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Review - पुस्तक समीक्षा

पुस्तक: 'दर्ज़ होंगे जख़्म'

गीता लिम्बू   |   Autumn 2026

पुस्तक: 'दर्ज़ होंगे जख़्म'

कवियित्री- सरिता शैल

समीक्षक - गीता लिम्बू
'दर्ज होंगे जख़्म' का काव्यात्मक सौंदर्य'

 

   मन में हलचल और अनेक जिज्ञासाएँ उत्पन्न करने वाला शीर्षक और एक निपुण चित्रकार की सूक्ष्म कलाकारी से सुसज्जित आवरण पृष्ठ के साथ प्रस्तुत कवयित्री सरिता सैल जी का कविता संग्रह "दर्ज होंगे जख़्म" पहली ही दृष्टि में ध्यान आकर्षित करता है।

अंतःपृष्ठ में भूमिका, उत्कृष्ट विश्लेषण सहित रचनाओं पर विद्वानों की प्रतिक्रियाएँ, प्रस्तावना और अनुक्रमणिका पुस्तक का परिचय करवाते हैं। पुस्तक परिचय में ही पाठक को 'दर्द-ए-जख़्म' का अहसास होने लगता है।

सरिता जी की कविताएँ समसामयिक राजनीतिक, सामाजिक और प्राकृतिक विसंगतियों को झेलते मानव जीवन की जिजीविषा के यथार्थ की अभिव्यक्ति हैं।

"दर्ज होंगे जख़्म" में मानवीय मूल्यों का ह्रास करती विसंगतियों के प्रति क्रोध और स्वार्थी शोषकों के प्रति घृणा है। इनके विरुद्ध बार-बार नुकीले व्यंग्य-बाण छोड़े गए हैं, तो दूसरी ओर बंजर ज़मीन के कारण पलायन करने वाले किसानों, उपेक्षित निम्न वर्गीय लोगों, विस्थापितों और शोषित स्त्रियों के प्रति करुणा है। इसमें युद्ध और मृत्यु की भयावहता है, तो शांति, आनंद और वात्सल्य भी है (जैसे— 'पहली बारिश में' - पृष्ठ 44, और 'गर्भनाल की जमीं' - पृष्ठ 81 में वात्सल्य है)। 'प्रेम' (पृष्ठ 27, 28) कविता में प्रेम और शृंगार है। 'जिस दिन उसने ज़बान खोली थी', 'नाक', 'औरत की जात बिकाऊ नहीं है' और 'मैं बीज हूँ' (पृष्ठ 22) जैसी कविताओं में वीर रस का संचार हुआ है और जागृति की चिंगारी छिटक रही है। 'धूप की यात्रा' (पृष्ठ 23) में धूप के मानवीकरण से अद्भुत रस की सृष्टि हुई है। समग्र रूप से देखा जाए तो इस काव्य-पुस्तक में नवरसों का समावेश हुआ है।

 

सौष्ठवपूर्ण और भावानुकूल शब्दों का चयन तथा विन्यास सैल जी की काव्य-कला की प्रमुख विशेषता है। कवयित्री ने अलंकार, प्रतीक और बिम्बों का पर्याप्त एवं यथोचित प्रयोग किया है, जिसके कारण काव्य में विद्यमान रचनात्मक सुंदरता एवं सरसता झलकती है।

कविता 'त्रिशंकु' (पृष्ठ 33) में खेत की बंजरता के कारण गाँव छोड़कर शहर में जीविका चलाने के लिए गए किसानों के अव्यवस्थित फुटपाथी जीवन की झलक है—

महानगरों के बीच
दम तोड़ते सपने
त्रिशंकु-सा जीवन
न गाँव का बाशिंदा
न शहर का...

'त्रिशंकु' विस्थापित किसान-जीवन की सार्थक उपमा है। सैल जी की अधिकतर कविताएँ किसानों पर आधारित हैं और ये कविताएँ गाँव के हरे-भरे खेतों में लहलहाती धान की बालियों की, सुनहरे पके धान से भरे खलिहानों की, किसानों की उत्साह भरी हँसी की, कुएँ पर औरतों की हँसी-ठिठोली की, चैती गीतों और बैलों की घंटी की कहानियाँ सुनाती हैं; तो दूसरी ओर बंजर भूमि, विवश किसानों का पलायन, उजाड़ गाँव और विस्थापित किसानों के शहर में दर-दर ठोकर खाते दयनीय जीवन की तस्वीरें भी दिखाती हैं। इन कविताओं में विरोधाभास के साथ दृश्य बिम्ब, श्रव्य बिम्ब, घ्राण बिम्ब और अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है।

'धूप की यात्रा' (पृष्ठ 23) एक रूपक कविता है, जिसमें धूप का मानवीकरण हुआ है। पूरी कविता में स्पर्श बिम्ब और दृश्य बिम्ब के प्रयोग से एक नारी की दिनचर्या का सजीव चित्रण किया गया है। 'बारूदी रंग' (पृष्ठ 37) कविता में भी अन्न की बड़ियों, बारिश की बूँदों और बादलों का मानवीकरण किया गया है। मिट्टी की गंध, बैलों की घंटियाँ, बारूदी रंग आदि के माध्यम से घ्राण बिम्ब, श्रव्य बिम्ब और दृश्य बिम्ब का सटीक प्रयोग हुआ है।

पुस्तक में प्रस्तुत प्रथम कविता 'मानदंड' में प्रतीकात्मक बिम्ब का सुंदर प्रयोग करके घटनाओं या परिस्थितियों के दो पहलुओं को यथार्थ के मापदंड पर तौला गया है—

पत्तों का पेड़ पर से गिरना
हमेशा उसकी उम्र का
पूरा हो जाना नहीं होता
कभी-कभी यह तूफ़ान की साज़िश भी होती है

यहाँ 'पत्तों का पेड़ से गिरना' मृत्यु का प्रतीकात्मक बिम्ब है। इनके अतिरिक्त, सरल और प्रवाहमान भाषा इस काव्य का विशेष आकर्षण है। संदर्भ और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शक्तियों के साथ चलते भावों की गति में लचीलापन है और एक मनोहारी लय का सृजन हुआ है।

कवयित्री सरिता सैल जी की रचनाएँ विसंगतियों से प्रदूषित यथार्थ के शुष्क धरातल पर जन्मी हैं, परंतु रचनाओं को काव्य-रस ने सींचकर सरस बना दिया है। इन रचनाओं में सभी प्रकार की मानवीय अनुभूतियों का स्पर्श है। समग्र रूप से 'दर्ज होंगे जख़्म' मानवीय संवेदनाओं की एक गहरी अभिव्यक्ति है।


author
गीता लिम्बू