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लघुकथा

आँख का तारा 

डॉ. मीना कुमारी परिहार 'मान्या' पटना   |   Autumn 2026

  जुम्मन चाचा गाँव के लोगों की सेवा में लगे रहते थे। जुम्मन चाचा को गाँव में कौन नहीं जानता था। घर में किसी के यहाँ झगड़ा हो जाए तो सुलझाना, कोई बीमार हो जाए तो अस्पताल ले जाना, लड़कियों को स्कूल पहुँचाना,

ऐसे कार्यों को चुटकी में हँसते-हँसते कर जाते थे। गाँव के  बरगद पेड़ के नीचे उनकी खटिया लगी रहती थी।

गाँव के बच्चे उनसे कहानी सुनने आते थे। बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाई की बातें समझाना, नैतिकता का पाठ पढ़ाना। पंचायत का मुखिया भी इन्हें काफी तवज्जो देता था। कोई भी फैसला लेना हो तो जुम्मन चाचा को आमंत्रित करता था। जुम्मन चाचा सबके चहेते बन गए थे। उनके बच्चे जब अमेरिका से मिलने आए तो उनकी खुशी का ठिकाना न था।

"बाबूजी! हम लोग यूँ ही बिना समझे आपको हर वक्त कुछ न कुछ कह दिया करते थे कि क्यों आप दिन भर बच्चों के बीच रहते हैं और सारा काम छोड़कर क्यों गाँव के लोगों के लिए मेहनत करते हैं, कभी तो आराम कर लिया कीजिए।"

"आज क्या कहना चाहते हो मेरे बच्चों!"

"यही कि आज आपका जीवन सार्थक हुआ।  हम ही ग़लत थे।  समझ न सके आपकी सेवा-भावना को।आप सभी के आप सभी के आंख के तारे बन गए हैं। सभी के ज़ुबां पर है जुम्मन चाचा !जुम्मन चाचा!"


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डॉ. मीना कुमारी परिहार 'मान्या' पटना

डॉ. मीना कुमारी परिहार 'मान्या' पटना, बिहार की एक प्रतिष्ठित साहित्यकार, कवयित्री और विदुषी हैं। वे पटना के सांस्कृतिक और साहित्यिक गलियारों में अपनी सक्रिय भागीदारी के लिए जानी जाती हैं।