शिलांग के ‘खुबलेई’ से प्रॉव्हिडन्स के ‘हैलो’ तक

अक्टूबर १९९९ में, मुझे रामकृष्ण मिशन के मुख्यालय से एक आदेश मिला:

“अमेरिका के पूर्वी तट पर प्रॉव्हिडन्स नाम के छोटे से नगर में रामकृष्ण संघ का एक पुराना आश्रम है- ‘वेदान्त सोसायटी ऑफ प्रॉव्हिडन्स’। वहाँ कई दशकों से कार्यभार सम्हाल रहे पूजनीय स्वामी सर्वगतानन्दजी अब ८८ साल के हैं और पिछले ३-५ वर्षों से अनुरोध कर रहे कि अब उनके स्थान पर अन्य किसी को कार्यभार सौंपा जाए। इसके लिए मुख्यालय ने आपको चुना हैI”

 उन्होंने कई संन्यासियों के नाम सुझाए थे, जिन में मेरा नाम भी था। चूँकि मेरी कभी उनके साथ मुलाकात नहीं हुई थी, यह स्पष्ट था कि किसी से मेरे बारे में सुनकर उन्होंने मेरा नाम उस सुझाव-सूची में रखा था। (यदि मेरे साथ प्रत्यक्ष परिचय होता तो वे ऐसी गलती कभी नहीं करते)। उन दिनो परम पूजनीय स्वामी रंगनाथानन्दजी रामकृष्ण संघ के परमाध्यक्ष थे। चूँकि मैने शायद ही कभी अंग्रेजी में व्याख्यान दिए थे, मेरे मन में वहाँ जाने में कुछ दुविधा थी। उन्होंने मुझे उत्साह देते हुए कहा कि ‘वह बड़ा अच्छा स्थान है और जब Providence (सबका भरण-पोषण करने वाले परमात्मा) तुम्हें बुला रहा है, तो तुम ‘ना’ कैसे कह सकते हो?’

सन २००० के मार्च में मेरी शिलांग से छुट्टी हुई। तभी मेरे शिलांग में चार वर्ष पूर्ण हो गये थे। १९९९ के नवम्बर में मेरा पासपोर्ट भी बन गया था। वीजा पाने का प्रयास जारी था। उसमें बहुत समय लग गया। करीब १५ महीने मैं भारत के कई आश्रमों और तीर्थस्थानों- में भ्रमण करता रहा। सन २००१ के मई महीने में वीजा मिल गया और फिर ठीक ३१ मई को मैं मुम्बई से इंग्लैण्ड, हॉलैंड, जर्मनी, फ्रान्स, स्वित्झर्लण्ड में प्रवास करते हुए अमेरिका पहुँच गया। इसको इत्तेफ़ाक़ कहूँ कि – स्वामी विवेकानन्द भी ३१ मई को मुंबई से अमेरिका के लिए चल दिए थे। वह २१ जून की प्रभात थी। प्रात:काल के  १ बजे (1 am) में बोस्टन के वेदान्त सोसायटी में पहुँच गया। सर्वगतानन्दजी मेरा इन्तजार कर रहे थे। श्रीरामकृष्ण के अंतरंग पार्षद स्वामी अखण्डानंदजी के वे शिष्य थे। १९५४ से वे बोस्टन और प्रॉव्हिडंस के बेदान्त सोसायटी का कार्यभार सम्हाल रहे थे। इस महापुरुष के सम्बन्ध में बहुत कुछ शिक्षाप्रद बातें क्रमशः समझ में आयी; उसकी चर्चा बाद में कभी करूँगा। करीब दो बजे सो गया; कमरा काफी गरम था पर प्रायः पुलिस या फायर ब्रिगेड, ट्रक्स बड़े ज़ोर से कर्णकर्कश ध्वनी करते हुए पास के बड़े रास्ते से गुज़र रहे थे। इस के कारण मैं बिल्कुल सो नहीं पाया। दिन निकलने पर ध्यान -जप आदि के बाद नास्ता करने गया। वहाँ सैंटा बार्बरा कॉन्व्हेन्ट से आयी प्रव्राजिका ब्रह्मप्राणा (इन दिनो वे  वेदान्त सेंटर ऑफ नॉर्दन टेक्सास का कार्यभार सम्हालती हैं) से मेरी भेंट हुई। वे चंद दिनों के लिए बोस्टन में आई थीं और वहाँ स्वामी विवेकानन्द से सम्बंधित स्थान देखना चाहती थीं। उनके साथ मेरी भी यह तीर्थयात्रा हुई। एक भक्त – जोसेफ (संक्षेप में ‘जो’) ड्वायर – जो कुछ घण्टों पहले मुझे एयरपोर्ट से बोस्टन बेदान्त सोसायटी ले आए थे, वे ही अब हमें उन स्थानों पर गाड़ी से ले जाने वाले थे। वे एक बड़े ही अच्छे गायक और संगीतज्ञ थे। क्रमशः उनसे अधिक घनिष्ठ परिचय हुआ। हम दोपहर के २ बजे के बाद वहाँ से मिकले।

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अमेरिका के सम्बन्ध में कितनी ही बातें कई विषयों पर सुनता आया था। भारत के लोगों में यह धारणा कई दशकों से जड़े जमाकर बैठी है कि इस देश में सर्वत्र विलासिता है, गरीबी का बिल्कुल नामो निशान तक भी नहीं। कुछ दिनों में ही समझ में आया कि विलासिता,  अमीरी होने के बावजूद, यहाँ पर भी अधिकांश लोगों को गरीबी से जूझना पड़ता है। अमरीकी समाज का स्त्री-पुरुषों के परस्पर सम्बन्धों के विषय में भी बिलकुल अलग नज़रिया है। यह भी सुनता आया था, मध्यमवर्गीय सुशिक्षित  हिन्दू समाज के नज़रिये से यह भिन्न होने के बावजूद भी इन में नैतिकता कम हो ऐसी कोइ बात नहीं। और सुना था – यहाँ वेदान्त / हिन्दू  दर्शन और स्वाभी विवेकानन्द के प्रभाव के विषय में। कई लोगों की राय है कि यह प्रभाव बड़ा ही विस्तारित है और गहरा भी। अन्य लोगों का कहना था कि प्रभाव कोई बड़ा नहीं है; सामान्य अमरीकी लोगों ने न वेदान्त का नाम सुना है, न ही श्रीरामकृष्ण- विवेकानन्द का।

जो भी हो, हम लोग इन स्थानों के दर्शन हेतु निकल पड़े। सर्वप्रथम गए विश्वविख्यात हार्वर्ड विश्वविद्यालय। वहाँ विवेकानन्दजी ने जिस हॉल पर व्याख्यान दिया था उसे देखा। ३३ वर्ष बाद उस कमरे में एक साइन बोर्ड लगाया गया, जिसमे विवेकानन्दजी के वहाँ व्याख्यान के बारे में लिखा है। उस दिन हम लौट आये।

दूसरे दिन हमलोग वाल्डन पॉन्ड देखने गये। नयनरम्य वनराजी से घिरा यह अति मनोरम सरोवर है; किन्तु यहाँ हमारे जाने का उद्देश्य अलग था। यह स्थान  हेन्री डेविड थोरो से सम्बन्धित है। थोरो भारतीय औपनिषद दर्शन से बहुत प्रभावित हुए थे। उन्नीस वी  शताब्दी के मध्योत्तर में अमरीका के उत्तर-पूर्व भाग में Transcendentalist Movement नाम से एक दार्शनिक संप्रदाय शुरू हुआ था। Transcendentalist का तात्पर्य है कि सतही तौर पर जो भासमान होता है उसके परे जो नित्य तत्व है उसे पकड़ना। राल्फ वाल्डो इमर्सन, मार्गरेट फुबर, अमोस ब्रॉनसन अल्कोट्, थॉरो इ. कई विख्यात कवि और दार्शनिक इस सम्प्रदाय के अग्रणी थे। विवेकानन्द जी ने जो वेदान्त के बीज बोए उसके लिए जमीन तैयार करने का काम इन ट्रान्सेंडेटालिस्ट लोगों ने किया। कई दशकों पहले थॉरो (हेनरी डेविड थॉरो) का नाम पढ़ा था। इस स्थान में उन्होंने अपने निवास हेतु एक छोटा सा लकड़ी का कमरा बनवाया था। उस कमरे को बाहर से और भीतर से देखकर विशेष आनन्द हुआ।

रविवार के दिन सुबह बोस्टन आश्रम में एक विद्वान भक्त का सुंदर प्रवचन हुआ। पू. सर्वगतानन्दजी के लिए इसे उनके कमरे से ही सुनने की व्यवस्था की गई थी, उन्होंने मुझे भी वहीं से सुनने के लिए कहा। इस रविवार के व्याख्यान कार्यक्रम को यहाँ Sunday Service कहा जाता है। इस के उपरान्त Soup lunch (सूप भोजन) हुआ और फिर हम सब एक गाड़ी में सवार होकर प्रॉव्हिडन्स शहर के लिए निकल पड़े। और करीबन सवा घण्टे में प्रॉव्हिडंस पहुँच गए।

इस रविवार को बोस्टन और प्रॉव्हिडन्स में कितने ही भक्तों के साथ परिचय हुआ। इन में कुछ भारतीय मूल के थे, परन्तु बहुत से अमेरिकन मूल के थे। यहाँ आने के पहले भी मैंने ऐसे भक्तों को श्रीरामकृष्ण, माँ सारदा, स्वामी विवेकानन्द और वेदान्त के प्रति लगाव होने की बहुत कहानियाँ सुनी थी। आज उसका प्रत्यक्ष अनुभव पाकर विशेष आनंद हुआ। इनमें से प्रायः सभी ने श्रीरामकृष्ण माँ सारदा – विवेकानन्द और वेदान्त का अच्छा अध्ययन किया था। इसलिए उनकी भक्ति केवल एक परंपरा- पालन या धर्म का औपचारिक आचरण न होकर मूल आध्यात्मिक जीवन का प्रामाणिक प्रकाश था।

यहाँ के रीतिरिवाज, मिलने-जुलने-खान-पान इत्यादि नियम (Manners etiquettes) सीखना मेरे लिए एक प्राथमिकता थी। सभी भक्त आनन्दपूर्वक मेरी गलतियों को प्रेम और विनम्रता से सुधार देते थे। इन्हीं दिनों स्वामी विवेकानन्द जी से सम्बन्धित स्थानों के दर्शन का अनायास सुअवसर प्राप्त हुआ। इन में सारा बुल का निवासस्थान (जहाँ विवेकानन्दजी कई दिनों तक रहे और स्वामी अभेदानन्द, सारदानन्द जैसे उनके गुरु बन्धुओंका भी यहाँ वास हुआ। बाद में सारा बुल ने परमानन्दजी को बोस्टन में वेदान्त का केंद्र प्रारंभ करने हेतु इस भवन में आमंत्रित किया।), एनीस्क्वाम (Annisquam) – जहाँ विवेकानन्दजी का प्रथम व्याख्यान हुआ और जहाँ से उन्हें शिकागो के धर्मसभा में सहभागी होने के लिए आवश्यक प्रशस्ति पत्र प्राप्त हुआ, सेलेम (Salem), जहाँ स्वामीजी कुछ दिन रुक थे और कुछ व्याख्यान भी दिए – इत्यादि स्थानों का समावेश था। विवेकानन्द- चरित्र में मैंने इन सब स्थानों के सम्बन्ध में पढ़ा था। किन्तु इन स्थानों को मैं अपनी आखों से कभी देख सकूँगा ऐसा स्वप्न में भी कभी नहीं सोचा था। इन के दर्शन-स्पर्शन से शरीर-मन बिलकुल रोमांचित हो गया।

इन्हीं दिनों एक विशेष ग्रंथ पढ़ने को मिला और उसके रचयिताओं से प्रत्यक्ष परिचय भी हुआ। भारत में रहते समय इस ग्रंथ को देखा तो था, किन्तु पढ़ा नहीं था। ग्रंथ का नाम था, ‘The Gift unopened’ (नहीं खुला उपहार) लेखिका का नाम एलेनोर स्टार्क। इनसे और इनके पति से इन दिनों मुलाकात हुई। दोनों उमर में पचहत्तर पार कर गए थे, किन्तु मुखमण्डल पर एक आध्यात्मिक आनंद और शान्ति छायी हुई थी।

इस ग्रंथ में यह दिखाया गया था कि विवेकानन्द ने अमेरिका के लिए जो अति मूल्यवान तोहफा दिया है, उसे अव तक पूर्णरूप से खोला नहीं गया है। इस ग्रंथ से एक उद्धरण देकर इस लेख का समापन कर रहा हूँ। यदि भगवान की इच्छा हो तो यहाँ के कुछ और उद्बोधक संमरण अगली किस्त में लिखुंगा ।

लेखिका एलेनोर स्टार्क, स्वामीजी के अमेरिका में आगमन को ‘अमेरिका की चतुर्थ क्रांती’ कहती हैं ।

“America has passed through three great revolutions: the first was a struggle  for independence as a new nation from the tyranny of unheeding power; the second was a civil war, an internal revolution… the third was an industrial revolution, which freed men & women from heavy labor and opened world- markets, but which did not bring about corresponding advances in the consciousness of man….

“This book proposes to tell of an advent on the American scene of a voice from the East, which in a few short years sowed the seeds of a regeneration of a great people. At the turn of the century an unheralded and quiet revolution took place across the land. A message, a gift was given to the American people in words of such universal wisdom and power that those who heard them at the time found their lives changed and their spirits freed…”  Intro. (xix)

यहाँ पिछले बाइस वर्षों से इस गंभीर सत्य का साक्षात अनुभव कर रहा हूँ।

स्वामी योगात्मानन्द वेदान्त सोसाइटी आफ प्रोविडेन्स के मंत्री एवं अध्यक्ष हैं। ये 1976 में रामकृ ष्ण मिशन में शामिल हुए और 1986 में सं न्यास की दीक्षा ली। 20 वर्ष तक रामकृ ष्ण मिशन नागपुर, में कार्य करने के उपरांत रामकृ ष्ण मिशन शिलांग मेघालय, के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे।

अरुणाचल प्रदेश की ज्ञान-संस्कृति और संकटग्रस्त भाषाएँ

अरुणाचल प्रदेश के एक वयोवृद्ध गाँवबुढ़ा से बातचीत हुई और उनके चिंतित स्वर ने हमें झकझोर दिया था। आदी जनजाति के इस जानकार आदमी ने अरुणाचली ज्ञान का समाजशास्त्र और अरुणाचली समाज का ज्ञानशास्त्र समझने हेतु आग्रह किया और उनके महत्त्व को जानने पर बल दिया था। मैं अपनी आईसीएसएसआर-इम्प्रेस टीम के साथ था। अरुणाचली लोक-साहित्य को स्थानीय एवं राष्ट्रीय मीडिया द्वारा यथोचित महत्त्व न दिए जाने के कारण यहाँ की आदिवासी संस्कृति और जनभाषाओं पर पड़ रहे विपरीत प्रभावों का हम गंभीरतापूर्वक आंकलन कर रहे थे। यह साक्षात्कार इसी परियोजना-कार्य का हिस्सा था और हमारे लिए आँख खोलने वाला था।

इस साल अरुणाचल प्रदेश अपने नामकरण की स्वर्ण-जयंती मना रहा है। आजादी के दो दशक बाद 20 जनवरी, सन् 1972 को अरुणाचल प्रदेश नाम स्वीकृत हुआ। इससे पूर्व यह ‘नार्थ ईस्ट फ्रंट्रियर एजेंसी’ यानी ‘नेफा’ के नाम से जाना जाता था। भारतीय गणराज्य के रूप में अरुणाचल प्रदेश की स्थापना 20 फरवरी, 1987 ई. को हुई। उत्तर-पूर्व के सबसे बड़े राज्य अरुणाचल प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में आदिवासी समाज के अलग-अलग समुदाय बसे हुए हैं। उनका रहवास गहरे घाटियों और ऊँचे पहाड़ों के बीच स्थित है। इन जनजातियों की संख्या मुख्य रूप से 26 है जिनकी अपनी ढेरों उप-जनजातियाँ हैं और यह संख्या सौ से भी अधिक हैं। मुख्य जनजातियों में मेयोर, लिसु, अका, बुगुन, वांचो, तांगसा, सिंग्फो, तुत्सा, नोक्ते, मोम्पा, शेरर्दुक्पेन, खाम्ति, मेम्बा, मिजी, न्यीशी, आदी, गालो, तागिन, आपातानी, इदु मिश्मी इत्यादि। यहाँ की नदी-संस्कृति पहाड़ों की जीवनवाहिनी हैं जिसमें सियांग, दिरांग, कामेंग, तिराप, सुबनसिरी, यामने, योमगो, पाचिन, पारे, पापुम, पान्योर, लोहित आदि। इसी तरह याक, ताकिन, मिथुन और धनेश पक्षी के अलावे आर्किड फूल और कीवी फल की प्रचुरता है। होलुङ के पेड़ इस परिक्षेत्र की शोभा है। नाहर एवं अन्य पेड़ खूबसूरत बहुत है। वन-सम्पदा से परिपूर्ण अरुणाचल प्रदेश में ज्ञात तौर 241 प्रकार के वृ़क्ष होने की पुष्टि एक पुस्तक करती है-‘‘ट्रीज ऑफ अरुणाचल प्रदेश: अ फील्ड गाइड’। इसी तरह आदी भाषा में ‘तान्नो इलिङ’ कहे जाने वाले फूल की सुन्दरता मोहक है। गणना में 84, 743 वर्ग किलोमीटर में फैला यह प्रदेश प्राकृतिक रूप से जवां और सांस्कृतिक रूप से धनी है। इस प्रदेश में विभिन्न गुणों और प्रचुर उपलब्धता वाले बाँस उपयोगी बहुत है। बम्बू का प्रयोग घर बनाने, खाने से लेकर अपोङ (लोकल दारू) पीने-पिलाने में बहुत होता है। घरों के ऊपर छज्जे के रूप में ‘तोको पत्ता’ का प्रयोग किया जाता रहा है जो आधुनिक दिनों में कम इस्तेमाल हो रहे हैं।

अरुणाचली घर अपनी बनावट एवं संरचना में बेहद आकर्षक मालूम होते हैं जिसे बनाने का काम सारे बस्ती के लोग सामूहिक रूप से करते हैं। आज भी अरुणाचली गाँवों की पहाड़ी खेती में जंगल साफ कर जलाने से लेकर अमुक भूमि पर खेती करने की प्रक्रिया सबलोग मिलजुल कर करते हैं। यह अपनापा और आत्मीयता आदिम जनजाति की बड़ी खूबी है जिसमें सुख और दुःख, खुशी और उदासी सब के सब साझे में मिले-बँटे हुए हैं। इस प्रदेश की बड़ी खूबी भाषिक बहुलता है। जनजातीय भाषा के उच्चार में प्रकृति की अभ्यर्थना और स्तुति सबसे अधिक हैं। इन भाषाओं के शब्द छोटे किन्तु गहरे अर्थ और भावभूमि वाले होते हैं। इनमें एक लय और लोच देखने को मिलते हैं जो मामूली फेरफार के कारण अर्थ-परिवर्तन का कमाल कर डालते हैं। जनजातीय शब्दों की निर्मिति या कहें व्यक्ति (स्त्री-पुरुष) के नामकरण की रामकहानी अलग है। इन नामों के पीछे का इतिहास परम्परा का अवगाहन करता मालूम देता है। गालो आदिवासी न सिर्फ अपने माता-पिता का नाम जानते हैं, बल्कि अपने 20 पुश्त पहले के पुरखा का नाम भी पता कर लेते हैं जहाँ से उनका खानदान शुरु हुआ है। यह ताज्जुब करने योग्य हो सकता है, किन्तु सचाई यही है कि गालो जनताति में नामकरण की विधि पूर्व-निर्धारित है जिसके माध्यम से नाम रखा जाता है।

अरुणाचली लोक-साहित्य वाचिक परम्परा में अब भी बने हुए हैं। पर्व-त्योहर के अवसर पर इनकी प्रस्तुति पारम्परिक विधि-विधान एवं अनुष्ठान के बीच किया जाता है। इस राज्य को उत्सवप्रिय राज्य कहा जा सकता है जहाँ सालों भर त्योहारों की धूम रहती है। जैसे-सी-दोन्यी, बूरी-बूत, लोसर, तोरग्या, रेह, न्योकुम, मोपिन, सोलुंग, मोह मोल, द्रि, चालो लोकू, आरान, एतोर, खिकसबा इत्यादि। अरुणाचली लोक-साहित्य यहाँ के आदिवासी शब्दों में समोये हुए हैं। इन आदिवासी शब्दों का व्यवहार-जगत में भीतर तक धँसा होना आदिवासीयत की मूल पहचान और जड़ से जुड़ा होना है। अरुणाचली आदिवासी अपने समस्त दुःख-तक़लीफ को शब्दों में रोप देना जानते हैं जिससे निकलने वाले अर्थ गहरी पीड़ा का आकल्पन होती है जिसे बड़ी समझदारी से गाया अथवा स्वरबद्ध किया जाता है। नृत्य का आदिवासी भाषाओं से तालमेल गहरा है। वह युद्ध अथवा उल्लास के लिए भी नृत्य कर अपनी ओजपूर्ण वीरता और प्रसन्नतासूचक उमंग व्यक्त करते हैं। जैसे-तापू नृत्य, बुया नृत्य, रिकमपादा नृत्य, देलोङ नृत्य, पोनुङ नृत्य, पोपिर नृत्य आदि।। ‘सेदी’ और ‘सेलो’ जैसी आदिवासी गाथाएँ हैं जिसमें अनगिन दर्द छुपा हुआ है। अरुणाचली लोक-साहित्य आदिवासी जीवन के दुःख और संत्रास को व्यक्त करने का सघन माध्यम बनते हैं। ‘आंजा’ और ‘पेङे’ शोकगीत यहाँ किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद गाया जाने वाला स्मरणगीत है जिसे नई पीढ़ी भूलने लगी है।

अरुणाचल प्रदेश की जनभाषाओं में विकल्पन सर्वाधिक है, तो लहजे में बदलाव के कारण उच्चारण में अंतर खूब है। एक ही पहाड की अलग-अलग स्थितियों में रहने वाली समान जनजाति की भाषा में भिन्नता मिलना स्वाभाविक है। यद्यपि पहाड़ों के बीच जीवन सहज नहीं है, तथापि पहाड़ को पैदा होते ही जिन्होंने देखा है; उनसे यारी गाँठी है; दु:ख-सुख, आफत-बिपत सबमें उसी के सुमिरन भरोसे अपने को अब तक बचाए रखा है। वे पहाड़ की परिभाषा नहीं बाँचते। फर्जी नामकरण नहीं करते। दरअसल, पहाड़ उनके लिए सजावटी लैम्प-पोस्ट नहीं है। छवि-निर्माण का तिकड़म या औजार नहीं है। पहाड़ उनके लिए आदिवासीयत-संस्कृति के मजबूत पाँव हैं, जिनसे विलग उनका अपना कोई इतिहास नहीं, सामूहिक-बोध, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक स्मृति नहीं है। जंगल उनकी अपनी दुनिया हैं, तो वनचरों से निकटता और लगाव उनके प्रेम का उत्स। भारतीय आदिवासियों के स्वीकार में दृढ़ता या कहें अटल वचनबद्धता है, तो क्रोध में आवेश का स्फुरण मात्र। उनके यहाँ धोखे की सतरंगी कलाबाजियाँ मौजूद नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में उन्हें इरादतन सिखाया गया है। उन्हें उनकी ही मूल पहचान से कट जाने की शिक्षा दी जा रही है। उन्हें अपने जड़ और मूल आस्था से जुड़े रहने का आश्वासन तो दिया जा रहा है, लेकिन अलग-अलग आयातित ‘नेमप्लेट’ के साथ उनके आंतरिक मूल्यों एवं पुरखाई चेतना को नष्ट-विनष्ट भी किया जा रहा है। आधुनिक शिक्षा-प्रणाली ने इन्हें अपनी मातृभाषा से अधिक दूर कर दिया है या फिर प्रत्यक्ष-परोक्ष बाहरी दबाव एवं आक्रमण के कारण वे अपनी विलुप्त होती जा रही भाषाओं को बचा पाने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं।

अरुणाचल प्रदेश के 25 जिलों में करीब सवा सौ जनजातियाँ हैं जो अपनी भाषा में समृद्ध और सामूहिक चित्तवृत्ति वाली संस्कृति में श्रेष्ठ है। यहाँ गंगा लेक है, जो ताईबिदा की लोककथा आज भी सुनाती है। जयरामपुर, विजयनगर, महादेवपुर, परशुराम कुण्ड, भीष्मकनगर, मालिनीथान, रुक्मिणी मंदिर आदि ऐसे नाम हैं जो उत्तर भारतीय लोक में रचे-बसे द्वापर व त्रेतायुगीन मिथकों की सचाई उजागर कर देते हैं। यह प्रस्थान-बिन्दु भारत की सामासिक-संस्कृति का सच सामने ला कर खड़ा कर देता है। प्राचीनता के ये अवशेष भारतीय सभ्यता के ऐसे स्मारक हैं जिसके समक्ष अखिल भारतीय चेतना मनुष्य मात्र के निमित रची-बुनी गई मालूम पड़ती है। पुरातत्त्व के आधुनिक विशेषज्ञ इस प्रदेश की प्राचीनता को भारत की गौरववर्णी सभ्यता का केन्द्रक मानते हैं। आदिवासियत की बहुआयामी परम्परा और मिथकीय चेतना में अरुणाचल प्रदेश अव्वल है। जीवटता और कर्मठता यहाँ के रहवासियों के गहने हैं। श्रमशीलता उनके जीवन की मुख्य धुरी है। उत्परिवर्तन और उद्वविकास के वे प्राकृतिक यात्री हैं। भाषा में उनके हृदय के फूल खिलते हैं और गंध बिखेरते हैं। कला, शिल्प और नानाविध कौशल भारतीय आदिवासियों का मुख्य श्रृंगार है।

आधुनिक मीडिया तंत्र या कहें संचार विधान में पहाड़ के लिए जगह या तो नहीं है या-है भी तो अल्पमात्र। ऐसे में आदिवासियत को समझने के लिए खुला दिल और सहृदय मन चाहिए। अस्तु, आदिवासी जनसमूह के वाचिक साहित्य को लेकर जिस ढंग की संवेदनशील एवं आत्मिक चेष्टाएँ चाहिए, उसका हर तरफ अभाव है। विशेषतया अरुणाचल या पूर्वोत्तर का आदिवासी लोक-साहित्य मौजूदा विमर्श की केन्द्रीयता एवं पहुँच से बाहर है। अरुणाचली भाषाएँ आज अपनी तमाम खूबियों के बावजूद पहचान के संकट से गुजर रही है। उनके समक्ष अपने को बचाए रखने की चुनौती है। यह घाव नित गहरा होता जा रहा है। मौजूदा मीडिया ने इस घाव को और चोटिल करने का काम किया है। वह बिकाऊ गाय बन चुकी है जिसे दूहते सत्ता-पूँजी के समर्थक हैं। आज की सूचना एवं संचार-संस्कृति में यही गायें भारतीयता के अब तक के हासिल को गोबर करने पर तुली हुई हैं। निःसंदेह वर्तमान मीडिया की सूचना एवं संचार-संस्कृति आलोचना के घेरे में है। यह घेराव पूर्वग्रह या दुराग्रहपूर्ण नहीं है, बल्कि हक़ीकत यही है। वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी मीडिया के वर्ग-चरित्र और वस्तु-स्थिति पर गंभीर टिप्पणी करते हैं कि-“अब मुख्यधारा की मीडिया की स्वतन्त्रता कोरी मिथ है। यह कारपोरेट घरानों व विज्ञापन घरानों का बंधक है। मीडिया सामग्री ‘प्रोडक्ट’ बन चुकी है। यह अब सूचना विचार की वाहक नहीं रही। अतः मीडिया की अन्तर्वस्तु और एकरूपीकृत कार्यशैली सचाई है जो मूल सवालों व मुद्दों का विलोपीकरण या हाशियाकरण करता है तथा सतही सवालों एवं मुद्दों का केन्द्रीकरण करता जाता है।“ परिणास्वरूप मीडिया की मनोगतिकी एवं मनोभाषिकी में अप्रत्याशित फेरफार हुआ है। शब्द अर्थ से आवृत्त न होकर पूँजी के दास हो गए हैं। अब शब्द तक की ‘यूनिक सेलिंग प्राइस’  (यूएसपी) तय की जा रही है। यह देखा जाने लगा है कि ‘शब्द-निवेश’ के कारण माध्यम की प्रभावशीलता में क्या और कितना फ़र्क पड़ रहा है। यह गौरतलब है कि अब छवियों की ही नहीं बल्कि शब्द के अभिविन्यास और उसके सत्ता को लेकर भी राजनीति शुरू हो गई है। ये शब्द अर्थ की वजह से नहीं अपनी बिकाऊपन की प्रकृति के कारण प्रयोग में घट या बढ़ रहे हैं।  लगातार हाशिए पर धकेली जा रही लोक-संस्कृति और उसके ठेठ लोक-साहित्य को लेकर रोना-धोना मचाने की जगह कुछ बातें ठोस एवं उपयुक्त तरीके से जान लेनी आवश्यक है। आधुनिक सूचनाशास्त्री सुभाष धूलिया का मानना है कि-‘‘समाज के नए-नए तबके मीडिया बाज़ार में प्रवेश कर रहे हैं और अपनी क्रय-शक्ति के आधार पर मीडिया उत्पादों के उपभोक्ता बन रहे हैं। सूचना की इस क्रांति के उपरांत दुनिया में जितने भी संवाद आज हो रहे हैं, वे बेमिसाल हैं; लेकिन इस संवाद का आकार जितना बड़ा है इसकी विषयवस्तु उतनी ही सीमित होती जा रही है। लोग अधिकाधिक मनोरंजित होते जा रहे हैं, और अधिकाधिक कम सूचित/जानकार होते जा रहे हैं।’’

अरुणाचली बौद्धिकों में अपनी ज्ञान-व्यवस्था और सांस्कृतिक कला-शिल्प के प्रति चिंता गाढ़ी हुई है। अपनी भाषाई अस्मिता और पुरखाई कोठार को लेकर वे जागरूक तथा अत्यंत संवेदनशील होते दिखाई दे रहे हैं। शहरी आबोहवा में उनका घरेलूपन जिस तरह छिन्न-भिन्न होता जा रहा है या कि उनकी सामूहिकता की संस्कृति जिस तरीके से अलगाववादी होती जा रही है; वे इसका निषेध करते हुए अपनी अस्मिता और पहचान को ‘पुनि पुनि’ खोजने का प्रयास कर रहे हैं। परिणामस्वरूप ‘वोकल फॉर लोकल’ की बात तेजी से हो रही है, लेकिन मीडिया की उपेक्षा और इरादतन नज़रअंदाज़ करने का भाव बेचैन कर देता है। 

पूर्वकथित गाँवबुढ़ा की चिंता आदी भाषा को लेकर थी। वह नई पीढ़ी के अपनी आदिवासी मूल्य-दर्शन और पहचान-अस्मिता से कटते जाने को लेकर व्यथित थे। माक्तेल परटिन नाम है उनका और पासीघाट से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित दाम्बुक गाँव के पोबलुङ बस्ती में रहते हैं। नई पीढ़ी तकनीकी ज्ञान में अव्वल है। उसे झटपट बहुत कुछ करने आता है जिससे आधुनिक जीवन जीना आसान हो चला है। इसे लेकर वह सकारात्मक रूख दिखाते हैं, लेकिन उनकी मूल चिंता भाषा को लेकर है।

अरुणाचल प्रदेश की अधिसंख्य जनजातियाँ अपनी स्वतंत्र लिपि नहीं होने के कारण बड़ी विडम्बना का शिकार है। खाम्पति और मोम्पा आदिवासी के पास लिपि की अपनी परम्परा है, लेकिन उसके जानकार बहुत कम और बेहद विशिष्ट लोग हैं। सामान्य प्रचलन में अरुणाचली लिपि का सर्वथा अभाव है जिस कारण यह प्रदेश दुनिया की दृष्टि में आज भी पूरी तरह से खुला या कि सूचना एवं संचार संस्कृति की सीधी पहुँच में नहीं है। यद्यपि इस दिशा में बहुतेरे प्रयास हुए हैं, तथापि यह नाकाफ़ी है। जैसे-वांचो लिपि, तानी लिपि, गालो लिपि, आदी लिपि आदि। व्यक्तिगत प्रयास द्वारा स्थानीय लिपि-निर्माण की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन किसी एक लिपि को लेकर अभी अरुणाचल प्रदेश का मानस एकजुट अथवा एकमत नहीं है। लिपि को लेकर जन-स्वीकृति का नहीं होना बड़ी समस्या है। बहरहाल, बहुमान्य लिपि न होने के कारण अरुणाचली जनसमाज अपनी मातृभाषाओं के लोक-साहित्य का संरक्षण एवं संग्रह कर पाने की स्थिति में नहीं है। आकाशवाणी पासीघाट के कार्यक्रम प्रमुख इदाङ परटिन ने बताया कि-‘पासीघाट का यह आकाशवाणी केन्द्र सबसे पुराना केन्द्र है। इस केन्द्र के पास रिकॉर्डेड अति-महत्त्वपूर्ण अभिलेख हैं जो यहाँ के जनसमाज एवं जनसंस्कृति के लिए अमूल्य धरोहर है। लोक-साहित्य आधारित कार्यक्रम की व्यवस्था है। आधुनिक तकनीक एवं प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जा रहा है जिसमें डीआरएम (DRM) और यूपीटीआर (UPTR) की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।”

अरुणाचली प्रसारण में रेडियो की भूमिका अन्यतम रही है। इनके पास मौजूद रिकार्डेड अभिलेख संकटग्रस्त होती जा रही जनजातीय भाषाओं के लिए संजीवनी सरीखा है। ईटानगर स्थित दूरदर्शन के ‘अरुण प्रभा’ चैनल की उल्लेखनीय भूमिका यह रही है कि वह स्थानीय भाषाओं में प्रसारण को लगातार बढ़ावा और मातृभाषाओं में अनेकानेक कार्यक्रम ‘टेलिकास्ट’ कर रहे हैं। यह यूनेस्को के उस रिपोर्ट की चिंता को कम करने की दिशा में ठोस एवं सार्थक पहलकदमी हैं जिसके मुताबिक 1961 ई. की जनगणना में 1652 भाषाओं के होने की जो पुष्टि हुई थी, वह 1971 ई. में मात्र 808 की संख्या में बची थीं। पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के 2013 ई. में हुए सर्वेक्षण बताते हैं कि पिछले पचास सालों में भारत की 220 भाषाएँ मृत हो चुकी हैं, जबकि 197 भाषाएँ संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल हो चुकी हैं। ऐसी दशा में शिक्षा आधारित भाषाई लगाववृत्ति विकसित किया जाना आवश्यक हो चला है। खासकर अरुणाचल प्रदेश की उन भाषाओं के लिए यह खतरा अधिक भयावह है जिसके बोलने वाले की संख्या दो-चार सौ तक सिमट कर रह गई है। ऐसे में अरुणाचल प्रदेश के ज्ञानवान समाज और उनकी ज्ञान-संस्कृति का बचाने की मुहिम छेड़ना जरूरी हो गया है। यह और बात है, अरुणाचल प्रदेश की पढ़ी-लिखी पीढ़ी के शौक और स्वप्न तेजी से बदल रहे हैं। वह आदिम आकांक्षा की जन-भावनाओं से भिन्न सोच रही है। वह प्रकृतिजीवी नहीं है, अपितु अधिकाधिक विलासी एवं कृत्रिम जीवन चुन रही है। महँगी गाड़ियों की ख़रीद, बड़े-बड़े बँगलों का शौक तथा सांस्कृतिक उत्पाद एवं  उपनिवेश बनते जाना इसका उदाहरण है। ऐसे में अपने समय के अंतर्विरोधों को दर्ज करना है, देशकाल में मौजूद विरोधाभासों से टकराना है तथा अपने समय के द्वंद्वों एवं विडम्बनाओं पर गंभीरता के साथ चिंतन-मनन करना है। जनमाध्यम के लिए ‘मास’ की असल अवधारणा मुख्य भूमिका और औचित्य भी यही है।

  1. Navendu Page; Aparajita Dutta; Bibidishananda Basu, Trees of Arunachal Pradesh (Mysore:Nature Conservation Foundation, 2022)
  2. रामशरण जोशी, “असंतोष और असुरक्षा के साये में”, समयांतर (फरवरी, 2011), 8
  3. समयांतर (फरवरी, 2011) 57
  4. आईसीएसएसआर-इम्प्रेस क्षेत्र-सर्वेक्षण के अन्तर्गत पासीघाट आकाशवाणी के कार्यक्रम निदेशक इदाङ परटिन द्वारा लिए गए रिकार्डेड साक्षात्कार से।

डॉ. राजीव रंजन प्रसाद राजीव गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, अरुणाचल प्रदेश के हिंदी विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं तथा भारतीय समाज विज्ञान अनुसन्धान परिषद् द्वारा अनुदानित ‘अरुणाचली लोक-साहित्य और मीडिया: अंतःसम्बन्ध एवं अंतःक्रिया’ शीर्षक शोध-परियोजना कार्य पूर्ण कर चुके हैं।

दोहों में गीतों के अक्षय अंकुर : ज्यों कुहरे में धूप

पुस्तक: ज्यों कुहरे में धूप
लेखन: श्री शिव मोहन सिंह
प्रकाशन: विनसर पब्लिशिंग कं देहरादून

“देखन में छोटा लगे, घाव करे गंभीर” वाली सटीक पंक्ति कविवर बिहारी की सतसई के संदर्भ में कही गई थी। सतसई वह दोहा-संग्रह है जिसे विश्व स्तरीय ख्याति मिली है। संत कवि कबीरदास, आचार्य तुलसीदास, नीति निपुण रहीम जी, जायसी जी आदि कवि दोहों की बदौलत अब तक जनमानस में जीवित हैं।  इससे दोहा की महत्ता और जन स्वीकार्यता सिद्ध होती है। दोहा चार चरणों में कुल 48 मात्राओं का व्यवस्थित छंद मात्र नहीं है अपितु कथ्य और प्रभाव की दृष्टि से युगबोध का सबसे लघु प्रतिनिधि दस्तावेज भी है। इसलिए दोहा का कलापक्ष सबसे आसान है तो भावपक्ष का प्रतिमान सबसे ऊपर। अतएव दोहाकार को स्थापित होने के लिए बहुत बड़ी सतत साधना की आवश्यकता होती है। ससम्मान सेवानिवृत्त अभियंता श्री शिव मोहन सिंह जी देहरादून की धवल धरती से सरस गीत, प्रेरक मुक्तक के बाद अब दोहाकार के रूप में “ज्यों  कुहरे में धूप” के साथ उपस्थित हैं।

15 अध्यायों में विभक्त किंतु अखंड 108 पृष्ठीय तकरीबन 600 दोहों से सुसज्जित है ज्यों कुहरे में धूप। यद्यपि दोहे मुक्त होते हैं तथापि कुछ लेखक विविध विषयों या उपविषयों में बाँधकर श्रृंखलाबद्ध सृजन भी करते हैं। इस पुस्तक के लेखक के मन में जब भी विचारों का अर्णव उदित हुआ, मन वांछित विधा में लिपिबद्ध कर लिए। जब पुस्तक प्रकाशन का विचार आया, विषयों-उपविषयों में संग्रहित कर लिए। इस सम्बंध में लेखक ने “अपनी बात” में बताया भी है कि-

“भाव-भाव आते रहे, पथ में जैसे मीत।

शब्द-शब्द बनते रहे, कुछ दोहे कुछ गीत।।”

इस संग्रह में शतकाधिक दोहे ऐसे हैं जिन्हें लोकोत्तियों का नव कलेवर कहा जा सकता है। द्विरुक्ति का अधिकाधिक प्रयोग हुआ है जो दोष होते हुए भी श्रृंगार वर्द्धक है। एक या दो चरण का कई दोहों में ज्यों का त्यों जुड़ जाना खलता है किंतु लेखक की पूर्व स्वीकारोक्ति कि दोहों का सृजन काल व्यापक रहा है, दोष क्षीण हो जाता है। पुस्तक को त्रुटिरहित रखने में लेखक को बहुतायत सफलता मिली है। प्रायः दोहा में प्रथम व द्वितीय चरणों में किसी तथ्य को कहा जाता है और तृतीय व चतुर्थ चरण में उदाहरण द्वारा पुष्टि की जाती है। यही कारण है कि मात्र 48 मात्राओं में एक विषय का पूर्ण निष्पादन हो जाता है। दृष्टांत या उदाहरण के संदर्भ में सर्वाधिक प्रचलित दोहे ही हैं। इस मानक पर कुछ दोहे कुछ कमजोर प्रतीत होते हैं किंतु वे एक स्वतंत्र काव्य बनकर स्थापित हो जाते हैं।

 दोहों के परिधान में गीत सँजोना इस दोहाकार की प्रमुखं विशेषता है। इसका कारण इनके पूर्व रचित गीत हैं जो किसी भी काव्यिक साँचे में स्वयं को ढाल लेते हैं। लेखक महोदय वर्तमान की दशा और भविष्य की दिशा के प्रति भी पूर्णतः सजग हैं। विरासत, परिवर्तन और प्रगति के पक्षधर हैं। कुछ दोहे द्रष्टव्य हैं जो प्रबुद्ध पाठक को कुहरे में धूप की अनुभूति कराकर ही दम लेते हैं।

“आज अधूरे ज्ञान की, सत्ता हुई समर्थ।

बनते पावन शब्द के, नित्य अपावन अर्थ।।

पक्की होती क्यारियाँ, कच्चा घर बुनियाद।

खेती होती सड़क पर, धरना संग फसाद।।

नफ़रत के बाजार में, घुला प्रीति का रंग।

मुदित हुआ मन झूमता, उर में भरी उमंग।।”

समीक्षक

डॉ अवधेश कुमार अवध: वाराणसी (चन्दौली), उत्तर प्रदेश के मूल निवासी डॉ अवध मेघालय में सिविल अभियांत्रिकी मेंं सेवारत हैं। बहुआयामी लेखन के साथ समीक्षा में भी रुचि रखते हैं।  देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ नियमित रूप से प्रकाशित होती रहती हैं। इनके द्वारा संपादित “इनसे हैं हम” उल्लेखनीय पुस्तक है।

त्याग और वलिदान की जाग्रत प्रतिमूर्ति – सती जयमती

जम्बुद्वीप भरतखण्ड भारतवर्ष आर्यावर्त देश के प्राचीन शाश्वत् इतिहास के पृष्ठ में महिमामयी तथा वीरांगना नारियों के नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। अखंड भारत के भूभाग एवं रत्नगर्भा धरित्री के कोख में जन्मे सौभाग्यवती नारियों का वर्णन कर पाना किसी भी कलमकारों के लिए सहज नहीं है। वह चाहेँ प्राचीन काल की विदुषी नारी के विषय में हो अथवा ऋषि-मुनियों का ही वर्णन हो अथवा मध्यकाल की वीरांगनाओं का वर्णन ही क्यों  न हो। समय-समय पर ऐसी विदुषी द्वारा दिखाए गये साहसिक कदमों ने नारी जाति के कद को अनेक बार ऊँचा उठाया है। उसी क्रम में पूर्वोत्तर भारत के नारियों का योगदान भी इतिहास के पन्नों में पाया  जाता है। वो चाहे आक्रमणकारियों के विरोध में आवाज उठाना हो अथवा देशहित को सर्वोपरि मानकर देशभक्ति सहित राष्ट्रधर्म पालन करने वाला कार्य हो अथवा परतन्त्रता से मुक्ति पाने के लिए किया गया संघर्ष ही क्यों न हो? ऊपर उल्लेख किया गया समग्र महामानवीय गुणों से परिपूर्ण पूर्वोत्तर भारत असम राज्य की वीरांगना जयमती का नाम वीरांगना नारियों के बीच का कभी न भूलने वाला नाम है। ऐसी स्वाभिमानी नारी, जिन्होंने अपने पति और देश के लिए दिया हुआ बलिदान तथा उनके गौरवमय ऐतिहासिक गाथा को प्रत्येक भारतवासियों को हृदयंगम करना और उनके बारे में जानना जरूरी है।

माता चन्द्रदारू और पिता लाइथेपेना बरगोहाञी की पुत्री जयमती कई भाई बहनों के बीच की थी, फिर भी वह माता-पिता तथा परिवार के सभी लोगों से ज्यादा प्यार – दुलार पाकर पली बड़ी थी। लाइथेपेना बरगोहाञी के पूर्वजों के साथ आहोम राजपरिवार का घनिष्ट सम्पर्क था। इसी सूत्र के तहत ही लाइथेपेना का भी आहोम राजा के साथ घनिष्ट सम्पर्क रहा। राज परिवार की छत्रछाया तथा अपने परिवार से अधिक प्यार दुलार पाने वाली सती जयमती छोटी उम्र से ही अधिक दायित्वशील,  दक्ष और अत्यन्त बुद्धिमती थी।

उस समय आहोम राज्य के राजा थे गोबर राजा। गोबर राजा के तृतीय पुत्र थे गदापाणि। गदापाणि बहुत ही शक्तिशाली तथा साहसी थे। प्राय: राजकुमार गदापाणि जंगलों में शिकार करने हेतु जाया करते थे। एक दिन शिकार से लौटते वक्त वे भूख और प्यास से आतुर हो गदापाणि के घर पहुँचे और कुछ खिलाने के लिए आग्रह किया। सुशील तथा अतिथि परायण गुण सम्पन्न जयमती ने बहुत ही स्फूर्ति से भूख और प्यास से आतुर गदापाणि का बहुत अच्छी तरह से अतिथि सत्कार किया। उत्तम आतिथ्य से प्रभावित होकर जयमती को अपनी अर्द्धांगिनी  के रूप में पाने की इच्छा उनके मन में प्रकट होने लगी। लावण्यमयी जयमती भी सुंदर, सुदक्ष तथा शक्तिशाली राजकुमार गदापाणि से प्रभावित हुई। दोनों परिवार की सहमति से जयमती और गदापाणि का आहोम के ‘चकलंग’ विवाह पद्धति अनुसार शुभ विवाह सम्पन्न हो हुआ । ‘त्याग नारी के जीवन का अलंकार है और पति उनका देवता है’ – इस आप्तवाक्य को शिरोधार्य कर जयमती ने अपनी वैवाहिक जीवन में कदम रखा। ससुराल में भी सासू माँ जयमती से असीम स्नेह करती थीं। उन दोनों का युग्म जीवन सुख – समृद्धि से व्यतीत होने लगा। दोनों को वैवाहिक जीवन के साक्षी स्वरुप दो सुंदर पुत्र संतान की प्राप्ति भी हुई।

गोबर राजा के मृत्यु पश्चात् उनका तृतीय पुत्र गदापाणि आहोम के राजा बना। उस समय राजसत्ता को लेकर अधिकारियों के बीच घमासान गृहयुद्ध शुरु हो गया  । गुवाहाटी और निचले असम के आहोम राज प्रतिनिधि लालुकखोला बरगोहाञी ने कूटनीति  एवं षड्यन्त्र कर सात दिन में ही गदापाणि को राजसत्ता से हटाया और चुलिकफा नामक चौदह वर्षीय बालक को खुद के निजी स्वार्थ सिद्धि के लिए सन् 1679 में राज सिंहासन पर बैठाया। छोटी-सी उम्र में राजा बनने के कारण चुलिकफा को ‘लरा रजा’ भी कहा जाता था। चतुर लालुकखोला ने कुशलतापूर्वक उनकी पाँच वर्ष की बेटी को सत्तासीन लरा रजा के साथ विवाह कर फिर शासन की बागडोर अपने हाथों में ले लिया। उसके बाद वह तमाम षडयन्त्र रचने लगा। आहोम राज्य में ऐसा एक प्रचलित नियम था कि अंगक्षत वाला कोई भी युवक राजा बनने का योग्य नहीं होगा। लालुकखोला ने इस नीति का गलत फायदा उठाते हुए राज्य में राजा बनने के योग्य युवकों को अंगक्षत करने का आदेश दे दिया। जयमती के पति गदापाणि लालुकखोला बरफुकन का सबसे बड़ा शत्रु था क्योंकि एक राजा होने के सभी गुण और योग्यता उनमे विद्यमान था। ‘लरा रजा’ और लालुकखोला के इस तरह के अनैतिक क्रिया-कलापों के कारण गदापाणि अपनी अर्धाङ्गिनी जयमती और दोनों बेटों को लेकर किसी गुप्त स्थान में रहने लगे। राजा के सैनिक गदापाणि को ढूँढते हुए उस स्थान पर पहुँच गए। अपने पति को शत्रु-पक्ष से बचाने तथा देश को सुशासक प्रदान करने के लिए जयमती गदापाणि से दूसरे जगह भागने के लिए कहा। पहले तो गदापाणि कहीं भागने के लिए राजी नहीं थे। पत्नी के बार-बार अनुरोध करने पर वह टाल नहीं पाते और दोनों बेटों को नानी के पास सुरक्षित छोड़कर गदापाणि नगापाहाड़ की ओर चल गए ।   लालुकखोला के आदमियों ने जयमत जयमती से गदापाणि का पता बार-बार पूछा लेकिन जया ने अपने पति का ठिकाना नहीं बताया। अत्याचारी लालुकखोला जयमती को बंदी बना कर ले गए और गदापाणि के बारे में पूछते हुए राजदरवार में उन पर अनेक प्रकार के अत्याचार करने लगे लेकिन जयमती अडिग रही और पति के विषय में कुछ भी नहीं बताया। अत्याचार सहन करती रही फिर भी मुँह नहीं खोली। शत्रु पक्ष जब जया से कुछ जान नहीं पाए तब और भी ज्यादा क्रुद्ध होकर जयमती को जेरेंगा पथार नामक एक खुले मैदान में ले ग्ए। काँटों से भरे हुए एक पेड़ पर जया को बाँधकर ” अपने  पति को कहाँ छुपाया है?” यह प्रश्न बार-बार कर उसको शारीरिक और मानसिक अमानवीय अत्याचार करने लगे। –” राज्य शासन कर रहे भ्रष्ट सत्ताधारियों को गदापाणि जीवित रहने से ही सत्ताच्युत करना सम्भव हो पाएगा। यदि  इन लोगों को  गदापाणि का पता चल गया तो निश्चित ही उनको मार डालेंगे। उनकी मृत्यु से अच्छा है, ये लोग मुझे ही मार डालें। खुद के प्राण की आहुति देकर भी इन दुराचारियों के पंजे से भावी योग्य राजा को मैं बचाऊँगी ।” ऐसी बातें सोचते हुए अत्याचार सहन करने लगी। दुराचारियों ने उबलते हुए गरम पानी जयमती के शरीर पर फेंका और लोहे के चाबुक से प्रहार किया उसके  उपरान्त भी परम तेजस्विनी क्रान्तिकारिणी नारी जयमती ने राजधर्म का पालन करते हुए क्रूर शासक के आगे मुँह नहीं खोला। उसी समय वहाँ एक दृश्य परिघटित होता है – गदापाणि नगापाहाड़ में स्थान बदल-बदल कर खुद को छुपाते हुए  जयमती प्रति हो रहे कठोर अत्याचार  का पता चला। वे छद्मवेश में उसी स्थान पर पहुँच जाते हैं, जहाँ जयमती कठोर अत्याचार की शिकार हो रही थी। अपनी प्रियतमा पत्नी को आँखों के सामने किया गया अत्याचार, उत्पीड़न देखकर उनका हृदय पीड़ा से दग्ध हो जाता है। चाबुक से निरन्तर पीटते हुए प्रताड़क कह रहे थे — “ओई तोर गिरियेक कोत आसे क’?” (अर्थात् तेरा पति कहाँ है बता) कहकर पत्नी को पिटते हुए देखकर छद्मवेशी गदापाणि खुद को रोक नहीं पाता  और सामने आकर जयमती को कहता है – “ओइ, तइ तोर गिरियेकर कथा कोइ निदिय किय?” (अर्थात् – तुम अपने पति के बारे में क्यों बता नहीं देती?”) अपने पति की उपस्थिति का आभास जयमती को हो जाता है, वह गदापाणि को पहचान लेती है। तब तुरंत जयमती गदापाणि को यह स्थान छोड़ने के लिए इंगित करते हुए कहती है — “जोर मानुह तालै नाजाय किय? मइ नकउँ, नकउँ, नकउँ।” (जहाँ से आए हो वहीं क्यों नहीं जाते? मैं नही कहूँगी, नहीं कहूँगी, नहीं कहूँगी) वे अपनी पत्नी के दृढ़ संकल्प तथा कठोर निर्णय के आगे नतमस्तक होकर दुखी मन लेकर वहाँ से चले जाने को बाध्य हो गए। यह विछोड़ इन प्रेमी युगलों के जीवन की अंतिम विदाई बनी। अर्थात् यही थी गदापाणि और जयमती का अंतिम मुलाकात।

जेरेंगा पथार में 14 दिन तक निरन्तर अमानवीय अत्याचार सहते हुए अपने पति का ठिकाना “मैं कदापि नहीं कहूँगी” कहते हुए एवं अनेक यातनाएँ सहकर उसी पेड़ पर बँधी हुई जयमती ने सन् 1679 के 27 मार्च के दिन प्राण त्याग दिया । वीरांगना जयमती के महान त्याग के द्वारा लरा रजा तथा लालुकखोला के अन्याय तथा अत्याचार से असमवासी का उद्धार करने में सक्षम हुई । सन् 1681 से लेकर सन् 1696 तक गदापाणि  गदाधर सिंह नाम  से आहोम के राजा हुए। बाद में सन् 1696 – 1724 तक  जया के ज्येष्ठ पुत्र रूद्र सिंह आहोम के राजसिंहासन पर अधिष्ठित हुए। वीरांगना जयमती के पुत्र रूद्र सिंह ने कुछ दिनों के बाद अपनी  माता जयमती का अमानवीय अत्याचार सहन कर मृत्यु वरण किये गये स्थान ( जेरेंगा पथार ) पर ‘जयसागर’ नाम से एक पोखर का निर्माण किया और उसी जयसागर के ही पास ही “जयदौल” भी निर्माण किया। सन् 1714 – 1744 तक जयमती के कनिष्ठ पुत्र शिव सिंह आहोम के राज सिंहासन पर अधिष्ठित हुए। इस प्रकार राजसत्ता परिवर्तन करने में सक्षम अत्यन्त निडर दृढ़ निश्चयी भारतीय क्रांतिकारी नारी जयमती का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षर में अंकित किया गया है। जयमती के त्याग ने समग्र नारी जाति को गौरवान्वित किया है। वैसे तो इतिहास में बलिदान के अनेको गाथाएँ पढ़ने अथवा सुनने को मिलती हैं। उन सभी का बलिदान  अपने अपने क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हैं। आत्मबलिदान की परिसीमा अधिकतम् अथवा न्यूनतम कभी नहीं होती। आखिर बलिदान तो बलिदान ही होता है, यह सदैव महानतम होता है लेकिन जयमती के बलिदान नारी जगत के लिए विशेष महत्वपूर्ण एवं राष्ट्रधर्म के साथ संलग्न तथा राज्य के लिए सुयोग्य प्रशासक पति रूपी सुराजा का चयन और नियुक्ति का मोहर है। चौदह दिन तक का भीषण प्रहार झेलकर भी भावी सुयोग्य राजधर्म पालक राजा के सपने संजोकर मृत्यु को आलिंगन करने के लिए एकबार भी पीछे नहीं हटी। उन्होंने भारतीय सनातनी नारी के पतिधर्म का भी उतना ही पालन किया जितना उन्होंने सुयोग्य राजा को बचाने के लिए किया। ऐसी महिमामयी त्यागी वीरांगना नारी जयमती की महान् त्याग को स्मरण करते हुए प्रतिवर्ष 27 मार्च के दिन पूरे असम में ” जयमती दिवस” मनाया जाता है। महान् वीरांगना नारी जयमती की असीम त्याग,  उनके दिखाए गए आदर्श तथा उनकी स्मृति हमारे बीच सदैव सजीव होकर रहेगा।

साभार  ग्रंथ:

  1. Itihase Soaura Chasahata Bachar (ইতিহাসে সোঁৱৰা ছশটা বছৰ), Sarbananda Rajkumar ,(Guwahati: Banalata,2017)
  2. Tungkhungia Buranji Or A History Of Assam 1681-1826, S K Bhuyiyan, (London:Oxford University press,1933)
  3. Deodhai Asam Buranji: with several shorter chronicles of Assam, S K Bhuyiyan, (Calcutta:Department of Historical and Antiquarian Studies Assam,1932)
  4. जयमती कुँवरी, लक्ष्मीनाथ बेजबरूवा।
  5. जयमती कुँवरी मालिता, कृपानाथ फुकन

कल्पना देवी आत्रेय कल्पना असम के नगांव जिले के हाथीखोया गांव की रहने वाली हैं। वह एक शिक्षिका होने के साथ-साथ एक गृहिणी और लेखिका भी हैं। उनके लेखन में ऐतिहासिक महिला पात्र अधिक नजर आते हैं।

मोच

Voice: Badal

कई दिनों से पाँव में दर्द होने के कारण खाना बनाने वाली बाई केवल सुबह ही आ पाती है l और उसमे भी बीच बीच में नागा कर लेती है अतः रात का खाना हम दोनों माँ -बेटी मिल कर ही बनातीं हैं इसीलिए रात का भोजन एक साथ बैठ कर ही कर लेते हैं l
इन्होंने हम दोनों से पहले खाना खा कर अपनी थाली खिसकाते हुए कहा — ये भी रख देना और तुरंत खड़े हो कर सिंक की ओर मुड़ गए l
बेटी जो विदेश से कुछ महीनों पहले ही कोरोना के चलते मेरे पास यहाँ आई हुई है, तपाक से बोल पड़ी —-पापा अपनी थाली ख़ुद रखा करो, आप के जूठे बर्तन उठाते -उठाते मेरे हाथ में मोच आ गयी !
सुनते ही मुझे हँसी आ गयी !
सच में ही बेटी के हाथ में मोच आ गयी थी या आज कल के बच्चों की उच्शृंखलता झलक रही थी या कि उसने भारतीय मर्दों की सोच पर प्रहार करना चाहा था l

रात को बिस्तर में देर तक नींद नहीं आयी , जाने कितनी ही पिताजी की बातें एक मधुर एहसास लिए हुए , चलचित्र की भांति दिखाई देने लगीं l वो हमेंशा ही अपने जूठे बर्तन उठाते ही नहीं बल्कि माँजा भी करते थे l
इतना ही नहीं वे हमेंशा अपने पहनने के कपड़े धो कर प्रेस भी ख़ुद ही किया करते थे l बटन भी अपने आप ही टाँका था एक बार मेरे आग्रह के बावज़ूद भी l और न जाने कितने ही कार्यों में वो माँ का हाथ बँटाया करते l दही बिलौना तो जैसे उन्हीं की जिम्मेदारी हो l मैं जब दसवीं में थी तो उन्होंने मेरे हिस्से का काम भी सहर्ष किया था ताकि मुझे पढ़ने के लिए अधिक समय मिल सके l मेरे नौकरी पेशा पिता भी पूर्णतः भारतीय ही तो थे l
आज सुबह ही बाई का फ़ोन फिर आ गया उसकी बेटी ने उधर से कहा माँ के तेज बुख़ार है आज नहीं आएगी lमैं कुछ कह पाती उससे पहले ही फ़ोन काट दिया l अच्छा हुआ ऐसे में कहने को मेरे पास था ही क्या ? और मैं रसोई की तरफ जाते हुए सोचने लगी मेरे हाथ की मोच तो यूँ ही बर्तन धोते हुए ठीक हो जाएगी, हमेंशा की तरह l
अवनीत कौर दीपाली, का जालंधर पंजाब में जन्म हुआ। इनकी तुकांत, अतुकांत,लघुकथा, कहानी कई समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई है। अनेकों पत्रिका जैसे गृहशोभा, सरिता, वनिता गृहलक्ष्मी और असम की अनेकों पत्रिकाओं में इनकी कविताएं ज्ञापित हुई है।

डॉ. सुशीला ढाका रसायन विज्ञान श्री कल्याण राजकीय महाविद्यालय सीकर की अध्यापिका होने के साथ-साथ कई पुरस्कारों से सम्मानित एक नामचीन कवित्री हैं। इनकी कई पत्रिकाओं में कविताएं छप चुकी हैं। ईनकी कविताओं का संग्रह बंदी से नामक पुस्तक में पाई जा सकती हैं। नियमित तौर पर आकाशवाणी से इनकी कविताओं का प्रसारण होता है।

इनसे हैं हम

पाठ्य पुस्तक के सारे गुण समाहित हैं ‘इनसे हैं हम’ में

मैं बार -बार सोचता हूं कि अगर जगनिक न होते तो आल्हा-ऊदल जैसे वीरों का नाम समय के साथ समाप्त हो गया होता। राजा परमाल का नाम तो इतिहास की किताबों में मिलता है लेकिन आल्हा- ऊदल का नहीं मिलता। इतिहास सिर्फ शासकों का लिखा जाता है। सेनापतियों का लिखा जाता है। वार जनरलों का लिखा जाता है। सारा खेल तो राजा- रानी के इर्द-गिर्द ही घूमता है न? अब उसमे प्यादों, घोड़ों, ऊटों को भला कौन याद रखे? जबकि उनके बिना किसी भी सम्राट का कोई अस्तित्व नहीं। नींव के ईंट कब तक गुमनाम होते रहेंगे!

आज हम जो भी हैं, ऐसे ही नहीं हैं। उसके पीछे प्रत्यक्ष या परोक्ष उन तमाम लोगों की कुर्बानियां हैं जिन्होंने इस धरती को उर्वर रखने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। ये कुर्बानियां सिर्फ खुद को गर्वित महसूस करने के लिए याद रखनी जरूरी नहीं होतीं बल्कि इन्हें पढ़कर और सुनकर अपना आगे का मार्ग प्रशस्त करने में भी सुविधा होती है। भविष्य की गलतियाँ याद करके अपने पूर्वजों को कोसने से बेहतर है, उनके प्रति अहोभाव रखकर उनकी गलतियों से सीखें जिससे उनका दुहराव होने से बचा जा सके।

यह देश दधीचि का देश है जिन्होंने असुरों को मारने के लिए अपनी अस्थियाँ दान कर दी। यह देश गौतम बुद्ध का देश है जिनके एक इशारे पर अंगुलिमाल जैसा डाकू बौद्ध हो गया। यह देश नेताजी का देश है जिनकी गुमनामी भी शत्रुओं के लिए भयावह बनी रही। यह देश भगत सिंह और आजाद का देश है जिनकी जवानी ने खून की होली खेली तो देश में उबाल आ गया। यह देश रानी लक्ष्मीबाई और दुर्गावती का देश है जिन्होंने तलवार उठाया तो अंग्रेजों की चूलें हिल गईं। ये देश पन्ना धाय का देश है जिसने अपने राज्य के युवराज को बचाने के लिए अपने बेटे को तलवार के नीचे रख दिया।

ऐसे ही अपने इक्यावन पूर्वजों की कहानी से सजे हुए संग्रह का नाम है ‘इनसे हैं हम’ जिसका संपादन डॉ अवधेश कुमार अवध जी ने बेहतरीन ढंग से किया है। जिसका हर पाठ प्रतिभा संपन्न किंतु हिंदी साहित्य के बड़े मठों से दूर रहने वाले साहित्यकारों ने बड़ी ही सहजता और सरलता से लिखा है। जिसे पढ़ना नई पीढ़ी के लिए न केवल ज्ञानार्जन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है बल्कि हर पुस्तकालय में  इस प्रकार की पुस्तकों की उपस्थिति अपरिहार्य भी है।

संपादकीय से लेकर अंतिम पाठ तक हर अध्याय पठनीय है। संपदाकीय के लिए संपादक की अलग से तारीफ भी बनती है, जिसमें उन्होंने पुस्तक की जरूरत और पूर्वजों की भूमिका पर वृहद लिखा है। संग्रह की सहजता इसकी उत्कृष्टता भी है जिसमें इस देश की महान विभूतियों के बारे में संक्षेप में किंतु दुर्लभ जानकारियाँ उपलब्ध करवाई हैं। बिना किसी अतिरिक्त फैंटेसी और काल्पनिकता का सहारा लिए इस प्रकार संग्रह तैयार करना इसे पाठ्य पुस्तकों की श्रेणी में रखने के लिए पर्याप्त है। उम्मीद है कि सक्षम व समर्थ लोग ध्यान देंगे।

आज के इस अंतर्जालीय युग में ज्ञान जितना सुलभ हुआ है उतना ही सत्य और प्रामाणिकता से दूर भी हुआ है। ऐसे समय में किताबों की अहमियत और बढ़ गई है। इंटरनेट माध्यमों पर लोग कुछ भी लिख दे रहे हैं। ऐसे में सही और गलत का फैसला कर पाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। खासकर नई पीढ़ी के लिए यह समय और भी दुविधापूर्ण है। ऐसे समय में ‘इनसे हैं हम’ जैसी किताबों की उपलब्धता उनके लिए एक मार्गदर्शक का काम कर सकती हैं, जिसे पढ़कर वे सही और गलत का फैसला बड़ी आसानी से कर सकते हैं।

एटा जिले के कासगंज तहसील में जन्मे महावीर सिंह का नाम हममें से ही कई लोग होंगे जिन्होंने सुना भी नहीं होगा।  जिन्होंने बाहर तो छोड़िए जेल में रहकर भी अंग्रेजों की नाक में दम करके रखा था। अंडमान जेल की सुविधाओं के विरोध में आमरण अनशन करते हुए जब जेल अधिकारी उन्हे जमीन पर पटककर नाक में नली डालकर जबरन दूध पिलाने की कोशिश कर रहे थे। इसी समय वह नली उनकी आंतों में न जाकर फेफड़ों में दाखिल हो चुकी थी। अधिकारी उनके फेफड़ों में ही दूध उड़ेलकर दूसरे कैदी के पास चले गए और महावीर सिंह ने वहीं तड़पकर अपना दम तोड दिया। (स्वाधीनता संग्राम के महावीर – डॉ राकेश दत्त मिश्र ‘कंचन’)

बप्पा रावल का नाम तो काफी सुना-सुना सा लगता है लेकिन वो कौन थे कब जन्मे थे उनका अपने इतिहास में क्या योगदान है आदि बातें मुझे प्रस्तुत संग्रह में संग्रहित उनकी जीवनी पढ़कर ही पता चली। इस अध्याय के लेखक डॉ पवन कुमार पांडेय जी हैं।

ऐसे ही वीर कुँवर सिंह और उनके भाई अमर सिंह और उनके रिश्तेदार बेनी सिंह का योगदान इतिहास से ओझल है। (डॉ अवधेश कुमार अवध)।

वीरबाला कनकलता बरुआ के बारे में बहुत कम ही लोग जानते होंगे। जबकि उनका योगदान किसी भी नागरिक का सिर माथे पर बिठा लेने के लिए काफी है। वो असम की पहली महिला थीं जो आजादी की लड़ाई में शहीद हुए थीं। अधिक जानकारी के लिए इस संग्रह में संकलित डॉ रुनू बरुआ जी के लेख को पढ़ा जा सकता है। डॉ अनीता पंडा द्वारा लिखित मेघालय के जयंतिया हिल्स से कियांग नांगबाह का शौय एवं सूझबूझ पठनीय है।

युद्धवीर सुकालू, लाचित बरफुकन, सती जयमती, चाफेकर त्रिबंधु, प्रफुल्ल चंद्र चाकी, बलिदानी तिरोत सिंह, मांगी लाल भव्य, मणिराम देवान, रानी नागनिका जैसे कई ऐसे नाम जिनके बारे में पहले कभी नहीं पढ़ा था। पढ़ने सुअवसर उपलब्ध कराने के लिए एक बार फिर से संग्रह के संपादक और उनकी पूरी टीम का बहुत बहुत आभार।

निश्चित रूप से यह संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है। एक बार मेरे सर्वकालिक और सर्व प्रिय मित्र ने कहा था कि हमें करोड़ों में बिकने वाली दो-दो टके की अभिनेत्रियों के नाम तो याद हैं लेकिन गणतंत्र परेड में परेड का नेतृत्व करने वाली पहली महिला कमांडर का नाम याद नहीं है। ये इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

बात भी सही है। लेकिन उनके बारे लिखने या खोजकर पढ़ने का किसी ने शायद जरूरत ही नहीं समझा होगा इसलिए यादों पर धूल जम गई। जरूरी है उस धूल को हटाना ताकि आने वाली पीढ़ी को रास्ता मिल सके। इस हेतु भी इनसे हैं हम एक सार्थक पहल है।

दिवाकर पांडेय “चित्रगुप्त भारतीय सेना में कार्यरत है और खाली समय में लिखने का शौक रखते हैं। इनकी लिखित आलेख, लघु कथा और कविताएं कई पत्रिकाओं में छप चुके हैं

झीनी झीनी बीनी चदरिया : अमरचरित्र ‘मतीन’

वही साहित्य श्रेष्ठ माना जाता है जिसमें सत्यं, हितं, एवं प्रियं का सहज सन्निवेश हो । सत्यं, हितं, एवं प्रियं को ही क्रमशः सत्यं शिवं एवं सुन्दरम् की संज्ञा से अभिहित किया जाता है । सामान्यतः यह माना गया है कि साहित्य के सभी गुण इन तीनों में समाहित है । सत्यं से ही साहित्य में स्वाभाविकता आती है। हितं (शिवं) इस तत्व में लोक-रक्षण की भावना निहित है और जिन विशिष्टताओं के कारण साहित्य अपने पाठकों को आकृष्ट कर अपने में उलझाएँ रखता है उसका प्रियं (सुंदरम्) गुण है । कृति की श्रेष्ठता इन तीन तत्वों के समन्वय में होती है। ऐसी श्रेष्ठ कृतियों में उभरा हुआ चरित्र आदर्श और अमर चरित्र की पंक्ति में समाहित होता है । ऐसे चरित्रों में लोक-रक्षण की भावना सुन्दरं ही नहीं शिवं भी हो, प्रियं ही नहीं हितकर भी होनी चाहिए । जैसे महादेव ने हलाहल प्राशन कर संपूर्ण संसार को अमृत सौन्दर्य दिया जिसके मूल में लोक-सृष्टि का रक्षण कल्याण एवं मंगलकामना ही रही है। समाज में ऐसी मनोवृत्ति वाले चरित्र हिमनग की भांति मानव के अंतस में उभरते हैं ।

‘अमर’ शब्द का संबंध अंशत: अमृत से है। सामान्यतः भारतीय जन-मानस की यह धारणा है कि अमृत सेवन से अमरत्व प्राप्त होता है, जिससे मनुष्य कालजयी बनता है । समुद्र मंथन में निकले अमृत को प्राशन कर राहु-केतु भी देवताओं की पंक्ति में जा बैठे अर्थात् अमर हो गए । साहित्यिक दृष्टि से पौराणिक सन्दर्भ में अमरत्व अलौकिकता को समेटे हुए हैं, तो भौतिक (लौकिक) जगत् के सन्दर्भ में यही अमरत्व उदात्त जगत् के सन्दर्भ में यही अमरत्व उदात्तता की और संकेत करता है। इसप्रकार अमर चरित्र कहने से हमारे सामने सचरित्र, उदात्त एवं कालजयी चरित्र की छवि उभरती है ।

परिवर्तन सृष्टि का शाश्वत नियम है । परिणामस्वरूप साहित्य में भी स्थल-काल सापेक्ष परिवर्तन होता रहता है । वैश्वीकरण के इस युग में अमर चरित्र की संकल्पना में काफी मात्रा में परिवर्तन हुआ है। आज अमर चरित्रों में उन सभी चरित्रों को समाहित किया जाता है, जो आदर्श या उदात्त नहीं प्रत्युत तामसी वृत्ति से चरित्र के संखलन के कारण वितेषणा, दारेषणा और लोकेषणा का शिकार होकर खलनायक के रूप में सामने आते हैं और आदर्श चरित्रों के प्रतिकूल दिखाई देते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि आज खलनायक या खलनायिका को भी अमरता की श्रेणी में रखा जाने लगा है । मात्र प्रसिद्धि ही इस अमरता की पृष्ठभूमी है । ये चरित्र अपने कृत्यों-कुकृत्यों से प्रसिद्ध हो जाते हैं और स्थल-काल सापेक्ष निरंतर उभरते हैं। जैसे ‘राम’ तथा ‘पांडवों’ के सन्दर्भ आते ही क्रमश: ‘रावण’ और ‘दुर्योधन’ का चरित्र भी उभर आता है। क्योंकि ‘रावण’ का ‘रावणत्व’ में तथा ‘दुर्योधन’ का ‘दुर्योधनत्व’ के विरोध में ही क्रमश: ‘राम’ का ‘रामत्व’ और ‘पांडवों’ का ‘पांडवत्व’ है । अर्थात् ‘असत्’ पर ‘सत्’ की, ‘अधर्म’ पर ‘धर्म’ की विजय दिखाई देती है । आजकल हिंदी साहित्य में अमर चरित्रों की एक और श्रेणी दिखाई देती है । इनमें उन चरित्रों का समावेश होता है जो जीजिविषा हेतु संघर्षरत है, जो शोषण के प्रति जाग्रत हैं, जो अन्याय और अत्याचार के विरोध में आवाज उठाने की क्षमता रखतें हैं। इतना ही नहीं वे पीड़ित, शोषितों के प्रति सहानुभूति से पेश आकर शोषणकर्ताओं के प्रति कड़ा रुख अपनाकर संघटित होकर संघर्ष तो करते ही हैं, साथ ही संघटित होने पर बल देते दिखाई देते हैं। इसके पीछे जन-सामान्य के कल्याण एवं मंगलकामना की भावना प्रमुख होती है। ऐसे चरित्र भले ही लौकिक हो किन्तु वे अपने आदर्श कार्य के कारण अलौकिकता को प्राप्त करते दिखाई देते हैं

हिंदी साहित्य पर एक नजर डालने से पता चलता है कि कबीर जैसे महान संत की कार्य- प्रणाली इसका प्रमाण है। कबीर ने अपने जीवनकाल में धर्म-निरपेक्ष और मानवता का समर्थन किया, सांप्रदायिकता से ऊपर उठकर सामजिक अन्याय, अत्याचार, शोषण, अंधविश्वास, कुरीतियों एवं सभी कुप्रथाओं का कड़ा विरोध किया, जिसके फलस्वरूप कबीर, महात्मा कबीर बने । अब्दुल बिस्मिल्लाह का ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास पर कबीर के ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ का अर्थात् ब्रह्मा, जीव और जगत् का दार्शनिक प्रभाव दिखाई देता है। विषय विकारों के मखमली लिहाफ में लिपटे जगत् में कर्तव्य-अकर्तव्य, क्रिया-प्रतिक्रया के चक्र में घूमता हुआ जीव ‘ब्रह्म’ अर्थात् परम तत्व मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। उसी ब्रह्म की ओर जिसने जीवात्मा को जीवन रूपी ताने-बाने से बीनी हुई चदरिया ओढ़कर इस मायावी जगत् में भेजा है । कबीर के इसी दार्शनिक चिंतन का प्रभाव परोक्ष रूप से उपन्यास पर परिलक्षित होता है । मानव ( मतीन का चरित्र) अर्थात् जीव का जीवन, जीवन की विविध गतिविधियों, उतार-चढाओं के ताने-बाने से बुना हुआ जगत् अर्थात् समाज में निरंतर संघर्षशील रहता है । इसका लक्ष्य केवल ‘ब्रह्म’ अर्थात् अपना लक्ष्य, आदर्श, सच्चाई, शोषण मुक्ति आदि को प्राप्त करना रहा है । स्पष्टत: यह कहा जा सकता है कि उपन्यास के प्रमुख चरित्र ‘मतीन’ पर अप्रत्यक्ष रूप से कबीर दर्शन का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है जो संपूर्ण उपन्यास में मतीन के जीवन दर्शन के रूप में प्रतिबिंबित हुआ है। इस विशिष्ट जीवन दर्शन के द्वारा उपन्यासकार अब्दुल बिस्मिल्लाह ने पथ-प्रदर्शन का कार्य करते हुए मतीन के माध्यम से बुनकरों के विद्रोह और जीवन के मुक्ति संघर्ष के जीवंत दस्तावेज प्रस्तुत कर बदलते भाव-बोध को दर्शाने का सफल प्रयास किया है वर्तमान की युवा पीढी प्रत्येक क्षेत्र में बदलते परिवेश और जीवन-सन्दर्भों के प्रति सजग दिखाई देती है। आज की पीढी को परंपरा की लीक पर चलना स्वीकार नहीं है क्योंकि जीवन की हर समस्या उनके लिए प्रश्नचिन्हं बन जाती है ।

‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास में बुनकरों के मुक्ति संघर्ष का जीवंत दस्तावेज प्रस्तुत है । प्रस्तुत उपन्यास में बुनकरों की अभावग्रस्त और रोग जर्जर दुनिया में हम मतीन, अलीमुन और नन्हें इकबाल के सहारे प्रवेश करते हैं जहां उपस्थित है रऊफ चाचा, नजबुनिया, नसीबन बुआ, रेहाना, कमरून, लतीफ़, बशीर और अल्ताफ जैसे अनेक चरित्र, जो टूटते हुए भी हालात से समझौता करना नहीं चाहते । बावजूद इसके उनसे लड़ना और उन्हें बदलना चाहते हैं और मजबूत है । वे अंतत: अपनी इस चाहत को जनाधिकारों के प्रति जागरुक अगली पीढ़ी के इकबाल को सौंप देते हैं । इस प्रक्रिया में लेखक ने शोषण के उस पुरे तंत्र को भी बड़ी बारीकी से बेनकाब किया है जिसके एक छोर पर है गिरस्ता और कोठीवाल, तो दूसरे छोर पर भ्रष्ट राजनितिक हथखंडे और सरकार की तथाकथित कल्याणकारी योजनाएं हैं। साथ ही बुनकर-बिरादरी के आर्थिक शोषण में सहायक उसी की अस्वस्थ परंपराओं, सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक जड़वाद और साम्प्रदायिक नजरिये को भी अनदेखा नहीं किया है

उपन्यास का नायक मतीन है, जो पेशे से बुनकर है । बुनकर शोषण के शिकार हैं । मतीन बुनकरों पर हो रहे अन्याय, अत्याचार और शोषण के विरूद्ध आवाज उठाता है लेकिन शोषकों द्वारा उसकी आवाज दबाई जाती है । शोषण के विरुद्ध उसके प्रयास असफल हो जाते हैं किन्तु अपनी बिरादरी पर हो रहे अन्याय अत्याचार के खिलाफ अपने समाज को सचेत और जागृत करने में मतीन सफल हो जाता है । मतीन के व्यक्तित्व का एक पहलू यह भी है कि पराजित होने के बाद, उसकी लड़ने की इच्छाशक्ति और अधिक प्रबल हो जाती है ।

मतीन के माता-पिता बचपन में खो जाते हैं; इसलिए वह अत्यंत कम उम्र में ही रोजी-रोटी के लिए काम करना शुरू कर देता है । मतीन एक सामान्य बुनकर के रूप में पाठकों के समक्ष उभरता है । जैसे-जैसे वह अपने काम में कुशल हो जाता है वैसे ही वह अन्य बुनकरों के समान शोषण की दोहरी चक्की में पिसता जाता है। एक ओर गिरस्त तो दूसरी ओर कोठीवालों द्वारा शोषण का शिकार हो जाता है । अर्थाभाव के कारण वह अपनी खुद की कतान नहीं खरीद सकता इसलिए दूसरों की बानी पर ही बीनने के लिए मजबूर होता है । मतीन गिरस्त हाजी साहब से कतान लेता है यहीं से उसका जीवन हाजी साहब जैसे सेठ पर निर्भर रहने लगता है। कड़ी मेहनत करने पर उसे एक हप्ते बाद मात्र नब्बे रुपये मिलते हैं। इसमें भी कई प्रकार की कटौतियां होती हैं जैसे – “गिरस्त जो है साड़ी  में ऐब दिखाता है ।” प्रका. २००३ : पृ. क्र. १७) पत्नी अल्मुनिया क्षयरोग (टीबी) से ग्रसित है । पत्नी के इलाज के लिए हो रहे खर्च के कारण खाने के लाले पड़े है । इसलिए दुबारा हाजीसाहब जैसे सेठ से ऋण लेना पड़ता है । मतीन जीवनभर कर्ज में डूबा रहता है । उसका जीवन केवल ऋण चुकाने में ही व्यतीत होता है । ऐसी परस्थिति में भी मतीन अपने बेटे को पढ़ा-लिखाकर बड़ा बाबू बनाना चाहता है क्योंकि उसे ऐसा लगता है कि बेटा अगर पढ़-लिखकर बड़ा बाबू बनेगा तो अपना जीवन ऋणमुक्त होकर समाज की उन्नत्ति और कल्याण के काम आयेगा ।

बुनकर मतीन कड़ी मेहनत से साड़ियाँ बुनकर तैयार करता है लेकिन बदले में क्या मिलता है- “सिर्फ एक लुंगी, भैंस का गोष्त और नंग धडंग जाहिल बच्चे ।” (अब्दुल बिस्मिल्लाह : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ प्रका. २००३ पृ. क्र. ५४) लगभग सभी बुनकरों की यही स्थिति है इसप्रकार बुनकरों पर हो रहे अन्याय, अत्याचार और शोषण के निवारण हेतु तथा मुक्ति के लिए संघटन (सोसायटी) बनाकर शोषकों का मात्र विरोध करना ही नहीं चाहता बल्कि संघटन के माध्यम से सरकार से अपील कर आर्थिक सहायता हेतु गुहार लगाना चाहता है । मतीन को लागता है कि संघटन के माध्यम से सरकार से गुहार करने पर आर्थिक सहायता मिलेगी तो कतान खरीदकर संघटन के नाम पर साड़ियाँ बुनने का कारखाना आरंभ किया जा सकता है जिससे बुनकरों की आर्थिक स्थिति में सुधार आ सकता है। यह सपना लेकर संघटन आरंभ करने हेतु तीस सदस्य और सदस्य शुल्क जुटाता है । सदस्य शुल्क जुटाने के बाद बैंक पहुँचने पर पता चलता है कि इन लोगों के नाम पर पहले ही फर्जी संघटन गठित हो चुका है। इस सन्दर्भ में बैंक मेनेजर मतीन को सलाह देते हुए कहता है कि  “जनाब अब्दुल मतीन अंसारी साहब, जाइए और चुपचाप अपनी साड़ी बिनिये। फ्राड करना बहुत बड़ा जुर्म है ।” (अब्दुल बिस्मिल्लाह : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ प्रका. २००३ : पृ. क्र. १०३) फर्जी संघटन बनानेवाले हाजी अमीरल्लाह के खिलाफ लड़ने में मतीन अपने आप को असमर्थ पाता है क्योंकि इन गिरस्तों की बहुत लम्बी पहुँच है ।

इसप्रकार मतीन इस लड़ाई में पराजित होता है । उसका सपना टूट जाता है बावजूद इसके वह बनारस की जिन्दगी से समझौता नहीं करना चाहता और कुछ बेहतर बनने के लिए तथा अच्छी परिस्थिति में काम करने के लिए बनारस छोड़कर मऊ चला जाता है। मऊ आने पर मतीन को पता चलता है कि यहाँ की परिस्थिति और बनारस की परिस्थिति में कोई अंतर नहीं है । अर्थात अन्याय, अत्याचार और शोषण में कोई फर्क नहीं है । इस सन्दर्भ में मतीन का कहना है कि “मऊ और – बनारस में फर्क ही क्या है ? गरीब तो हर जगह एक जैसे है ।” (अब्दुल बिस्मिल्लाह : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ प्रका. २००३ पृ. क्र. १४४) अतः यह कहना अनुचित नहीं होगा कि बनारस हो या मऊ या फिर देश का कोई और शहर गरीबों पर अन्याय, अत्याचार होता ही रहता है । भारत में मजदूरों का शोषण होना आम बात है, फिर चाहे वह मजदूर कल-कारखानों का हो या फिर खेत में काम करनेवाला हो । इतिहास साक्षी है कि अपने देश में शोषित, पीड़ित, अत्याचारित समाज कितना भी संघर्ष करें देश की सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्था इतनी मजबूत है कि वह विजयी नहीं हो सकता ।

‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास का केन्द्रीय पात्र मतीन शोषकों का विरोध करने में अपने आपको असमर्थ पाता है । परिणामतः मतीन मुक्ति संघर्ष की लड़ाई में पराजित होता है । किन्तु फिर भी मतीन के व्यक्तित अपने आपको असमर्थ पाता है । परिणामतः मतीन मुक्ति संघर्ष की लड़ाई में पराजित होता है। किन्तु फिर भी मतीन के व्यक्तित्व की यह ख़ास विशेषता रही है कि कई बार संघर्ष की लड़ाई हारने पर भी मतीन निराशा की गर्त में जीवन जीना नहीं चाहता बल्कि वह बार-बार संघर्ष कर जीत हासील करना चाहता है । कई बार टूटने पर भी मतीन में विद्यमान व्यवस्था के खिलाफ लड़ने की इच्छा -शक्ति जाग्रत होती रहती है ।

‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास बनारस के साड़ी  बुनकरों के कठिन संघर्ष का बयान है । प्रस्तुत उपन्यास केवल बुनकरों के मुक्ति संघर्ष की कथा नहीं है बल्कि देश के समस्त शोषित वर्ग के मुक्ति संघर्ष की यशोगाथा है। उस फिनिक्स पक्षी के सामान शोषित वर्ग नया जीवन जीना चाहता है किन्तु भारतीय व्यवस्था उन्हें उड़ने (जीने नहीं देती यह भारतीय समाज की त्रासदी है। ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास में चित्रित मतीन का संघर्ष बुनकरों के जीवन का अर्थ भी है और सौन्दर्य भी।

सारांश रूप में यह कहा जा सकता है कि, प्रस्तुत उपन्यास का प्रमुख पात्र मतीन अपने त्रासदी भरे जीवन में आदर्श समेटे हुए है जो उसे कालजयी बनाने में सहायता प्रदान करता है । शोषण चक्र में निरंतर पिसते हुए भी मतीन का जीवन के प्रति दृष्टिकोण अत्यधिक सकारात्मक रहा है बावजूद इसके वह आगामी पीढ़ी की चिंता करते नजर आता है। मतीन ने अपने जीवन में कभी सांप्रदायिकता को महत्त्व नहीं दिया । मतीन सांप्रदायिकता के संकुचित दायरे से बाहर आकर एकजुट होकर अराजक सामंती व्यवस्था के प्रति केवल आक्रोश व्यक्त नहीं करता बल्कि शोषण चक्र में पिसते हुए असाहाय्य गरीब मजदूरों, बुनकरों का जीवन संवारने का काम करता हैं, वह एक प्रतिमान के रूप में खड़ा होता है । अतः यह कहना अनुचित नहीं होगा कि मतीन गरीब मजदूरों, बुनकरों को अपने हक के लिए लड़ने की ताकत ही नहीं देता बल्कि उन्हें प्रेरित भी करता है । अपने अधिकार के प्रति उन्हें सचेत ही नहीं करता बल्कि दीपस्तंभ के रूप में खड़ा होता है । अतः मतीन समकालीन पीढ़ी के लिए आदर्श तो है ही साथ ही आनेवाली पीढी के लिए भी आदर्श एवं प्रेरणास्रोत बना रहेगा । अत: यह कहना अनुचित नहीं होगा कि मतीन का जीवन-दर्शन युवा चेतना के लिए पथ-प्रदर्शक का पर्याय है

डॉ. मधुकर देशमुख अध्यक्ष, हिंदी विभाग इंद्रायणी महाविद्यालय के अध्यक्ष हैं। इन्होंने सात खंडों में प्रकाशित कवि महेंद्र भटनागर की कविताओं का संपादन किया है। अनेकों लेख हो सहित इनकी 3 पुस्तकें प्रकाशित हैं।

असम के शहीद पियली फूकन

 भारत की स्वाधीनता संग्राम में शहीद होनेवाले असम के पहले शहीद थे पियली फूकन। पियली फूकन की फांसी हुई थी 14 सितंबर, सन 1830 में ।

Assam District Gazettears Sibsagar District  के एक चेप्टर में पियली फूकन के बारे में सन 1830 में स्वाधीनता के लिए ब्रिटिशों के विरुद्ध युद्ध करने का उल्लेख है।

Determined to liberate the country from foreign domination before it was too late, Numali of the Dihingia Buragohain family, in collaboration with another dianitary of the old realm  Peoli Borphukan, son of Badon Chandra Borphukan  made in 1830 a large scale preparation for a massive armed attack  on the British  so as to expel them from Assam.”

ब्रिटिशों  के विरुध्द पहला विद्रोह किया था गोमोधर कोंवर ने। गोमोधर कोंवर ने सशस्त्र विद्रोह किया और तरातली के युद्ध  में ब्रिटिशों के हाथों पराजित हो तिरुपहाड़ के भीतर सुरक्षित स्थान में आश्रय लिया था। ब्रिटिशों को जब पता चला तो उन्होंने गोमोधर को राजा बनाने का झांसा देकर  धोखे से बंदी बनाकर घाटी के रंगपूर जेल में रखा ।

गोमोधर की यह हालत देखकर  विद्रोह का नेतृत्व लेने के लिए आगे बढ़ आए रोंगाचिला के दुवरा वंशज पियली बरफूकन।

पियली फूकन मेें साहस,  देशप्रेम, कर्तव्य निष्ठा, कूटनीति और आत्माभिमान कूट-कूट कर भरा था। लोगों में जोश भरने की काबिलियत भी रखते थे। उन्होंने किसी को भी कोई  काम करने का आदेश नहीं दिया। हर कोई अपने दायित्व को समझ अपना कर्तव्य करने लगे। पियली के साथ युद्ध में साथ देने आए कछारी, मिचिंग,  खामति, चिंग्फो, चुतीया, मटक आदि अनेक जनजातीय और संप्रदाय के लोग। मटक के बड़े सेनापति का बेटा खाछि चियेम सिकत् सिंग, चिंग्फो गाम वाकुम आदि प्रत्यक्ष रुप से पियली के साथ थे। यह सब देखकर गोमोधर  कोंवर के सैनिक जो  ब्रिटिशों के साथ हुए युद्ध के बाद अस्त्र-शस्त्रों के साथ नगा पहाड़ में  छुपे हुए थे , वो सब आकर पियली कें संग जुड़ गए।

गेलेकी के तिरुपथार के शिविर का दायित्व था हरनाथ पानीफूकन पर। इसके अलावा हरनाथ को जबका के खारघर के शिविर में अस्त्र-शस्त्रों के तैयारी का भार भी सौंपा गया। गोरे अफसरों के वहां पियली के जासूस थे जो सारी खबरे दिया करते थे। अजला कोंवर नाम का एक युवक गोरे साहब के वहां रसोइया था। वह और गदाधर कोंवर नाम का एक युवक दुश्मनों की खबरे नियमित रुप से पियली को दिया करते थे।

हरनाथ पानीफूकन ने पहाड़ी जातियों के साथ स्वाधीनता संग्राम को लेकर संपर्क बनाया। एकदिन ब्रिटिश सैनिक ने संदेहवश हरनाथ को पकड़ लिया और  युद्ध के षड्यंत्र का भेद खुल गया। हरनाथ के बंदी होने की खबर से सब को लगा कि युद्ध का समय आ गया है, और सब तैयार हो गए। 

रोंगाचिला के खेतों में खेती कर के रसद का इंतजाम किया गया । तिरुपहाड़ में युद्ध के लिए लोहे से अस्त्र-शस्त्र बनाने के लिए कारखाना बनाया गया। तिरुपहाड़ के भीतर अस्त्र-शस्त्र से लैस हो युद्ध के लिए प्रशिक्षण दिया जाता और अभ्यास किया जाता था। गोरों  के विरुद्ध  नगा,आबर, खामति आदि जातियों को साथ लेकर चलने का निर्णय अति दूरदर्शी सोच का वाहक था।

इस विद्रोह को जनवरी सन 1829 को शुरू करने का निर्णय लिया गया। इस विद्रोह में पियली के साथ थे धनंजय गोंहाई, रुपचंद कोंवर, बम चिंग्फो, नूमली गोंहाई, नूमली गोंहाई की बेटी लाहोरी आईदेओ, चिकन ढेकियाल फूकन, जिऊराम दुलिया बरुवा, मोइना खारघरिया फूकन, बेनुधर कोंवर,  देउराम दिहिंगिया, रूपचंद्र कोंवर, चुरण कोंवर, ब्रजनाथ कोंवर के अलावा भी कोई  दो सौ नगा युवाओं ने सहयोग दिया था। देश के हर श्रेणी के लोगों ने इस विद्रोह में साथ दिया था। यहां के लोक-गीतों में भी इसका प्रसंग मिलता है।

लोकगीत का अनुवाद—- खामटि, नगाटि
गारो, खाछियाटि
संग डफला मिरि
रंगाचिला वन में
बड़ी मिटिंग में आए
तय करने कैसे
वध करेंगे फिरंगी का!
रंगाचिला वन में
किसने बजाई शिंगा*
भात खाते सुना
अचल वन को
लोग चल पड़े
गमन के शोर से
चले पता !
रिकिटि मिरिकिटि
हिरिंग रिंग रिंग
पर्वत पर की घिटिंग टिंग
आ दे हम आवाज दे!

(*शिंगा- भैंस के सिंग को बजा कर युद्ध की घोषणा। हिन्दी में रणभैरी भी कहते है ।)

पहले तय किए प्लान के अनुसार  25 मार्च, सन 1830 की शाम युद्ध के आरम्भ का निर्णय लिया गया। इसबार तरातलि के शिविर में घाटि न बनाकर बरफूकन के बाड़ी के दोलबारी*  में शिविर की स्थापना की गई।

गेलेकी  दोल के घाटी से बरफूकन के गली से निकलकर जयसागर पुखुरी* के किनारे घाटी बनाकर वहीं से गोरो के बारुद के गोदाम तथा छावनी में आग लगाकर गोरे पल्टनों को मारने के लिए पहले से तय किए प्लान के अनुसार  25 मार्च, सन 1830 की शाम युद्ध के आरम्भ का निर्णय लिया गया।

गेलेकी  दोल के घाटी से बरफूकन के गली से निकलकर जयसागर पुखुरी* के कि प्लान के मुताबिक  पियली फूकन और जिऊराम दुलिया बरुवा ने अपने सैनिको के साथ एक ही समय में तेल से भीगे सूखे अमड़ा की गुटी में आग लगाकर धनुष-बाण के सहारे बारुद-भंडार में दो तरफ से हमला बोल दिया। ऐसी आग लगी मानों दिन निकल आया हो! चारों तरफ रौशनी छा गई थी।

बहुत समय तक युद्ध चला। बहुत सारे ब्रिटिश सैनिक मारे गये। मगर और बहुत सारे ब्रिटिश सैनिकों के आ जाने से पियली के सैनिकों को निरापद स्थान के लिए दिखौ नदी के पार लौटना पड़ा। वहां पहले से नाव का इंतजाम किया हुआ था। मगर किसी देशद्रोही ने नाव की रस्सियों को काट दिया था जिसके कारण पियली के सैनिक लौट न सके! ऐसे में ब्रिटिश सेना ने गोली चलानी शुरू कर दी। इस गोलीकांड में भबा कोंवर, बेणुधर कोंवर,नूमली गोंहाई ,  चिकन ढेकियाल फूकन, लाहोरी आईदेओ, मोइना खारघरिया फूकन और कई खामटि तथा बहुत सारे नगा युवकों की मौत हो गई। 

इसी समय में नाजिरा और  दिखौमूख  में गोरे सैनिकों के शिविर पर आक्रमण कर के पियली के सैनिकों ने बहुत सारे ब्रिटिश सैनिकों को खत्म किया था । उनके नावों को डूबा दिया था।

आग की रौशनी में पियली बैसाखी के सहारे भागते हुए पकड़े गए और बंदी बना लिए गए। निउविल साहब ने 26 मार्च की सुबह प्रसन्न दत्त, सुबेदार ज़ालिम सिंह, जयपाल सिंह आदि सैनिकों को साथ पीछा करके जिऊराम दुलिया बरुवा,बम चिंग्फो, हरनाथ पानीफूकन, रुपचंद्र कोंवर, देओराम दिहिंगिया फूकन आदि सब को बंदी बना लिया। ब्रजनाथ कोंवर और चुचम  कोंवर मणिपुर भाग गये। धनंजय बरगोंहाई अपने एक बेटे के साथ नगा पहाड़ पलायन कर गए। 14 सितंबर सन 1830 में पियली फूकन को फांसी दे दी गई। शिवसागर पुखुरी के पास उनकी समाधि देखी जा सकती है।

 भावार्थ = *दौल— गुम्बद के साथ बना आराधना का एक मंदिर जैसा भवन। *पुखुरी— पोखर से बड़ा और सरोवर से छोटा जलाशय।

असम से साहित्यकार, लेखक अनुज दुवरा ने प्रांतिक पत्रिका के 1 अक्तूबर 2015 ,में एक मुद्दा उठाया था कि भारत के पहले शहीद मंगल पाण्डे थे या पियली फूकन ! क्यों की मंगल पाण्डे को फांसी सन 1857 की 8 अप्रेल में, अर्थात पियली फूकन की फांसी के 27 साल बाद हुई थी।

डाॅ. (मा) रुनू बरुवा “रागिनी तेजस्वी” अखिल भारतीय साहित्यकार सम्मान, साहित्य रत्न सम्मान, साहित्य श्री सम्मान , साहित्य गौरव सम्मान, मात्सुओ ‘बासो’ सम्मान, सरस्वती सम्मान आदि से सम्मानित डिब्रूगढ़ की प्रतिष्ठित साहित्यकारों हैं।

शहरों का आकर्षण-होता गाँवों से पलायन

कोरोना काल में जिस बहुतायत से शहरों, महानगरों से अपनी जमीन, गाँवों, अपनी जड़ों की ओर वापिसी हुई, वाहनों की अनुपलब्धता, कोरोना के नियम यथा दूरी, सेंनीटाइज हेंड आदि को देखते हुये मीलों पैदल यात्रा जिसमें नन्हें बच्चे, गर्भवती स्त्रियाँ भी थी, यह सोचने को विवश करते हैं कि लगभग 50–70% आबादी वापिस होने से क्या अर्थव्यवस्था पर असर हुआ? क्या शहरों और गाँवों का तालमेल बैठा ?क्या जो ठिकाने.महानगरों में जुटाये थे या पाँव के नीचे जमीन जुगाड़ने की  कवायद थी उसे छोड़ना किस आर्थिक विषमता को जन्म दे गया?

 इन सब प्रश्नों के उत्तर खोजने से पहले यह देखनाआवश्यक है कि आखिर गाँवों से पलायन के क्या कारण थे? अपनी जड़ों को छोड़ कर जाने में क्या खोया -क्या पाया?

 बदलती जीवन शैली, उन्मुक्त जिंदगी और सपनों की उड़ान, देखने सुनने में आज बड़ी बात न लगे परंतु इनके दुष्प्रभाव अपनी जड़ो से दूर हो रहे व्यक्तियों में देखे जा सकते हैं।

हताशा, तनाव के साथ एकांगी होती सोच, परिवार  की अवधारणा को कहीं न कहीं विघटित ही कर रहे हैं। आज हर घर में टेलीविजन और संचार के छोटे -बड़े माध्यम मौजूद हैं। मनोरंजन के नाम पर महानगरीय रहन-सहन और जादू की छड़ी घूमते ही सभी परिस्थितियां सुधर जाना युवा व ग्रामीणों को चकाचौंध कर रहा है उस समय यह विचार नहीं आता कि बिना आजीविका के यह सब कैसे संभव है?

जहाँ गाँवों का खुला परिवेश और पुश्तैनी काम- धंधे व खेती आदि से परिवार बेहतर तरीके से जीवन यापन कर सकता है, वहीं शहरों में बढ़ती जनसंख्या के चलते, महँगाई का सुरसा मुख की तरह मुँह फाड़ने के कारण बहुमंजिला  इमारतों में एक कमरे में रहना दुष्कर भी है।

आज गाँवों से कस्बों, कस्बों से शहरों की ओर पलायन लगातार जारी है। यद्यपि कोरोना काल ने कुछ लोगों की पुनर्वापिसी की है परंतु गाँवों और शहरों के बीच बढ़ने वाला अंतर कम नहीं हो रहा।हर साल लाखों की संख्या में लोग ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन करते हैं संभवतः इसका कारण क्षेत्र विशेष में जीवन यापन की मुश्किलें हों।

      देखने में आता है कि गाँव छोड़ने वालों में शिक्षित,सुविधा संपन्न लोग ज्यादा होते हैं। क्यूं कि उनकी शिक्षा उन्हें पुश्तेनी काम करने से रोकती है।दूसरे वे लोग हैं जो गाँवों में मजदूरी आदि करके भी रोजी-रोटी की पूर्ति नहीं कर पा रहे।संसाधनों के बढ़ते दबाव में कम होते रोजगार अवसर भी एक बड़ा कारण है है सपरिवार शहरों की ओर पलायन का।इस पलायन के कुछ कारण कुदरती हैं तो कुछ सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक राजनीतिक के साथ तकनीकी भी।तकनीकी रूप से दक्ष या तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवा ज्यादा अवसरोंकी तलाश में शहरों की ओर बढ़ जाते हैं। किस्मत साथ देती है तो वाणिज्य केंद्रों व शहरों के बड़े उद्योगों के कारण भी बन जाते हैं।

         इसी पलायन ने विभिन्न समस्याएं पैदा कीं ।जनसंख्या संतुलन बिगड़ने के साथ ही शहरों में आवास व रोजगारकी समस्या विकट होती जा रही है तो दूसरी तरफ गाँवों में उपजाऊ जमीन बंजर होती जा रही है।

     अगर आँकड़ों की बात करें तो भारत के शहरों में लगभग 44-50%परिवार एक कमरे में गुजारा करते हैं और शौचालय सुविधा भी लगभग 24-30% आबादी के पास ही है। 70% शहरों में रोज निकलने वाले कूड़े को ठिकाने लगाने की  व्यवस्था न होने से वह खुले में सड़ता है।

लेखिका ने स्वयं दिल्ली प्रवास के समय विभिन्न एरिया में जाकर देखा है कि उचित प्रबंधन न होने से कचरा सड़ता रहता है और उससे उठने वाली बदबू माहौल को प्रदूषित करती है। बरसात के पानी की भी निकासी की उचित व्यवस्था नहीं जिसके कारण फैलते प्रदूषण की समस्या की  चपेट में, गाँवों से पलायन करने वाले लोग हैं।

   2001 के आँकड़ों के अनुसार  भारत की आबादी का 27.81% हिस्सा शहरों में रहता था जोकि 2011में 31.16%तक पहुँचा। शहरीकरण का यह दौर अचानक ही नहीं बढ़ा। शहरीकरण की जो दर 1991-2001 में 2.10फीसदी थी ,वह 2001 से 2010 तक 3.35प्रतिशत तक पहुँच गयी। इस दौरान  देश में 2775 छोटे शहर और बस गये। आँकड़ों की मानें तो 2001 की जनगणना में शहर  और कस्बों की कुल संख्या 5161 थी जो अब बढ़ कर 7936 हो गयी। यह आँकड़े बताते हैं कि भारत की आबादी तेजी से सुविधा संपन्न आबादी में बदलती जा रही है ।विकास का जो वैश्विक मॉडल पूरी दुनियाँ में चल रहा है ,उसमें शहरीकरण को विशेष तरजीह दी गयी है।  यक्ष प्रश्न है फिर गाँवों का पिछड़ापन और बढ़ेगा या गाँव का अस्तित्व ही खतम प्रायः होगा?

आइये समझते हैं विकासीकरण की अवधारणा को …

विशेषज्ञों की मानें तो विकास का वर्तमान पैमाना अच्छी अर्थव्यवस्था का संकेत है ।वहीं दूसरी और तेजी से होते शहरीकरण की वजह ज्वलंत बहस का मुद्दा है जिसमें पलायन और गाँवों में बुनियादी सुविधाओं का न होना ,अशिक्षा,पिछड़ी लाइफ स्टाइल जैसे मुद्दे हैं।

 संयुक्त राष्ट्र संघ की हालिया रिपोर्ट के दो आँकड़े चौंकाने वाले हैं —–

1–इस वर्ष के अंत तक विश्व की आधी आबादी शहरों में रहने लगेगी।

2–2050तक भारत की आधी आबादी महानगरों,नगरों एवं कस्बों में निवास करेगी और तब तक विश्वस्तर पर शहरीकरण का आंकड़ा 70% हो चुका होगा।

ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाले पलायन से जहाँ एक तरफ कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा रही है ,वहीं शहरी ढाँचे पर भी इसका  विपरीत प्रभाव पड़ है। अर्थ शास्त्रियों की मानें तो यह शिक्षा प्रणाली म़े कमी के कारण है। वर्तमान शिक्षा गाँवों को अपने साथ नहीं जोड़ पा रही। यह शिक्षा युवाओं का गाँवो़ से मोह भंग कर रही है। पढ़ने लिखने के बाद गाँव उन्हें उबाऊ और अपनी शिक्षा के अनुकूल नहीं लगते। उच्च शिक्षा के साथ वह शहरों महानगरों में रहने के सपने संजोने.लगते हैं। ग्रामीणों के लिए अपनी संतान को पढ़ाना मुश्किल हो गया है। शिक्षित होने के बाद बच्चे पारिवारिक व्यवस्थाओं मेंहाथ नहीं बँटाना चाहते। जिस काम ने उन्हें लायक बनाया वही काम उन्हें अब ओछे और अपनी पोजीशन के खिलाफ लगते हैं।

ग्रामीण क्षेत्र के लोग संतान को पढा लिखा कर काबिल तो बनाना चाहते हैंपर ऐसी शिक्षा नहीं दिलाना चाहते जो संतान के अंदर अलगाव का बीज बो दे।

शहरी जीवन के सुने सुनाये ठाठ बाटके चलते हकीकत से कोसों दूर कोई भी झोंपड़ी और गंदगी में नहीं रहना चाहता। गरीबी, बिना व्यवसाय या धनोपार्जन के बुनियादी सुविधाओं से वंचित युवा शहरों में नारकीय जीवन जीने को विवश है।

अमूमन अनुमानतः लगभग दो तिहाई से ज्यादा आबादी शहरों में अविकसित कालोनियों और झुग्गियों या झोंपडपट्टियो़में रहती है।

विकास की गति ने गाँव – जंगल उजाड़ दिये। नदियों पर बाँध बना कर उनका स्वाभाविक प्रवाह रोकने, बड़े कारखानों या खनन आदि परियोजनाओं के कारण भी हर सार लगभग 5-6 हजार लोग गाँव छोड़ शहर आते हैं।

जमीन पर बढ़ता दबाव, खेती के तौर तरीकों में बदलाव आने से भी हाथ का काम छिनने लगा। आपसी लड़ाई झगड़ो, आर्थिख व.धार्मिक कारण एक बड़ा मुद्दा है गाँव छोड़ कर जाने का।

गाँव शहरों की दूरी को कम करने के प्रयास में ग्राम पंचायतों को जागरुक करने व इन्हें और अधिक अधिकार देकर सक्रिय करने की योजना पर भी पलीता लग चुका। क्यों कि  आज की जरुरत अनुसार गाँवों के समग्र विकास हेतु आवश्यक है कि धनराशि देकर लघु एवं कुटीर उद्योंगों को पुनर्जीवित किया जाए। जहाँ जिस कच्ची वस्तु का उत्पादन अधिक हो, वहाँ उसी से संबंधित उद्योग, छोटी मिल-फेक्ट्रियों को विकसित किया जाए। गाँवों के दर्जी, सुनार, जुलाहे, मोची, लोहार, बढई, तेली, कुम्हार, किसान आदि को प्रशिक्षण देकर वर्तमान समय से जोड़ा जाए। उनके माल की खपत हेतु बाजार सुनश्चित किये जाये़ तो सँभव है उनके बच्चे अपने पुश्तेनी व्यवसाय से पढ़ने लिखने के बाद भी जुड़े रहे। शहरों की ओर  बढ़ता पलायन रुक जाये!

साथही शहरों के साथ ग्रामीण क्षेत्र, अंचल के विकास की तरफ भी ध्यान दिया जाए। मूल भूत सुविधा आज भी रोटी कपड़ा और मकान ही है पर आवश्यकता नुसार, सड़क बिजली पानी पर भी ध्यान दिया जाए तो कोई कारण नहीं बचता शहरों की ओर पलायन का।

इन्हीं सारी बातों का ध्यान रखते हुये हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम जी ने प्यूरा का विचार प्रस्तुत किया था। इसमें चार संयोजन शामिल है — भौतिक, इलेक्ट्रॉनिक, ज्ञान  तथा ग्रामीण क्षेत्रों के गाँव की समृद्धि को बढ़ाने हेतु आर्थिक गतिविधियां।

प्यूरा के उद्यमी  के पास  इतना कौशल होना चाहिये कि वह बैंकों के साथ मिलकर  व्यवसायिक योजना बना सके, बुनियादी ढाँचा तैयार कर सके। यथा — क्षेत्र में शिक्षण संस्थान, स्वास्थ केंद्र व.लघु उद्योग, परिवहन सेवाएँ, टेलीएज्यूकेशन, टेलीमेडिसिन तथा ई गवर्नेंस सर्विसेस। ये सेवाएँ सरकार की ग्रामीण विकास योजनाओं जैसे सड़क संचार परिवहन और स्व उत्पाद और सेवाएँ बेचने के लिए राष्ट्रीय एवं विश्व बाजार के साथ घनिष्ट सहयोग करेंगी।।

         वास्तव में गाँवों व शहरों के बीच के अंतर को पाटना मात्र एक आर्थिक कार्यक्रम नहीं है। गरीब वर्ग के आर्थिक उत्थान और समाज सुधार के कार्यो़ को आपस म़े जोड़ कर सार्थक और सटीक परिणाम हासिल किये जा सकते हैं।

पलायन गाँव के मान सम्मान का प्रश्न है तो उनकी भाई चारे की भावना को चुनौती भी है। भूख, कुपोषण, गरीबी उन्मूलन और अभाव दूर करने की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है साथ ही अगर गाँव व समाज स्वयं भी इस क्षेत्र में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर ले तो गाँवों का विकास कोई बड़ी बात नहीं। सामाजिक बुराइयों, आर्थिक विषमताओं को दूर करना भी एक बड़ा लक्ष्य है। इसके साथ ही जहाँ अच्छी सार्थक परंपरायें हैं उन्हें भी सींच कर नवजीवन देना होगा तभी गाँवों से पलायन रुकेगा और पृथ्वी का असंतुलन और अति दोहन भी।

       कहने का आशय मात्र इतना है कि  एक तरफ विकास के ऊँचे ऊँचे सपने और दौड़ है तो दूसरी तरफ उजड़ते गाँव और सर्वहारा वर्ग की बर्बादी। विकास की गंगा सदैव गाँव ,कस्बों और कृषि से ही बही है ।खेतों को काट कर बंजर करना ,उन पर प्लाट बना कर कंक्रीट में बदलने से विकास तो दूर दूर तक नहीं दिखेगा अपितु हम ऐसे जाल में फँसते जायेंगे कि उससे निकलना मुश्किल हो जाएगा।पोलीथिन तो वायुमंडल व पर्यावरण को लील ही रहा है ….।आज आवश्यकता है कि विकास के हसीन ख्बाव दिखाने वाले उच्च स्तरीय , संबंधित अधिकारीगण वास्तविकता से आँखें न फेरें। धन लोलुप ,स्वार्थी न बनें। तभी देश का भला सँभव है।गाँव समृद्ध होंगे तो पलायन रुकेगा,पलायन रुकेगा तो छोटे धंधों को बढ़ावा मिलेगा.जिससे आर्थिक स्थिति सुधरेगी।

मनोरमा जैन “पाखी” शारदा स्कूल पत्रिका की संपादिका और ‘बरनाली’ तथा ‘लघुकथा संग्रह’ की सहसंपादिका है। इनकी रचनाएं स्पंदन,‘शब्द बिथिका’ आदि पत्रिकाओ में प्रकाशित हो चुकी हैं। कई साहित्य सम्मानो से सम्मानित, मनोरमा जी साहित्य प्रतियोगितायो विजेता रही हैं ।

मेघालय का स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तोगन नेंग्मिज़ा या पातोगन संगमा

पूर्वोत्तर क्षेत्रों में जब अधिकतर कबीलों के सरदार, प्रमुख एवं राजा एक-एक करके ब्रिटिश सेना के सामने हथियार डाल रहे थे, वहीँ कुछ ऐसे भी रणबाकुरे भी थे, जिन्होंने अपने जीते जी अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार नहीं की अपितु अंतिम समय तक सीमित और पारम्परिक हथियारों से उनका विरोध किया I उनमें हैं  – गारो पहाड़ियों के आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तोगन नेंग्मिज़ा तथा जैंतिया पहाड़ी के उ किआंग नांगबाह I इन्होंने आधुनिक हथियारों से सुसज्जित ब्रिटिश सेना का सामना अपने मुट्ठी भर साथियों के साथ किया I 

    सन् 1872 में ब्रिटिश सेना घने जंगलों के बीचोबीच सड़क बना रहे थे, जहाँ गारो आदिवासी रह रहे थे I वे पिछले कई दशकों से गारो विद्रोही आदिवासियों को दबाने की कोशिश कर रहे थे परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिलती थी I जबकि उस समय तक धीरे-धीरे पूरे भारत पर अंग्रेज़ों का अधिकार हो गया था और लगभग सभी कबीलों ने आत्मसमर्पण कर दिया था पर इनमें से कुछ कबीले अपनी आज़ादी के लिए लगातार संघर्ष कर रहे थे I यह 1872 की आज़ादी के लिए अंतिम लड़ाई थी I 

   अंत में ब्रिटिश उपनिवेशकों ने गारो पहाड़ियों पर तीन दिशाओं से आक्रमण करने का निश्चय किया I कॉलोनेल हौघ्तोन (Colonel Houghton) ने अपनी सेना को तीन योग्य जनरल के नेतृत्व में विभाजित कर दिया I ग्वालपारा के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन डेविस को बजेंग्दोबा से होकर जाना था ; कैप्टन डल्ली पुलिस अधिकार कछार को सिजू रेवाक से होकर दक्षिण से कैप्टन डब्लू. जे. विल्लिंसोन, डिप्टी कमिश्नर तुरा से आगे जाना था I 

    कैप्टन डल्ली (Dally) युध्दभूमि में पहुँची और उन्हें सिम्सोंग नदी के किनारे मत्छु रोंक क्रेक (Matchu Ronk Krek) पर डेरा डाला I जिस समय ब्रिटिश सिपाही वहाँ पहुँचे, कुछ गारो मुखिया थे, जिन्होंने अपनी जगह देने से इंकार कर दिया I वे अपनी भूमि के लिए हर तरह से संघर्ष करने के लिए तैयार थे I उस समय यह बात गारो मुखियाओं तक पहुँची कि सरकारी सिपाही छेददार भले के साथ आएँ हैं, जो दूर से आग उगलती है I घने जंगलों रहने वाली इस जनजाति ने 

ऐसा हथियार पहले कभी भी नहीं देखा था I अधिकतर मुखिया बहुत घबरा गए क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि इस हथियार से खुद को और अपनी मातृभूमि को कैसे बचाएँगे ? उन्होंने आपस में बहुत विचार-विमर्श किया और अंत में अंग्रेजों से तब तक युध्द करने का निर्णय लिया जब तक एक भी गारो जीवित रहेगा पर जीते जी वे अंग्रेजों की आधीनता नहीं स्वीकार करेंगे I अब समस्या यह थी कि आग उगलती स्टील की नलियों का सामना कैसे किया जाए ? विलियम कारे के गारो जंगल बुक “Gowal” के अनुसार उनमें जो सबसे बहादुर था, उसने सोचा कि वह इसका हल निकाल लेगा I केले का तना फैलती आग के आगे टिक सकता है, यह बात उसे पता थी I इसके लिए उसने अपना जलता हुआ लाल लोहे के भाले को केले के तने में डाला तो वह तुरंत ठंडा हो गया I यह देखकर वह बहुत जोश में भर गया I उसे अपने योध्दाओं के लिए युध्द करने का सही तरीका मिल गया I इस बात की जानकारी और लोगो को मिली तो वे भी जोश में भर गए I वह व्यक्ति था, उनका नेता ‘तोगन नेंग्मिन्ज़ा (Togan Nengminza) और उसका साथी गिल्सोंग दल्बोत. (Gilsong Dalbot.)’ I 

     गारो योध्दाओं ने छिपकर आक्रमण करने की योजना बनाई I भोर होते ही पूरे जोश और आत्मविश्वास के साथ वे केले के दो-दो तने लेकर घने जंगलों में रेंगते हुए पहुँचे और शत्रुओं पर टूट पड़े I वे लगातार बढ़ते रहे और बंदूकों की आवाज़ पर ही रुके परन्तु वे घबराए नहीं I शत्रुओं का सामना करते हुए, अपने आप को बचाते हुए वे उनके खेमे में घुस गए I एक सेकेण्ड में बारूदों और गोलियों की बौछार होने लगी I उसका बहादुर मित्र गिल्सोंग दल्बोत. शहीद हो गया I उसे शहीद होते देख योध्दाओं का आत्मबल कम हो गया परन्तु वे हिम्मत नहीं हारे और युध्द करते रहे I तोगन नेंग्मिन्ज़ा भी युध्द करते हुए शहीद हो गया I उसके बाद बचे हुए समूह ने आत्मसमर्पण कर दिया I 

      आज की पीढ़ी इस घटना का इसलिए हँसी उड़ाती है कि देशप्रेमी गारो जनजाति ने ब्रिटिश सेना के आधुनिक अस्त्र-शास्त्र का सामना केले के तने और भाले से किया परन्तु सत्य तो यह है कि घने जंगलों में आज़ादी से रहने वाले आदिवासी बाहरी सभ्यता से बिल्कुल अनजान थे I उन्होंने कभी बन्दूक नहीं देखी 

थी न ही उन्हें पता था कि उसे कैसे चलाया जाता है I उन्होंने सोचा कि बन्दूक एक ऐसा भाला है, जो आग उगलती है और उसे केले के तने के द्वारा रोका जा सकता है I इन सबके पीछे उनके त्याग, बलिदान और देश प्रेम की भावना प्रबल थी I मुट्ठी भर वीरों ने पूरी निडरता और साहस से गुरिल्ला युध्द किया I इसमें कोई संदेह नहीं है कि तोगन नेंग्मिन्ज़ा एक वीर, देशप्रेमी और सच्चे स्वतंत्रता सेनानी थे I जिन्होंने अंतिम साँस तक अंग्रेजों के आधुनिक हथियारों का सामना भाले और केले के तने से किया I मातृभूमि के ऐसे वीर सपूतों को सलाम I

अनीता गोस्वामी की कर्मभूमि सन १९८४ से मेघालय की राजधानी शिलांग रही है। यहाँ की लोक-संस्कृति आदि पर हिन्दी में लेखन तथा हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु संलग्न हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं से भी जुड़ी हैं।
सम्प्रतिः वरिष्ठ लेखिका, अनुवादक, कवियित्री, समीक्षक एवं, दूरदर्शन मेघालय एवं पूर्वोत्तर सेवा आकाशवाणी, शिलांग में कार्यक्रमों का संचालन। राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान २०१५ से सम्मानित। कई साहित्यिक संस्थाओं की अध्यक्षा।