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Poesy - कवितायन

बसंत में सायकिल चलाती लड़की

डाॅ मुक्ता   |   Autumn 2026

गांव की धूल भरी सड़क पर सायकिल चलती लड़की
नहीं देखी है  मुड़कर पीछे
सड़क के दोनों ओर खेतों में बिछी है पीली सरसों
सरसों के फूलों पर मंडरा रही हैं तितलियां
पीली ओढ़नी सी बिछी सरसों- के ऊपर मंडराती तितलियां... आकर्षित करती हैं लड़की को  लड़की अपने मन को बाँध... तन को साधती - देख रही है -
 ...अपने लक्ष्य की ओर
कभी इन्हीं धूल भरी राहों में खो गई थीं
कितनी ही लड़कियां ...
मां की  मांओं की सखियां - बालपन में ब्याही गई
घूंघट में लिपटी लजीली- गठरियाँ
लोगों ने नाम दिया था सुंदर- तितलियां

नुचे पंख खो गईं लड़कियां - अनाम गांव के किसी आंगन में

 

सायकिल चलाती लड़की सजग है अपने प्रति
तितली और फूल के समीकरण से दूर
अंतरिक्ष के खगोलीय नक्षत्र के - सवालों को हल कर रही है- लड़की
पृथ्वी और आकाश को एक साथ  साध रही है लड़की।


author
डाॅ मुक्ता