चेतना देखने को मिलता है, वह माँ के जीवन में भी विराजमान है। परंतु विशेषता यह है कि माँ ने उसे भारतीय भावना से अनुरंजित किया है। विल्सन के 14 दफा मांगों के साथ विश्वयुद्ध बंद हुआ। माँ एक सन्तान से उन मांगों को सुनना चाहा। सब सुनकर माँ कहती हैं ‘सभी मुखस्थ यानि सिर्फ मुँह से कही हुई बात है, यदि अंतस्थ होता (अर्थात हृदय से प्रेरित होता) तो बातें कम होती।’
एक भक्त बिना मिलावट वाला दूध पाने के लिए दूध के मूल्य में वृद्धि करने की बात करने से उनको कहती हैं, – ‘दुध की कीमत क्यों बढ़ा रहे हो?’ इस प्रकार की कितनी असाधारण दूरदृष्टि उनमें थी, अभी इस युग में सोचकर हम आश्चर्यचकित होते हैं।
एक दिन माँ के प्रिय शिष्य प्रबोध बाबू माँ से कहते हैं कि अंग्रेजों ने कितने प्रकार के सुख-सुविधाएं प्रदान किया हैं। यह कहकर उनका गुणगान करते हैं। सब सुनने के पश्चात माँ कहती हैं ‘हाँ बेटे, यह सब तो हुआ परंतु पहले इतनी अनाज की कमी नही थी, अब तो अन्न का अकाल है’।
केवल नवीन एवं प्राचीन का समन्वय नहीं, या सिर्फ प्राच्य एवं पाश्चात्य का मिलन ही नहीं , माँ अपने जीवन से नारी को एक निजस्वता में विचरण करने क्षेत्र दिखला दिया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि विस्तार में ही नारी का मातृत्व है। इस मातृत्व में वे श्रीरामकृष्ण को भी प्रवेशाधिकार नहीं दिया। वे खुद कहती हैं ‘मैं सचमुच में माँ हूं, ’। गर्भ में पालन न कर भी किस प्रकार सत्य जननी बना जा सकता है, वह हमें माँ के जीवन से ही सीखना है।
माँ इसी विस्तार को हमें सिखलाती है। भारतीय नारीयों के समक्ष एक ऐसा आदर्श जीवन रख गई है कि जो नारीत्व के गरिमा से परिपूर्ण है जो एक नए नारीवाद के विचारधारा को वहन करती है, जहाँ माँ कुछ तोड़ती नहीं जोड़ती हैं। जोड़ने के लिये आह्वान करती हैहुई।
स्वामी सर्वभूतानन्दजी रामकृष्ण संघ के एक वरिष्ठ साधु, व रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के ट्रस्टियों में से एक हैं, जो वर्तमान में रामकृष्ण मिशन, मठ चांदीपुर के सचिव हैं। उन्होंने अपना मठ जीवन नारायणपुर केंद्र से शुरू किया और गोलपार्क, इलाहाबाद केंद्रों की अध्यक्ष के रूप में सेवा की। वह 2017 से 2021 तक शिलॉन्ग सेंटर के प्रमुख थे। उनके प्रेरणा से 2020 को त्रिभाषी पत्रिका ‘का जिंगशाई, द लाइट’ शुरू हुई।

पूर्वोत्तर में आध्यात्मिक सूर्योदय के अग्रदूत

डॉ अवधेश कुमार ‘अवध’
‘स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।’ जी हाँ, राज की पूजा उसके देश में होती है, वो भी भय से, इसके विपरीत विद्वान् की पूजा दुनिया भर में होती है, वो भी पूरी श्रद्धा से। उन्नीसवीं शताब्दी का अंत और बीसवीं शताब्दी की शुरुआत एक ऐसे परिवेश में हुई जिसमें अधिकांश दुनिया परतन्त्र थी। न केवल भौगोलिक अपितु धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से हमारा देश भी गुलाम था। धर्म के नाम पर पाखंड, कुप्रथाएँ और रुढ़ियाँ मनुष्यता पर भारी थीं। अतीत कालीन विश्वगुरु और सोने की चिड़िया के रूप में संज्ञा प्राप्त भारत की गुरुता मृतप्राय हो रही थी और सोने की चिड़िया से सोना नदारद था। बहुमुखी समस्याओं से जूझते भारत में समय-समय पर जागरण अभियान एवं आन्दोलन चलाए जाते किंतु सब ऊँट के मुँह में जीरा साबित होते…..अपर्याप्त थे। इसी बीच कलकत्ता में 13 जनवरी सन् 1863 को एक शिशु ने जन्म लिया जिसका नाम नरेन्द्र नाथ दत्त रखा गया। ज्यों-ज्यों नरेन्द्र नाथ दत्त बड़े होते गए, उनकी यशोकीर्ति बढ़ती गई। रामकृष्ण परमहंस उनके गुरु हुए और नरेन्द्र नाथ दत्त स्वामी विवेकानन्द बन आए। इस सपूत के पाँव पालने में ही परिलक्षित होने लगे। स्वामीजी ने अपने गुरु के नाम पर रामकृष्ण मिशन की स्थापना की जिनकी संख्या दुनिया भर में अब बढ़कर 177 से अधिक हो गई है।
11सितम्बर 1893 को शिकागो, अमेरिका में धर्म सम्मेलन रखा गया था जिसमें सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व स्वामीजी ने किया। इसमें तीन प्रमुख बातों को बताना आवश्यक हो जाता है। अमेरिका यात्रा के दौरान 30 वर्षीय स्वामीजी से 54 वर्षीय टाटा जी की मुलाकात हुई। बातों के दौरान स्वामीजी ने उन्हें भारत में स्टील फैक्ट्री और रिसर्च यूनिवर्सिटी स्थापित करने का सुझाव दिया। टाटा जी ने दोनों कार्य करके दिखाया। कहना नहीं पड़ेगा कि भारत की उन्नति में इन दोनों संस्थानों का कितना योगदान है! दूसरी प्रमुख घटना हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट से मुलाकात की है। जब जॉन हेनरी को पता चला कि धर्म संसद में स्वामीजी को प्रवेश की अनुमति परिचय पत्र के अभाव में नहीं मिल पा रही है तो उन्होंने कहा कि, “आपका परिचय मांगना ठीक उसी तरह है जैसे सूर्य से स्वर्ग में चमकने के लिए उसके अधिकार का सबूत मांगना।” तीसरी घटना धर्म संसद में अप्रतिम सम्बोधन से जुड़ी है। स्वामीजी ने अपने सम्बोधन में कहा, “अमेरिका के बहनों एवं भाइयों,- मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से धन्यवाद देता हूँ। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की ओर से धन्यवाद देता हूँ और सभी जाति, सम्प्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हू… ।” इसके साथ ही पाखंडरहित और वैज्ञानिक अवधारणाओं पर आधारित सनातन धर्म और वेदांत से स्वामीजी ने पूरी दुनिया को भली- भाँति परिचित कराया। स्वामीजी का प्रवचन न केवल स्वामीजी के लिए बल्कि सारी दुनिया के लिए अविस्मरणीय बना। भारत की धार्मिक साख का लोहा विश्व ने माना। भारत माता फूले न समायी अपने विलक्षण सपूत के वैश्विक उन्नयन पर। गिरते स्वास्थ्य पर भारी असीम जोश ने स्वामीजी को सदैव सकारात्मक एवं आशान्वित रखा। उन्होनें एक बार कहा भी था कि,“खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है।”
धर्म के प्रति स्वामीजी की राय सदैव बहुत व्यापक और समभाव की है। धर्म/ सम्प्रदाय को उन्होंने सद्भावना और दुर्भावना का सबसे बड़ा और प्रबल कारण माना। समाज को नियन्त्रित करने में धर्म की भूमिका सर्वाधिक है। सच्चा धर्म वही है जिसमें सबको अपनाने की क्षमता हो। किसी का कोई आराध्य हो सकता है, हमसे पृथक धर्म ग्रंथ हो सकता है किन्तु उसको उसी रूप में स्वीकार करना ही सर्वोत्तम धर्म है और मानवता भी। जब धर्म में अविवेकी और बौद्धिक रूप से अंधे लोग सशक्त हो जाते हैं तो यही धर्म समाज में अविश्वास और अराजकता फैलाने का साधन बन जाता है। स्वामीजी धार्मिक सहिष्णुता को सीमित अर्थ में देखते थे। सहिष्णुता में दया के साथ स्वीकारोक्ति का आशय निहित होता है अर्थात् जब हम अपने से पृथक धर्म वाले को सहज होकर नहीं अपनाते बल्कि दया करके या एकता की मजबूरी में अपनाते हैं तो वहाँ धार्मिक सहिष्णुता प्रभावी होती है। यह धार्मिक सद्भाव की अपेक्षा बेहद संकुचित अवधारणा है। उन्होनें यह भी बताया कि, “सत्य को हजार तरीके से बताया जा सकता है फिर भी हर एक सत्य ही होगा।” इसका आशय है कि सबकी मंजिल एक होनी चाहिए, रास्तों की परवाह मत करो। चलने दो सबको पसंदीदा रास्तों से, चुनने दो मनवांछित तरीका। अंत में सबको पहुँचना है एक ही गंतव्य पर।
भारत का पूर्वोत्तर भू-भाग सांस्कृतिक प्रयोगशाला के रूप में आज भी जाना जाता है। इसका सम्बंध प्राचीन काल में महाभारत के प्रमुख पांडव पात्रों से रहा है। अर्जुन और भीम की शादियाँ यहाँ भी हुई थीं। महावीर घटोत्कच और महात्मा बर्बरीक इसी पावन भूमि की पैदाइश थे। बाणासुर-कृष्ण के महासंग्राम के उपरान्त उषा – अनिरुद्ध की प्रेम कहानी जीवंत हुई। शक्तिपीठ कामाख्या और जयन्तिया देवी का सम्बंध भी शेष भारत से अटूट रहा है। यहाँ ब्रह्मर्षि वशिष्ठ का आश्रम होना भी धार्मिक भावना के उत्थान का द्योतक है। मुगलों से हर बार यद्यपि यह भू भाग विजयी रहा तथापि संग्राम ने विकास को अवरुद्ध किया। परिणाम स्वरूप उन्नीसवीं शताब्दी का चरणांत पूर्वोत्तर को कई अर्थों में कमजोर कर रखा था। जाति, भाषा, बोली, क्षेत्र, उपक्षेत्र, कबीले आदि में असंगठित तत्कालीन बड़ा असम राज्य की राजधानी शिलॉंग (शिवलिंग) थी। हिंदू, मुस्लिम और ईसाई धर्म के त्रिकोण पर अवस्थित त्रिशंकु पूर्वोत्तर भू भाग पर स्वामीजी का चरण पड़ना नितांत आवश्यक था। सुप्तप्राय सनातनी आध्यात्मिक/सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण हेतु स्वामीजी अप्रैल-मई 1901 में सर हेनरी कॉटन के आमन्त्रण पर शिलॉंग आना स्वीकार किए। इसका एक कारण यहाँ की स्वास्थ्यप्रद जलवायु का होना भी था।
स्वामीजी की शिलॉंग यात्रा पूर्वोत्तर के लिए एक क्रांतिकारी कदम थी। श्रीमंत शंकर देव के बाद मूल सनातन अवधारणा से जनता विमुख हो रही थी। श्रीमंत का आधार केवल भक्ति था और भक्ति से वही प्रभावित हो सकता है जिसके भीतर इसका प्रादुर्भाव हो, वैज्ञानिक सोच रखने वालों को वैज्ञानिक आधार चाहिए। पाखंडवाद के चंगुल में वेदांत दम तोड़ रहा है। स्वामी दयानन्द का “वेदों की ओर लौटो” के आह्वान से भी पूर्वोत्तर अछूता ही था। स्वामीजी अपने परिजनों एवं शुभचिंतकों के साथ 18 मार्च 1901 को जलमार्ग द्वारा ढाका के लिए प्रस्थान किये। तदनन्तर 5 अप्रैल 1901 को ढाका से कामाख्या के लिए चल दिये और कामाख्या में एक पंडा के घर रुके। यहाँ उनकी मुलाकात पद्मनाथ भट्टाचार्य से हुई और गुवाहाटी में स्वामीजी के तीन अनमोल प्रवचन भी हुए।
तदुपरान्त स्वामीजी गुवाहाटी से शिलांग के लिए चल पड़े। अस्वस्थ थे लेकिन यहाँ आने का मोह संवरण न कर सके। घोड़ागाड़ी पर उनके साथ उनके घर वाले भी थे। उनकी गाड़ी के अगल- बगल पैदल चल रहे थे शिलॉंग के जमींदार राय साहब कैलाश चन्द्र दास और ज्योतिन्द्रनाथ बसु। शायद समय को इंतजार था एक विशेष अध्याय लिखने का या संचेतना क्रांति के बीज- रोपण का। स्वामीजी के ही शब्दों में, “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाये।” इस तरह स्वामीजी शिलांग में जमींदार केसी दास के आग्रह पर उनके घर ठहरे।
27 अप्रैल 1901 का दिन स्वर्णाक्षरों में अंकित है। इसी दिन तत्कालीन असम के मुख्य आयुक्त सर हेनरी कॉटन, अंग्रेज हुक्मरान और स्थानीय जनता के समक्ष क्विंटन मेमोरियल हॉल में स्वामीजी के प्रवचन ने इतिहास रचा। अब वह हॉल रामकृष्ण मिशन विवेकानन्द सांस्कृतिक केन्द्र के नाम से सुविख्यात है।
पूर्वोत्तर में 20-25 दिन रहकर स्वामीजी पुन: कोलकाता वापस हो गये। उनका यह कथन विचारणीय है कि, “आत्मा से अच्छा कोई शिक्षक नहीं। दिल और दिमाग के टकराव में दिल की सुनो।” कमजोर स्वास्थ्य के कारण फिर बड़े स्तर पर प्रवचन करने में असमर्थ रहने लगे। 4 जुलाई 1902 को बेलुर मठ, हावड़ा में स्वामीजी नश्वर शरीर को त्यागकर परब्रह्म में विलीन हो गये। इन्होंने अस्पृश्यता का सदैव विरोध किया तथा साथ ही मानवता का पोषण किया। उनकी विचारधारा पूर्णत: वैज्ञानिक थी। उनका कहना था कि ‘तर्क की कसौटी पर कसकर किसी तथ्य को परखो, फिर मानों। आँख मूँदकर सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास न करो।’ आत्मबल पर विशेष बल देते हैं। एक बार उन्होंने कहा था कि, “जब आप खुद पर विश्वास नहीं करते, आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते।” स्वामीजी स्पष्ट विचारधारा और ढृढ़ी व्यक्तित्व के स्वामी थे। महाप्रस्थान के 118 वर्षों के बाद भी स्वामीजी सबके मन मस्तिष्क में बसे हुए हैं। उनकी 150वीं जन्म वर्षगाँठ और शिलॉग में प्रवचन की 112वीं वर्षगाँठ पर भव्य आयोजन का किया जाना उनके प्रति असीम श्रद्धा का परिचायक है ।
संदर्भ

  1. Pandey, Mridul, Swami Vivekanand in Shillong
  2. Shillong Times– April 28, 2013

बाल्पक्रम – एक खोज सनातन संस्कृति की


सी. टी. संगमा
मेघालय के गारो जिले के दक्षिण-पूर्वी पहाड़ियों में बाल्पक्रम पठार में राष्ट्रीय उद्यान और वन्य पशु अभयारण्य है। इसकी ऊँचाई समुद्रतल से 2,831 फीट है। यह ऊपर से मेज की तरह सपाट है और दक्षिण गारो पहाड़ियों के मुख्यालय बाघमारा से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर है। यहाँ का सूर्योदय और सूर्यास्त का दृश्य अद्भुत होता है। इसके उत्तर में रोंगचेन पठार और दक्षिण में छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हैं, जहाँ से बांग्लादेश दिखाई देता है।
सन 1988 में बाल्पक्रम पहाड़ी को राष्ट्रीय उद्यान ओए वन्य पशु अभ्यारण्य घोषित किया गया था। स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने इसका उद्घाटन किया था। तब से जैव विविधताओं के कारण इसने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। इस छोटे से पठार पर भिन्न-भिन्न प्रजाति के दुर्लभ पशु-पक्षी, जीव-जंतु, पेड़-पौधे और जड़ीबूटियाँ मिलती हैं। इनमें से कुछ ऐसी दुर्लभ जड़ीबूटियाँ हैं जो चिकित्सा के लिए बहुत उपयोगी हैं। दुःख की बात यह है कि इनमें से कई जड़ीबूटियाँ समाप्त हो रहीं हैं। नि:संदेह यह स्थान वैज्ञानिकों, बनस्पतियों और प्रकृतिवादियों के लिए आकर्षण का केंद्र है क्योंकि यह शोध के लिए उपयुक्त स्थान बन गया है लेकिन गारो जनजाति में इस जगह को लेकर अपना दृष्टिकोण और अपनी मान्यताएँ हैं।
यहाँ तक कि स्थानीय लोग का मानना है कि बाल्पक्रम की दुर्गम घाटियों में कुछ ऐसे स्थान हैं, जहाँ चट्टानों की छतों से पानी के बूँदें टपकती हैं। इनमें रोग-निवारण क्षमता है। जिसका पता कुछ समय पूर्व चला। यह बात तब सामने आयी, जब एक पक्षाघात से पीड़ित रोगी पूर्णतया स्वस्थ हो गया। वह रोगी लम्बे समय से इस बिमारी के कारण बहुत कष्ट में था। उसके परिवार वालों ने दवाइयों के साथ-साथ उसका देशी इलाज भी करवाया परन्तु उसे कोई लाभ नहीं हुआ। उसकी दशा देखकर उन लोगों ने सोचा – क्यों न अलग तरीके से इलाज करवाया जाए ? अत: वे लोग उसे बाल्पक्रम पठार पर ले गए, जहाँ से वे खड़ी ढलान से रस्सियों के सहारे नीचे उतरे। वह इलाका बहुत उबड़-खाबड़ और बहुत ही कठोर था। रास्ते में कई मोड़ मिले; वे चलते गए और कैसे पहुँचे? उन्हें पता ही नहीं चला। खोजते-खोजते उन्हें उस गुप्त स्थान का पता चल ही गया, जहाँ से बर्फ के समान ठंडी पानी की बूंदें टपक रहीं थीं। रोगी को अच्छी तरह से सहारा देकर उस स्थान पर बैठाया गया। वह उस स्थान पर बिना हिले-डुले काफी देर तक बैठा रहा। अचानक बर्फ की तरह ठंडी एक बूँद उसके सिर के दाहिनी गिरी। वह लगातार हिलाने लगा और तुरंत की हिंसक-सा हो गया। थोड़ी देर बाद वह बेहोश हो गया और उसका सारा शरीर ऐंठ गया। उसके बाद वह पूरी तरह से ठीक हो गया और खुद चलता हुआ अपने घर लौटा। इस पठार में लगभग 50 ऐसे स्थान हैं जो पौराणिकताओं और विचित्र रहस्यों से भरे पड़े हैं, जो अवर्णनीय हैं। अब तक तीन व्यक्ति, जो पक्षाघात की बीमारी से पीड़ित थे, वे स्वस्थ हो गए हैं। हालाँकि इन तीन व्यक्तियों का नाम, पता आदि किसी को ज्ञात नहीं है। इसके सत्यापन हेतु इनकी खोज करना आवश्यक है।
ध्यातव्य है कि बाल्पक्रम न केवल गारो जनजाति के लिए ही अपितु हिन्दुओं के लिए पवित्र स्थान है। ऐसा माना जाता है कि बाल्पक्रम वह स्थान है, जो हिन्दू पौराणिकता से भी जुड़ा है। श्री एच.ए.मराक ने अपनी विवरणिका शीर्षक “बाल्पक्रम” में लिखा है कि हिन्दुओं के कई पौराणिक स्थानों में भगवान शिव ठाकुर का एक निवास स्थान यहाँ था और लिंग के रूप में वह पत्थर महादेव नदी की घाटी में थी। इनका यह भी विश्वास है कि बाल्पक्रम एक पवित्र पर्वत था। जहाँ संजीवनी बूटी उगती थी, जो जीवन की रक्षा करती है। जब लक्ष्मण लंका में मेघनाद से युध्द करते समय गंभीर रूप से घायल हो गए थे और उनके प्राण संकट में पड़ गए, तब वैद्यराज सुषेन के कहने पर लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए हनुमान जी को संजीवनी बूटी सूर्यास्त से पहले लाने के लिए कहा गया। पुराण के अनुसार हनुमान जी ने पूरे विश्व क्व चक्कर लगाया परन्तु उन्हें संजीवनी कहीं नहीं दिखाई दी। अंत में बाल्पक्रम के पहाड़ में उन्हें संजीवनी बूटी जंगलों में दिखाई दी। उस समय सूर्य डूबने लगा था और समय बहुत कम बचा था। अत: शीघ्र ही उन्होंने पहाड़ का ऊपरी भाग तोड़ लिया और मूर्च्छित राजकुमार को बचाने के लिए वापिस लौट आए। इसी कारण बाल्पक्रम की पहाड़ी का ऊपरी भाग एक सपाट मेज या पठार के समान हो गया।
डॉ जुरियस एल. आर. मराक, संग्रहालय वैज्ञानिक, निदेशक क़ला, संस्कृति, मेघालय सरकार के अनुसार रामायण में वर्णित ‘गंधमादन पर्वत’ और कहीं नहीं बल्कि गारो पहाड़ियों में बाल्पक्रम चोटी है। पुराने ज़माने में हिन्दू तीर्थयात्री दूसरे देशों और पड़ोसी देशों से यहाँ वर्ष में एक बार श्रध्दा से आते थे। कुछ वर्ष तक मयमनसिंह के राजवंश (आज बांग्लादेश में) शाही परिवार साल में एक बार यहाँ तीर्थ के लिए आते थे और कुछ दिनों के लिए यहाँ रुकते थे।
इसके अतिरिक्त यहाँ कुछ ऐसे साक्ष्य मिलते हैं जिससे यह ज्ञात होता है कि यहाँ कभी हिन्दू धर्म के अनुयायी रहते थे। आज जहाँ आस-पास कोई हिन्दू परिवार नहीं रहता है, ऐसी जगह में महेशखोला मंदिर गारो, खासी पहाड़ियों और बांग्लादेश के बीच स्थित है। इस वीराने में हिन्दू मन्दिर का होना कई सवाल पैदा करता है। वहाँ बहने वाली पाँच समानांतर नदियाँ, जो कि बाल्पक्रम में बहती हैं, उनमें से चार नदियों के नाम हिन्दू धर्म से सम्बंधित हैं। उन चार नदियों के नाम हैं – महादेव नदी, जो महादेव भगवान पर आधारित, महेशखोला नदी – भगवान महेश पर आधारित, उसके बाद गणेशवारी नदी, जो शिव के पुत्र गणेश पर आधारित और कनाई नदी, जो नागों के देवता नाग कन्या पर आधारित है। इनमें से केवल एक नदी है जिसका नाम स्थानीय नाम “चिमिते” है। यह ना’वा के नाम से भी जानी जाती है, इसका अर्थ है – देव नदी। इससे यह अनुमान लगा सकते हैं कि वहाँ किसी समय हिन्दू रहते थे या पूजा करते थे और यह एक पवित्र क्षेत्र माना जाता रहा होगा।
बाल्पक्रम के उत्तर-पश्चिम से थोड़ी दूर पर सनितमंग या विमोंग की पहाड़ियों पर हिन्दुओं की श्रध्दा है। वे इसे भगवान शिव के घर कैलाश के नाम से पुकारते हैं। श्री हेल्सिंग एस. संगमा ने ईसा पूर्व गारो पहाड़ियों के जनजातियों पर पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के हिन्दुओं का ऐतिहासक एवं सांस्कृतिक प्रभाव का वर्णन किया है। श्री देवानसिंग एस. रोंगमुत्हू ने गारो जनजातियों की सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण के प्रति अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है कि बाल्पक्रम और उसके आस-पास का क्षेत्र मादी-रोंग-कुची (महादेव नदी का स्त्रोत) में प्राचीन गारो समुदाय रहता था। मादी-रोंग-कुची बहुत ही उन्नत और समृध्द क्षेत्र था। यह उस समय की बात है जब स्वर्ग और पृथ्वी अलग-अलग नहीं थे और धरती पर साधारण मनुष्य का नहीं अपितु देवताओं का निवास था।
हिन्दू विश्वास के समान गारो समुदाय की मान्यता के अनुसार जीवन-चक्र अनन्त है और आत्माएँ अजर-अमर हैं। उनका पुनर्जन्म होता है। मृत्यु के बाद और जन्म के पूर्व जीव आत्मा के रूप में रहती हैं। इनकी मान्यता के अनुसार जीवन-मृत्यु एक अनन्त काल तक चलने वाला एक चक्र है। बाल्पक्रम मृत आत्माओं का घर है, जहाँ आत्माएँ पुनर्जन्म लेने के पहले अस्थायी रूप से रहती हैं। जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो वह इस धरती पर आत्मा के रूप रहता है। इसे स्थानीय बोली में में.मंग (Me.Mang) कहते हैं, जिसका अर्थ है – मृत व्यक्ति की आत्मा। साधारणतया आत्माएँ बाल्पक्रम की ओर जाती हैं, जो आत्माओं का अस्थायी पड़ाव है। जहाँ आत्माएँ कुछ समय रहने के बाद पुनर्जन्म लेती हैं। वे अपने पूर्व जन्म के कर्मानुसार मनुष्य या किसी रूप में जन्म लेते हैं। जन्म लेने से पहले ये आत्माएँ क्योंकि वे अदृश्य रहती हैं अत: उनकी बात कोई नहीं समझ सकता है। आत्माओं के रूप में इस क्षेत्र में चारो ओर घूमती हैं परन्तु मनुष्यों को दिखाई नहीं देती हैं। दुनिया जो कुछ भी होता है, वे देख सकती हैं परन्तु बता नहीं सकती हैं। श्रीमद्भगवतगीता के द्वितीय अध्याय, सांख्ययोग में श्री कृष्ण आत्मा के पुनर्जन्म को व्याख्यायित करते हुए कहते हैं –
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।। 28।। (सांख्ययोग)
अर्थात् हे भारतवंशी ! समस्त प्राणी जन्म से पहले अप्रकट रहते हैं, बीच में (स्थितिकाल में) प्रकट होते हैं और मरने के बाद पुन: अप्रकट हो जाते हैं। अत: इसमें शोक करने की क्या बात है। इसी प्रकार आत्मा के अजर-अमर होने, शरीर के नाशवान होने एवं कर्मानुसार विभिन्न योनियों में पुनर्जन्म लेने की अवधारणा प्राचीन गारो मान्यता सनातन दर्शन के साथ अपने संबंधों सुदृढ़ बनाती है, जो सुदूर पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय के गारो पहाड़ियों की गारो जनजातीय आस्था को मुख्यधारा से जोड़ती है।
कहा जाता है कि एक सूक्ष्म आवरण (कोहरे की तरह) आत्माओं को संसार से अलग करता है। मान्यता है कि आमतौर पर पशु-पक्षी की आत्माएँ बाल्पक्रम में ही रहती हैं लेकिन खास अवसरों में वे दूसरी जगहों में भी घूमती हैं। कई शिकारियों के अनुभव इस बात की पुष्टि करते हैं। जब वे बाल्पक्रम में शिकार करने जाते हैं तो उनका सामना ऐसी आत्माओं से हुआ, जो चकित करने वाला है। शिकार करने के दौरान जब वे किसी पशु-पक्षी पर निशाना साधते हैं तो पलक झपकते ही वे आँखों के सामने से अदृश्य हो जाती हैं। अगर एक झलक में उन्हें देखें तो वे सामान्य पशु-पक्षी की तरह दिखाई देते हैं। यह अंतर तब पता चलता है जब इन पर निशाना लग जाता है तो इनके शरीर से खून नहीं बहता है।
इन्हें मारा नहीं जा सकता है क्योंकि वे एक पल में जीवित हो जाते हैं या दूसरे पल में अदृश्य हो जाते हैं। मारे गए स्थान पर खून के निशान नहीं मिलते। कहा जाता है कि वे आत्माएँ पशु-पक्षियों की हैं, जिनके शरीर में मांस नहीं होता केवल कंकाल मात्र होता है। सत्य है आत्माओं का रहस्य मानव कल्पना से परे है, जिसे नकारा नहीं जा सकता है। श्रीमद् भगवतगीता में भी श्रीकृष्ण ने सन्देश दिया है –
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वाभविता वा न भूयः।
अजो नित्य: शाश्वतोsयं पुराणों न हन्यमाने शरीरे।। 20।। (सांख्ययोग)
अर्थात् यह आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती ही है; अथवा ऐसा भी नहीं है कि यह एक बार जन्म लेकर पुनः नहीं जन्म लेती। यह जन्म रहित, नित्य, शाश्वत तथा संतान है; शरीर के नष्ट होने पर भी यह नष्ट नहीं होती। आत्मा एवं पुनर्जीवन सम्बन्धी मूल गारो जनजाति की यह अवधारणा हिन्दू दर्शन के अत्यन्त ही निकट है। दुर्भाग्य से इस समुदाय के लगभग सारे लोगों का धर्म परिवर्तन (ईसाई धर्म) हो चुका है। कहीं-कहीं दूर-दराज के गाँवों में कुछ लोग अपने मूल आस्था का अनुसरण कर रहे हैं और अपनी मान्यताओं के प्रति जागरूकता के प्रति उदासीनता ने इस जनजातीय संस्कृति के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। इस पर गंभीर शोध आपेक्षित है।
प्रस्तुति एवं अनुवाद – डॉ अनीता पंडा

घुमन्तू
ऋता सिंह ‘सर्जना’
‘मुझे तो मानव शरीर चाहिए … ’
प्रयोगशाला में खुशी का माहौल था। क्योंकि नए प्रयोग के बाद पहली बार के लिए उसे दुनिया की सैर करने की आजादी मिली थी। वह एक संक्रमित जीव था, जिसका सबसे ज्यादा पसंदीदा काम था, मानव शरीर में प्रवेश कर दुनिया की सैर करना। उसे न तो रंगभेद से मतलब था, न किसी लिंग भेद से पर उसे तलाश रहती थी बेहद कमजोर और लापरवाह लोगों से क्योंकि वह इसमें आसानी से प्रवेश कर निशाना बना लेने में सक्षम हो जाता है। दुनिया में हाहाकार मचाने में सफल जीव घूमते घामते भारत में भी पहुँच गया। उतावले जीव पर भारत की पहले से ही नजर थी लेकिन उसे नई भूमि में आकर खूब उधम मचाने का मन था। कुछ यात्रियों की मदद से वह आया मगर तभी… उसने महसूस किया –
“अरे यह क्या लोगों को क्या हुआ है? सड़के इतनी सूनसान क्यों है? हमने तो सुना था इस देश में लोगों की बड़ी भीड़ रहती है। पर यहाँ तो लोग दिखाई नहीं दे रहे है! कहाँ दुबक गए? जीव सोचने लगा। उसे कहाँ पता था कि भारत ने चेन तोड़ने की पूरी बंदोबस्त कर लिया है। कुछ पल के लिए निराश होकर जीव कुछ मायूस हो गया मगर थोड़ी दूर पर जाकर उसका चेहरा फिर से खिल उठा। वहाँ कुछ लोग इकट्ठा होकर नारे लगाने में व्यस्त थे।
“बेवकूफ इंसान! तुमने मुझे अभी तक नहीं पहचाना है। अच्छा है तुम्हारी बेफिक्री ही मेरी जीत है। जब तुम्हें मेरी ताकत की कोई अन्दाज़ा नहीं है, तो मुझे उड़ान भरने में क्या हर्ज है? लड़ो, आपस में मेरा क्या ? मुझे तो मानव शरीर चाहिए… तुम चाहे कोई भी हो। जीव कुटिलता से मुस्कुराया और चुपके से एक नए शरीर में घुस गया।
देउतार मैना (पिता की बेटी)
वाणी बरठाकुर ‘विभा’
जनवरी का महीना, धीरेन्द्र छुट्टी खत्म करके वापस अपनी कार्यरत जगह अरुणाचल जाने के लिए तैयार हो रहा है। तभी चुमकी आकर धीरेन्द्र से कहती है, “देउता, आप फिर घर कब आओगे ?” धीरेन्द्र ने बेटी से कहा, “देखता हूँ , फिर कब छुट्टी मिले। वैसे तो तुम जानते ही हो, हम आर्मी वालों को छुट्टी मिलना इतना आसान नहीं है।”
चुमकी पिताजी के जवाब पर बोल उठी , “ना देउता, आपको इस बार ‘बहाग बिहू’ में आना ही होगा। बहाग बिहू के पाँच दिन बाद मेरा जन्मदिन भी है। इसबार आपके साथ जन्मदिन मनाऊँगी और बिहू भी। आपको आना ही होगा।” धीरेन्द्र भी कान पकड़ कर घुटनों के बल बैठ गया, ठीक है मेरी माँ, इसबार अवश्य आऊँगा और हम सभी एक साथ बिहू और तुम्हारा जन्मदिन मनाएंगे।” धीरेन्द्र चला गया।
फरवरी/मार्च बीत गया, अप्रैल आया। बातों बातों में हमेशा चुमकी सबको कहती कि इसबार बिहू और जन्मदिन वो पिता के संग मनाएगी। वह उस दिन की प्रतीक्षा बहुत उत्साह से कर रही थी क्योंकि उसे जबसे होश आया, उसने कभी भी पिताजी के साथ बिहू और जन्मदिन नहीं मनाया है। एक दिन चुमकी माँ को बोली, “माँ, सब बता रहे हैं कि कल से बहाग बिहू है !” माँ के ‘हाँ’, कहने पर उसने पूछा, “देउता कब आ रहे हैं ?” माँ उसको बताया, “अभी सम्पूर्ण भारत में लाॅकडाउन चल रहा है। ऐसे में तेरे देउता कैसे आएंगे!” चुमकी कहने लगी, “ये लाॅकडाउन क्या है माँ? इसके लिए स्कूल भी नहीं भेज रही हो, बिहू के लिए नए कपड़े भी नहीं दे रही हो। सब कहते हैं, लाॅकडाउन लाॅकडाउन लाॅकडाउन…।” माँ उसे समझाने लगती है, “लाॅकडाउन यानी ताला बंद। कोरोना महामारी फैलने के कारण सबको घर में रहना है, ताकि कोरोना की शृंखला टूटे और लोग बच जाएँ। हम भी इसलिए घर में हैं और तुम भी घर में हो और सम्पूर्ण देशवासी अपने-अपने घरों में हैं।” इसी बीच चुमकी बोलने लगी, “तब तो देउता को भी घर में रहना चाहिए। अभी आप देउता को भी घर बुला लीजिये।” तभी माँ उसे समझाने लगती है, “अगर देउता घर आएंगे तो देश की रक्षा कौन करेगा ?” तभी चुमकी बोली, “हाँ माँ, बिहू और जन्मदिन हर साल आएगा लेकिन हमारा देश चल जाए तो हमारा क्या होगा ?है न माँ !” बेटी को प्यार से गोदी में उठाकर माँ बोली, “इतनी बड़ी बात तुझे किसने सिखाया है ?” चुमकी मुस्कुराते हुए बोली, “देउता तो मुझे अक्सर कहते हैं कि देश चले जाने से हम भी नहीं रहेंगे।” माँ उसे गले लगाकर कहने लगी, “सच में तुम अपनी देउता की सच्ची बहादुर बेटी हो।”
*देउता- पिता
*बहाग बिहू- बैसाख महीने में असम वासी मनाने वाले जातीय उत्सव।

तैलचित्र स्वामी विवेकानंद का – एक संस्मरण

विक्रम वीर थापा
भारतवर्ष में ऋषि-मुनियों ने जन्म लेकर अपने आध्यात्मिक चिंतन-मनन से रजनीगंधा के सौरभ की तरह आध्यात्मिकता को सुरभित किया। वेदों और पुराणों आदि की रचना कर इस भूमि में आध्यात्मिकता की सरिता बहाकर भारत को ही नहीं वरन विश्व को आध्यात्मवाद से सिंचित किया। सनातन धर्म भारत भूमि पर प्राचीन काल से ही अपना सीना ताने सगर्व खड़ा है। सनातन धर्म और हिन्दू धर्म में अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। उपनिवेशवादियों ने इसे मिटाने के लिए षडयंत्र रचे परन्तु वे विफल रहे क्योंकि इसे अक्षुण्ण रखने के लिए हमारे संतों ने अतीत में निरंतर प्रयास किया।
महर्षि दयानंद सरस्वती ने ‘आर्य समाज’ की स्थापना की। वे वेदों के प्रकाण्ड पंडित थे यद्यपि मूर्तिपूजा के विरोधी थे। उनका ध्येय बस सनातन धर्म अर्थात् ‘आर्य समाज’ को भारतवर्ष में जीवित रखना था, विश्वव्यापी बनाना नहीं। वास्तविक अर्थों में सनातन धर्म या हिन्दू धर्म विश्वव्यापी तब बना जब वेदांत दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान स्वामी विवेकानंद ने ‘विश्व धर्म सभा’, शिकागो में 11 सितम्बर 1893 में अपना कालजयी वक्तव्य हिन्दू धर्म के परिप्रेक्ष्य में दिया था। वक्तव्य में ‘अमेरिकी बहनों और भाइयों’ इन शब्दों को अद्यपर्यन्त विश्व स्मरण करता है।
वे मूर्ति पूजा को महत्त्व देते थे। अस्पृश्यता और जातिवाद से दूर वे मानवतावाद में विश्वास और आस्था रखते थे। इसका ज्वलंत उदाहरण हैं -भगिनी निवेदिता, जो ईसाई लड़की थीं और उनका नाम मार्गरेट एलिजाबेथ था। वे ब्रिटिश-आयरिश थीं। स्वामी विवेकानंद ने उन्हें भगिनी के रूप में स्थान दिया। फलस्वरूप इनके द्वारा स्थापित ‘रामकृष्ण मिशन’ आज तक पश्चिमी देशों में सुचारू रूप से संचालित हो रहा है।
भारत में ही नहीं वरन विश्व की महान विभूति स्वामी विवेकानंद का तैलचित्र ‘रामकृष्ण मिशन, शिलांग’ के अनुग्रह से चित्रांकित करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। यह तैलचित्र सन 2002 के अप्रैल माह में ‘रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कल्चरल सेंटर, कुइंटन रोड, शिलांग’ में लगी है। इस तैलचित्र का निर्माण मैंने कैसे किया, इसका वर्णन मैं संक्षेप में कर रहा हूँ और साथ ही शिलांग के लिखित एवं अलिखित इतिहास का भी उल्लेख कर रहा हूँ जिससे आपको शिलांग के बारे में जानकारी प्राप्त हो।
19 फरवरी 1824 में 8 गोरखा रायफल्स की पहली बटालियन कैप्टन पैट्रिक डजन ने बांग्लादेश के सिलहट नामक स्थान में स्थापित किया। इस पलटन का नाम ‘16 सिलहट लोकल इन्फ्रेंट्री बटालियन’ था। उस समय भारत में ईष्ट इंडिया कंपनी का शासन काल था। कालान्तर में इस पलटन के नाम में समय-समय पर परिवर्तन होता रहा और बाद में यह 1/8 जी. आर. के नाम से प्रसिध्द हुआ। परमवीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा इसी बटालियन के थे। सन 1980 के दशक तक यह पलटन 58 गोरखा ट्रेनिंग सेंटर, शिलांग के अधीन थी। अब इस बटालियन को मैकानाइज़्द में सम्मलित किया गया है। इसका नाम है – 3 बटालियन मैकानाइज़्द इन्फैंट्री रेजीमेंट (1/8 गोरखा रायफल्स) ।
यह पल्टन सिलहट में रहने के पश्चात् सन 1835 से 1866 तक चेरापूँजी में रही। 1867 में शिलांग को मुख्यालय बनाने के लिए इसने शिलांग में प्रवेश किया। इसके प्रवेश करने से एक वर्ष पहले ही असैनिक प्रशासन विभाग शिलांग आ चुका था। साथ ही अंग्रेज अधिकारियों के साथ गोरखा समुदाय सैनिकों के रूप में, शिक्षित बंगाली समुदाय प्रशासन विभाग कार्यालयों में क्लर्क के रूप में, मारवाड़ी समुदाय एवं मुसलमान समुदाय व्यापारियों के रूप में, तथा सिख हरिजन समुदाय के लोग शिलांग में आए ।
उस समय शिलांग घने जंगलों से परिवेष्ठित था। सभी समुदायों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर इस जनशून्य, जंगली इलाकों को शनै: शनै: शहर के रूप में विकसित किया। इस स्थान को मात्र शिलांग ही नहीं अपितु ‘स्कॉटलैंड ऑफ द ईस्ट’ के नाम से भी जाना जाता है। ये सभी समुदाय यहाँ के खासी समुदाय से भी घुलमिल गए। मैत्री सम्बन्ध स्थापित हुआ। इस प्रकार इस समुदायों का यहाँ उद्भव हुआ।
बंगाली समाज ने कुइंटन रोड के समीप सन 1890 के दशक में एक क्लब की स्थापना की। इसी क्लब में स्वामी विवेकानंद ने 27 अप्रैल 1901 के दिन शिलांग के उपस्थित जन समुदाय को प्रवचन दिया था। जब वे अपनी माताजी को कामख्या माँ के दर्शन कराने हेतु 1901 के अप्रैल माह के प्रथम सप्ताह में गुवाहाटी आए थे। गुवाहाटी में 17 अप्रैल तक रहे। वे उस समय घोड़ागाड़ी से शिलांग आए थे क्योंकि उस समय शिलांग-गुवाहाटी मार्ग में घोड़ागाड़ी चलती थी।
सन 2002 के मार्च माह के अंतिम सप्ताह में स्वामी एकार्थानंदजी और स्वामी अकल्मषानंदजी मेरे घर पधारे। वे मुझसे स्वामी विवेकानंद का तैलचित्र बनवाना चाहते थे। मैंने सहमति दे दि । ‘रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कल्चरल सेंटर’ के स्वामी अच्युतेशानंदजी की कृपा से मुझे स्वामी विवेकानंद का तैलचित्र बनाने का अवसर मिला। वे चाहते थे कि तैलचित्र की पृष्ठभूमि में शिलांग का दृश्य हो। मैंने चित्रांकन शुरू करने के पूर्व, सन 1901 में स्वामी विवेकानंद के शिलांग आगमन का फोटो प्राप्त करने की कोशिश शुरू की।
स्वामी अच्युतेशानंदजी से सामान खरीदने के लिए रूपए मिलने के पश्चात मैं रंग आदि सामग्रियाँ खरीदने के लिए पुलिस बाज़ार चल पड़ा। खरीदने के बाद मैंने दूकानदार से सन 1901 के स्वामी विवेकानंद के शिलांग आगमन के फोटो की बात की। दूकानदार ने मुझे अफजल हुसैन से मिलने की सलाह दी । उनके परदादा शिलांग के पुराने वासी थे। दूकानदार से अफजल हुसैन का पता लेकर मैं उनके घर पहुँचा। अभी वे 83 वर्ष के हैं। बातचीत के दौरान मुझे मनवांछित फोटो तो नहीं मिली पर एक महत्वपूर्ण बात पता चली कि सर्वप्रथम शिलांग-गुवाहाटी मार्ग पर घोड़ागाड़ी चलाने का शुभारम्भ 6 नवम्बर 1887 में गुलाम हैदर और उनके पुत्र कासिम्मुद्दीन द्वारा हुआ। इसी परिवार ने सन 1906 में सर्वप्रथम इस मार्ग पर मोटरगाड़ी चलाने का आरम्भ किया।
जो भी हो, तैलचित्र के लिए रंग, तूलिका, अलसी का तेल अर्थात् लिनसीड ऑयल आदि खरीदने के बाद मैंने 1 अप्रैल में ही ‘रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कल्चरल सेंटर’ के खुले प्रांगण में स्वामी विवेकानंद का तैलचित्र चित्रांकन करना आरम्भ किया। खुली जगह पर चित्रांकन करने के कारण मेरे कार्य को कोई भी देख सकता था। मुझे 14 फीट लम्बी और 8 फीट ऊँची आयतन वाली कैनवास में स्वामीजी का तैलचित्र पृष्ठभूमि सहित चित्रांकित करना था। मुझे मनोवांछित फोटो न मिलने के कारण पृष्ठभूमि के दृश्यों के लिए अपनी कल्पना का ही सहारा लेना था।
तैलचित्र निर्माण के लिए रंगों के मिश्रण में लीनसीड ऑयल की एक-दो बूँदें मिलाई जाती हैं जो एक महीने तक नहीं सूखता और कभी-कभी तो इससे भी ज्यादा समय लग सकता है। ऐसे में अगर कोई रंग को स्पर्श कर दे, तो तैलचित्र का सत्यनाश हो जाता है।
27 अप्रैल को ‘रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कल्चरल सेंटर’ का उद्घाटन होना था और निर्माण कार्य युध्दस्तर पर चल रहा था। मुझे भी युध्दस्तर पर ही तैलचित्र का चित्रांकन करना था अत: मैंने निश्चय किया कि मैं पन्द्रह दिन के अन्दर ही तैलचित्र चित्रांकित कर लूँगा। और शेष समय मैं में रंग सूखने के लिए रखूँगा। मैं प्रातः 5 बजे ‘रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कल्चरल सेंटर’ पहुँच जाता और संध्या 6 बजे तक अनवरत चित्रांकन करता था। तीन दिन के अन्दर मैंने स्वामी विवेकानंद का चित्रांकन पूरा कर लिया। अब पृष्ठभूमि के लिए कल्पना का सहारा लेना था।
तैलचित्र में सूक्ष्म दृश्यों का चित्रांकन करने से अधिक समय लगता है जबकि बड़े दृश्य कम समय में पूर्ण हो जाते हैं। मैंने सोचा कि अगर मैं स्वामी जी के चित्र की पृष्ठभूमि में छोटे-छोटे दृश्यों का चित्रांकन करूँ तो पन्द्रह दिन में पूरा नहीं कर पाऊँगा इसलिए मैंने पृष्ठभूमि में बड़े-बड़े दृश्यों को चित्रित करना आरम्भ कर दिया। ये दृश्य थे – बड़े-बड़े पत्थर, पेड़ और झरने।
साँझ की बेला थी और मैं अपने कर्म में तल्लीन था। लोग मेरे चित्र को मेरे पीछे से देख रहे थे। उसी समय किसी पुरुष के ये शब्दांश मेरे कानों में पड़े- ‘पेंटिंग अच्छी नहीं है…’। सुनते ही मैं स्तब्ध हो गया। लोग तो चले गए परन्तु मेरा मन रुआँसा-सा हो गया। मन ही मन में सोचने लगा कि ‘कहीं यह अपूर्ण तैलचित्र रामकृष्ण मिशन द्वारा अस्वीकृत हुआ तो…?’ और मैं निराश हो गया।
लोगों के जाने के बाद स्वामी अच्युतेशानंदजी मेरे समीप आए और तैलचित्र को निहारते हुए कहा – स्वामीजी के ऊपर पृष्ठभूमि का दृश्य हावी न होने पाए। स्वामीजी दृश्य से बिल्कुल अलग दिखने चाहिए। उनकी बातें सुनकर मेरा मन उदास हो गया और मेरी आँखों में आँसू आ गए। मेरे क्लांत मुँह को देखकर मुझे उत्साहित करने के लिए उन्होंने कहा ‘स्वामी विवेकानंद कहते थे कि जो मनुष्य अपने कर्म में मनोयोग लाता है, वह कभी भी असफल नहीं होगा। थापाजी, आपको भी इस पेंटिंग में प्रकाश लाना है। प्रकाश लाने में परमहंस रामकृष्ण आपकी ज़रूर मदद करेंगे।’
मैंने उनसे कुछ नहीं कहा। मैं वहाँ से घर की ओर चल पड़ा। मेरे कानों में स्वामी अच्युतेशानंदजीके शब्द ‘पेंटिंग अच्छी नहीं है’ गूँज रहे थे जिसके फलस्वरूप मेरे मन-मस्तिष्क में अंतर्द्वंद्व चल रहा था कि मैं तैलचित्र के पृष्ठभूमि के दृश्यों में क्या परिवर्तन करूँ जिससे स्वामी विवेकानंद का स्वरुप उभरकर बाहर आए। इसी अंतर्द्वंद्व में मुझे ज्वर चढ़ गया। आते समय मौखार में मेरी मुलाकात मेरे एक मित्र से हुई। उसे मेरे हालत के बारे में नहीं पता था। मेरे मुँह पर लगे रंग देखकर उसने पूछा, ‘विक्रम, तुम्हारे मुँह पर रंग क्यों लगा है?’
मैंने उत्तर दिया, ‘सिंघानिया टाकीज की जगह रामकृष्ण मिशन का जो भवन बन रहा है, वहाँ मैं स्वामी विवेकानंद की पेंटिंग बना रहा हूँ इसलिए बनाते वक़्त मुँह पर रंग लग गया होगा।’
उसने कहा, ‘आते समय मुँह धोकर आना चाहिए था। कपड़ों पर भी रंग लगा हुआ है। तुमको ऐसा देखकर लोग क्या कहेंगे।‘
मुझे उसकी बातें अच्छी नहीं लगीं। एक तो पेंटिंग करते करते मैं थक गया था, दूसरा मानसिक द्वंद्व चल रहा था इसलिए मुझे क्रोध आ गया और मैंने गुस्से में कहा, ‘मुझे शाबासी देने के बजाय तुम मेरे कपड़े, रूप-रंग की चिंता कर रहे हो। मैं स्वामी विवेकानंद की पेंटिंग बना रहा हूँ, यह मेरे लिए बड़ी बात है। अगर मैं अमेरिका में होता तो वहाँ के लोग मेरे पेंटिंग की प्रशंसा करते। मेरा इंटरव्यू लेते और मेरी तस्वीर टाइम्स मैगज़ीन में छपती।’
मेरे मित्र ने कुछ नहीं कहा। मैं घर आया और प्लास्टिक बोतल लेकर एक लीटर मिट्टी का तेल बाज़ार से खरीद लाया। उसके बाद दर्जी के दुकान से बचे हुए बेकार कपड़ों के टुकड़ों को इकट्ठा किया। दोनों चीजों को लेने का यह उद्देश्य था कि प्रातः काल जल्दी उठकर ‘रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कल्चरल सेंटर’ पहुँचूँ और कपड़े के टुकड़ों को मिट्टी के तेल में भिगोकर स्वामी विवेकानंद की पेंटिंग की पृष्ठभूमि में चित्रांकित सम्पूर्ण दृश्यों को मिटा सकूँ।
उस रात मैं चिंता से सो नहीं सका और ज्वर और बढ़ गया था। मेरा शरीर तप रहा था। प्रात:काल जल्दी उठकर मैं पाँच बजे ‘रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कल्चरल सेंटर’ के गेट के बाहर पहुँचा। उस समय सेंटर में रहने वाला कर्मचारी सो रहा था। गेट के बाहर से चिल्लाकर मैंने उसे उठाया। उसने गेट खोला। मैं प्रांगण में पहुँचा और कपड़ों के टुकड़ों में मिट्टी का तेल लगाकर पृष्ठभूमि में चित्रांकित सम्पूर्ण दृश्यों को मिटा दिया। उसके बाद पेंटिंग के ऊपरी भाग को आकाश की तरह नीला कर दिया। जैसे दूर से क्षितिज में पहाड़ नीला दिखता है, उसी तरह मैंने नीला पहाड़ का चित्रांकन करना आरम्भ किया। इससे स्वामी विवेकानंद का स्वरुप पीछे के दृश्यों से अलग होकर प्रस्फुटित हुआ।
सुबह के सात बज रहे थे। उस समय चौबीस-पच्चीस साल की एक विवाहिता बंगाली महिला दिखाई दी। उस समय मैं चित्रांकन करना छोड़कर, स्वामी विवेकानंद का स्वरुप कैसा दिखाई देता है, यह देखने के लिए तैलचित्र से करीब बीस फीट दूर से अपूर्ण चित्र का अवलोकन कर रहा था। वह महिला भी बड़े मनोयोग से तैलचित्र को देख रही थी। कुछ देर देखने के बाद महिला बोली, ‘आप बहुत बड़े आर्टिस्ट हैं।’
बीते हुए कल की घटनाओं के कारण मुझे उनकी बातों पर विश्वास ही नहीं हुआ। मैंने महिला से पूछा, “आपको कैसे पता कि मैं बड़ा आर्टिस्ट हूँ ! उत्तर में उन महिला ने कहा – ‘लिंसीड आयल से पेंटिंग बनाना बहुत मुश्किल काम होता है। इसके लिए हाथों में कंट्रोल होना चाहिए, नहीं तो आयल की वजह से पेंटिंग का ब्रश फिसलता है। आपके हाथों में कन्ट्रोल है इसलिए स्वामीजी की इतनी सुन्दर पेंटिंग बन गई।’
मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि उन्हें लिंसीड आयल के बारे में कैसे पता है ! मैंने पूछा ‘आप लिंसीड आयल के बारे में इतना कैसे जानती हैं?‘
उन्होंने कहा ‘मैं लाइतुमुखरा में एक प्राइवेट आर्ट स्कूल में पेंटिंग सीखी थी इसलिए मुझे इसके बारे में पता है, लेकिन मुझे लिंसीड आयल से पेंटिंग करनी ठीक से नहीं आती।’
अपने आपको परखने के लिए मैंने फिर पूछा – ‘आप सच बताइए कि क्या यह पेंटिंग सुन्दर बनी है?‘
‘सचमुच सुन्दर बनी है। मैंने अपनी ज़िन्दगी में इतनी अच्छी पेंटिंग इससे पहले नहीं देखी। ऐसा लग रहा है कि स्वामीजी अभी बोलने वाले हैं।’ उन्होंने उत्तर दिया। महिला और मेरे बीच काफी देर तक बातें होती रहीं। बातों-बातों में पता चला कि उसका जन्म शिलांग में हुआ और विवाह सिलचर में। वह अपने बेटे की पढ़ाई के लिए शिलांग में रह रही थी। उनके सुबह-सुबह आने का कारण था की उन्हें वहाँ के पुष्पवाटिका से रामकृष्ण परमहंस की पूजा के लिए फूल लेना था। फूल लेकर वह चली गई पर साथ में मेरा ज्वर भी चला गया।
उनकी उत्साहवर्द्धक बातों से मेरे मन में स्फूर्ति आ गई फलत- मैंने तेजी से चित्रांकित करना आरम्भ किया। उस दिन मैंने दिनभर पूरे उत्साह के साथ पेंटिंग किया। एक सप्ताह के बाद रंग खरीदने के लिए रंग लगे कपड़े और मुँह लेकर पुलिस बाज़ार गया। रंग खरीदने के पश्चात् मैं उस महिला से मिलने उनके घर गया और साथ में अपनी बनाई हुई पशुपतिनाथ (नेपाल) की फ्रेम की हुई पेंटिंग उपहारस्वरूप लेकर गया। मैं उन्हें यह तैलचित्र इसलिए देना चाहता था क्योंकि उनकी प्रेरणादायक बातों ने मेरे मन में उमंग एवं आशा का संचार किया था।
उनसे मुलाकात होते ही मैंने उनसे कहा ‘आपको बुरा तो नहीं लगा मैं रंगों से सने कपड़े पहनकर आया हूँ, और मेरे कपड़े साफ़ भी नहीं हैं। उन्होंने बड़े शालीनता से कहा – ‘आदमी की पहचान कपड़ों से नहीं वरन उनके कार्यों से होती है।‘
सहायक ग्रन्थ –
Huxford, H J, History of the 8th Gurkha Rifles (1952).
3 बटालियन मैकनाइज्ड इन्फैंट्री रेजिमेंट, 1/8 गोर्खा रायफल्स का इतिहास (झाँसी: मुद्रित आर्ट प्रेस, ८१).
Military Hospital Shillong, Centenary Health Bulletin, (20 January 1997).

मूल खासी संस्कृति – उद्भव एवं विकास


डॉ अनीता पंडा
मूल खासी समुदाय अपनी संस्कृति, आस्था, मिथक, लोकगीतों आदि में बहुत धनी रहे हैं। डॉ पी. चौधुरी ने अपनी पुस्तक ‘The Antiquity of Khasi – Jaintia People’, ए.रॉय ने बंगाली मासिक पत्रिका 1993 में लिखा है – खासी समुदाय की अपनी असंख्य कहानियाँ, मिथक, लोककथाएँ उनके समाज में प्रचलित हैं, जो बहुत रुचिकर और विस्तृत हैं। अगर उन्हें सुनाया जाए तो ये कथाएँ पूरी रात भर सुनाई जा सकती हैं। इनका वर्णन इतना खुबसूरत है और घटनाएँ इतनी क्रमबद्ध हैं कि ये मनुष्य के दिल और दिमाग को छू जाती हैं। इन कहानियों और लोककथाओं द्वारा यह कल्पना की जा सकती है कि संभवतः खासी समुदाय में भी अपना साहित्य रहा होगा परन्तु दुर्भाग्यवश आज उसका कोई नामोनिशान नहीं है
खासी समुदाय में पहाड़ियों, पर्वतों, नदियों, जलप्रपातों, फूलों आदि के इर्द-गिर्द कहानियां बुनने और रिकार्ड रखने की परम्परा रही है लेकिन इन मिथकों तथा लोककथाओं में समयानुसार परिस्थिति के अनुरूप परिवर्तन भी आता रहा है। ऐसे में ये कथाएँ वास्तविकता से दूर भी लगती हैं। खासी लोक कथाओं का विश्लेषण और अध्ययन उनके पौराणिकता का एक भाग है, जिसने खासी धर्म, रीति-रिवाज और खासी संस्थाओं आदि को काफी प्रभावित किया है। इतने वर्षों के बाद भी आज तक वे इसे पूरी तरह से मानते आ रहे हैं। इनमें विशेष बात यह है कि ये खासी समुदाय की विचारधारा, धर्म, नैतिकता और सामाजिक तथा उनकी जीवन-शैली पर आधारित है ।
खासी समुदाय के पूर्वजों के अनुसार – आरम्भ में पृथ्वी पर कोई नहीं रहता था। ईश्वर, जो कि जगत का निर्माता है, उसने ‘का राम-ऐव’ (पृथ्वी) और उनके पति ‘उ बासन’ को बनाया। वे दोनों बहुत सुख पूर्वक रहते थे। उनके सुखी जीवन में उन्हें अकेलापन अक्सर सताता था क्योंकि उनका कोई संतान नहीं था। समय बीतता जा रहा था। वे अपने अकेलेपन से ऊब गए। ‘का राम-ऐव’ दिन-रात सृष्टि के निर्माता ईश्वर से प्रार्थना करती कि उसे वारिस चाहिए, जो उसके वंश को आगे बढ़ा सके। ‘का राम-ऐव’ की सच्ची प्रार्थना ईश्वर ने स्वीकार कर ली और उन्हें पांच संतानें प्रदान किये। ये संतानें थीं – सूर्य, चाँद, पानी, हवा और आग। इनमें सूर्य पहली संतान तथा आग आखिरी संतान थी। आग, आखिरी संतान होने के कारण उस पर घर के सारे काम और देखभाल करने की जिम्मेदारी थी ।
पांच संतानों को पाकर ‘का राम-ऐव’ बहुत खुश थी। उसे अपने फलते-फूलते परिवार पर गर्व था। अब धरती पर सूरज, हवा और पानी था। अत: वृक्ष उगे, सुन्दर-सुन्दर फूल खिले, भांति-भांति के फल लगे। सारी प्रकृति ही सुन्दर दिखाई देने लगी। ‘का राम-ऐव’ धरती पर कई मौसम और उनके विभिन्न रंगों आदि को देखकर प्रफुल्लित थी। यह देखकर कुछ समय बाद ‘का राम-ऐव’ ने ईश्वर से विनती की कि वे दया करके किसी को भेजें, जो संसार पर शासन करे और उसे अनुशासित करे। ईश्वर को ‘का राम-ऐव’ के अनुरोध में सच्चाई नज़र आई और उन्होने वादा किया कि वह उसकी इच्छा अवश्य पूरी करेंगे ।
खासी मतानुसार उस समय स्वर्ग में सोलह परिवार ईश्वर के साथ सुख, शान्ति और भाईचारे के साथ रहते थे। ‘का राम-ऐव’ की इच्छा पूर्ति के लिए स्वर्ग में एक विशाल सभा का आयोजन किया गया कि संसार पर शासन करने की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाए?
इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के बाद यह निर्णय लिया गया कि स्वर्ग में ईश्वर के साथ रहनेवाले सोलह परिवारों में से सात परिवार, जो ‘की ह्न्यू त्रेप हन्यू स्कुम’ या ‘सात झोपड़ियाँ और सात घोंसले’ कहलाते थे, वे धरती पर जाएँ, खेती करें और उसे आबाद करें।
वे ईश्वर के आदेशानुसार धरती पर जाएँ और माँ की तरह ही धरती के विकास और उन्नति के लिए कार्य करें। वे प्रशासनिक दृष्टि से हर चीज़ की देखभाल करें। इस प्रकार ईश्वर ने ह्न्यू त्रेप हन्यू स्कुम और पृथ्वी को आशीर्वाद दिया। साथ ही यह कहकर अपनी बात समाप्त की कि अगर लोग स्वयं सही रास्ते पर चलेंगे; सच्चाई के रास्ते पर रहेंगे तो ईश्वर उनके साथ रहेंगे। उनके और स्वर्ग के बीच बिना किसी बाधा के आना-जाना होगा। वे एक पेड़ के द्वारा ‘जिन्किंग क्स्येर’ अर्थात् सोने की सीढ़ी जो ‘उ साॅपेतब्नेंग चोटी पर स्थित है, उससे स्वर्ग में आ-जा सकेंगे ।
सात झोपड़ियाँ अपना वचन निभाते हुए शांति और भाईचारे के साथ स्वर्ण युग में रहने लगे। उस समय स्वर्ग में निवास करने वाले नौ परिवारों और पृथ्वी के सात परिवारों के बीच सम्पर्क था और ईश्वर स्वयं भी धरती पर अक्सर आते-जाते रहते थे। वे उनसे मानव भाषा में ही बात करते थे। धीरे-धीरे कुछ समय बाद जीवन की हर दिन की व्यस्तता के कारण ये सात परिवार अपने दिए गए वचनों से दूर होते गए और उन पर कम ध्यान देने लगे। एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति ने इस स्थिति का लाभ उठाया क्योंकि उसे मानव के ऊपर ईश्वर और सच्चाई का राज करना अच्छा नहीं लगता था। अत: वह पृथ्वी और स्वर्ग से जोड़ने वाली सीढ़ी को काटने में सफल हो गया। परिणामस्वरूप धरती पर रहने वाले सात परिवार हमेशा के लिए बिछड़ गए। इस प्रकार ईश्वर के प्रभाव से भी हमेशा के लिए दूर हो गए। ईश्वर ने उनसे मानव-भाषा में फिर कभी बात नहीं की। ईश्वर को अपनी रचना अर्थात् मनुष्यों पर बहुत दया आई। यद्यपि वह उनसे इंसानी भाषा में बात नहीं कर सकते थे परन्तु वे उनसे अपने संकेतों आदि द्वारा बात करते थे ।
वे सातों परिवार इस विषय में कुछ नहीं किया केवल ईश्वर की आज्ञा का पालन करते रहे, वे बस टालमटोल करते रहे। कुछ समय बाद सपेटब्नेंग (पर्वत की चोटी) से पांच किलोमीटर दूर डेंगेई पीक / चोटी पर एक पेड़ उग आया। वह पेड़ कुछ ही समय में तेज़ी से बढ़ गया। उसकी शाखाएँ चारो ओर फैल गईं और इसकी पत्तियों ने पूरी धरती को ढक लिया। ऐसा लगने लगा कि दूसरी बनस्पतियाँ उसकी छाया में नहीं पनप सकेंगी। उस समय सारमो और सोराफिन नामक दो जिम्मेदार व्यक्ति डेंगेई चोटी की ढाल पर खेती कर रहे थे। उन्होंने इस घटना की जानकारी दरबार को दिया। उनकी बात सुनकर दरबार ने निर्णय लिया कि पेड़ को तुरंत कटवा दिया जाए क्योंकि अगर देर हो गईं, तो उस पेड़ की जड़ें और भी मज़बूत हो जाएँगी और उसकी शाखाएँ इतनी फ़ैल जाएँगी कि काटना मुश्किल हो जायेगा। उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी और दराती धार की और पेड़ काटना शुरू किया। दिनभर कठोर परिश्रम करने के बावजूद वे उस पेड़ का छोटा हिस्सा ही काट पाए। यह देखकर दरबार ने यह निर्णय लिया कि हर परिवार से कम से कम एक आदमी आएँगे और पेड़ काटने में मदद करेंगे। दूसरे दिन हर घर से एक-एक व्यक्ति पेड़ काटने चल पड़ा। जब वे उस स्थान पर पहुँचे, तो आश्चर्यचकित हो गए क्योंकि उस पेड़ पर कटने के कोई निशान नहीं थे। इसके बाद भी उन्होंने फिर से पूरे दिन काम किया परन्तु अगले दिन भी वैसा ही हुआ। वे परेशान और भयभीत हो गए ।
जब वे आपस में बातचीत कर रहे थे कि दूसरे दिन क्या किया जाए, तो उस समय एक छोटा पक्षी ‘रेन बर्ड ’(phret) वहाँ आया। सबका उदास चेहरा देखकर उसने एक वृद्ध व्यक्ति से उनकी उदासी का कारण पूछा। पूरी बात जानकर रेन बर्ड ने कहा – मैंने चीता से सुना है कि जब डेंगेई बड़ा हो जाएगा और इसकी शाखाएँ चारो ओर फैल जाएँगी, इसकी पत्तियाँ और मोटी हो जाएँगी, तब चारो ओर गहरा अँधेरा छा जाएगा। तब मैं चारो ओर घूम सकूँगा और इन्सानों को कह सकूँगा। अत: रात में बाघ इस पेड़ पर पड़े कटने के निशान को चाट लेता है, जिससे यह पेड़ फिर से वैसा का वैसा हो जाता है। इसलिए तुम लोग कितनी भी कोशिश कर लो, इसे नहीं काट सकते। तुम लोग अपना काम करते रहो और घर जाने से पहले अपनी कुल्हाड़ी और दराती को कटे हुए भाग पर उल्टा करके रखना। उसकी धार सामने की ओर होनी चाहिए। जब बाघ उसे चाटने की कोशिश करेगा, तो उसकी जीभ कट जाएगी और वह फिर से चाटने की कोशिश नहीं कर सकेगा ।
अत: रेन बर्ड की सलाह से लोगों ने फिर से पेड़ काटना आरम्भ किया। उस रात हमेशा की तरह बाघ आया और उसने कटे हुए निशान को चाटना आरम्भ किया, तो उसकी जीभ धारदार हथियार से कट गई और वह दर्द से चिल्लाता हुआ जंगल की ओर चला गया परन्तु उस समय से उसने मनुष्य से बदला लेने की प्रतिज्ञा की। इस घटना के बाद से उसे जब भी मौका मिलता है, वह उस पर आक्रमण करता है।
लगातार कई दिनों तक पेड़ काटते-काटते और रात में धारदार हथियार को कटी हुई जगह पर रखते हुए उन्होंने अंततः पेड़ को पूरी तरह नीचा कर लिया। डेंगेई चोटी में क्रेटर की तरह एक गढ्ढा बना हुआ है। मिथक के अनुसार यह वही जगह है जहाँ पर पेड़ खड़ा था। इस प्रकार मनुष्य अपनी युक्ति से पेड़ को सफलतापूर्वक नीचा करके बहुत प्रसन्न हुआ परन्तु यह काम बिना ईश्वर के सम्भव नहीं हो सकता था। अत: उसने उनका आभार प्रकट करने के लिए पृथ्वी के सभी प्राणियों के लिए नृत्य का आयोजन किया।