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Poesy - कवितायन

मोह के सिवाय कोई जादू नहीं

भरत प्रसाद   |   Autumn 2026

कभी हरे पत्तों की गहराई में उतर कर
खोजना खुद का अर्थ
कभी चूम लेना दरख्तों की छाल
जी भरकर
कभी पत्थरों के सीने पर
आंसू बहा देना
कभी सघन प्रणाम कर लेना
सूनसान राहों को
कितने सारे ऋण अदा किए बगैर
कैसे जीए जाते हो ?

जड़ों से उठकर जड़ों पर फैली घास
हमारे लिए सबक तो नहीं ?
आत्मा में उमड़ते मोह के सिवाय
कोई जादू नहीं
जो कंकड़-पत्थर भी जिंदा कर सके
हमारी उम्र से कई गुना ज्यादा।

गहराती ही क्यों जा रही ?
भूख से बाहर निकल कर
अनाजों को देखने की भूख
मनुष्यता को हरा रखने के लिए
फसलों का खड़े-खड़े कट जाना
क्यों ऋण चढ़ाता जा रहा ?
शेष जीवन में।।
 


author
भरत प्रसाद