एक बार क्या हुआ कि किसी चिड़िया को मिला मोती। एक कौवे ने छीन लिया और वह ऊँचे पेड़ पर अपने घोंसले में जाकर बैठ गया।
“अरे! मेरा मोती दे ना!” चहचहाती हुई चिड़िया बोली।
“मैं नहीं देता, जा!” कहते हुए कौवे ने उसे दुत्कार दिया।
फिर चिड़िया पेड़ से बोली, “पेड़-पेड़, कौवे का घोंसला गिरा दे रे, गिरा दे रे।”
पेड़ बोला, “मैं नहीं, जा।”
फिर चिड़िया गई बढ़ई के पास; बोली, “बढ़ई-बढ़ई, पेड़ काट रे।”
बढ़ई बोला, “मैं नहीं, जा।”
फिर चिड़िया गई राजा के पास; बोली, “राजा-राजा, बढ़ई को दंड दे रे।”
राजा बोला, “मैं नहीं, जा।”
तब चिड़िया गई रानी के पास; बोली, “रानी-रानी, राजा से रूठ जा न।”
रानी बोली, “मैं नहीं, जा।”
फिर चिड़िया गई चूहे के पास; बोली, “चूहे-चूहे, रानी की साड़ी कुतर दे रे।”
चूहा बोला, “मैं नहीं, जा।”
फिर चिड़िया गई बिल्ली के पास; बोली, “बिल्ली-बिल्ली, चूहे को खा रे।”
बिल्ली बोली, “मैं नहीं, जा।”
इस पर चिड़िया गई कुत्ते के पास; बोली, “कुत्ते-कुत्ते, बिल्ली को मार रे।”
कुत्ता कहता है, “मैं नहीं, जा।”
वह चिड़िया गई लाठी के पास; बोली, “लाठी-लाठी, कुत्ते की पीठ पर मार न।”
लाठी बोली, “मैं नहीं, जा।”
वहाँ से चिड़िया आई आग के पास; बोली, “आग-आग, लाठी को जला दे रे।”
आग बोली, “मैं नहीं, जा।”
तब चिड़िया समुद्र के पास आकर बोली, “समुद्र-समुद्र, आग बुझा दे रे।”
समुद्र बोला, “मैं नहीं, जा।”
तब चिड़िया हाथी से बोली, “हाथी-हाथी, समुद्र को उथल-पुथल कर दे रे।”
हाथी बोला, “मैं नहीं, जा।”
वहीं पर एक लाल चींटी थी। उससे चिड़िया बोली, “चींटी-चींटी, हाथी के कान में काट ले न।”
चींटी बोली, “मैं न...”
“चींटी!” चिड़िया डपटकर बोली, “घुसती है हाथी के कान में या खाऊँ तुझे?”
चींटी बोली, “नहीं-नहीं, मैं हाथी के कान में काटती हूँ।”
हाथी बोला, “नहीं-नहीं, यह लो मैं समुद्र को उथल-पुथल करता हूँ।”
समुद्र बोला, “नहीं-नहीं, मैं आग बुझाता हूँ।”
आग बोली, “नहीं-नहीं, मैं लाठी जलाती हूँ।”
लाठी बोली, “नहीं-नहीं, मैं कुत्ते की पीठ पर मारती हूँ।”
कुत्ता बोला, “नहीं-नहीं, मैं बिल्ली को मारता हूँ।”
बिल्ली बोली, “नहीं-नहीं, मैं चूहे को खाती हूँ।”
चूहा बोला, “नहीं-नहीं, मैं रानी की साड़ी कुतरता हूँ।”
रानी बोली, “नहीं-नहीं, मैं राजा से रूठती हूँ।”
राजा बोला, “नहीं-नहीं, मैं बढ़ई को दंड देता हूँ।”
बढ़ई बोला, “नहीं-नहीं, मैं पेड़ काटता हूँ।”
पेड़ बोला, “नहीं-नहीं, मैं कौवे का घोंसला गिराता हूँ।”
कौवा बोला, “नहीं-नहीं, मैं चिड़िया का मोती देता हूँ।”
और इस तरह आखिरकार चिड़िया को उसका मोती वापस मिल गया।

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अपने बचपन में शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसका ऊपर दी गई कहानी से परिचय न हुआ हो और आगे के जीवन में इस कहानी के तात्पर्य का अनुभव जिसे कदम-कदम पर न मिला हो, ऐसा व्यक्ति तो अपवाद स्वरूप ही मिलेगा।
कठिनाई के समय लोग इसके-उसके पास न जाने कितने तरीकों से मदद माँगते रहते हैं। कितनी ही बार लोग अपनी शिकायतें और विनतियाँ अधिकारियों के सामने रखने जाते रहते हैं। लेकिन यह दिखाई देता है कि जिन्हें मदद मिलती है, उन्हें वह स्वबल के आधार पर ही मिली होती है। जिनके पास खुद की कुछ शक्तियाँ होती हैं और उन्हें एक विशिष्ट तरीके से उपयोग करने का कौशल भी होता है, उन्हीं की शिकायतों और विनतियों को सम्मान मिलता है; केवल याचना करने वालों की झोली में शायद ही कुछ गिरता है। हर किसी के पास कोई न कोई विशिष्ट शक्ति होती ही है। कमी होती है तो बस, उसे सही जगह पर सही तरीके से उपयोग करके इच्छित सफलता प्राप्त कराने वाली तकनीक की।
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‘अगर मुझे पृथ्वी के बाहर खड़े रहने के लिए थोड़ी सी जगह मिल जाए, तो मैं पृथ्वी को भी उठाकर दिखा दूँगा’ — ऐसा आर्किमिडीज ने अपने उत्तोलक के सिद्धांत (Principle of Lever) का सामर्थ्य बताते हुए कहा था। उत्तोलक की सहायता से सचमुच अत्यंत भारी वजन बिल्कुल थोड़ी सी शक्ति लगाकर उठाए जा सकते हैं; और इस ऊपर-ऊपर से चकित कर देने वाले चमत्कार के पीछे का रहस्य है — उत्तोलक का ‘टेकू’ (आलंब/Fulcrum)। यह टेकू जिस वजन को उठाना है उसके जितना संभव हो उतना पास होना चाहिए, वजन उठाने वाले से जितना संभव हो उतना दूर होना चाहिए और पर्याप्त मजबूत होना चाहिए। अगर सही जगह पर टेकू लगा दिया जाए, तो इस उत्तोलक के सिद्धांत की सहायता से एक दुर्बल मनुष्य भी हजारों टन वजन वाले जहाजों को उठा सकता है; जैसे — एक मामूली सी चिड़िया भी राजा को विवश कर सकती है।
— इतना ही नहीं, बल्कि सांसारिक बंधनों से चारों तरफ से जकड़ा हुआ जीव भी, ऊपर से अभेद्य लगने वाले उन बंधनों को तड़-तड़ तोड़कर मुक्त हो सकता है। मनुष्य की शक्ति आखिर कितनी हो सकती है? लेकिन कोई परवाह नहीं। अगर सही जगह पर टेकू दे दिया जाए और वह सही तरीके से लगा दिया जाए, तो इस शक्ति को चाहे जितना बढ़ाया जा सकता है और उसकी सहायता से जो चाहिए, वह सिद्ध किया जा सकता है।
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शिलाँग में घटी एक घटना का यहाँ स्मरण होता है। रामकृष्ण मिशन की ओर से महाविद्यालयीन छात्रों के लिए एक वाद-विवाद प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। प्रतियोगिता का सही विषय अब याद नहीं है। एक छात्र ने सशक्त शब्दों में सिद्धांत रखा कि हमारा ध्येय या आदर्श व्यावहारिक होना चाहिए; हवामहल जैसा ऊँचा, अव्यवहार्य आदर्श हो तो उसकी प्राप्ति नहीं हो पाएगी और फिर मन विफलता, अवसाद इत्यादि मनोविकारों से ग्रस्त हो जाएगा। इसलिए आदर्श व्यवहार्य हो, इतना उच्च न हो कि उसे व्यवहार में लाना असंभव हो।
इस तर्कयुक्त प्रतीत होने वाले कथन का खंडन करते हुए अगले छात्र ने कहा कि यदि आदर्श अत्युच्च न हो, तो उसे आदर्श नहीं कहा जा सकता; क्योंकि फिर उससे जो उच्च होगा, उसे आदर्श कहना होगा। यदि सर्वोच्च न हो, तो मन उसे एक आदर्श के रूप में स्वीकार ही नहीं कर सकता। इसके बाद उस छात्र ने कहा कि आकाश में महल जरूर बनाएँ और उसे आधार देने हेतु जमीन से मजबूत खंभे लगाएँ। सर्वोच्च आदर्श को व्यवहार में परिणत करना ही मनुष्य जीवन की विशेषता है। सर्वश्रेष्ठ आदर्श को व्यवहार में लाना संभव है— आदर्श में किसी प्रकार की तोड़-मरोड़ न करते हुए, ऊपर बताए गए उत्तोलक सिद्धांत (Principle of Lever) के उचित उपयोग से सर्वोच्च आदर्श निश्चित ही व्यवहार्य होगा।
भृगु ने फिर तप शुरू किया। शरीर, मन इत्यादि साधनों का टेकू और आगे खिसका, वैसे ही उनका बल और भी ज़्यादा बढ़कर उन्हें विश्व के रहस्य अधिक से अधिक सुलझते हुए प्रतीत होने लगे। अब भृगु के ध्यान में आया, “पदार्थ क्या और शक्ति क्या, सब अंततः मन का स्पंदन ही तो हैं! सब कुछ मन से ही उद्भूत होता है, मन में ही अवस्थित रहता है और मन में ही विलय पाता है—जैसे कि स्वप्न में घटित होता दिखता है। निश्चित ही मन ही ब्रह्म है।”
लेकिन मन की भी उत्पत्ति, स्थिति और लय होती रहती है; ऐसा दिखाई देने पर पुनः वरुण के पास आकर उन्होंने उनसे ब्रह्मज्ञान के लिए प्रार्थना की। वरुण ने अपने पुत्र को फिर से वही उपदेश दिया, “तप के द्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करो; तप को ही ब्रह्म समझो।”
फिर से तप करते-करते भृगु के ध्यान में आया कि मन सहित यह सारा विश्व विज्ञान से, अर्थात प्रत्येक वस्तु को उसका अलगपन, स्वतंत्रता या विशेषता प्रदान करने वाली जो चेतना है, उसी से जन्म लेता है; उसी में सदा अवस्थित रहता है और उसी में लय पाता है। यह विज्ञान ही ब्रह्म है।
लेकिन फिर से वही बात कि यह भेदज्ञान या विज्ञान भी भला कहाँ से आता है और कहाँ अवस्थित रहता है? ऐसी शंका आने पर वह फिर से पिता के पास आकर ब्रह्मज्ञान के लिए प्रार्थना करने लगे और पिता का वही पुराना उत्तर सुनकर पाँचवीं बार तप करने के लिए निकल पड़े।
टेकू और आगे खिसका। वही पूर्वपरिचित साधन। तप द्वारा आगे खिसकने वाले अपने टेकू पर आरूढ़ होने के कारण वे अधिक से अधिक बलशाली होते जा रहे थे। अज्ञान की एक के बाद एक परतें उस उत्तोलक के बल पर छटती जा रही थीं, और उसी के साथ उनके भीतर छिपा हुआ मूल ब्रह्मस्वरूप अधिक से अधिक प्रकट होता जा रहा था। अब तक इस प्रकार अज्ञान की अन्नमय, प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय परतें उतर चुकी थीं। अब उनके और परब्रह्म के बीच केवल एक महीन, पारदर्शी परदा ही शेष रह गया था।
अब अंत में वह भी हट गया। सारे तपों की पूर्णता (परिसमाप्ति) हो गई। साध्य की प्राप्ति हो जाने के कारण देह — मन — इंद्रियों आदि का साधनत्व भी स्वाभाविक रूप से समाप्त हो गया। भृगु ने पक्के तौर पर, पूरी तरह से जान लिया कि आनन्द ही ब्रह्म है। सब कुछ इसी आनन्द से ही उद्भूत होता है, उसी में अवस्थान करता है और उसी में प्रलीन होता है। यह आनन्द ही अस्तित्व है, वही चैतन्य है, वही सच्चिदानन्द है। उसका जन्म इत्यादि नहीं होता क्योंकि अस्तित्व ही मूल रूप से उसका स्वरूप है।
भृगु को फिर से पिता के पास जाने की आवश्यकता नहीं बची।
तैत्तिरीय उपनिषद की तृतीय वल्ली में यह आख्यायिका (कहानी) सुनाकर तपस्या के द्वारा, अर्थात शरीरादि उपलब्ध ज्ञान-साधनों की सामान्यतः अत्यंत क्षुद्र लगने वाली शक्ति को सही दिशा में उपयोग करने के द्वारा — ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कराने वाली इस विद्या को ‘वरुण द्वारा उपदेशित और भृगु द्वारा जानी गई’ ऐसी भार्गवी वारुणी विद्या नाम दिया गया है।
लोग कहते हैं कि इस पर विश्वास रखो और उस पर विश्वास रखो; लेकिन मैं कहता हूँ — पहले खुद पर विश्वास रखो। यही एकमात्र उपाय है। आत्मविश्वास बनाए रखिए; सारी शक्ति आप ही के भीतर है, यह जान लीजिए और उसे प्रकट कीजिए। कहिए कि सब कुछ कर पाने का सामर्थ्य मेरे भीतर है। ‘नहीं’, ऐसा मत कहिए; नकारात्मक विचारों को आश्रय मत दीजिए। कहिए कि ‘वह है, वह है — सोऽहं सोऽहम्’।”
किन्नाम रोदिषि सखे त्वयि सर्वशक्तिः,
आमन्त्रयस्व भगवन् भगदं स्वरूपम्।
त्रैलोक्यमेतदखिलं तव पादमूले,
आत्मैव हि प्रभवते न जडः कदाचित्॥
[मित्र! तुम भला क्यों रोते हो? तुममें ही तो सारी शक्ति विद्यमान है। हे सर्वशक्तिमान! तुम अपने ऐश्वर्यशाली स्वरूप को प्रकट करो। यह सारा त्रिभुवन तुम्हारे ही चरणों में है। जड़ में कोई भी शक्ति नहीं होती; आत्मा की शक्ति का ही यह सारा प्रभाव है।]
“अदम्य उत्साह से कार्य शुरू करो। भय किस बात का? तुम्हें रोकने का सामर्थ्य किसमें है?
कुर्मस्तारकचर्वणं त्रिभुवनमुत्पाटयामो बलात्।
किं भो न विजानस्थस्मान् रामकृष्णदासाः वयम्॥
हम ग्रह-तारे पीसकर चूर्ण कर डालेंगे, सारे त्रिभुवन को बलपूर्वक उलट-पुलट कर छोड़ेंगे। तुम्हें मालूम नहीं हम कौन हैं? हम रामकृष्ण के दास हैं!”
स्वामी विवेकानन्द द्वारा तैयार किए गए श्रीरामकृष्ण संघ के प्रतीक-चिह्न (लोगो) पर लिखा है — ‘तन्नो हंसः प्रचोदयात्’ — वह परमात्मा हमें प्रेरणा दे। उस प्रतीक-चिह्न में सूर्य, कमल, उछलता हुआ पानी और इन सबको घेरने वाला सर्प क्रमशः ज्ञान, प्रेम, कर्म और ध्यान के प्रतीक हैं, तथा मध्य में स्थित हंस आत्मा का प्रतीक है। ज्ञान, प्रेम, कर्म और ध्यान ये शक्तियाँ हर किसी में कम-अधिक मात्रा में होती ही हैं, लेकिन यदि उनके प्रेरणास्रोत अथवा टेकू (आलंब) यदि अत्यंत नश्वर, भ्रामक ऐसे इंद्रिय-विषय होंगे, तो वे शक्तियाँ अज्ञान का आवरण कैसे दूर करेंगी? परंतु उन्हीं शक्तियों का प्रेरणास्रोत यदि अखंड, अभेद्य सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा हो तो?
तो क्या होता है इसका अनुभव हर कोई स्वयं ले सकता है। चिड़िया ने जैसे आत्मशक्ति के कुशल उपयोग से अपना खोया हुआ मोती वापस पा लिया, वैसे ही हम भी अपना खोया हुआ स्वरूप-मोती प्राप्त कर सकते हैं।
स्वामी योगत्मानन्द जी रामकृष्ण मिशन, शिलांग के पूर्व प्रमुख तथा वर्तमान में अमेरिका स्थित वेदांत सोसाइटी ऑफ प्रोविडेंस के अध्यक्ष रामकृष्ण संघ के एक वरिष्ठ संन्यासी एवं प्रखर आध्यात्मिक वक्ता हैं, जो वैश्विक स्तर पर वेदांत दर्शन के सरल प्रसार और मानवीय सेवा के लिए जाने जाते हैं।