एक मित्र ने कहा।
"हाँ! क्या मुस्कान है, गजब! विंची ने कमाल कर दिया है।"
दूसरे ने हामी भरी।
"चित्रकला प्रदर्शनी लगी है। देखने चलोगे? सुना है, वहाँ उस चित्र की अनुकृति भी है।"
वर्षो से दोनों की लालसा चित्रकार लियोनार्डो दा विंची की बहुचर्चित कलाकृति देखने की थी। वे पत्रिकाओं, समाचार पत्रों में छपी तस्वीर देखते रहे थे।
दोनों चित्रकला प्रदर्शनी देखने गए। मोनालिसा की कलाकृति की फ्रेमजड़ित अनुकृति के सामने पहुँचे। देर तक खड़े रहे।
उनकी अभिलाषा पूरी हुई पर पहले मित्र को निराशा महसूस हुई। उसने कहा,
"जैसा सोचा था, वैसी नहीं लगी।"
दूसरा मित्र मोनालिसा की मुस्कुराहट और चित्रकार की प्रशंसा में आसमान के कुलाबें मिला रहा था। पहला थोड़ी देर उसकी बातें चुपचाप सुनता रहा।
अंततः उसके सब्र का बाँध टूट गया।
"तुमने अब तक कितने लोगों की मुस्कान देखी है?
"मतलब?" दूसरा चौंका।
"मोनालिसा की मुस्कान ही सबसे आकर्षक मुस्कान नहीं है जी।"
मुग्ध मित्र ने बुरा सा मुँह बनाया।
"एक भी दिखला दो तो मानूं।"
"साँच को आँच क्या! लो देखो।"
उसने मोबाइल निकालकर स्क्रॉल किया। गैलरी खोलकर दूसरे के सामने कर दी।
कहीं कीचड़ में डूबी धान के पौधे रोपती स्त्री के गाल-बालों में कीचड़ लगा चेहरा खिलखिला रहा था, कहीं सर पर टोकरी थामे फटे वस्त्रों में हँसती स्त्री नजर आ रही थी। कहीं बच्चे को पीठ पर बाँधकर सामानों से लदी-फदी विपन्न स्त्री के डिम्पलवाले कपोल पर परम संतोषी आभा जलवा बिखेर रही थी।
"और देखना है? देखो।"
उसने अगला फोटो दिखलाया।
पत्थर तोड़ती स्त्री के स्वेदकण से भरी लाल नाक के नीचे दो पँखुड़ियाँ भरपूर खिली थीं। उनमें कोई भी मलीनता नजर नहीं आ रही थी।
"मित्र! श्रम की मुस्कान सबसे आकर्षक होती है।"
दूसरा दर्शक निरुत्तर। मोबाइल की गैलरी से उसकी उत्सुक नजरें चिपक-सी गई थीं।