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Poesy - कवितायन

अदृश्य विस्तार

अन्नपूर्णा 'महाराजा'   |   Autumn 2026


अन्नपूर्णा महाराजा

 

हे विधाता!
सृष्टि के सृजनहार…

 

धरती के ऊपर, जो
सजा दिए तुमने
हिमालय, अरावली और कैलाश से पहाड़।

 

मानो आकाश को थामे हुए
तेरे ही शक्तिस्तम्भ हो।

 

पर क्या यह भी सत्य है
कि समुद्र की अथाह गहराइयों में भी
रच रखे हैं तुमने
वैसे हीं अनगिनत से पहाड़?

 

अतल गहराइयों में भी तुमने
सजा दिया है विस्मय का संसार।

 

जो दिखते नहीं,
पर मौन खड़े हैं
जलीय आवरण में लिपटे,
अपनी ही गहराइयों में छिपते।

 

हे सृजनहार!
तेरी रचना का यह रहस्यमय संसार
और भी विस्मित करता है,

 

कि जो ऊपर है,
वह नीचे भी है…
जो प्रकट है,
वह अप्रकट भी है…

 

तेरी सृष्टि में
कुछ भी अधूरा नहीं,
हर दृश्य के पीछे है
एक अदृश्य विस्तार

 

हे विधाता!
तेरी यह लीला
सीमा में भी असीम का बोध कराती है…

 

जहाँ दृष्टि रुक जाती है,
वहीं से
तेरा वैभव प्रारंभ होता है
और धरती का इंसान अचंभित होता है।


author
अन्नपूर्णा 'महाराजा'

जयपुर की अन्नपूर्णा 'महाराजा' को कविता और साहित्य सृजन से गहरा लगाव है। प्रकृति के विविध रूपों, पर्यावरण और प्राकृतिक सौंदर्य को शब्दों में पिरोना आपकी काव्य शैली की मुख्य विशेषता है।