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लघुकथा

प्रहार

नीता शर्मा   |   Autumn 2026

 
      “अरे रघु भाई! क्या कलाकृतियाँ बनाते हो, लगता है अभी बोल पड़ेंगी।”
“सच में साहब! जादू है आपकी हथौड़ी और छेनी में! पत्थर भी जीवित हो उठते हैं।”

प्रदर्शनी के आयोजन में अपनी मूर्तियों की प्रशंसा सुन-सुनकर शिल्पकार रघुनाथ भावविभोर हो रहा था। देश का सुप्रसिद्ध शिल्पी, अनगिनत पुरस्कार और सम्मानों से पुरस्कृत। अपनी कला की आलोचना न सुन पाता और नए शिल्पकारों को भी हीन दृष्टि से देखता। अपने नाम और काम का अभिमान सर चढ़कर बोलने लगा था। आज भी प्रदर्शनी में उसकी मूर्तियों के लिए लाखों रुपये का मोलभाव चल रहा था। तभी एक संभ्रांत महिला का अपनी बेटी के साथ आगमन हुआ। बेटी एक नर्तकी की सुंदर मूर्ति पर आकर रुक गई और बहुत देर तक एकटक उसको सर से पांव तक निहारती रही। 
“लगता है नृत्यांगना को नर्तकी भा गई।” बेटी की ओर मुस्कुराकर देखते हुए महिला ने मूर्ति का मोल पूछा।
“दो लाख सत्तर हजार रुपये, मैडम!” रघुनाथ के सहायक ने गर्व से कहा और लगा मूर्ति के कसीदे पढ़ने, 
“इस मूर्ति को बनाने में साहब को पूरे दो साल लगे हैं। आप ध्यान से देखिए इसे, इसके आभूषण, आँखों का सम्मोहन, हाथों की ये मुद्रा और होठों की यह मुस्कान! ऐसा लगता है जैसे जीवंत हो अभी थिरक उठेगी।”
“नहीं! यह नर्तकी चाहकर भी थिरक नहीं पाएगी। इसके दाहिने पैर को ध्यान से देखो,  टेढ़ा है!”
ये सुनकर आस पास खड़े लोग स्तब्ध हो गए। 
बच्ची के ये शब्द रघुनाथ के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर गए। 
“चटाक!”
रघुनाथ के हाथ में पकड़े हथौड़े के प्रहार से मूर्ति के टूटने की आवाज हॉल में गूँज उठी।
दूर खड़े एक व्यक्ति ने पूछा,
“अरे! ये क्या टूटा?”
उसके पास खड़ा एक शिल्पकार मुस्कुराकर धीरे से बोला,
“दंभ!”


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नीता शर्मा