अग्नि,आग, पावक, अनल किसी भी नाम से सम्बोधित करें, यह तत्व जितना पावन होता है उतनी ही दाहक भी होता है। अपनी विकट भूखी ज्वाला में यह सब कुछ हजम कर जाता है। परन्तु यही अग्नि जब रामचरित मानस के विविध प्रसंगों में उपस्थित होती है, तब शीतल और पावन होने के साथ ही संदेशप्रद भी होती है। कहा भी गया है कि जैसा स्वभाव, वैसा भाव। मानस की प्रकृति में, उसके स्वभाव में ही है उसको अपनाने वालों को विकार रहित करना। इसीलिये इसमें विविध रूपों में अपनी उपस्थिति दिखाती अग्नि प्रकृतिगत विकारों को ही जलाकर सब कुछ पावन करती चलती है।
सामान्यतः अग्नि दो तरह की होती है ... पहली जो स्थूल आँखों से बहुत से लोगों को एक साथ भी दिखाई दे सकती है। दूसरी अग्नि वह है जो दिखाई तो नहीं देती परन्तु अनुभव की जाती है, वह है अंतर्मन की अग्नि, जो मन की दुर्बलता को दूर कर देती है। रामचरित मानस में दोनों प्रकार की अग्नि दिखाई देती है।
साथ ही कहीं-कहीं पर दोनों ही प्रकार की अग्नि दृष्टि में आती है जो दृष्टव्य होने के साथ ही अंतरमन में भी अपनी तीव्र दाहकता से दस्तक देती लगती है। ऐसा ही प्रसंग आता है जब राक्षसों के अत्याचार से त्रस्त हुए शरभंग मुनि का राम की प्रतीक्षा करते हुए निराश हो कर अग्निप्रवेश करने का तुलसीदास जी ने वर्णन किया है। असुरों द्वारा नित्यप्रतिदिन यज्ञादी में व्यवधान उपस्थित करने, प्रताड़ित करने से क्षुब्ध हुए सुतीक्ष्ण मुनि, राम की प्रतीक्षा कर रहे थे। परन्तु उनके आने में हो रहे विलम्ब से दुःखी हो कर आत्मदाह के लिए बनी चिता में प्रवेश कर जाते हैं। स्वनिर्मित चिता में जलते हुए शरभंग मुनि राम के अंतरमन में आक्रोश की अग्नि को अलग ही तीक्ष्णता दे जाते हैं।
इसी प्रकार दोनों प्रकार की अग्नि का एक और प्रसंग है, हनुमान जी द्वारा लंका के भीषण दहन का। लंका का यह अग्नि काण्ड हनुमान जी, जिन को सीता जी ने अपना पुत्र माना था, के आक्रोश की अग्नि प्रतीत होती है। सामर्थ्यवान पुत्र अपनी माँ के अपहर्ता रावण की नगरी, लंका को जला कर उनके अपमान का प्रतिशोध लेते हुए चेतावनी सी देता है कि आततायी अपनी परिधि में रहे और माता सीता को ससम्मान वापस राम तक पहुँचा आये। उसके ऐसा नहीं करने पर, राम के आने पर उनकी विजयश्री की मार्ग में आनेवाली संभावित बाधाओं को नेस्तनाबूत करने का प्रयास भी था यह अग्नि काण्ड, जिसमें लंका के आयुध भंडार के साथ ही वहाँ के निवासियों का आत्मबल भी नष्ट हो गया था। लंका दहन एक पुत्र एवं भक्त के समर्पण का ज्वलंत उदाहरण है।
मानस में अग्नि का एक और चर्चित प्रसंग लंका विजय के पश्चात राम के पास वापस जाने पर सीता की अग्नि परीक्षा देने का है। यद्यपि इस प्रसंग से संबन्धित कई उप कथाएँ भी हैं, तथापि यदि साधारण मनुष्य के समान समझें तब भी यही लगता है कि रामराज्य की आधारशिला यहीं पड़ गयी थी। यहाँ स्पष्ट परिलक्षित होता है कि नियमों के समक्ष, राजा हों या प्रजा, सब समान हैं। तथापि आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तब यह प्रसंग इंगित करता है अग्नि देव को सीता जी की छाया अर्पित कर शक्ति के मूल पावन तत्व ,असली वैदेही को वापस लाने का ही था।
इस का एक और ही अर्थ ज्यादा मोहक लगता है, जो दिखाता है कि सबसे नाजुक समझी जाने वाली स्त्री के प्रतीक के रुप में, पूरे वनवास काल में सबसे अधिक मुश्किलों का सामना सीता जी ने ही किया और इस का सामना करने में सहायक बना उनका आत्मबल जिसने अशोक वाटिका में एक नन्हे से तिनके को कवच सरीखा बना लिया था। एक तरह से सीता जी ने आमजन में यह विश्वास भरने की प्रेरणा दी कि कोई कितना भी असहाय क्यों न लग रहा हो, यदि वह आत्मबल को साधे रहे, तब विकटतम दुष्कर परिस्थियों का भी सामना कर सकता है। साथ ही यह भी बताता है कि यदि विश्वास प्रबल हो तो सबसे दुर्बल और उपेक्षित जीव अथवा वस्तु भी उस तिनके के समान सशक्त सहारा बन सकता है।
यद्यपि इस विषय में एक और भी उपकथा है जिस को दृष्टि की ज्वाला रूपी अग्नि भी कह सकते हैं। विवाह के बाद, जब सीता जी के अपनी पहली रसोई में मिष्ठान परोसते समय, एक घास का तिनका हवा से उड़कर राजा दशरथ की थाली में गिर गया था। उसको उन्होंने अपनी क्रोधित, एकाग्र दृष्टि से घूरकर राख कर दिया था। यह देख कर दशरथ जी ने सीता जी से वचन लिया था कि वो अपनी इस शक्ति का उपयोग कभी नहीं करेंगी।
लंका में उन्होंने अपने इसी वचन के कारण अपनी इस शक्ति का उपयोग रावण पर नहीं करके, केवल मर्यादा बनाए रखने के लिए तिनके का सहारा लिया। यह घटना उनकी आंतरिक शक्ति का प्रतीक है, जिसे उन्होंने मर्यादावश रावण पर प्रयोग नहीं किया।
दिखाई देने वाली अग्नि का तीसरा प्रसंग है कामदेव के जलने के समय का। कामदेव प्रतीक हैं इच्छाओं के, जाजलव्यमान कामनाओं के। अन्य देवताओं की इच्छा पूर्ति करने के लिए, वो शंकर भगवान की तपस्या भंग करने की कामना ले कर गए थे, परन्तु भोलेनाथ के तीसरे नेत्र के खुलते ही, स्वयं ही भस्म हो गए। यह प्रसंग इंगित करता है कि ईष्ट के पास सिर्फ़ उनको पाने की और स्वयं को उन के प्रति समर्पित करने की ही कामना ले कर जाना चाहिए, न कि उनको अपनी इच्छानुसार परिवर्तित करने के।
रामचरित मानस में इस अग्नि के अतिरिक्त भी कई प्रकार की अग्नि और उसकी दाहकता, बिम्ब के रुप में दिखाई देती है, मन की अग्नि के रूप में, प्रकट नहीं होते हुए भी, या कह लीजिये कि दिखाई नहीं देते हुए भी है, अनेक स्थानों पर उपस्थित होती है।
इस श्रेणी में सबसे पहले ध्यान आकर्षित करता है कैकेयी के मन का दावानल, जो स्वयं के अस्तित्व को कलंक की अग्नि में आहुति दे कर राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाने की इच्छा शक्ति की अग्नि से प्रज्जवलित होती है। यदि कैकेयी वचन में राम का वनवास नहीं मांगती, तब राम के वन गमन की परिस्थिति ही नहीं आती और वह अन्य राजपुत्रों के समान एक साधारण राजपुत्र ही रह जाते जो इतिहास नहीं बना पाते अपितु इतिहास के पन्नों में कहीं खो गए होते।
इसी प्रकार की अग्नि दृष्टि में तब आती है जब वह कर्तव्य एवं सामाजिकता के आवरण में है जो विश्वामित्र के अनुरोध पर यज्ञ की रक्षा के लिए, उनके साथ राम एवं लक्ष्मण को भेजने से दशरथ को विवश सी करती दिखाई देती है।
अग्नि अपनी तीव्रतम दाहकता के साथ तब भी परिलक्षित होती है जब दशरथ कैकेयी को दिए गए वचनों को पूरा करने के लिए अपने हृदयांश राम को चौदह वर्षो के वनवास पर जाते देखते हैं और उनके अपने कुल की परिपाटी, कि 'प्राण जाये पर वचन नहिं जाई' की परम्परा के पालन की विवशता की कुंठा से प्रज्जवलित क्रोधाग्नि, उनके अपने ही प्राणों की आहुति भी ले लेती है।
दुबारा भी राम के रूप में एक सामाजिक चेतना की अग्नि प्रज्जवलित हुई थी जिसने अयोध्या के राजमहल से निकल कर, लंका तक के नामालूम से कंकर-कंकर को भी अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध करता पत्थर बना दिया था और सामान्य वनवासी एवं पशु पक्षी भी दिव्यास्त्रों के सम्मुख चट्टान बनने को तत्पर हो गए।
पारिवारिक सदभाव एवं रिश्तों के सामंजस्य की पावन अग्नि भी गुनगुनी गरमाहट दे जाती है जब राम के वनगमन पर, चाहें वो ऋषि के माँगने पर यज्ञ की सुरक्षा के लिए वन जाना हो अथवा कैकेयी के वचनों के परिणामस्वरूप का वन गमन हो, हर बार लक्ष्मण राम का अनुगमन करते हैं। इस श्रृंखला में भरत भी कहीं पीछे नहीं हैं। वो अयोध्या के राज़ सिंहासन के स्थान पर राम के ह्रदय के सिंहासन के आकांक्षी प्रतीत होते हैं, जब वह उनके प्रतिनिधि के रूप में नंदीग्राम से और शत्रुघ्न अयोध्या में रह कर राज्य की व्यवस्था को सुचारु रखते हैं।
इसी कड़ी में क्रोध और शर्मिंदगी की अग्नि प्रकट होती है राम के वनवास के कारण रूप में स्वयं को पा कर अपनी माँ कैकेयी को दोषी मानते हुए भरत के द्वारा उन के त्याग के रुप में।
अहंकार की अग्नि के प्रतीक रूप में रावण का चरित्र आता है। स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने का उसका अहंकार, उसके पूरे कुल का नाश करवा देता है। इस कार्य में सहयोगी बनती है, रावण द्वारा अपने पति विद्युज्जिन्ह के वध का बदला लेने की लालसा की शूर्पणखा के हृदय में जलती प्रतिशोध की अग्नि। वैसे एक सत्य यह भी है कि शुर्पणखा के अंतस में सिर्फ़ रावण के प्रति प्रतिशोध की ही नहीं, अपितु सीता एवं राम के परस्पर प्रेम एवं समर्पण से जगी ईर्ष्या की अग्नि भी सुलग रही थी। राम के सौम्य आकर्षक रूप पर मोहित हो कर, उसने राम के प्रति प्रेम निमंत्रण दिया था जिस को राम द्वारा नकारे जाने और लक्ष्मण द्वारा उसके कर्ण नासिका भंग किये (काटे) जाने का कारण सीता को मान कर, अनदेखी ईर्ष्या की आत्मदाही अग्नि की लपटों से द्वारा उसका हृदय सुलग उठा था।
जगत जननी सीता के रूप में प्रकट हुई माया की शक्ति की सात्विक अग्नि, पावन हवन की समिधा सी प्रकट हुई। लंका से उनको मुक्त कराने के लिए चले, एक प्रकार के जन अभियान में, स्वयं को सर्वथा निरीह, दुर्बल माननेवाले प्राणियों में आत्मचेतना की अलख जगा गयी थी।
अयोध्या के राजपरिवार की स्त्रियों की बात की जाए तो कौशल्या के ह्रदय में सब्र एव सहनशीलता की गुनगुनी सी गरमाहट का एहसास है तो सुमित्रा कर्तव्य पथ पर अडिग हो कर चलने वाली अलग ही तरह के दीपक की लौ सी जगमगाती, मार्ग प्रशस्त करती अग्निशिखा हैं। माण्डवी और उर्मिला के हृदय में कर्तव्य एवं प्रतीक्षा की अग्नि दाहकता के स्थान पर गुनगुना सा एहसास देती है।
मानस में अग्नि सिर्फ़ अयोध्या के महल में ही सिमट कर नहीं रह गयी है, अपितु अयोध्या से लंका तक के वनों में निवास कर रहे ऋषियों के विवश आक्रोश की दाहकता के रुप में दावानल सी विस्तार पाती है। सच यह दावानल ही तो था जिसने अयोध्या के राजमहल से राम-लक्ष्मण रुपी चिंगारी को प्रखर बनने को प्रेरित कर के आसुरी प्रवृत्ति वाली लंका को नष्ट कर दिया।
मौसम एवं परिस्थितियों के अनुसार ही अग्नि अपना असर छोड़ती हुई कभी जलाती है तो कभी ठंड में ठिठुरती काया को गुनगुनी सी ऊष्मा प्रदान करती है। रामचरित मानस में, राम के सम्पर्क में आ कर अग्नि अपने सबसे पावन रूप ,में जीवन रूपी हवन में विकारों की समिधा को मुक्ति देती लगती है।
स कुछ भस्म कर के, समूल नष्ट कर देने की क्षमता रखनेवाली, अग्नि को राम का आशीर्वाद मिल जाता है तब रामचरित मानस के विविध प्रसंगों में सर्दियों की धूप सी सकारात्मक लगती है! अपनी दाहकता से समूल नाश का परिचय देती यही अग्नि, राम के प्रभाव में सबको जोड़ने का काम कर जाती है और मन प्रभु कृपा की गुनगुनी धूप सेंकने लगता है।
जीवन का सच कहती अपनी ही पंक्तियों से प्रभु को नमन करती हूँ ...
जीवन जब जब हो कठिन, साँस लगे अभिशाप।
चरण शरण प्रभु की चलो, करो राम का जाप।।
कई साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित निवेदिता श्रीवास्तव ‘निवी’ एक लेखिका, शिक्षिका और कलाकार हैं। अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर डिग्री के साथ, उन्होंने मिशन स्कूलों में पढ़ाया है और मदर काउंसलर के रूप में काम किया है। लेखिका और कवयित्री के रूप में, निवेदिता ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशनों में कई किताबें और कई लेख प्रकाशित किए हैं। वह एक साहित्यिक समूह, भाव कलश की संस्थापिका हैं।