कभी हरे पत्तों की गहराई में उतर कर
खोजना खुद का अर्थ
कभी चूम लेना दरख्तों की छाल
जी भरकर
कभी पत्थरों के सीने पर
आंसू बहा देना
कभी सघन प्रणाम कर लेना
सूनसान राहों को
कितने सारे ऋण अदा किए बगैर
कैसे जीए जाते हो ?
जड़ों से उठकर जड़ों पर फैली घास
हमारे लिए सबक तो नहीं ?
आत्मा में उमड़ते मोह के सिवाय
कोई जादू नहीं
जो कंकड़-पत्थर भी जिंदा कर सके
हमारी उम्र से कई गुना ज्यादा।
गहराती ही क्यों जा रही ?
भूख से बाहर निकल कर
अनाजों को देखने की भूख
मनुष्यता को हरा रखने के लिए
फसलों का खड़े-खड़े कट जाना
क्यों ऋण चढ़ाता जा रहा ?
शेष जीवन में।।