मेघालय की मातृवंशीय संस्कृति व परंपरा

वीरेन्द्र परमार

Matriliny by Bah Raphael Warjri

प्रकृति की सुकुमार गोद में बसा मेघालय पूर्वोत्तर भारत का एक लघु पर्वतीय प्रदेश है। यहाँ की शस्य-श्यामला धरती के गर्भ में अनेक रहस्य, कहानियाँ, पौराणिक आख्यान, रोमाँचकारी किस्से और मिथक छिपे हुए हैं। प्रकृति यहाँ के निर्दोष और निष्पाप लोगों की सहचरी है। मेघालय अपने अद्भुत और अनिर्वचनीय सौन्दर्य के मोहपाश में बाँध लेता है, अपने निष्कपट हाव–भाव से सम्मोहित कर लेता है, अपने अकृत्रिम आचरण से बार–बार आने के लिए आमंत्रित करता है। यहाँ के निवासी भविष्य की चिंता में दुबले नहीं होते, बैंक बैलेंस के व्यामोह में तनाव नहीं पालते और आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी परंपराओं को तिलांजलि नहीं देते। वे वर्तमान में जीते हैं और जो मिल गया उसी से संतुष्ट हो जाते हैं। मेघालयवासियों का पाखंडहीन जीवन और निष्पाप आचरण किसी भी सभ्य समाज के लिए वरेण्य है। यहाँ की हरियाली, खूबसूरत घाटी, मनमोहक सूर्योदय और सूर्यास्त किसी कवि की कल्पना से भी अधिक चित्रात्मक, भावपूर्ण और अर्थगर्भित है। अगर कोई व्यक्ति प्रकृति के आँचल पर अपनी कल्पना के रंग भरना चाहे है तो उसे मेघालय से बेहतर कोई जगह नहीं मिलेगी। यहाँ की मनमोहक जलवायु किसी श्रांत–क्लांत और तनावग्रस्त पथिक को चंदन का अवलेप लगाती है। मेघालय का अर्थ है मेघों का आलय अर्थात मेघों का आवास। सचमुच यहाँ बादल अठखेलियाँ करते हैं। यहां खासी, जयंतिया और गारो तीन प्रमुख आदिवासी समुदाय के अतिरिक्त तिवा, राभा, हाजोंग, लाखेर, कार्बी, बाइते, कुकी आदि जनजातियों के लोग निवास करते हैं। मेघालय का इतिहास यहाँ निवास करनेवाली तीन प्रमुख जनजातियों खासी, जयंतिया और गारो से जुडा हुआ है। ये जनजातियां सदियो से यहाँ निवास करती हैं। मेघालय की अधिकांश जनसंख्या ईसाई धर्म ग्रहण कर चुकी है। खासी लोग कैथोलिक हैं जबकि गारो लोग बैपटिस्ट हैं। पनार अथवा नार मेघालय का एक प्रमुख समुदाय है जिसे जयंतिया के नाम से जाना जाता है। जयंतिया शब्द एक पूर्व सम्राज्य जयंतिया सम्राज्य से लिया गया है जिसके शासक सिन्तेंग समुदाय के थे। जयंतिया का मूल आदिवासी धर्म नीमत्रे युग ता युग के नाम से जाना जाता है। एक लोककथा के अनुसार तूफान के देवता के साथ आकाश के देवता ने स्वर्ग के पेड़ को हिलाकर उससे बीज गिरा दिया जिसे एक पक्षी ने उठाया और उस बीज को जमीन में बो दिया। वह और कुछ नहीं बल्कि चावल का बीज था। ईश्वर ने मनुष्य को कुछ दिव्य बीज तथा चावल की खेती के लिए आवश्यक निर्देश दिए। मेघालय की जनजातीय संस्कृति और लोक परंपरा अत्यंत समृद्ध है। बांसुरी और मृदंग से निकली स्वर लहरियों के साथ नृत्य और मदिरापान यहाँ के सामाजिक समारोहों और धार्मिक अनुष्ठान का अभिन्न अंग है। पांच दिनों तक मनाया जानेवाला “का पाबलांग-नोंगक्रेम” खासी समुदाय का प्रमुख त्योहार है। इसे ‘नोंगक्रेम’ के नाम से जानते हैं। यह शिलांग से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘स्मित’ नामक गाँव में मनाया जाता है। “शाद सुक मिनसीम” भी खासी जनजाति का पर्व है। हर साल हर्ष और उत्साह के साथ अप्रैल माह में यह त्योहार आयोजित किया जाता है। इसका आयोजन शिलांग में किया जाता है। “बेहदीनखलम” जयंतिया समुदाय का त्योहार है जो प्रायः जुलाई में मनाया जाता है। “बेहदीनखलम” का शाब्दिक अर्थ है “छड़ी से शैतान को भगाना”। इसका आयोजन जोवाई नामक कस्बे में किया जाता है। गारो समुदाय अपने देवता “सलजोंग” (सूर्य) के सम्मान में अक्टूबर-नवंबर महीने में ‘वांगला’ त्योहार मनाता है। मेघालय में सदियों से युवागृह की परंपरा विद्यमान है। गारो समुदाय के युवागृह को ‘नोकपंते’ के नाम से जानते हैं। प्रत्येक गाँव में कम से कम एक नोकपंते अवश्य होता है। इसमें ग्रामीण युवक पारंपरिक कला और शिल्प का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। नोकपंते में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। गाँव के सभी युवक नोकपंते में ही रात्रि विश्राम करते हैं, परन्तु पूर्वोत्तर की अन्य जनजातियों के युवागृह की भांति गारो समुदाय के युवागृह भी आधुनिकता के प्रवाह में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
मेघालय का समाज मातृसत्तात्मक है। सबसे छोटी पुत्री समस्त संपत्ति की मालकिन होती है। छोटी पुत्री ही वृद्ध माता-पिता एवं अविवाहित भाई-बहनों की देखभाल करती है। परिवार में कोई पुत्री नहीं होने पर माता-पिता किसी निकटतम महिला संबंधी को अपनी संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाते हैं। खासी और जयंतिया समुदाय के लोग अपने पारंपरिक मातृवंशीय नियमों का पालन करते हैं जहां सबसे छोटी पुत्री परिवार की सभी जिम्मेदारियां निभाती है। गारो जनजाति में भी सबसे छोटी बेटी मूल रूप से पारिवारिक संपत्ति की वारिस होती है। जब माता-पिता किसी अन्य लड़की को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हैं तो उसका दावा स्वतः समाप्त हो जाता है। गारो जनजाति के गोत्र अनेक उपगोत्रों में विभक्त है जिसे ‘मचोंग’ कहा जाता है। मचोंग का शाब्दिक अर्थ मातृत्व (मदरहुड) है। मचोंग इस समुदाय की सबसे छोटी इकाई है। यह परिवार से भिन्न संस्था है। मचोंग के सभी सदस्य एक ही माँ की संतान माने जाते हैं। खासी और गारो दोनों जनजातियों में पिता को बाहरी व्यक्ति माना जाता है। बच्चे अपनी माता के नाम से जाने जाते हैं। परिवार की सम्पूर्ण सत्ता माँ के हाथों में होती है। इस समाज में पिता की कोई निर्णायक भूमिका नहीं होती है। सभी संपत्ति पर माँ का अधिकार होता है। माँ की मृत्यु के बाद माता की संपत्ति पर उसकी सबसे छोटी बेटी का अधिकार हो जाता है। यदि किसी महिला को कोई संतान नहीं हो तो उस मचोंग की किसी अन्य महिला को वह संपत्ति मिल जाती है। सबसे छोटी पुत्री को ‘नोकना’ कहते हैं जिसका अर्थ है उत्तराधिकारिणी। ‘नोकना’ की अनुमति के बिना उसकी बड़ी बहनें भी मकान में नहीं रह सकती हैं। बच्चों का गोत्र वही होता है जो माँ का गोत्र होता है। यदि माँ संगमा हो और पिता मोमीन हो तो बच्चों का गोत्र संगमा माना जाता है। जयंतिया समाज में गोत्र को ‘कुर’ कहा जाता है। ‘कुर’ समाज की लघुतम इकाई है। गोत्र कई उपगोत्रों में विभक्त है जिसे ‘कपोह’ कहा जाता है। एक गोत्र के सभी सदस्यों को एक ही माता (पूर्वज) की संतान माना जाता है। जयंतिया समुदाय में लगभग 38 गोत्र हैं। परिवार में पिता का कोई महत्वपूर्ण स्थान नहीं है। बच्चों का परिचय माता के नाम से दिया जाता है। विवाह के बाद पति अपनी पत्नी के साथ उसके घर में रहता है, फिर भी पति को आजीवन बाहरी व्यक्ति ही माना जाता है। पत्नी की सम्पति में पति का कोई अधिकार नहीं होता है। विवाहित पुत्र द्वारा अर्जित संपत्ति पर उसकी माता का अधिकार होता है, पत्नी का नहीं। इस समाज में माँ ही परिवार की मुखिया होती है, परिवार पर माँ का ही पूर्ण नियंत्रण होता है। वह परिवार की एकमात्र रक्षिका होती है। विवाह के बाद दामाद सम्पूर्ण रूप से अपनी पत्नी के माता–पिता के घर रहने के लिए नहीं आता है, बल्कि सूर्यास्त के उपरांत वह अपनी पत्नी के साथ रात व्यतीत करने के लिए आता है और प्रातःकाल में काम करने एवं खाने–पीने के लिए अपनी माँ के घर चला जाता है। मृत्यु के बाद भी उसकी अंत्येष्टि पत्नी के सगे–संबंधियों द्वारा नहीं की जाती, वरन उसके ‘कुर’ के सदस्यों द्वारा की जाती है। मेघालय की भूमि लोकसाहित्य की दृष्टि से अत्यंत उर्वर है। यहाँ के आदिवासी पर्वतशिखरों एवं सुदूर जंगलों में प्राकृतिक जीवन व्यतीत करते हैं जहाँ गीत गाते झरनों, बलखाती नदियों, वन्य–जीवों और नयनाभिराम पक्षियों का उन्मुक्त संसार है। यहाँ का जीवन सरल और स्वच्छंद है। यहाँ जीवन की आपाधापी नहीं, समय की व्यस्तता नहीं, कोई कोलाहल नहीं। यहाँ तनावरहित जीवन और न्यूनतम आवश्यकताएं हैं। इन परिस्थितियों में इनके उर्वर मस्तिष्क में कल्पना की ऊंची उड़ान उठती है। फलतः लोकगीतों, लोककथाओं, मिथकों, कहावतों, पहेलियों का सृजन होता है। मेघालय की पुरानी पीढ़ी को लोकसाहित्य का जीवंत भंडार गृह कहा जा सकता है। लोकसाहित्य वाचिक परंपरा में पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता है जो नई पीढ़ी के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम करता है।

वीरेन्द्र परमार: भारत सरकार के राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय में हिन्दी प्राध्यापक के रूप में हिन्दी शिक्षण योजना के केंद्रों पर प्राध्यापन। जल संसाधन मंत्रालय (भारत सरकार) के अधीनस्थ कार्यालय केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड, फरीदाबाद में उपनिदेशक (राजभाषा) के पद पर कार्य। राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय में उपनिदेशक (कार्यान्वयन) पद पर पूर्वोत्तर भारत के समाज, लोक परंपरा, लोकजीवन, लोकसाहित्य और आदिवासी जीवन के उपर विपुल लेखन। सम्प्रति असम विश्वविद्यालय, सिलचर में पदस्थ।

महादेव खोला धाम

अनुपमा प्रधान

महादेव खोला धाम एक बहुत ही पौराणिक और प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर मेघालय, अप्पर शिलांग, इस्ट खासी हिल्स में स्थित हैं। उमशिरपी नदी मंदिर के सामने अपने शांत स्वभावके साथ बहती रहती है। कहा जाता है यह मंदिर डेढ़ सौ साल पहले स्थापित की गई थी।
अनेको कहानियाँ सुनने में आती है इस मंदिर के बारे में, मंदिर कैसे, क्यों और कब स्थापित हुई इस बारे में। कहा जाता है इस जगह पहले काफी घना जंगल था जहाँ लखिया बाबा वर्षो से धयान में लीन बैठे थे। वही एक 2/8 गोर्खा राइफल्स के सूबेदार मेजर को सपने में एक गहरे लाल वस्त्र पहने, गले में रूदराकश और एक हाथ में त्रिशूल लिए तपस्या में लीन बैठे दिखाई दिए। अकसमात एक रोशनी के बीचों-बीच से आवाज़ आई और सूबेदार जी को आदेश दिया, कहा उस साधु की तलाश करे और साथ ही वहाँ मंदिर की स्थापना भी करें।
अगले ही दिन सूबेदार जी आदेशानुसार उन महात्मा की खोज में निकल पड़े और उस जगह पहुँचे आज जहाँ महादेव खोला धाम है। लखिया बाबा के मिलते ही उनहोंने मंदिर स्थापना का कार्य भी आरंभ कर दिया। हैरानी की बात यह थी मंदिर स्थापना के कार्य करते समय उन्हे वहाँ एक शिवलिंग प्राप्त हुआ।
मंदिर के पंडितों का आज भी कहना है यह शिवलिंग उन्हे वही गुफा से प्राप्त हुई थी।
इस धाम के बारे में यह भी कहा जाता है कि यहाँ एक गुफा है जहा से अंदर ही अंदर गुवाहाटी, कामखया मंदिर पहुँच सकते है। लोगों का यह भी कहना तब के समय लोग यही से आया जाया करते थे।
150 साल पहले सूबेदार जी द्वारा स्थापित किया गया छोटा सा शिव मंदिर आज बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर है। हर शिव भक्त का यह मानना है कोइ भी सच्चे दिल से मुराद माँगते है वह कभी निराश नहीं होते है।
यहाँ के पंडितों का यह भी कहना है मंदिर के अंदर जो छोटे-छोटे मंदिर हैं। उन्हें भक्त जनो ने अपनी मुराद पूरी होने पर बनवाया है।
आज जो इस मंदिर की देख-रेख कर रहे है, वह पंडित सुखराम दास मिश्रा जी की छठी पीढ़ी है। सुखराम जी इस मंदिर के पहले पंडित थे।
शादी, यज्ञ और बहुत सारी हिन्दु रस्मों-रिवाज़ का इस मंदिर में आयोजन किया जाता है।
बात जब तीज-त्योहार की आती है महा शिवरात्रि के मेले का आयोजन बड़े धूम-धाम से होता हैं। हजारों के तादात में लोग जगह-जगह से इस मंदिर के दर्शन के लिए एकत्रित होते हैं। आज भी शिवरात्रि के उत्सव पर गोरखा राइफल्स अपना योगदान देते हैं।
सावन के महीने में बोलबम का नारा लगाते हुए भक्त जन नंगे पाँव कावड पद यात्रा के लिए महादेव खोला धाम में आते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ अपनी भक्ति ईश्वर को अर्पित करते हैं।
सच्चाई कुछ भी हो पर भक्त जन पूरी श्रद्धा से अपनी भक्ति ईश्वर को अर्पित करते हैं। यह धाम बहुत ही लोकप्रिय है और श्रद्धालुओं की अटूट भक्ति ने इस धाम को पूरे देश में प्रसिद्ध कर दिया है।

अनुपमा प्रधान,  अध्यापिका हिन्दी में कविता, आलेख और कहानियाँ पत्रिकाओं में प्रकाशित। पूर्वोत्तर सेवा आकाशवाणी, दूरदर्शन, शिलांग से कविता और कहानी प्रसारण और अन्य कार्यक्रम में भागीदारी।

का पुङ वेइक्यान- एक लोककथा

एहसिंग खिएवताम्

मेघालय के पूर्वी खासी पहाड़ी जिला के पेनुर्स्ला खंड में उम्न्युह् त्मार नामक एक ग्राम है। यह ग्राम बांग्लादेश सीमा से लगकर स्थित है। यहाँ के ग्रामवासी में आज भी ‘उ रेन्’ के बारे में एक लोककथा प्रचलित है। यह लोककथा आज भी ग्रामवासी अपने अगले पीढ़ी को सुनाते आए है।
कहा जाता है कि कई वर्षों पूर्व ‘उ रेन्’ नामक युवक इस ग्राम में अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहता था। ‘उ रेन्’ बहुत ही मेहनती तथा फुर्तीला युवक था। प्रतिदिन खेत-बागानों में काम करके शाम को घर लौटता था। इसी प्रकार रेन् का दिनचर्या होता था। एक दिन कड़ाके की धूप हो रही थी तथा रेन् को खेत में काम करते-करते थकावट का अनुभव हो रहा था। तभी रेन् खेत का काम छोड़कर पास के ‘वेइक्यान’ नदी की ओर मछ्ली पकड़ने एवं विश्रांम करने जाने लगा। मछ्ली पकड़ने में व्यस्त था तभी एकाएक उसकी दृष्टि नदी के दूसरी छोर पर गयी। एक अप्सरा सी युवती नहाकर धूप में आराम कर रही थी। मुखमंडल पर अद्भुत तेज था, अद्वितीय सुंदरता से शोभित थी, नदी की रानी सी प्रतीत हो रही थी। रेन् कुछ देर के लिए उस अद्वितीय सुंदरता को अवाक देख रहा था क्योंकि उसके नदी आने के क्रम में आज पहली बार कोई युवती इस सुनसान नदी में अकेली नहाने आई थी। अश्चार्यवश रेन् झट से नदी के उस पार चला गया और उस सुंदर युवती से पूछताछ करने लगा। दोनों ने पर्याप्त समय तक शब्दों का आदान-प्रदान किया। दोनों आपस में सहज अनुभव कर रहे थे। उनके ह्रदय में एक दूसरे के लिए प्रेम पल्लवित हो रही थी तभी युवती ने रेन् से कभी उसके एवं उसकी भावना के साथ छल न करने का वचन लिया एवं उसे अपने घर ले जाने को सहमत हो गयी। रेन् तुरंत ही उस सुंदरी के वचन को मान उसके साथ उसके घर चलने को तैयार हो गया। सुंदरी ने अपने दोनों हाथों से नदी के पानी को अलग कर अपने घर के द्वार तक का रास्ता खुला कर दिया था। रेन् की आँखों को यह घटना पहली बार अनुभव करने का अवसर प्राप्त हो रहा था तथा उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। नदी के अंदर प्रवेश करते ही पानी अपने आप फिर से जुड़ने लगा। सुंदरी का घर बहुत ही सुंदर था, साज-सज्जा की कोई दूसरा उदाहरण नहीं था। रेन् उस चकाचौंध में खोने लगा था। कुछ देर सुंदरी के साथ रहने के बाद अचानक उसे अपनी माँ का ध्यान हो आया तथा अपनी माँ से मिलने व्याकुल हो रहा था। अपनी सुंदरी को वापस आने का वचन देकर रेन् वहाँ से चलने लगा।
अपने बेटे को घर लौटते देख उसकी माँ खुशी से समा नहीं पा रही थी। रेन् को अपने सीने से लगाकर चूमने लगी। उनकी आँखों से आँसू निरंतर प्रवाहित हो रही थी। यद्यपि रेन् की माँ कुछ हैरान भी थी क्योंकि रेन् की खोज ग्रामवासी ने निरंतर तीन दिन तक की थी। रेन् अपनी सुंदरी के घर तीन दिन तक रहा था इसकी सुध उसे तनिक भी नहीं था। माँ बहुत खुश थी। रेन् अपनी माँ से सारी घटना का जिक्र करने लगा तथा अपनी माँ से उसकी बहू की पहली बार घर आने की तैयारी करने के लिए भी अनुरोध करने लगा। रेन् ने अपनी माँ से विशेष सूचना भी दिया कि जब उसकी बहू घर में प्रवेश करे तो उसकी दृष्टि में घर का झाडू नहीं आना चाहिए। रेन् की माँ वृद्ध थी। माँ ने अपने सभी सहेलियों से तैयारी की सहायता करने के लिए बुलाई। तुरंत ही घर की साफ-सफाई, सजावट, सुशोभिकरण में सब व्यस्त होने लगे थे।
अंततःवो दिन भी आ ही गया जिसकी प्रतीक्षा रेन् की माँ के साथ-साथ पूरे ग्रामवासी भी उत्सुकता से कर रहे थे। रेन् की पत्नी का ग्राम में आगमन होते ही ग्रामवासी उसे अवाक होकर देख रहे थे। उन्होने अपने सपने में भी ऐसी सुंदर स्त्री की कल्पना नहीं की थी। लोगों में काना-पुसी होने लगी। लोग आपस में बाते करने लगे कि रेन् ने एक परी से विवाह किया है। रेन् की माँ बहुत ही खुश थी। अपनी बहू का स्वागत करने लगी थी। आगे-आगे चलकर बहू को अपने घर में प्रवेश करा रही थी। अपनी सासु माँ के पीछे-पीछे चलकर बहू घर के चौखट तक पहुँच गयी थी। घर में प्रवेश कर ही रही थी तभी उसकी दृष्टि द्वार के पास कोने में रखे झाड़ू की ओर पड़ी। आहत होकर वही से पीछे मुड़ गयी। पलटते ही रेन् से कहने लगी कि यदि वह चाहता है तो अपनी माँ के साथ रह सकता है परंतु वह इस घर में क्षणभर भी रुक नहीं सकती और वहाँ से चलने लगी। रेन् धीरे-धीरे अपनी माँ के पास बढ़ा उनसे अपनी पत्नी को दिया वचन से बद्ध होने की भावना को प्रकट किया। साथ ही खासी संस्कृति से बद्ध होने का एहसास भी अपनी माँ को दिलाने लगा, जहाँ खासी परिवार का पुरुष अपनी पत्नी एवं उसके भावी संसार की रक्षा, भरण-पोषण एवं संवर्धन के लिए उसके साथ अथवा उसे लेकर अपनी माँ का घर छोडता है। अपनी माँ को दिलासा देकर कहने लगा कि यदि मैं जीवित हूँ तो वर्षा के ऋतु में आपको ‘वेइक्यान’ नदी से अंगड़ाई नुमा गूँज सुनाई देगी अतः यही गूँज मेरे जीवित होने का प्रमाण होगा। रेन् अपनी माँ को अंतिम बार सीने से लगाकर विदाई लेने लगा एवं अपनी पत्नी के घर चलने लगा।
आज भी ‘उम्न्यु-त्मार’ एवं ‘वेइक्यान’ के ग्रामवासी का मानना है कि वर्षा के ऋतु में रेन् की गूँज कभी-कभी सुनाई देता है।

सन्दर्भ-
१. Golden Vine of Ri Hynniewtrep – The Khasi Heritage : Sumar Sing Sewian : page no. 28.
२.Unbelievable : C T Sangma
३.गारो पहाड़ियों से : अनीता पंडा : pg. 10 – 12.

एहसिंग खिएवताम्
एम.फिल. शोधार्थी, नेहू

आखिर कब तक दया शर्मा

मैं जब भी सुबह की सैर के लिये निकलती तो रास्ते में सड़क की ढलान पर स्थित हवेलीनुमा घर पर मेरी नज़र अनायास टिक जाती मानो बाहर की वीरानगी अन्दर की कुछ कहानी कहना चाहती हो। एक दिन जब मैं वहाँ से सुबह गुज़र रही थी तो एक दर्दनाक चीख सुन मेरे पैर वहीं ठिठक गये। आवाज़ घर के अन्दर से ही आई थी। ढलान से ऊपर आती एक औरत मुझे देख रुक गई और बोली, “मैडम, शायद आपने भी वही चीख सुनी है।” फिर कुछ रुक कर बोली “यहाँ तो आए दिन कुछ न कुछ होता रहता है। पता नहीं ये लोग बहू के साथ ऐसा बर्ताव क्यों करते हैं। खैर, हम तो ठहरे गरीब आदमी ऐसे झंझटों में खुद को डालकर मुसीबत क्यों लें।” यह कहकर मेरी प्रतिक्रिया देखे बिना मुड़ गई । पता नही क्यों उसकी बात सुनकर मन कसैला हो गया और मैं बिना गये वापस घर की और लौट आई।
उसी शाम मुझे कुछ जरूरी काम के लिए बाजार जाना पड़ा। मैनें उसी घर की तरफ से रूख किया जबकि जाने का दूसरा रास्ता भी था। जैसे ही उस घर के नजदीक पहुँची वहाँ से कुछ लड़ाई- झगड़े की आवाज़ सुनी। सामने जो दो चार छोटे-छोटे मकान नज़र आ रहे थे वहाँ ठण्ड में लोग अपने अपने घरों में दुबके पड़े थे। सड़क पर भी इक्का दुक्का ही आदमी नजर आ रहे थे। मैं भी भारी मन से आगे की ओर चल पड़ी।
नित्य की भान्ति मैं दूसरे दिन सुबह की सैर के लिये निकल पड़ी। उस हवेलीनुमा घर के जब नजदीक पहुंची तब मन बहुत घबराया सा था। देखा बाहर कुछ लोग जमा थे। पूछने पर पता चला कि कल रात घर की बहु चल बसी है। “क्या हुआ था बहू को ?” मैं पूछे बिना न रह सकी। उसी व्यक्ति ने जवाब दिया “ ज्यादा तो मुझे भी पता नही। घर के लोगों का कहना है कि काफी दिनों से बीमार चल रही थी।” न तो मैं घर के लोगों से परिचित थी और न ही बहू को कभी देखा था फिर भी अन्दर से एक आवाज़ आ रही थी कि बहूत से घरों के न जाने और कितने ऐसे अनकहे राज़ होंगे जो मनुष्य की मौत के साथ ही दफन कर दिए जाते हैं। न ही कोई केस और न ही कोई पैरवी बस अनकही दास्तान बन कर रह जाते हैं।
जैसे ही मैं वापिस अपने घर की तरफ मुड़ने को तैयार हुई ऐसे लगा मानो मेरी अंतरात्मा मुझे धिक्कार रही हो। मैंने उसी क्षण निर्णय लिया कि मैं इसे अनकही दास्तान नहीं बनने दूँगी आखिर बहू की मौत का रहस्य उजागर होना ही चाहिए ताकि कुसूरवार को सजा मिल सके। मेरे हाथ स्वतः मोबाइल की ओर उठे ताकि मैं पुलिस को सूचित कर सकूँ। इसके लिए मैंने अपने आप को जरुरत पड़ने पर ‘महिला सेल‘ जाने के लिए भी तैयार कर लिया। मुझे आन्तरिक प्रसन्नता हुई कि मैं एक माँ व एक नारी होने के नाते एक सही निर्णय ले रही हूँ। आखिर कब तक बहू – बेटियाँ ससुराल में शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलती रहेगी उन्हें भी तो तथाकथित सभ्य समाज में जीने का हक और अपनी निष्पक्ष बात कहने का अधिकार मिलना चाहिए।

श्रीमती दया शर्मा-गृहिणी महिला काव्य मंच मेघालय इकाई की सदस्य रचनाएं समाचार पत्र व पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। पूर्व इम्फाल (मणिपुर ) मे AIR मे casual announcer के तौर पर कार्यरत रह चुकी है। शिलांग AIR में भी विभिन्न विषयों पर कार्यक्रम देती है।

गुड़िया की ओढ़नी तूलिका श्री


‘ओ दादी’, रूआंसी होती हुई मीनल बोली- ‘मुझे भूख लगी है, माँ आप कहाँ हो?’ जोर जोर से आवाजें लगाती हुई मीनल माँ को ढूँढने लगी।
पांचवी कक्षा में पढ़ने वाली मीनल की सबसे अच्छी दोस्त थी राजकुमारी दोनों साथ मिलकर मीनल की हवेली की तीसरी मंजिल से भी ऊपर की ओर छत पर जाने वाली सीढ़ियों पर छुप कर बैठ जाते, पकी हुई इमली, अमरूद, लाल मिर्च भरी हुई बड़े सुख से खाते, उन दोनों की जिंदगी का सबसे बड़ा खुशहाली का वक्त वही होता था। दोपहर में जब सब सो जाते थे, राजकुमारी के आँगन में अमरूद का पेड़ था बिल्कुल कच्चे नारियल जैसा स्वाद था, वाह कितना अच्छा था सब कुछ औरअब 15 दिन बीत गए। सब्र की हद हो गई। एक दिन सुबह-सुबह ही सहेली के घर जा पहुंची वो। आँगन में सिलबट्टी पर पड़ी गीली हल्दी आज अपनी रंगत से अलग ही दीखरही थी। ‘राजकुमारी कहाँ हो तुम? अरे आंटी जी ! बहुत दिनों से वो स्कूल क्यों नहीं आ रही है? बहुत ज्यादा पढ़ाई हो रही है’ उसकी मम्मी अपनी आँखों से आँसू पूछती हुई दूसरे कमरे में चली गई। भैया ने बोला ‘चिंता मत करो हम उसे खबर कर देंगे।’ भोली मीनल उदास सी अपने घर लौटी, तो माँ ने डाँट लगाई- ‘सुबह-सुबह भला किसी के घर जाते हैं क्या? अब से वहाँ गई, तो समझना।’
रूआाँसी मीनल अपनी गुड़िया की ओढ़नी में अटकी हुई थी। राजकुमारी बोल कर गई थी ‘मैं इस गुड़िया की ओढ़नी सजाऊ ँगी। बस नानी के घर से जल्दी ही लौट कर आऊ ँगी तुम सब सामान जुटा कर रखना।’ कितनी मिन्नतों के बाद दादी ने थोड़ा सा गोटा दे दिया था, देते हुए बोली थीं- ‘यह ठाकुर जी (कृष्ण भगवान) के लिए म ँगाया है, दे रही हूं तुम्हें खराब मत करना।’ छत पर अकेली बैठी मीनल का मन नहीं लग रहा था। उसने सोचा चलो क्यों न दादी से ही किरन, गोटा लगवा लेते हैं, और सारा सामान ले गुड़िया को खूब सारा प्यार कर उसे दुपट्टे में लपेट वह सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी कि बाबा की आवाज सुनाई दी, ‘हमारी मीनू बिटिया उदास हो जाएगी अभी मत कुछ बताना।’
सन्नाटा था बरामदे में, दादी ने उसे यह कहकर वापस कर दिया कि ‘मैं थक गई हूं, बाद में कर लेंगे।’ बुआ को भी जाने क्या हुआ था बोली- ‘आँखों में दर्द है और मम्मी, अभी उनके आराम करने का वक्त है।’ उदासी, दुख और गुस्सा सब मीनल के सिर पर नाचने लगे थे तभी बाबा ने प्यार से सिर सहलाते हुए कहा- ‘कल मिथिला आएगी न काम पर बस सबसे पहले तुम्हारे गुड़िया की ओढ़नी, ठीक है।’ मीनल को मन माँगी मुराद मिल गई थी अपने सपनों को दुपट्टे में समेटे नाचते-कूदते यह बात अपनी छोटी बहन को बताने चली गई।
अगले दिन स्कूल में हिंदी का पीरियड था और कक्षा में काव्य पाठ का आयोजन, जो कि हिंदी की अध्यापिका हर महीने करवाती थी। कोई भी कविता देखकर पढ़ने का मन हो या याद करके बोलने का मन हो, खूब अच्छे ढंग से अभिनय के साथ जो पढ़ता उसे टीचर अपनी तरफ से इनाम देती। मीनल से भला कोई कहाँ जीत पाता था पर आज सदा मुस्कुराने वाली मीनल पनियाली आँखें लिए बैठी थी। सारी लड़कियाँ एक के बाद एक कविता पढ़ रही थीं लेकिन टीचर की आँखें तो अपनी प्यारी मीनल अभिनेत्री को ढूँढ रही थी तभी उनकी नजर उस पर पड़ी, ‘क्यों उदास क्यों बैठी हो अभिनेत्री?’(टीचर हमेशा इसी नाम से उसे बुलाया करती थीं)
‘टीचर वो राजकुमारी आज-कल स्कूल नहीं आती, घर पर भी नहीं है मम्मी बोलती हैं वह नानी के घर चली गई है।’ पल भर में ही टीचर को सारी वस्तु स्थिति समझ में आ गई थी। उनकी भी आँखें भर भरा उठी, बोली- ‘बेटी जो लोग भगवान के घर चले जाते हैं वह वापस कभी नहीं आते तुम्हें किसी ने बताया नहीं, उसको ब्लड कैंसर हो गया था। और बेटा इस रोग का इलाज अभी तक नहीं निकला है। उसके लिए प्रार्थना सभा तो रखी थी स्कूल में, शायद तुम उस दिन नहीं आई थी।’ मीनल को अपनी गुड़िया, ओढ़नी, गोटा-किरन, अपनी सहेली सब धुँधले होते नजर आ रहे थे।

तूलिका श्री, बड़ौदा : बड़ौदा से प्रकाशित हिंदी त्रैमासिक पत्रिका नारी अस्मिता में समीक्षक के रूप में कार्यरत। अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनंदन समिति मथुरा द्वारा राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय कवि का सम्मान प्राप्त। संप्रति- ऑक्जिलियम कन्वेंट हाई स्कूल, बड़ौदा में हिंदी संस्कृत की अध्यापिका के रूप में कार्यरत।

पुस्तक समीक्षा

डेजी शर्मा


पुस्तक- साक्षात्कार: संभावना और यथार्थ (पूर्वोत्तर के हिंदी रचनाधर्मियों से साक्षात्कार)
लेखन – पंकज मिश्र ‘अटल’
प्रकाशक – बोधि प्रकाशन, जयपुर (राजस्थान)
प्रकाशन वर्ष – जुलाई 2020
पूर्वोत्तर का नाम लेते ही एक सुंदर और मनोरम जगह का एहसास होता है। असम से लेकर मणिपुर तक पूर्वोत्तर के आठों राज्यों में जनजातीय लोगों तथा शेष अन्य जातियों के लोगों ने अपनी साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक विरासत को संभाल कर और संजो कर रखा है।
यहाँ पूर्वात्तर में अनेक ऐसे महान व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने अपनी कलाकारी से, अपने लेखन से, अपने अन्य योगदानों से पूर्वात्तर के राज्यों को प्रगति और प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचाया है।
यहाँ ढेरों ऐसे प्रतिभाशाली लोग हैं, लेकिन कुछ तो हमेशा पर्दे के पीछे ही रहे हैं। ऐसे ही लोगों की सोच को, उनके हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति योगदान को हमारे सामने साक्षात करने की कोशिश की है पंकज मिश्र ‘अटल’ जी ने।
पंकज जी ने साक्षात्कारः संभावना और यथार्थ नामक पुस्तक के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत में हिंदी लेखन को भी एक नई दिशा देने की पहल की है। पुस्तक में उन्नीस रचनाकारों की मनोवृत्ति को, उनके हिंदी में लेखन को उजागर किया गया है। पंकज जी मानते हैं कि अगर वे यहाँ के रचनाकारों से जुड़ेंगे, तो यहाँ की मिट्टी से जुड़ेंगे। रचनाओं के माध्यम से यह जानने की चेष्टा की गई है कि यहाँ अर्थात पूर्वात्तर के आठों राज्यों में हिंदी के विकास की संभावनाएँ यदि हैं तो किन रूपों में हैं।
अनुवाद के माध्यम से भी यहाँ की सभ्यता, संस्कृति दूर-दूर तक जा चुकी है। कुल मिलाकर इस पुस्तक के माध्यम से हम विभिन्न कलमकारों के विचारो से अवगत होंगे। पुस्तकें तो हम कई पढ़ते हैं, लेकिन कई साक्षात्कारों को एक साथ किसी धागे में मोतियों की तरह पिरोना एक नई पहल के रूप में ही है यह साक्षात्कारों पर केंद्रित पुस्तक।
पंकज जी ने इसको एक नया रूप दिया है। वर्तमान में पंकज मिश्र ‘अटल’ असम के बरपेटा में जवाहर नवोदय विद्यालय में कार्यरत हैं और अपनी लेखनी से हिंदी के विकास के पथ पर अग्रसर हैं।
पंकज जी विशेषकर अतुकांत कविता, नवगीत और समीक्षात्मक लेख लिखते हैं। बाल साहित्य में भी उनकी लेखनी चली है। ये आकाशवाणी से भी जुड़े हुए हैं।
आइए, पुस्तक की गहराइयों में अवगाहन करते हैं। सबसे पहले मैं इसकी भूमिका पर अपने विचार प्रस्तुत करना चाहती हूँ। इसमें पूर्वोत्तर के कई रचनाधर्मियों से लिए गए साक्षात्कार हैं। यहाँ पूर्वोत्तर के आठों राज्यों के रचनाकारों को समेटा गया है। इन साक्षात्कारों में अगर अतीत का विवरण है, तो वर्तमान की विवेचना और व्याख्या भी निहित है तथा भविष्य में झाँकने की जिजीविषा भी समाहित है। पंकज जी ने अपनी कलम से इन साक्षात्कारों में ऐसी जान फूँकी हैं कि पाठक उनकी लेखनी में डूब जाएंगे।
पहला साक्षात्कार अरूणाचल प्रदेश की लेखिका डॉ. जमुना बीनी तादर का है। पढ़ने के बाद हम लेखिका के व्यक्तित्व, कृतित्व और विचारधारा से रूबरू होंगे। दूसरा साक्षात्कार सिलचर के रचनाकार गुलशन राय मोंगा का हैं, जो कि एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार हैं। इनकी रचनाओं में वर्तमान व्यवस्था, सामाजिक विकृतियों और नारी शोषण के खिलाफ हुंकार दिखाई देती है। वहीं डॉ. देवेन चंद्र ‘सुदामा’, रूनू बरुवा ‘रागिनी तेजस्वी’, मदन सिंघल, कुंतला दत्त, किशोर कुमार जैन, जीना बरुवा, सौमित्रम्, हरकीरत हीर, डॉ. प्रवीन कोच, डॉ. नवकांत शर्मा, एमी मेहजाफी हुसैन ‘आयशा’, डॉ. बी.पी. फ़िलिप जुविचु, राधा गोविंद थोंडाम ‘कविराज’, ड़ॉ. अनिता पंडा, डॉ. वानलाल रेमरूअता राल्ते, अर्जुन चामलिड. ‘यावा’, रमेंद्र कुमार पाल के विचारों को पढ़ लेते हैं तो हम समग्र पूर्वोत्तर को जान जाएंगे। इस प्रकार यह पुस्तक अपने नए सोच और विचारों के साथ हमारे सामने आई है।
पंकज जी ने इन समस्त साक्षात्कारों के माध्यम से पूरे पूर्वोत्तर को साहित्यिक दृष्टि से एक धागे में पिरो दिया है, जो कि एक अनूठा कार्य है।
पंकज मिश्र ‘अटल’ द्वारा पूर्वात्तर भारत में हिंदी की स्थिति, हिंदी में लेखन, अनुवाद कार्य की स्थिति आदि को स्वयं जानने और पूर्वात्तर में हिंदी में हो रहे लेखन से शेष भारत के बुद्धिजीवियों और हिंदी रचनाधर्मियों से परिचित कराने हेतु किया गया यह कार्य पूर्वात्तर के तमाम साहित्यिक संदर्भों में अपना विशेष स्थान और महत्व रखता है। इस प्रकार कई लेखकों को एक साथ एक जगह पर प्रस्तुत करना, वह भी अलग-अलग राज्यो से, एक दुर्लभ कार्य है।
पंकज मिश्र ‘अटल’ ने बुद्धिजीवियों द्वारा साक्षात्कारों के रूप में दिए गए विवरण के अलावा इस पुस्तक की भूमिका में समग्र पूर्वोत्तर को ही व्याख्यायित सा कर दिया है। आपने पूर्वोत्तर भारत में जो जनजातीय भाषाएं हैं उनके साहित्य, उनकी भाषाओं, बोलियों, उन भाषाओं में जो साहित्य है उसके हिंदी में अनुवाद की स्थिति, पूर्वोत्तर की बहुरंगी संस्कृति, लोकसाहित्य, और हिंदी में हो रहे लेखन की गुणात्मकता तथा क्षेत्रीय भाषाओं में हिंदी साहित्य के अनुवाद की स्थिति को भी उभारने की चेष्टा की है।
पंकज मिश्र ‘अटल’ ने भूमिका के माध्यम से ही इस पुस्तक और इस वृहद कार्य के सन्दर्भ में अपने मनोभाव और कार्य की महत्ता और अवश्यकता को भी स्पष्ट कर दिया है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि बहुत से स्थापितों के साथ नए हस्ताक्षरों को भी आपने राष्ट्रीय फलक पर अपने आपको स्थापित करने और साबित करने हेतु अवसर भी दिया है, कहीं न कहीं साक्षात्कारों के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत के ये रचनाकर पूर्वोत्तर में बुद्धिजीवियों के मध्य चर्चा में आए, उनकी पहचान को मजबूती मिली और विस्तृत साहित्यिक फलक भी मिल सका।
साक्षत्कार विधा को चुनने के संदर्भ में पंकज मिश्र ने कहा है कि, “मेरा ध्यान सीधे-सीधे साक्षात्कार विधा की ओर गया, क्योंकि साक्षात्कार विधा ही वह माध्यम है जिसके द्वारा व्यक्तित्व से कृतित्व तक की गहराइयों का अवगाहन किया जा सकता है, आदर्श से यथार्थ तक की दूरी तय की जा सकती है, और किसी भी व्यक्ति के योगदान को सूक्ष्मता से विश्लेषित और व्याख्यायित भी कर सकते हैं।”
पंकज मिश्र ‘अटल’ इस पुस्तक के संदर्भ में अपने उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि, “इस पुस्तक के माध्यम से मैं कई महत्वपूर्ण उद्देश्यों को आधार बनाकर चला हूं। इन उद्देश्यों में पूर्वोत्तर में हिंदी की जमीनी हकीकत को जानना, हिंदी के संदर्भ में किए जा रहे प्रयासों को परखना, पूर्वोत्तर के हिन्दी लेखन पर समीक्षात्मक चर्चा करना, पूर्वोत्तर की क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य तथा जनजातीय लोक साहित्य के हिंदी में हो रहे अनुवाद से जुड़कर अनुवाद तथा अनूदित साहित्य पर विश्लेषणात्मक और विवेचनातमक संवाद करना आदि मुख्य हैं।”
अंत में मैं यही कहना चाहूँगी कि पूर्वोत्तर में हिंदी लेखन और हिंदी के प्रचार तथा प्रसार की अपार संभावनाएँ हैं।
अगर इस प्रकार के साहित्यिक कार्य होते रहे, तो पूर्वोत्तर किसी भी परिचय के लिए मोहताज नहीं रहेगा और यहाँ के भी रचनाकारों की गिनती पूरे भारतवर्ष में होने लगेगी।
अंततः मैं यही कहना चाहती हूं कि साक्षात्कार विधा पर जारी यह पुस्तक जिन मन्तव्यों और संदर्भों को केंद्र में रखकर लिखी गई और प्रकशित की गई है, पूर्ण रूप से पूर्वोत्तर भारत में हिंदी की वास्तविकता को जानने और समझने में सहायक है।
शोधार्थियों को पूर्वोत्तर में हिंदी लेखन के सन्दर्भ में यह पुस्तक सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में मार्गदर्शन भी करेगी। पंकज मिश्र ‘अटल’ ने पूर्वोत्तर भारत काफ़ी गहराई और गंभीरता के साथ न केवल स्वयं महसूस किया है अपितु साक्षात्कार विधा की इस पुस्तक को पूर्वोत्तर वासियों और शेष भारत के तमाम-तमाम बुद्धिजीवियों तक पहुँचा कर बौद्धिक स्तर पर पूर्वोत्तर और शेष भारत के प्रबुद्ध वर्ग को, साहित्यिक समाज को एक-दूसरे को समझने और एक-दूसरे से जुड़ने में सेतु की भूमिका भी निभाई है।
पूर्वोत्तर भारत में हिंदी भाषा और साहित्य की स्थिति को जानने और परखने की मनोभावना के साथ-साथ यह पुस्तक पंकज मिश्र ‘अटल’ के साहित्यिक तथा साकारात्मक सोच, पूर्वोत्तर भारत के प्रति उनकी आत्मीयता को तो उजागर करती ही है पूर्वोत्तर में हिंदी के संदर्भ में अपार संभावनाएं और हिंदी के उज्ज्वल भविष्य की ओर भी संकेत करती है। क्योंकि पंकज मिश्र ‘अटल’ की मनोभावनाओं और पुस्तक के संदर्भ में निहित विचारों को समाहित करते हुए आगे बँढ़ू तो बेहतर होगा।
पंकज मिश्र ‘अटल’ लिखते हैं कि, “पुस्तक ‘साक्षात्कार: संभावना और यथार्थ (पूर्वोत्तर में हिंदी रचनाधर्मियों से साक्षात्कार)’ पूर्वोत्तरमें हिंदी भाषा और साहित्य को लेकर चर्चा और संवाद की पर्याय मात्र न होकर नवीनतम संदर्भों में परिष्कृत दृष्टि की परिचायक है और स्वयं में अनंत अपेक्षाओं और संभावनाओं के साथ उस कल की ओर उन्मुख है जो कि पूर्वोत्तर के बुद्धिजीवियोंं, हिंदी प्रेमियों का संभावित सच है। ” पंकज मिश्र ‘अटल’ का यह कथन उनकी व्यापक दृष्टि, उनके बहुआयामी सोच और वैचारिक गहराई का द्योतक तो है ही, साथ ही साथ यह साक्षात्कार ग्रंथ इन आधारों, तथा मानकों पर भी खरा उतरता है। यही नहीं यह पुस्तक पूर्वोत्तर भारत में हिंदी को, हिंदी लेखकों और उनके लेखन को सुदृढ़ आधार भी प्रदान करता है।
निश्चय ही पूर्वोत्तर भारत के हिंदी रचनाकारों, हिंदी सेवी विद्वानों के हिंदी के प्रति योगदानों और हिंदी लेखन को साहित्य के फलक पर उकेरने और आकार देने की दृष्टि से पुस्तक “साक्षात्कार: संभावना और यथार्थ (पूर्वोत्तर के हिंदी रचनाधर्मियों से साक्षात्कार)” एक महत्तवपूर्ण सन्दर्भ ग्रन्थ तो है ही साथ-साथ पूर्वोत्तर के संदर्भों में पूर्वोत्तर वासियों को एवम शेष भारत के प्रबुद्ध वर्ग को पंकज मिश्र ‘अटल’ की अप्रतिम साहित्यिक भेंट भी है।

डेजी शर्मा जी स्वयं एक लेखिका भी हैं, अनुवाद विधा में भी आपकी विशेष रुचि है, लेखन के अतिरिक्त आपकी पत्रकारिता में अभिरुचि है। आपने गुवाहाटी से प्रकाशित हो रहे हिंदी समाचार पत्रों पूर्वांचल प्रहरी तथा सेंटिनल (हिंदी) में उप सम्पादक के पद का दायित्व निर्वहन किया है।
वर्तमान में आप गुवाहाटी (आसाम) में अध्यापन के साथ लेखन भी कर रहीं हैं।

महिला सशक्तिकरण – भारतीय संस्कृति का अंग


उज्ज्वला संदीप देसाई,

श्रीमती उज्जवला देसाई आई.टी. कम्पनियों में विभिन्न पदों पर 20 वर्ष से ज्यादा कार्यरत रहीं हैं। सम्प्रति वे पूना की एक साफ्टवेयर कम्पनी की बोर्ड आफ डायरेक्टर्स में एक हैं। पिछले पाँच वर्ष से स्वैच्छिक सामाजिक मुद्दों पर कार्य कर रही हैं यथा देशप्रेम के प्रति जागरूकता, युवा -निर्माण आदि।

Priyanka Jhunjhunwala


नमस्ते, आज २१वी शताब्दी में हम महिला सशक्तीकरण के बारे में सोचते, लिखते या पढ़ते हैं तो बहुत अच्छा लगता है पर थोड़ा विचित्र नहीं लगता?
जिन महिलाओं ने सृष्टि की रचना से लेकर आज तक अनेकों पीढ़ियों को या महापुरुषों की निर्मात्री बनीं, उनका सशक्तिकरण अबतक क्यों नहीं हुआ? क्या वो सशक्त नहीं है? जब निसर्गत: उसे बड़ा ही उच्च, माता का दर्जा मिला हुआ है। मातृत्व एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी का काम है, एक माता न सिर्फ अपने बच्चों पर बल्कि आनेवाली अनेक पीढ़ियों पर संस्कार देने का काम करती है। एक तरह से देखा जाय तो वो एक कुम्हार की तरह माटी को, अंदर और बाहर से सुधार कर मटके में रूपांतरित करती है। आज अगर उस पर अत्याचार हो रहे हैं या उसे एक भोगवस्तु के रूप में देखा जा रहा है, तो उसके लिए वो खुद भी तो जिम्मेदार है। समस्या का समाधान अगर चाहिए तो उस समस्या की जड़ तक जाना पड़ेगा, निरपेक्ष भाव से काम करना होगा, अगर हमारी गलती है, तो उसे भी स्वीकार करना होगा।
हम अपने पुराणों में या इतिहास में झाँककर देखेंगे तो पाएँगे कि स्त्री कभी अबला नहीं थी। इस सृष्टि के सृजन में पुरुष के साथ प्रकृति का कार्य भी महत्वपूर्ण है। हमारी प्रमुख देवताओं में स्त्री देवता अर्थ, शस्त्र, शास्त्र, कला सहजतासे संभाल रही है। मां लक्ष्मी के साथ श्री विष्णू जो सत्विक्तता का प्रतीक है, मां शक्ति के साथ शिव जो समदर्शिकता का प्रतीक है, हमे बता रहे है कि संपन्न होने पर सात्विकता और शक्ति आने पर समदर्शिता का त्याग नहीं करना चाहिए। माँ सरस्वती कला और विद्या दोनों की देवता हैं। शक्तिस्वरुपा दुर्गा सर्व शस्त्रों से सुसज्ज है और उसने अनेक दैत्यों का संहार करके संसार की रक्षा की है।
इतिहासमें कैकयी ने देव दानव युद्ध में अपने पति की सारथी बन कर उसके प्राणों की रक्षा की है। महाभारत काल में अंबाने अपने ऊपर हुए अन्याय का बदला घोर तपश्चर्या करके पूर्ण किया। इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त भीष्माचार्य के मृत्यु का कारण बनी। कुंतीने अपने पुत्रों को अपने बहू पर हुए अन्याय को प्रत्युत्तर देनेके लिए प्रेरित किया, उसी समय धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ वनवास जाकर, उनकी सेवा भी की। न्याय और कर्तव्य दोनोंका समानता से निर्वाह किया। अनेक प्रसंग उसके धैर्य और संतुलित मन का परिचय देते है। द्रौपदी तो इतिहास में अमर हो गई। बंधक बने अपने पाँच बलशाली पतियों को मुक्त कराया। अपने केश खुले रखकर, सतत अपने पतियों को उनके कर्तव्य की याद दिलाती रही। राजदरबार में भीष्म, द्रोण, विदुर जैसे दिग्गजों को उनकी हतबलता और कर्तव्यबोध का आइना दिखाया। पति बंधन में होते हुए भी खुद की स्वतंत्रता का मान रखा। माता सीता ने भी अपना निर्णय खुद लिया। चाहे वनवास जाना हो या रावण की कैद में खुद का मनोबल संभालना या भूमिगत होना हो।
अध्यात्मशास्त्र में पारंगत अनेक स्त्रियोंका वर्णन पुराणों में आता है, लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषियों की ऋचाएँ वेदों में आती है। आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य और मंडन मिश्र के विवाद में मंडन मिश्र की पत्नी उभयाभारती ने पंच की भूमिका निभाई थी।
भक्ति योगमें मीराबाई, मुक्ताई, जनाई और अशिक्षित समझी जानेवाली बहिणाबाई, रामकृष्ण परमहंस की अर्धांगनी शारदा देवी शिखर पर थी। धैर्य और सामर्थ्य में जीजाबाई, रानी लक्ष्मीबाई, ओनके अव्वाक्का, केलाडी चेंनंमा, बेलावडी मल्लंमा, राणी अबाक्का, राणी वेलू नचीयार व कित्तुर चेल्लंमा, नागालैण्ड की रानी गिइदिन्ल्यू आदि पुरुषों से कम नहीं है अपितु विदेशी आक्रांताओं से मातृभूमि की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने अपने जीवन सार्थक कर आने वाले पीढ़ियों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया।
आज भी अनेक महिलाएँ शास्त्र, कला, संरक्षण जैसे विविध क्षेत्रों में उत्तम कार्य कर रही हैं। फिर क्या भूल हो गई हमसे या हमारे अज्ञान का फायदा लिया गया, जो आज स्त्रियों पर अत्याचार होते हैं और महिला सशक्तिकरण का नारा बुलंद करना पड़ता है।
दुर्दैव से बीच के काल में हम पर बहुत से आक्रमण हुए। उसके परिणाम स्वरूप स्त्रियोंपर बहुत सी पाबंदियां आ गई, क्यों कि आक्रांता राक्षसी वृत्ति के थे। ७००/८०० साल की गुलामी से समाज की मनोदशा गुलामवत हो गई फिर भी हमारी शूरवीर महिलाओं और पुरुषों ने समय-समय पर संघर्ष कर स्वयं को पारतंत्र्य से बाहर लाने की कोशिश अनवरत की। अन्य किसीभी देशमें उनकी पुरानी सभ्यता दिखाई नहीं पड़ती। पर आज स्वातंत्र्य के पश्चात धर्मनिरपक्षता जैसे लुभावने नाम से हमारी संस्कृति पर चारो और से आघात हो रहे है और हम भी उस दलदलमे फँसते जा रहे है। अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण, आक्रांताओं का उदात्तीकरण करनेवाला इतिहास व हिंदू मन पर आघात करनेवाला सिनेमा जगत, इन सबके कारण आज हमारा युवावर्ग अपने ही गौरवशाली इतिहास को भूलकर, पाश्चत्य संस्कृति के आधीन होता दिखाई दे रहा है। महिला वर्ग भी बाजारीकरण के अधीन हो रहा है।
स्त्री को सक्षम और सशक्त होना है तो इस आभासी दुनियासे बाहर आकर, सत्य का सामना करना पड़ेगा। आज जागरूक होनेकी आवश्यकता है।
अगर समाज हमे भोगवस्तू न माने ऐसे लगता है तो सबसे पहले जो सिनेमा स्त्रियोंको भोगवस्तु(आइटम) बनाकर प्रस्तुत करता है उसपर बहिष्कार होना चाहिए। अगर बदलाव चाहते हो, तो उसकी शुरुआत खुद से करो। लड़कों के कपड़े पहननेसे या उनकी तरह रात को बाहर टहलने से महिला सशक्त नहीं हो सकती, वो सिर्फ ऊपरी दिखावा मात्र है। स्त्रियों कों कराटे या तत्सम स्वसंरक्षण सिखाने वाली कला में पारंगत होना पड़ेगा, दूसरी ओर लड़कों को पाक कला का शिक्षण देना होगा। दोनों को सब जीवनावश्यक कला आनी चाहिए, जिससे वो सही तरह से आत्मनिर्भर हो सकेंगे। हर चीज सरकार नहीं कर सकती, आज भविष्य के लिए तैयार होना पड़ेगा। महाभारत में भीम पाक कला और अर्जुन नृत्य कला जानने के कारण विपरीत परिस्थितियों भी बच गए।
प्रत्येक माता ने अगर अपने बच्चों को सही शिक्षण दिया तो ये समाज सक्षम और सशक्त होगा। समाज का कोई भी घटक, स्त्री या पुरुष कमजोर नहीं होना चाहिए। अपने गौरवशाली इतिहास को याद करो, नहीं तो पैसा और प्रसिद्धि का हवस समाज को नष्ट कर देगा। कल जो प्रसिद्धिके जाल में फँसे थे वो आज ईडी के जाल में दिखाई दे रहे है।
हमारे सच्चे नायक/नायिका सैनिक, स्वास्थ्य कर्मचारी, समाज सेवी, वैज्ञानिक शास्त्रज्ञ, कृषक एवं श्रमिक वर्ग हैं, जो हमारे समाज का भरण, पोषण और संरक्षण कर समाज को आगे ले जा रहे है, उन्हें छोड़कर झूठे नायक/नायिका के मायाजाल में न फँसिए। आपका आदर्श अगर सही है तो आपकी दिशा भी सही होगी। भारत ही विश्वगुरुका स्थान ले सकता है अगर हम देवी/देवताओंकी तरह स्त्रियों का भी सम्मान कर सके। सन् 1893 मार्च 25 को स्वामी विवेकानंद के ‘भारतीय नारी’ विषय पर अपने भाषण में कहा था –
भारत में नारी ईश्वर की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और उसका सम्पूर्ण जीवन इस विचार से ओत-प्रोत है कि वह माँ है। पश्चिम में स्त्री पत्नी है, पूर्व में वह माँ है। हिन्दू माँ-भाव की पूजा करते हैं और संन्यासियों को भी अपनी माँ के सामने अपने मस्तक से पृथ्वी का स्पर्श करना पड़ता है।

मेघालय के जयंतिया पहाड़ियों के क्रांतिकारी उ कियांग नंगबाह


आलोक सिंह, सीनियर रिसर्च फेलो पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय, शिलांग हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं जैसे वाक, परिकथा, बयां, समन्वय पूर्वोत्तर, लमही, अभिनव मीमांसा, अक्षर पर्व, राष्ट्रभाषा सेवक, मेघालय दर्पण, नेहू ज्योति, साहित्य वार्ता आदि पत्रिकाओं में कविताएं, समीक्षा, लेख आदि प्रकाशित।

आज मेघालय राज्य के जयंतिया हिल्स के स्वतंत्रता सेनानी उ कियांग नंगबाह की 158 वीं पुण्यतिथि है। जिन्होंने ब्रिटिश सेना के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया और लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उ कियांग नंगबाह ने अंग्रेजों के खिलाफ तब विद्रोह किया था जब खासी जयंतिया स्वतंत्र राज्य हुआ करते थे। यह वाकया उस समय का है जब 18 वीं शताब्दी में मेघालय की पहाड़ियों पर अंग्रेजी सत्ता का शासन नहीं था। वहाँ खासी और जयंतिया जनजातियाँ स्वतन्त्र रूप से निवास करती थीं। इस क्षेत्र में वर्तमान में सटे बांग्लादेश और सिलचर के 30 छोटे-छोटे राज्य थे। इनमें से एक का नाम जयन्तियापुर था। अंग्रेजों ने जब यहाँ हमला किया, तो उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के अन्तर्गत जयन्तियापुर को पहाड़ी और मैदानी भागों में बाँट दिया। इसी के साथ उन्होंने निर्धन वनवासियों का धर्मांतरण करना भी प्रारम्भ कर दिया। राज्य के शासक ने अंग्रेजों के भयवश इस विभाजन को मान लिया, पर जनता और मन्त्रिपरिषद ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने राजा के बदले उ कियांग नंगबाह को अपना नेता चुन लिया। उ कियांग नंगबाह ने जनजातीय वीरों की सेना बनाकर जोवाई क्षेत्र की ओर बढ़ रहे अंग्रेजों का मुकाबला किया और उन्हें पराजित कर दिया। पर अंग्रेजों की शक्ति असीम थी। उन्होंने 1860 में सारे क्षेत्र पर दो रुपये कर के रूप में लगा दिया। जयंतिया समाज ने इस कर का विरोध किया और इसी कारण उ कियांग नंगबाह की अगुवाई में वहां के लोगों ने मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उ कियांग नंगबाह की बात करें तो वह वीर योद्धा के साथ-साथ एक अच्छे बाँसुरीवादक भी थे। वह बाँसुरी की धुन के साथ लोकगीत गाते थे। इस प्रकार वह अपने समाज को तीर और तलवार उठाने का आह्नान करते थे। अंग्रेज इसे नहीं समझते थे पर स्थानीय लोग इस कारण संगठित हो गये और वेे हर स्थान पर अंग्रेजों को चुनौती देने लगे।
अब अंग्रेजों ने कर वसूली के लिए कठोर उपाय अपनाने प्रारम्भ किये तो उ कियांग नंगबाह के आह्नान पर किसी ने कर नहीं दिया। इस पर अंग्रेजों ने उन सीधे-साधे लोगों को जेलों में ठूँस दिया। इतने सब संघर्ष के बाद भी उ कियांग नंगबाह उनके हाथ नहीं लगे। वह गाँवों और पर्वतों में घूमकर देश के लिए मर मिटने को समर्पित युवकों को संगठित कर रहे थे। धीरे-धीरे उनके पास अच्छी सेना हो गयी। उ कियांग नंगबाह ने योजना बनाकर एक साथ सात स्थानों पर अंग्रेज टुकड़ियों पर हमला बोला। सभी जगह उन्हें अच्छी सफलता मिली। यद्यपि वनवासी वीरों के पास उनके परम्परागत शस्त्र ही थे; पर गुरिल्ला युद्ध प्रणाली के कारण वे लाभ में रहे। वे अचानक आकर हमला करते और फिर पर्वतों में जाकर छिप जाते थे। इस प्रकार 20 माह तक लगातार युद्ध चलता रहा।अंग्रेज इन हमलों और पराजयों से परेशान हो गये। वे किसी भी कीमत पर उ कियांग नंगबाह को जिन्दा या मुर्दा पकड़ना चाहते थे। उन्होंने पैसे का लालच देकर उनके साथी उदोलोई तेरकर को अपनी ओर मिला लिया। उन दिनों उ कियांग नंगबाह बहुत घायल थे उनके साथियों ने इलाज के लिए उन्हें मुंशी गाँव में रखा हुआ था। उ कियांग नंगबाह के मित्र उदोलोई ने अंग्रेजों को यह सूचना दे दी, फिर क्या था? सैनिकों ने साइमन के नेतृत्व में मुंशी गाँव को चारों ओर से घेर लिया। उस समय उ कियांग नंगबाह की स्थिति लड़ने की बिल्कुल नहीं थी। इस कारण वह साथी नेता के अभाव मेंअंग्रेजों के सामने टिक नहीं सके। फिर भी उन्होंने समर्पण नहीं किया और युद्ध जारी रखा। अंग्रेजों ने घायल उ कियांग नंगबाह को पकड़ लिया।
उन्होंने प्रस्ताव रखा कि यदि तुम्हारे सब सैनिक आत्मसमर्पण कर दें, तो हम तुम्हें छोड़ देंगे, पर वीर उ कियांग नंगबाह ने इसे स्वीकार नहीं किया। अंग्रेजों के अमानवीय अत्याचार भी उनका मस्तक झुका नहीं पाये। अंततः अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह के कारण उन्हें 30 दिसंबर 1862 को पश्चिम जयंतिया जिले के जोवाई शहर के उसममियंग में सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई। 30 दिसंबर, 1862 की शाम को जब उन्हें फांसी पर चढ़ाया जा रहा था, तो उ कियांग नंगबाह ने कुछ भविष्यवाणी करते हुए कहा, “भाइयों और बहनों, कृपया मेरे चेहरे पर ध्यान से देखें जब मैं फांसी पर मर जाऊं। यदि मेरा चेहरा पूर्व की ओर मुड़ता है, तो मेरा देश (खासी जयंतिया) अगले 100 वर्षों में विदेशी शासन से मुक्त हो जाएगा और यदि यह पश्चिम में बदल जाता है, तो यह अच्छे के लिए बंधन में रहेगा। भारत सरकार द्वारा सन 2001 में एक डाक टिकट भी उनकी याद में जारी किया गया। उनकी बहादुरी के किस्से हमारे दिलों में हमेशा रहेंगे।

मेघालय की लोक कथाओं और मिथकोंमें राम कथा का प्रसंग

डॉ अनीता पंडा

डा. अनीता पंडा, सम्पादिका, का जिंग्शई अर्थात ज्योति

Srinivas Sopurav

श्रीराम कथा में ऐसी दर्शन और भावुकता की स्त्रोतस्विनी प्रवाहित होती है, जो सम्पूर्ण मानव समुदाय को भक्ति-भाव से आप्लावित कर देती है। श्रीराम केवल अयोध्या के राम नहीं अपितु जन-जन के राम हैं। तभी तो रसमयी राम कथा ने देववाणी से विभिन्न भाषों से होती सुदूर जनजातीय संस्कृति एवं आस्था तक की यात्रा तय किया है। “सियाराम मय सब जग जानि, करहू प्रणाम जोरि जुग पानी।” यह समस्त जग सिया राम मय है, दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए रामकथा सागर से किंचित मौक्तिक-कण मेघालय के जनजातीय क्षेत्र से प्राप्त करने का प्रयास मात्र है। जय श्रीराम!
जैसा कि सर्वविदित है कि राम कथा भारत की विविध भाषाओँ में लिखी गई। यहाँ तक की देश की सीमाओं को पार का विदेशों में भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम के प्रसंग एवं साक्ष्य मिलते हैं। देववाणी संस्कृत से लेकर लोक भाषों एवं बोलियों में राम कथा का प्रसंग प्राप्त होता है। राम कथा के संदर्भ में मुख्य रूप से संस्कृत में ‘रामायण’ और तुलसीदास कृत ‘रामचरित मानस’ ज्यादा चर्चित एवं लोकप्रिय हैं। वाल्मीकि के राम ऐतिहासिक तथा मानवीय रूप है जबकि तुलसी के राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। राम कथा में निहित मूल्य प्रासंगिक है। कारण, आज की विषम परिस्थितियों में अपने नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों को समावेशित करने के लिए यह एक ऐसी राम कथा की धारा है, जो शक्ति, शील और सौन्दर्य से पूर्ण निराश मन को आशा का संचार करती है।
भक्ति आन्दोलन के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो “श्रीमद्भागवत” की रचना से पहले ही दक्षिण भारत में भक्ति धारा प्रवाहित थी, जो कालान्तर में भारत में फ़ैल गई। दक्षिण के आलवार और नायनर भक्तों का प्रभाव सम्पूर्ण भक्ति साहित्य पर पड़ा। “श्रीमद्भागवत” में व्यास महर्षि ने भक्ति के मुख से यह कहलवाया है कि मैं द्रविड़ प्रदेश में उत्पन्न हुई, कर्नाटक में बड़ी हुई; महाराष्ट्र में कुछ दिन निवास करने के पश्चात गुजरात में वृध्दा हुई।
उत्पन्ना द्राविडेचाहं कर्नाटे वृद्धिमागता।
स्थिता किन्चिन्महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णामता। ।
कबीर ने भी इसी तथ्य को स्वीकारते हुए कहा है –
भक्ती द्रविड़ उपजी, लाए रामानंद।
परगट किया कबीर ने, सात द्वीप नौ खण्ड। ।
हिंदी का भक्ति साहित्य यह प्रमाणित करता है कि भक्ति अपने कथन के डेढ़ हजार साल बाद पूरे युवा उत्साह के साथ उत्तर भारत में आई और उसने अपने भव्य भावधारा से उसने जन सामान्य को मन्त्र-मुग्ध कर लिया। भक्ति इस निर्मल रसमयी धारा ने हिंदी भाषी प्रदेशों को आप्लावित किया और गौडीय-वैष्णव संतों द्वारा असम के संत शंकरदेव और उनके शिष्य माधवदेव को भावमग्न करती हुई सुदूर पूर्वोत्तर भारत को अपने रंग में रंग लिया। मेघालय भी इससे अछूता न रहा। यहाँ राम कथा के प्रसंग प्रतीक के रूप में तथा मिथकों, लोक कथाओं के रूप में मिलता है।
प्रागैतिहासिक काल में मौन-खमेर बोलने वाले खासी और जैंतिया पहाड़ियों में खासी और पनार के रूप में स्थापित किया। मेघालय राज्य में मुख्य रूप से खासी, गारो और जैंतिया भाषा और बोली है परन्तु इन भाषाओँ को बोलने वाले बड़ी संख्या में असम राज्य के निवासी हैं। इनमें से खासी भाषा मेघालय के खासी और जैंतिया पहाड़ियों पर रहने वाली खासी-जैंतिया जनजातियों द्वारा बोली जाती है। गारो पहाड़ियों में रहने वाले गारो आदिवासियों की भाषा गारो है। इनका स्वधर्म, परम्परा एवं संस्कृति थी। स्वतंत्रता के संघर्ष के पश्चात सन् 1757 में खासी-जैंतिया तत्पश्चात गारो क्षेत्र अंग्रेजों के आधिपत्य में आ गया और मिशनरी का प्रभाव इनके मूल आस्था पर प्रहार किया परिणामस्वरूप तेजी धर्मांतरण हुआ। साथ ही इस क्षेत्र में ब्रिटिश शासकों ने इनके पारम्परिक रीति-रिवाज एवं अनुष्ठानों पर रोक लगा दिया था। कालांतर में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के उपरांत शिक्षित युवा वर्ग में अपनी मूल संस्कृति एवं रीति-रिवाजों आदि के प्रति जागरूकता आई। ‘बाबू जीबोन रॉय’ की अध्यक्षता में सोलह खासी युवकों सहित २३ नवम्बर १८९९ में अपने मूल संस्कृति और परम्पराओं के पुनर्जीवन हेतु ‘सेंग सामला खासी’ संस्था की स्थापना की। बाबू जीवन रॉय, खासी भाषा के पहले विद्वान थे जिन्होंने रामायण का खासी भाषा में अनुवाद किया। इसी प्रकार एल. एस. पॉल और सुलेनट लैमार ने राम कथा का अनुवाद भारतीय संस्कृति में अमूल्य योगदान दिया।
मेघालय की जैंतिया पहाड़ियों की जैंतिया या पनार जनजतियों में राम कथा के दो प्रसंग मिलते हैं। कहते है कि ‘जैंतिया पहाड़ियों में अर्थात् ‘हिमा शेल्ला’ के ‘री वार’ में वा या उम सियेज नदी है। वा या उम का अर्थ पानी है। वहाँ एक स्थान है जिसे ‘सिंगोह उराम’ के नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ है – राम का जल। मिथक के अनुसार श्री राम सीता की खोज करते हुए ‘री वार’ आए थे। वे अत्यंत व्याकुल थे। उन्होने स्वयं को शांत करने के लिए इस नदी में डुबकी लगाईं थी। वहाँ एक पत्थर पर एक चूहे और तितली के निशान मिलते हैं। राम कथा से सम्बंधित दूसरा प्रसंग ‘सीता हरण’ से है। कुछ लोगों का मानना है कि जब रावण सीता का हरण करके ले जा रहा था तो सीता ने यहाँ स्वयं को उसकी पकड़ से मुक्त करने प्रयास किया। १ जैंतिया समुदाय के अधिकतर लोग अपना मूल धर्म मानते हैं। आज भी यहाँ परिवार के बड़े बेटे का नाम ‘राम’ और छोटे बेटे का ‘लखन’ और बेटी का नाम ‘दुर्गा’ रखने की परम्परा है। ध्यातव्य है कि “लखन”शब्द अवधी भाषा का है, जो पूर्वोत्तर के जनजातीय क्षेत्र में प्रचलित है। खासी, जैंतिया पहाडियों से होती हुई राम कथा के मिथकीय प्रसंग गारो पहाड़ियों से जुड़ती है। ध्यातव्य है कि गारो पहाड़ियों में स्थित बाल्पक्रम पठार धर्मांतरण के पूर्व गारो जनजातियों और हिन्दुओं के लिए एक पवित्र तीर्थ स्थल था। बाल्पक्रम पठार बाघमारा मुख्यालय से लघभग 50 कि.मी. दूरी पर स्थित है। इसे सन् 1988 में ‘राष्ट्रीय उद्यान और वन्य पशु अभ्यारण्य घोषित किया गया है। यह पठार हनुमान की संजीवनी बूटी की खोज से सम्बंधित है। स्थानीय लोग रामायण के इस प्रसंग को ज्यादा महत्व देते हैं। ‘श्री एच ए मराक के अनुसार – एक समय बाल्पक्रम एक पवित्र पर्वत था। यहाँ संजीवनी बूटी उगती थी, जो जीवन रक्षक थी। स्थानीय लोगों के अनुसार जब लक्ष्मण लंका में मेघनाद से युध्द करते हुए गंभीर रूप से घायल हो गए और वे मूर्च्छित हो गए थे। उनके प्राण संकट में पड़ गए थे, तब लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए लंका के वैद्यराज सुषेन ने हनुमानजी को सूर्योदय से पहले संजीवनी बूटी लेन के लिए कहा। पुराण के अनुसार हनुमानजी ने पूरे विश्व की परिक्रमा किया परन्तु उन्हें संजीवनी बूटी नहीं दिखाई दी। अंत में उन्हें गारो पहाड़ियों में बाल्पक्रम पर्वत पर संजीवनी बूटी दिखाई दी। समय बहुत कम था और सूर्योदय होने वाला था। उन्होंने पहाड़ के ऊपरी भाग तोड़ लिया और मुर्च्छित राजकुमार की रक्षा के लिए शीघ्रता से लौट आए। ’२ इस प्रकार संजीवनी बूटी के उपचार से लक्ष्मण जी स्वस्थ हो गए। स्थानीय लोगों के अनुसार तब से बाल्पक्रम की पहाड़ी का ऊपरी भाग टूटने के कारण यह सपाट मेज या पठार के समान हो गया।
डॉ जुरियस एल. आर. मराक, संग्रहालय वैज्ञानिक, निदेशक क़ला, संस्कृति, मेघालय सरकार के अनुसार रामायण में वर्णित ‘गंधमादन पर्वत’ और कहीं नहीं बल्कि गारो पहाड़ियों में बाल्पक्रम चोटी है। पुराने ज़माने में हिन्दू तीर्थयात्री दूसरे देशों और पड़ोसी देशों से यहाँ वर्ष में एक बार श्रध्दा से आते थे। कुछ वर्ष तक मयमनसिंह के राजवंश (आज बांग्लादेश में) शाही परिवार साल में एक बार यहाँ तीर्थ के लिए आते थे और कुछ दिनों के लिए यहाँ रुकते थे।
इसके अतिरिक्त यहाँ कुछ ऐसे साक्ष्य मिलते हैं जिससे यह ज्ञात होता है कि यहाँ कभी हिन्दू धर्म के अनुयायी रहते थे। आज गारो जनजातियों ने लगभग ९९ प्रतिशत लोगों ने अपना मूल धर्म छोड़ धर्म परिवर्तन (ईसाई धर्म) कर लिया है। ध्यातव्य है कि यहाँ आस-पास कोई हिन्दू परिवार नहीं रहता है, ऐसी जगह में महेशखोला मंदिर गारो, खासी पहाड़ियों और बांग्लादेश के बीच स्थित है। इस वीराने में हिन्दू मन्दिर का होना कई सवाल पैदा करता है। वहाँ बहने वाली पाँच समानांतर नदियाँ, जो कि बाल्पक्रम में बहती हैं, उनमें से चार नदियों के नाम हिन्दू धर्म से सम्बंधित हैं। उन चार नदियों के नाम हैं – महादेव नदी, जो महादेव भगवान पर आधारित, महेशखोला नदी – भगवान महेश पर आधारित, उसके बाद गणेशवारी नदी, जो शिव के पुत्र गणेश पर आधारित और कनाई नदी, जो नागों के देवता नाग कन्या पर आधारित है। इनमें से केवल एक नदी है जिसका नाम स्थानीय नाम “चिमिते” है। यह ना’वा के नाम से भी जानी जाती है, इसका अर्थ है – देव नदी। इससे यह अनुमान लगा सकते हैं कि वहाँ किसी समय हिन्दू रहते थे या पूजा करते थे और यह एक पवित्र क्षेत्र माना जाता रहा होगा।
बाल्पक्रम के उत्तर-पश्चिम से थोड़ी दूर पर सनितमंग या विमोंग की पहाड़ियों पर हिन्दुओं की श्रध्दा है। वे इसे भगवान शिव के घर कैलाश के नाम से पुकारते हैं। श्री हेल्सिंग एस. संगमा ने ईसा पूर्व गारो पहाड़ियों के जनजातियों पर पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के हिन्दुओं का ऐतिहासक एवं सांस्कृतिक प्रभाव का वर्णन किया है। श्री देवानसिंग एस. रोंगमुत्हू ने गारो जनजातियों की सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण के प्रति अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है कि बाल्पक्रम और उसके आस-पास का क्षेत्र मादी-रोंग-कुची (महादेव नदी का स्त्रोत) में प्राचीन गारो समुदाय रहता था। मादी-रोंग-कुची बहुत ही उन्नत और समृध्द क्षेत्र था। यह उस समय की बात है जब स्वर्ग और पृथ्वी अलग-अलग नहीं थे और धरती पर साधारण मनुष्य का नहीं अपितु देवताओं का निवास था।
निष्कर्षत: इन मिथकों एवं जनश्रुतियों में वर्णित राम कथा सत्यापन हेतु शोध आवश्यक है।
यह एक आस्था का प्रश्न है, जो समय के गर्त में विषम परिस्थितियों में धूमिल अवश्य हो गईं थी परन्तु राम की भक्तिमय धारा मेघालय के गारो, खासी और जैन्तियाँ पहाड़ियों पर सदैव ही प्रवाहित हो रही थी। इसका मुख्य कारण है मेघालय में तेजी से होता धर्मांतरण। इस सत्य से इंकार नहीं किया जा सकता है यह एक ऐसी अनन्त भक्ति की धारा है जिसने पूरे देश को एक सूत्र में पिरो दिया है। अंत में – “हरि अनंत, हरि कथा अनंता”– अर्थात् हरि अनंत है और हरि की कथा भी अनंत है।

शिलाँग में मेरा प्रथम दिन

स्वामी योगात्मानन्द, वेदान्त सोसायटी आफ प्रोविडेन्स, अमेरिका

स्वामी योगात्मानन्द वेदान्त सोसाइटी आफ प्रोविडेन्स के मंत्री एवं अध्यक्ष हैं। ये 1976 में रामकृष्ण मिशन में शामिल हुए और 1986 में संन्यास की दीक्षा ली। 20 वर्ष तक रामकृष्ण मिशन नागपुर, में कार्य करने के उपरांत रामकृष्ण मिशन शिलांग मेघालय, के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे। तदुपरांत आप सन् 2001के ग्रीष्म ऋतु में अमेरिका में वेदांत सोसायटी आफ प्रोविडेन्स के मंत्री के पद पर आए।

स्मृतियों के झरोखे में बासन्ती हवा ने बादलों की पाती भेज रामकृष्ण मिशन शिलांग द्वारा प्रकाशित अंतर्राष्ट्रीय ई पत्रिका ‘का जिंग्शई अर्थात ज्योति’, द लाइट के लिए कुछ शब्द-मुक्ताओं को पिरोने का दायित्व दिया है। आज स्मृतियों के पन्ने पलटता हूँ और वर्तमान से अतीत में जा मेघालय की राजधानी शिलांग में अपने प्रथम दिवस की अनुभूतियों को आपके साथ आत्मसाथ करता हूँ।
गुरुवार, दि. २९ फरवरी १९९६ (जो कि चार सालों में एक ही बार आनेवाली तारीख़ है)। सुबह करीब ९ बज रहे थे। नागपुर, रामकृष्ण मठ के प्रकाशन विभाग के कार्यालय में मैं कुछ १५ – २० मिनट पेहले पहुचाँ था; और भी एक या दो मठवासी संन्‍यासी आ गये थे, कुछ वेतन भुक्त कर्मचारी भी मौजूद थे। कई दैनिक गतिविधियाँ – पुस्तकों की छपाई, प्रूफ रीडिंग कई लोगों से पत्रव्यवहार, इत्यादि – जारी थी, कि बेलुर मठ से फोन आया। श्रद्धेय आत्मस्थानानन्द जी, जो उन दिनों जनरल सेक्रेटरी थे, मुझ से बात करना चाहते थे। “साष्टांग प्रणाम, महाराज”, मैंने कहा।
वैसे तो इस प्रकार के फोन की अपेक्षा कुछ दिनों से थी ही। नागपुर के मठ से मेरा तबादला लगभग निश्चित ही था; किन्तु सिवा मेरे, इसकी भनक वहाँ अन्य किसी को भी नहीं थी। जब श्रद्धेय आत्मस्थानानन्द जी ने बताया कि मुझे शिलाँग के आश्रम का मुख्य बनाकर भेजा जा रहा है, तो मैं बिल्कुल चौंक गया। क्या कहूँ, क्या ना कहूँ, कुछ भी नहीं सूझ रहा था। दो – तीन मिनट बात हुई, कुछ और समाचार देकर उन्होंने फोन रख दिया।


शुक्रवार दि. मार्च २२, १९९६। प्रातः ११ बजे नागपुर से मेरी यात्रा प्रारंभ हुई – हावड़ा मेल से। दूसरे दिन बेलुड़ मठ-स्थित रामकृष्ण मठ – मिशन के मुख्यालय में पहुँच कर शिलाँग आश्रम का कार्यभार सम्हालने का अधिकार – पत्र व अन्य आवश्यक कागजाद लिये। दूसरे दिन प्रेसिडेंट महाराज परमपूज्य भूतेशानन्द जी महाराज से मुलाकात हुई। वे शिलाँग आश्रम के प्रथम प्रमुख थे। उन्होंने भूरि-भूरि आशीर्वाद दिया। अन्य वरिष्ठ सन्यासी, जो कि शिलाँग आश्रम में पहले कार्यरत थे उनसे भी परामर्श लिया। और सोमवार २५ मार्च को आकाश मार्ग से गुवाहाटी पहुँच गया। वहाँ शिलाँग आश्रम से स्वामी हृदानन्द जी हवाई अड्डे पर आये थे। रास्ते में रुखकर कामाख्या-पीठ का दर्शन कर और गुवाहाटी के नितान्त-सुंदर आश्रम मे रात बिताकर दूसरे दिन सुबह शिलाँग के लिये हम रवाना हुए। मैं, हृदानन्द जी और ड्राईवर। रास्ते में एक गणेश मंदिर में दर्शन किया। आनेवाले लगभग चार सालों में शिलाँग – गुवाहाटी – शिलाँग की अनगिनत यात्राएँ हुई, प्रायः हर बार यहाँ गणेश जी के दर्शन कर ही आगे बढ़ना होता था। ठीक सुबह ११.२५ को गाड़ी शिलाँग आश्रम में पहुँच गयी। श्रद्धेय रघुनाथानन्द जी (आश्रम प्रमुख जो मुझे कार्यभार सौप देने वाले थे), श्रद्धेय गणनाथानन्द जी, समचित्तानन्द जी और कई साधु-बर्ह्मचारियों ने हृदयपूर्वक स्वागत किया।
तो इस प्रकार २६ मार्च १९९६ को मेरा शिलाँग जीवन प्रारम्भ हुआ। हाँ, एक और बात तो लिखना भूल ही गया था। शिलाँग में और गुवाहाटी से शिलाँग आते समय जो सुरम्य पर्वतों के बीच से गाडी चलती है, वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन तो मैंने कई प्रत्यक्ष-दर्शियों से सुना था किन्तु ‘सुनना’ और प्रत्यक्ष देखना इस में कितना अंतर होता है! वह दृश्य अद्भुत था विशेष कर जब गाड़ी उमियाम (बड़ा पानी) से गुजर रही थी तो अनिमेष दृष्टि से उस सुंदरता का पान कर रहा था फिर आने वाले चार वर्षोँ में न जाने कितने बार उस दृश्य को अतीव आनन्द से, कितने ही रंगों में देखा।
शिलाँग आश्रम का मंदिर तथा परिसर भी अति सुंदर और साफ़-सुथरा था।
मुझे उसी कमरे में रहना था, जहाँ परम पूज्य भूतेशानन्द जी से लेकर सभी आश्रम-प्रमुख निवास करते थे। उस कमरे से लगे बरामदे में मैं, रघुनाथानन्द जी तथा अन्य सब बैठकर सामान्य बातचीत कर रहे थे। मुझे एक कटोरी में कुछ प्रसाद दिया गया। आनंद से उसे खाकर मैं हाथ-मुँह धोने के लिये बाथरूम में गया – और…
शिलाँग पहुँचने से पहले बेलुर मठ में कई पुराने संन्यासियों ने वहाँ की समस्याएँ बतायी थीं। पूज्य प्रमेयानन्द जी ने विशेष आग्रह के साथ कहा था कि वहाँ सारे इलाके में, विशेषकर अपने आश्रम में, पानी की बहुत बड़ी समस्या है; देखो यदि तुम उसके लिये कुछ कर सको तो बहुत अच्छा होगा। जब मैं अब शिलाँग के बाथरूम में पहुँचा तो वहाँ किसी नल से पानी नहीं आ रहा था। एक महाराज जी जल्दी से कहीं से थोड़ा पानी लाए। पूज्य प्रमेयानन्द जी के कथन का मेरे पहुँचते ही प्रमाण मिल गया। इस समस्या का हल करना मेरी प्राथमिकता बन गई ।


शिलाँग में प्रथम दिन ही सायंकाल को ‘विवेकानन्द कल्चरल सेन्टर’ मे जाने के लिये श्रद्धेय रघुनाथानन्द जी के साथ निकला। इसके पहले लाइब्रेरी, लेक्चर हाल, स्टूडेण्ट्स होस्टेल इत्यादि सारा उन्होंने घूम कर दिखाया। (इन में होस्टल, साधू-निवास और रसोई – भोजन – कक्ष अब बड़ा ही विस्तृत और सुंदर बना है; १९९६ में या २००० में – जब मेरा शिलाँग से तबादला हुआ – वह इतना अच्छा नहीं था। ) जाते समय से पहले पाँच मिनट डिस्पेन्सरी देखी (वह भी अब बहुत बड़ी हुई है)। जीप में बैठकर जब हम जा रहे थे, तो श्रद्धेय रघुनाथानन्द जी अपने विनोद-गर्भ, सुंदर शैली में आश्रम के विविध कार्य, उनकी पृष्ठभूमि, आश्रम के समर्पित भक्त, इन सब के सम्बन्ध में जानकारी दे रहे थे।
पुलिस बाज़ार, जहाँ आज ‘विवेकानन्द कल्चरल सेन्टर’ के नाम से विख्यात संस्था है, मानो शिलाँग का केंद्र बिंदु था, हृदय था। उन दिनों ‘विवेकानन्द कल्चरल सेन्टर’ यह नाम कोई नहीं जानता था – उसे ‘क्विण्टन हाल’ कहते थे। पहुँच कर देखा – मकान की स्थिति डाँवाडोल थी और देखने में भी भद्दी। समचित्तानन्द जी – जो वहाँ की गतिविधियाँ देखते थे – हमें सीढ़ी से ऊपर देवघर में ले गये। सीढ़ी लड़खड़ाते हुए मानों कह रही थी – ‘मुझे भी मरम्मत की सख्त जरूरत है।’ तब स्मरण हुआ कि श्रद्धेय आत्मस्थानानन्द जी की उस सूचना का, जो तीन दिन पहले बेलुर मठ में मुझे दी थी। रामकृष्ण संघ के जनरल सेक्रेटरी के नाते उन्होंने बताया था की यद्यपि बरसों की न्यायिक लड़ाई के बाद इस क्विण्टन हाल पर रामकृष्ण मिशन का अधिकार हो तो गया है, परन्तु कुछ प्रशासकीय अवरोधों के कारण वह जायदाद अभी भी हमारे नाम पर दर्ज नहीं हुई है। और इसी कारण उस स्थान का नवीनीकरण/ पुननिर्माण नहीं हो रहा है। मुझे शिलाँग पहुँच कर इस काम को तेजी से आगे बढ़ाना होगा।
वहाँ से लौटते समय श्रद्धेय रघुनाथानन्द जी ने बताया कि स्वामी विवेकानन्द जी के संस्पर्श से पुनीत हुआ यह स्थान, रामकृष्ण मिशन को मिल तो गया है; किन्तु मेघालय की सरकार अभी भी उसे अपने हाथ करना चाहती है। इसीलिये यहाँ का प्रशासन अभी भी इसके पन्जीकरण में कई बाधाएँ डाल रहा है। अब तुम कोशिश करो – कुछ मार्ग ढूँढ निकालो।


क्विण्टन हाल से लौटकर आया और आरती में शरीक हुआ। छात्रवास के बच्चे सुंदर आरती गान कर रहे थे। ४ – ६ भक्त भी उपस्थित थे। एक ‘चकमा’ छात्र – सुजय उसका नाम – बड़ी खूबी से तबला बजा रहा था। सभी छात्रों को संगीत का स्वयंप्रेरित ज्ञान था। आरती के उपरान्त कुछ भक्तों से चंद क्षण वार्तालाप हुआ। मंदिर में श्रीरामकृष्ण देव की मूर्ति रात के मंद प्रकाश में अत्यंत सुंदर दिखाई दे रही थी। रात्रि का भोजन हुआ – तब शिलाँग की ठंड का एक और प्रभाव दिखाई दिया। भोजन परोसते-परोसते ही ठण्डा हो जाता था। क्या करे ? सोचा – अब ऐसा ही भोजन करने अभ्यास बनाना होगा। जैसी रात बढ़ती गयी, ठंड भी बढ़ने लगी। मार्च के अन्त में इतने ठंड की मुझे अपेक्षा नहीं थी। जल्द ही मैंने सामान को खोलकर एक स्वेटर और टोपी पहन लिया और आते समय श्रद्धेय रघुनाथानन्द जी ने जो एक सुंदर ऊनी शाल दी थी (जिसका उपयोग मैं यहाँ अमेरिका में पच्चीस सालों के बाद भी कर रहा हूँ ) उसे ओढ़ लिया। सब साधुओं से कुछ वार्तालाप हुआ और मैं सोने के लिये चला गया।
नींद ठीक से नहीं आ रही थी कारण एक ओर बढ़ती ठंड और दूसरी ओर जोर से चलने वाली हवा की आवाज। सब कुछ नया अनुभव था। चंद दिनों में इस से अभ्यस्त हो गया।
इस प्रकार शिलाँग का प्रथम दिन कई नयी बातें सीखते – सीखते आनन्द पूर्वक गुजर गया। आने वाले चार वर्ष चुनौती पूर्ण थे। उन दिनों की स्मृतियाँ शेष हैं…पुनश्च